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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

व्यापारिक घराने हिंदी अपनाने पर बाध्य होंगे

साहित्यिक रपट

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं लोकार्पण समारोह संपन्न


स्थिति और परिघटना भाषा के प्रयोजन पक्ष की नियामक हैं - प्रो. दिलीप सिंह
व्यापारिक घराने हिंदी अपनाने पर बाध्य होंगे - विनोद तिवारी
साहित्य की भाषा भी विविध रूपों में प्रयोजनवती होती है - प्रो. ऋषभदेव शर्मा


हैदराबाद, 21 अप्रैल, 2009 (प्रेस विज्ञप्ति)।


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के धारवाड केंद्र में 'प्रयोजनमूलक हिंदी के नए आयाम' विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। इस अवसर पर संस्थान के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह की वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कृति 'हिंदी भाषा चिंतन' तथा उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय द्वारा प्रकाशित प्रो.. दिलीप सिंह और प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित ग्रंथ 'अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य' को लोकार्पित भी किया गया।


आरंभ में समारोह का उद्घाटन करते हुए 'माधुरी' के पूर्व संपादक विनोद तिवारी ने विश्वास दिलाया कि भावी विश्व की एक प्रबल भाषा के रूप में हिंदी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है क्योंकि तकनीकी और वैश्विक वाणिज्य के क्षेत्रों में हिंदी का निरंतर विस्तार हो रहा है। उन्होंने साहित्यिक भाषा से अधिक ध्यान प्रयोजनमूलक भाषा पर देने की माँग करते हुए कहा कि आने वाले समय में सभी व्यापारिक घरानों को हिंदी माध्यम अनिवार्य रूप से अपनाना होगा। 'अनुवाद' पत्रिका के संपादक डॉ. पूरनचंद टंडन ने विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए अनुवाद की भूमिका पर ज़ोर दिया और कहा कि शुद्धतावाद तथा छुआछूत से बचकर ही किसी भाषा का आधुनिकीकरण और विस्तार हो पाता है।


बीज वक्तव्य में प्रो. दिलीप सिंह ने विस्तारपूर्वक अलग-अलग व्यवहार क्षेत्रों में भाषा प्रयोग की चुनौतियों की चर्चा की और कहा कि अब समय आ गया है कि प्रयोजनमूलक हिंदी के विभिन्न रूपों का विवेचन और विश्लेषण स्थितियों और परिघटनाओं के परिवर्तन के संदर्भ में किया जाए।


उद्घाटन सत्र में ही संस्थान के समकुलपति आर.एफ. नीरलकट्टी ने दूरस्थ शिक्षा निदेशालय द्वारा प्रकाशित और प्रो. दिलीप सिंह एवं प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक 'अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य' को लोकार्पित किया। पुस्तक का परिचय देते हुए डॉ.. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि इसमें अनुवाद चिंतन के सभी अद्यतन और व्यावहारिक पक्षों का समावेश है।


'प्रयोजनमूलक हिंदी: ऐतिहासिक एवं सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ' विषयक प्रथम विचार सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पूर्व उपनिदेशक डॉ. दिनेश चंद्र दीक्षित ने की। डॉ.. सविता घुडकेवार, प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी, डॉ.. संजय मादार, डॉ.. साजी आर कुरुप तथा डॉ. रामप्रवेश राय ने अपने शोध पत्रों में प्रयोजनमूलकता की अवधारणा का विवेचन किया तथा पिछले चार दशकों में विभिन्न प्रयोजन क्षेत्रों के विस्तार का भी जायजा लिया।


दूसरे विचार सत्र में 'प्रयोजनमूलक हिंदी और प्रिंट मीडिया' के संबंधों का विश्लेषण किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता अंग्रेज़ी और भारतीय भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के आचार्य डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी ने की। डॉ. सुनीता मंजनबैल ने साहित्यिक पत्रिकाओं तथा डॉ.. जी. नीरजा ने दैनिक समाचार पत्रों में फल-फूल रही प्रयोजनपरक हिंदी का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत किया, तो विनोद तिवारी ने फिल्म पत्रकारिता, डॉ.. पी. श्रीनिवास राव ने खेल पत्रकारिता और डॉ. बिष्णु राय ने अन्य संदर्भों की पत्रकारिता के हिंदी भाषा पर पड़नेवाले प्रभावों की चर्चा की।


'सृजनात्मक साहित्य में प्रयोजनमूलक हिंदी के संदर्भ' पर केंद्रित तीसरे विचार सत्र की अध्यक्षता गोवा विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. बालकृष्ण शर्मा 'रोहिताश्व' ने की। इस सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने आलोचना, डॉ.. पी. राधिका ने कथा-साहित्य, डॉ.. बलविंदर कौर ने कविता, प्रो. अमर ज्योति ने संस्मरण तथा डॉ.. सूर्यकांत त्रिपाठी ने आत्मकथात्मक उपन्यासों की भाषा के प्रयोजनमूलक वैविध्यों की विस्तार से पड़ताल की। इससे प्रयोजनमूलक दृष्टि से सृजनात्मक साहित्य का विश्लेषण करने के विविध प्रारूप उभरकर सामने आए और यह स्पष्ट हुआ कि साहित्य भी भाषा का एक विशिष्ट प्रयोजन ही है जिसमें अलग-अलग विधाओं के प्रयोजनों के अनुरूप विशिष्ट भाषा का चयन किया जाता है तथा संदर्भ के अनुसार साहित्येतर विषयों की प्रयोजनपरक भाषा के समावेश द्वारा प्रामाणिकता की सिद्धि की जाती है।


चौथे विचार सत्र में 'प्रयोजनमूलक हिंदी के आनुषंगिक संदर्भ' की पड़ताल की गई जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव ने की। इस सत्र में डॉ. जयलक्ष्मी पाटिल, डॉ.. एन.लक्ष्मी, डॉ.. रेशमा नदाफ और प्रो. एस.वी.एस.एस..नारायण राजू ने कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान, राजभाषा, वैज्ञानिक लेखन और मीडिया लेखन के संदर्भ में उभरते हुए नए-नए भाषारूपों की विशेषताओँ पर प्रकाश डाला। विभिन्न सत्रों का संचालन प्रो. अमरज्योति, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. नारायण राजू, डॉ. सुनीता मंजन बैल और डॉ.. जयलक्ष्मी पाटिल ने किया।


दूसरे दिन सायंकाल आयोजित समापन समारोह की अध्यक्षता डॉ.. दिनेश चंद्र दीक्षित ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. जे.पी. डिमरी, प्रो. रोहिताश्व और राकेश कुमार मंचासीन हुए। डॉ.. रामप्रवेश राय और विनोद तिवारी ने संगोष्ठी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इससे
व्यावहारिक भाषा संबंधी अनेक भ्रांतियों का निराकरण हुआ है तथा विभिन्न व्यवहार क्षेत्रों में हिंदी के प्रगामी प्रयोग की दिशाएँ स्पष्ट हुई हैं। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद केंद्र के आचार्य प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर समकुलपति आर.एफ.नीरलकट्टी ने प्रो. दिलीप सिंह की सद्यःप्रकाशित कृति 'हिंदी भाषा चिंतन' का लोकार्पण किया तथा प्रो. जे.पी. डिमरी और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने लोकार्पित कृति के संबंध में समीक्षात्मक विचार प्रकट किए।


हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के निधन पर श्रद्धांजलि के साथ दो दिन का यह आयोजन समाप्त हुआ।0

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं लोकार्पण समारोह : धारवाड़

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के धारवाड़[कर्नाटक]केंद्र में आयोजित ''प्रयोजनमूलक हिंदी के नए आयाम'' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का दीप प्रज्वलन कर उद्घाटन करते हुए फिल्म पत्रिका 'माधुरी' के पूर्व सम्पादक विनोद तिवारी |

उद्घाटन सत्र में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के समकुलपति आर.एफ.नीरलकट्टी ने दिलीप सिंह और ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक ''अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य'' का लोकार्पण किया [दायें - नीचे]|

समापन सत्र में दिलीप सिंह की पुस्तक ''हिंदी भाषा चिंतन'' का भी लोकार्पण संपन्न हुआ [दायें - ऊपर]|

इस अवसर पर , साथ में उपस्थित 'अनुवाद' पत्रिका के सम्पादक पूरन चंद टंडन ,राम प्रवेश राय , इफ्लू के जगदीश प्रसाद डिमरी,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व उपनिदेशक दिनेश चन्द्र दीक्षित ,राकेश कुमार, गोवा विश्वविद्यालय के बालकृष्ण शर्मा रोहिताश्व,सचिव जे. एस. एन. पट्टनशेट्टी  तथा विभागाध्यक्ष अमर ज्योति |

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

सालारजंग संग्रहालय में जैन प्रदर्शनी

Posted by Picasa सालारजंग संग्रहालय में २६०८वीं महावीर जयंती के अवसर पर दस दिन की जैन धर्म संबंधी पुरातत्व प्रदर्शनी का उद्घाटन कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की पूर्व राज्यपाल डॉ. रमादेवी ने किया. बाद में वहीं ''वर्तमान विश्व में महावीर की अहिंसा का औचित्य''विषय पर संगोष्ठी संपन्न हुई [चित्र : 'स्वतंत्र वार्ता' से].

रविवार, 5 अप्रैल 2009

प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता*




भाषा रूपों का अध्ययन करने की आधुनिक प्रणालियों में एक यह मान कर चलती है कि प्रयोजनवती होकर ही कोई भाषा व्यापक प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है. ये प्रयोजन मोटे तौर पर दो प्रकार के हो सकते हैं.एक हैं सामान्य प्रयोजन ,जैसे दैनंदिन व्यवहार में वार्तालाप द्वारा विचारों का आदान -प्रदान . इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा को 'सामान्य प्रयोजनों की भाषा' कहा गया है. दूसरे प्रकार का सम्बन्ध विशिष्ट व्यवहार क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा रूपों से है, जैसे अलग अलग विज्ञान शाखाओं में अलग अलग भाषा रूप का प्रयोग होता है अथवा कार्यालय या प्रशासन के कामकाज को अंजाम देने के लिए खास तरह के भाषाप्रयोग में दक्ष होना ज़रूरी होता है. अलग अलग प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इन विशिष्ट भाषा रूपों को 'विशिष्ट प्रयोजनों की भाषा ' या प्रयोजनमूलक भाषा कहा जा सकता है.किसी प्रयोजनक्षेत्र की भाषा के वैशिष्ट्य के आधार पर उसकी प्रयुक्ति [रजिस्टर] का निर्धारण होता है. प्रयुक्ति विशेष के अभ्यास द्वारा उस क्षेत्रविशेष या ज्ञानशाखाविशेष के भाषिक व्यवहार में दक्ष हुआ जा सकता है. यहाँ यह भी साफ़ करना उचित होगा कि सामान्य प्रयोजन की भाषा को निष्प्रयोजन या प्रयोजनातीत नहीं कहा जा सकता ,बल्कि वह भी प्रयोजनाधारित एक प्रकार ही है. इसी तरह ललित या साहित्यिक भाषा को भी अलगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि साहित्य भी एक विशिष्ट प्रयोजन है तथा उसकी अपनी अनेक प्रयुक्तियाँ और उपप्रयुक्तियाँ हैं.

यहाँ तनिक रुक कर भारत के स्वातंत्र्योत्तर भाषिक परिवेश पर विचार करें तो पाते हैं कि यद्यपि भारत में राजभाषा के रूप में जनभाषाओं के प्रयोग का लम्बा इतिहास रहा है ,तथापि ब्रिटिश काल में उन्हें अपदस्थ करके अंग्रेजी को कार्यालय, प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया गया . ऐसा करना सर्वथा अवैज्ञानिक था परन्तु भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था. अतः स्वतंत्रताप्राप्ति के साथ ही यह आशा जगी कि अब भारत की राजभाषा हिंदी होगी.संविधान ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित कर भी दिया. लेकिन जहाँ जहाँ जिन जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था वहां वहां उन उन प्रयोजनों के लिए देश भर में हिंदी के प्रयोग को संभव बनाने की चुनौती आज भी हमारे सामने विद्यमान है. कार्यालयों में, व्यवसायों में, शिक्षालयों में और न्यायालयों में जब तक हिंदी प्रतिष्ठित नहीं हो जाती तब तक यही समझना चाहिए कि यह देश भाषिक तौर पर आजाद नहीं हुआ है. इस भाषिक आजादी को हासिल करने के लिए विविध प्रयोजनों की हिंदी के व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.

संभावनाओं से परिपूर्ण व्यवहार क्षेत्र के रूप में राजभाषाक्षेत्र अर्थात कार्यालय और प्रशासन का अपना महत्व है ,लेकिन लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता ने हिंदी की विविध प्रयुक्तियों को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. आज यदि खेल के मैदान से लेकर राजनीति के मैदान तक और व्यापर-वाणिज्य से लेकर कम्प्युटर के भूमंडलीय स्वरूप तक को सहेजने में हिंदी के विविध प्रयोजनमूलक रूप सक्षम दिखाई दे रहे हैं तो इसका श्रेय बड़ी सीमा तक हिन्दी पत्रकारिता को जाता है क्योंकि उसने राजकाज, शिक्षा,न्यायव्यवस्था और अन्य अनेक क्षेत्रों में राजभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा के बावजूद जनभाषा के रूप में उसकी व्यापक जनसंचार की शक्ति को पहचाना तथा नित-नूतन प्रसार पाते ज्ञानाधारित समाज की स्थापना में हिंदी को समृद्ध करते हुए स्वयं समृद्धि प्राप्त की.

वस्तुतः हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों के सन्दर्भ में पत्रकारिता की हिंदी के वैशिष्ट्य को समझना समसामयिक संचारयुग मेंअत्यंत प्रासंगिक विषय है. इसीलिए नीलम कपूर और सुनीता भाटिया ने अपनी पुस्तक ''प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता''[२००७] में इस विषय का सांगोपांग विवेचन किया है जो भाषा और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं वरन सामान्य अध्येता के लिए भी रोचक और उपयोगी है.
>ऋषभ देव शर्मा


*प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता ,
नीलम कपूर एवं सुनीता भाटिया ,
कान्ती पब्लिकेशन्स ,ए - ५०७/१२, साउथ गांवडी एक्सटेंशन , दिल्ली - ११००५३,
२००७, ४९५ रुपए ,सजिल्द. ३५० पृष्ठ .
--Posted By कविता वाचक्नवी to "हिन्दी भारत" at 4/04/2009 06:42:00 PM