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गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

शुभाशंसा : आशा मिश्र 'मुक्ता' की पुस्तक 'साहित्यिक पत्रकारिता'

साहित्यिक पत्रकारिता
आशा मिश्र 'मुक्ता'
2016
गीता प्रकाशन, हैदराबाद
मूल्य : 595/-
पृष्ठ : 176  

शुभाशंसा

हिंदी पत्रकारिता का चरित्र आरंभ से ही साहित्यिकता प्रधान रहा है. इसे यों भी कहा जा सकता है कि पत्रकारिता के उदय के साथ ही हिंदी साहित्य में यह विशिष्ट चारित्रिक परिवर्तन घटित हुआ कि उसने पत्रकारिता के सरोकारों को अपने सरोकार बना लिया. इस तरह साहित्य और पत्रकारिता ने एक दूसरे को व्यापक जन-गण-मन से जोड़ने में परस्पर सहयोग किया. इस सहयोग की चित्ताकर्षक परिणति है हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता. साहित्य और पत्रकारिता की इस जुगलबंदी का परिणाम यह हुआ कि साहित्य को व्यापक पाठक समुदाय मिला और पत्रकारिता बड़ी सीमा तक सौंदर्यबोध और लोकमंगल को भी सूचना और सनसनी को साथ साथ साधती रही. यह तो सर्वविदित है ही कि पत्रकारिता ने हिंदी साहित्य को कविता की प्रधानता से मुक्त करके गद्य की प्रधानता में दीक्षित किया जिसके फलस्वरूप पिछले डेढ़ सौ साल में अनेक नई गद्य विधाओं का प्रवर्तन हुआ. 

यह भी उल्लेखनीय है कि साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में केवल हिंदी की मुख्य भूमि का ही योगदान नहीं रहा बल्कि गौण भूमि अर्थात हिंदीतर भाषी क्षेत्रों ने भी अपनी उर्वरता प्रमाणित की है. इस दृष्टि से बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि ‘ख’-वर्ग ही नहीं दक्षिण भारत अर्थात ‘ग’-वर्ग की देन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. स्वातंत्र्योत्तर काल में हिंदी साहित्य की परिवर्तनशीलता की अगुवाई करने वाली पत्रिका ‘कल्पना’ को कौन नहीं जानता जो हैदराबाद से निकलती थी. दक्षिण भारत और उसमें भी विशेष रूप से हैदराबाद (या कहें कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) की साहित्यिक पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन और हैदराबाद मुक्ति संघर्ष से लेकर तेलंगाना आंदोलन तक को एक सीमा तक बौद्धिक नेतृत्व प्रदान किया. 

श्रीमती आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ ने साहित्यिक पत्रकारिता पर केंद्रित अपनी प्रस्तुत पुस्तक में दक्षिण भारत, उसमें भी विशेष रूप से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, की साहित्यिक पत्रकारिता का सुसंबद्ध और संगठित ब्यौरा और लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है. साथ ही हैदराबाद से प्रकाशित ‘पुष्पक’ का गहन अध्ययन और उसमें प्रकाशित सामग्री का विवेचन-विश्लेषण करके हिंदी जगत को साहित्यिक पत्रकारिता की देन पर प्रकाश डाला है. इसमें संदेह नहीं कि यह पुस्तक पत्रकारिता के जिज्ञासु पाठकों से लेकर विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अध्यापकों तक के लिए उपादेय सामग्री से परिपूर्ण है. 

इस प्रामाणिक और शोधपूर्ण सामग्री के प्रकाशन के अवसर पर लेखिका को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ. 

2 अक्टूबर, 2015 
 - ऋषभदेव शर्मा 

रविवार, 1 नवंबर 2015

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख


अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख
 गुर्रमकोंडा नीरजा
2015
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
 पृष्ठ - 304
मूल्य – रु. 495/-
मनुष्यों द्वारा विचारों और मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के शास्त्र को भाषाविज्ञान कहा जाता है. सामान्य भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा के उद्भव और विकास पर विचार किया जाता है. सैद्धांतिक भाषाविज्ञान भाषा अध्ययन और विश्लेषण के लिए सिद्धांत प्रदान करता है. वह मूलतः इस प्रश्न पर विचार करता है कि भाषा क्या है और किन तत्वों से बनी हुई है. इसके चार क्षेत्र हैं – ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, वाक्य विज्ञान और अर्थ विज्ञान. आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भाषाविज्ञान सैद्धांतिकी से आगे बढ़कर विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयुक्त हो रहा है और भाषा-उपभोक्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान विकसित हुआ है. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा शिक्षण, शैलीविज्ञान, कोशविज्ञान, भाषा नियोजन, वाक् चिकित्सा विज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, अनुवादविज्ञान आदि अनुप्रयोग के क्षेत्र शामिल हैं. हिंदी में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संक्रियात्मक भूमिका पर केंद्रित गंभीर पुस्तकों का लगभग अभाव-सा है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (1975) की पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ (2015) इस अभाव की पूर्ति का सार्थक प्रयास प्रतीत होती है.

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ में कुल 29 अध्याय हैं जो इन 7 खंडों में विधिवत संजोए गए हैं – अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषा शिक्षण, अनुवाद विमर्श, साहित्य पाठ विमर्श (शैलिवैज्ञानिक विश्लेषण), प्रयोजनमूलक भाषा, समाजभाषिकी और भाषा विमर्श में अनुप्रयोग. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अग्रणी विद्वान प्रो. दिलीप सिंह का निम्नलिखित कथन इस पुस्तक की प्रामाणिकता का सबसे अधिक विश्वसनीय प्रमाणपत्र है – 

“पुस्तक का प्रत्येक खंड एवं संबद्ध आलेख बड़ी ही तन्मयता के साथ लिखे गए हैं. इस तन्मयता का ही परिणाम है कि हिंदी भाषा के साहित्यिक और साहित्येतर पाठों के विश्लेषण में यह सफल हो सकी है और इस तथ्य को उजागर कर सकी है कि कोई भी भाषा (इस अध्ययन में हिंदी भाषा) अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों और प्रयोजनों में अलग-अलग ढंग से बरती ही नहीं जाती, बल्कि भिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होते समय अपनी अकूत अभिव्यंजनात्मक क्षमता को भी अलग-अलग संरचनाओं में ढाल कर अलग-अलग तरीकों से सिद्ध करती है.”

लेखिका ने पहले खंड में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के स्वरूप और क्षेत्र पर सैद्धांतिक चर्चा की है. इसके बाद दूसरे खंड में मातृभाषा, द्वितीय भाषा और अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर चर्चा की है. तीसरे खंड में अनुवाद सिद्धांत, अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन पर सोदाहरण प्रकाश डाला गया है. पुस्तक का चौथा खंड साहित्यिक पाठ विमर्श के लिए शैलीविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाता है. यहाँ एक निबंधकार (प्रताप नारायण मिश्र), एक उपन्यासकार (प्रेमचंद) और दो कवियों (शमशेर तथा अज्ञेय) के साहित्यिक पाठ निर्माण, बनावट और बुनावट का विश्लेषण किया गया है. यह खंड पाठ विश्लेषण के क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए विशेष उपयोगी है. पाँचवे खंड में अखबारों से लेकर टीवी तक विविध संचार माध्यमों द्वारा समाचार से लेकर प्रचार तक के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली हिंदी भाषा के लोच भरे गंभीर और आकर्षक रूप की सोदाहरण मीमांसा की गई है. इसके पश्चात छठा खंड समाजभाषाविज्ञान पर केंद्रित है. जहाँ एक ओर तो सर्वनाम, नाते-रिश्ते की शब्दावली, शिष्टाचार, अभिवादन और संबोधन शब्दावली पर हिंदी भाषासमाज के संदर्भ में तथ्यपूर्ण विमर्श शामिल है तथा दूसरी ओर दलित आत्मकथाओं और स्त्री विमर्शीय लेखन की भी गहन पड़ताल की गई है. यह खंड साहित्य पाठ विमर्श वाले खंड के साथ मिलकर पाठ विश्लेषण के विविध प्रारूप सामने रखता है. पुस्तक का अंतिम खंड है – ‘भाषाविमर्श में अनुप्रयोग’. यहाँ विदुषी लेखिका ने महात्मा गांधी, प्रेमचंद, अज्ञेय, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, विद्यानिवास मिश्र और दिलीप सिंह जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों के भाषाविमर्श पर सूक्ष्म विचार-विमर्श किया है. इतना ही नहीं यह खंड इन भाषाचिंतकों के भाषाविमर्श की केंद्रीय प्रवृत्तियों को भी रेखांकित करता है. लेखिका ने प्रमाणित किया है कि महात्मा गांधी के भाषाविमर्श के केंद्र में संपर्कभाषा या राष्ट्रभाषा का विचार है, प्रेमचंद के भाषाविमर्श में सर्वाधिक बल हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी जैसी साहित्यिक शैलियों के रचनात्मक समन्वय पर है तो अज्ञेय का भाषाविमर्श उनकी साहित्यिक शैली के प्रति जागरूकता के इर्दगिर्द निर्मित होता है. प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव को डॉ. जी. नीरजा ने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के सजग प्रहरी सिद्ध किया है तो विद्यानिवास मिश्र को आधुनिक भाषाशास्त्रीय चिंतन की पीठिका का भारतीय संदर्भ खड़ा करने का श्रेय दिया है. उनके अनुसार दिलीप सिंह का भाषाविमर्श अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संपूर्ण पड़ताल के लिए कटिबद्ध और प्रतिबद्ध है. उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक प्रो. दिलीप सिंह को ही समर्पित भी है. 

अंत में, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन विभाग के आचार्य डॉ. देवराज के शब्दों में यह कहना समीचीन होगा कि “डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर भरपूर सामग्री तैयार की है जो अन्य लोगों के लिए रचनात्मक स्तर पर चुनौती बना हुआ है. उनकी अध्ययनशीलता और संकल्पशीलता के लिए मेरी शुभकामनाएँ!”

बुधवार, 30 सितंबर 2015

[भूमिका] कविता लिखती हूँ मैं, जैसे फूल उगाती हूँ मैं

भूमिका 

क्षणिकाओं अथवा मुक्तकों के अपने इस नए संकलन 'धड़क रहा सागर बूँद में' [2015] के साथ कवयित्री शशि कोठारी [1962] एक बार फिर अपने पाठकों के सामने हैं. वैसे इनमें से अधिकतर रचनाओं को वे फेसबुक पर भी प्रस्तुत कर चुकी हैं और वहाँ इन्हें पर्याप्त प्रशंसा मिली है. लघु आकार की इन रचनाओं से उनका जो कवि व्यक्तित्व उभरता है वह जागतिक चिंताओं से मुक्त ऐसे प्रेमी का व्यक्तित्व है जो अपने प्रेमपात्र को आराध्य, या आराध्य को प्रेमपात्र, मानता है. यह प्रेमपात्र या आराध्य बुद्धों, सूफियों और भक्तों का वह परमात्मा है जो आत्मा में ही रहता है पर अलग दीखता है; और जब दिख जाता है तो अलगाव नहीं रहता – अद्वैत घटित हो जाता है. शशि कोठारी की ये कविताएँ ‘प्रिय के साथ अद्वैत’ (चाहत प्रिय अद्वैतता : बिहारी) साधने की विविध दशाओं – प्रेम, समर्पण, पात्रता, भक्ति, आत्मविसर्जन, तल्लीनता, सायुज्य आदि - की ही सहज अभिव्यक्तियाँ हैं. शिल्प की दृष्टि से कहीं ये अनगढ़ भी प्रतीत हो सकती हैं लेकिन इनका सौंदर्य इस सहजता में ही निहित है – अकृत्रिम आत्मस्वीकृतियों में!

अपनी प्रेमाभक्ति की गोपन-अगोपन अनुभूतियों को शशि ने सहज संप्रेषणीय प्रतीकों और बिंबों में बाँध कर प्रकट किया है. इसके लिए बहुत बार वे समान उपादानों का सहारा लेती हैं और सूक्तियां गढती हैं – स्व रस से बढ़कर कोई रस नहीं/ मौन से कर्णप्रिय कोई शब्द नहीं/ साक्षीभाव से बढ़कर कोई भाव नहीं/ स्थितप्रज्ञ से बढ़कर कोई स्थिति नहीं. इसी तरह जब वे कमल और कीचड के बहाने अस्तित्व और माया के संबंध की बात करती है तो समानता को ही उभारती हैं. इसके विपरीत वे अभिव्यक्तियाँ हैं जहाँ द्वंद्व या विरोध का सहारा लिया गया है. ऐसे स्थलों पर भीतर-बाहर, स्व-पर, तृष्णा-तृप्ति, रत्न-कांच, दुःख-सुख, उजाला-अँधेरा, सूर्य-छाया, बिखरना-सिमटना, धरती-आकाश, स्थूल-सूक्ष्म, असीम-क्षुद्र और अनंत-क्षणभंगुर के बीच का तनाव पाठक को वैचारिक सामग्री प्रदान करता है.

कथन को विश्वसनीय और प्रभावी बनाने के लिए कवयित्री ने द्रष्टांत, प्रश्न और उद्बोधन की भाषिक युक्तियों का भरपूर इस्तेमाल किया है. स्व से अनजान होने के कारण पर से बंधे रहने को वे भीतर से अनजान होने के कारण बाहर भटकने के द्रष्टांत द्वारा समझाती हैं तो तिल में तेल और कुंडली में कस्तूरी होने के संदर्भ याद आने लगते हैं. प्रश्न उन्होंने स्वयं से भी किए हैं, पाठक से भी और प्रिय से भी – मन भीतर जाए कैसे?/ आँखों में जब फूल ही फूल हैं, फिर बहार क्या और पतझड़ क्या?/ बंध कर किसी घट से, यह दरिया रहे कैसे?/ हमें भला किस तरह छुओगे तुम?/ ऊपर उठ गए अब, कीचड में फिर धंसें क्यों?/ आत्मा हूँ मैं, फिर नारी बन क्यों सह गई? इसी प्रकार उद्बोधन भी अपने और पाठक दोनों के लिए हैं – प्यार का रस बड़ा मीठा, पर स्व का रस पियो तो जानो./ माया में उलझो नहीं, ऊपर उठ जाओ./ पुकारो, पूरी शिद्दत से पुकारो. संबोध्य जब प्रिय हो तो बात कुछ ऐसे बनती है – मैं खो जाऊँ तो तुम मिल जाओ / मैं मर जाऊँ तो तुम जन्म लो. बेशक, ‘मैं’ का खोना ‘तुम’ के मिलने की शर्त है. पर स्त्री मन इससे आगे जाता है, वह अपने गर्भ से ‘तुम’ को जनना चाहता है. 

आत्मसाक्षात्कार और आत्मबोधन के अवसरों पर रचनाकार का स्त्री मन खुल कर व्यक्त हुआ है. प्रकृति-पुरुष का मिथक ऐसे में बड़े काम का सिद्ध होता है. मैं एक स्पंदन-धडकन-थिरकन-पुलकन हूँ, मैं फूल-पंछी-कंगन-कुंदन बन महक-चहक-खनक-दहक गई हूँ, सागर-मौन होकर भी मैं लहर-शब्द बन क्यों उछल-फिसल गई? मेरा कुछ बह गया है, मेरा कुछ ठहर गया है, ठहरा मैं बहते मैं को देख रहा है, प्यार धीरज और विश्वास से./ मैं नाजुक बेलिया, तुम सुदृढ़ दरख़्त, बेल बलवती होती गई, दरख़्त पिघलने लगा./ चाँद को चाँद की आस है. इस अद्भुत प्रणयलीला का चरम उत्कर्ष यह है - तूने अपना सर्वस्व मेरे नाम किया, मैं भी अपना स्नेह तुम पर बरसाना चाहूँ, और यह कहकर उतर गया सागर बूँद में, अहो! नन्ही बूँद मिटी नहीं, आप सागर बन गई. पर इस फलागम तक पहुँचने के लिए पात्रता हासिल करनी पड़ती है. परंपरित पुरुष-सोच समर्पण से पहले पवित्रता माँगता है – देह पवित्र नहीं, मन पावन नहीं, कैसे करूँ प्रभु, भजन मैं तेरा? अपावनता का कारण भी साफ़ है – तुम्हारी दृष्टि तो सदा मुझ पर थी, मेरी ही नज़र संसार पर टिकी रही. दृष्टि पलटते ही मिलन घटित हो जाता है; आग और पानी का मिलन – तुम आग हम पानी, बड़ा खूबसूरत यह मेल है, खुद में मर कर तुम में जीती हूँ, कितना खूबसूरत यह खेल है. शायद प्रेमियों का मोक्ष इसी तरह होता है कि – धड़क रहा सागर बूँद में, समा गया आकाश घट में, मुझमें वही समाया है, जी रहा वही मुझमें.

हर रचनाकार से उसके सृजन का प्रयोजन पूछा जाता है. कोई और पूछे न पूछे उसका मन तो पूछता ही है. शशि कोठारी ने इस प्रश्न का उत्तर कुछ इस तरह दिया है – कविता लिखती हूँ मैं, जैसे फूल उगाती हूँ मैं, किसी का घर महके न महके, मेरा घर तो महक ही जाता है. कवयित्री ने यह भी स्वीकार किया है कि – आप ही कवयित्री भी मैं, कविता भी मैं ही. रचनाकार और रचना की यह अद्वैतता भी प्रिय-अद्वैतता का ही एक रूप है. यहाँ आकर कवि और कविता, प्रेमी और प्रेम, अस्तित्व और सृजन एक हो जाते हैं – अब तो बस यही चाहूँ, जीवन कविता बन निखर जाए. 

जीवन और कविता के एक होने की यह कवि-कामना चरितार्थ हो; यह शुभकामना करते हुए मैं इस कृति के प्रकाशन पर शशि जी को हार्दिक बधाई देता हूँ.


21 सितंबर 2014                                                                                                        - ऋषभ देव शर्मा 

शनिवार, 15 अगस्त 2015

क्षितिज के पार : चेन्नई के हिंदी लेखक




भूमिका


‘’क्षितिज के पार’’ पुस्तक-समीक्षाओं का महत्वपूर्ण संकलन है. महत्वपूर्ण इसलिए कि इसके माध्यम से विभिन्न विधाओं की 16  कृतियों के विवेचन के बहाने इतनी बड़ी संख्या में युवा समीक्षकों नई पीढी अपने उदय की घोषणा कर रही है. इस पीढी की निगाहें रचना और रचनाकार के एक-दूसरे से मिलने का आभास देने वाले क्षितिज पर तो हैं ही, उसके पार जाने का भी हौसला और सामर्थ्य रखती हैं. यह हौसला और सामर्थ्य ही किसी समीक्षक को ‘पाठ’ के पार देख पाने की शक्ति देता है. चेन्नै के एम ओ पी महिला  महाविद्यालय के हिंदी विभाग के पत्रकारिता  पाठ्यक्रम से सम्बद्ध इन सभी छात्राओं / समीक्षकों तथा इनके इस प्रायोजना कार्य की निर्देशक डॉ. सुधा त्रिवेदी की इस सूझबूझ भरे रचनात्मक कार्य के लिए जितनी प्रशंसा की जाए, कम है. इससे चेन्नै की सजग हिंदी-चेतना का तो पता चलता ही है, वहां के साहित्य और पत्रकारिता जगत की संभावनाओं का भी संकेत मिलता है.

इस पुस्तक में अलग-अलग रचनाकार की रचनाधर्मिता के समीक्षात्मक उद्घाटन के लिए जिस प्रारूप का इस्तेमाल किया गया है, वह सहज ही ध्यान आकृष्ट करता है. यह पुस्तक जहाँ एक ओर समीक्षित रचनाकारों के जीवन और कृतित्व की संक्षिप्त झांकी प्रस्तुत करने के बाद उनकी किसी एक चुनी गई कृति में प्रवेश करती है, वहीं प्रत्येक समीक्षक का भी संक्षेप में पाठक से साहित्यिक परिचय कराती है जो निश्चय ही इन नवांकुरों के लिए उत्साहवर्द्धक और प्रेरक सिद्ध होगा. इन समस्त परिचयों को चित्रों के सहारे दर्शनीयता भी प्रदान की गयी है जो सराहनीय है. 

हिंदी में पुस्तक-समीक्षा की शुरूआत भारतेंदु युग से हुई. तब से अब तक इस विधा ने बहुत विकास कर लिया है. आज के समय में तो प्रकाशन व्यवसाय इतना बढ़ गया है कि उसकी तुलना में बहुत थोड़ी सी पुस्तकों की ही समीक्षा छप पाती है. ऐसे में हिंदी की मुख्यभूमि से दूर रहकर जो रचनाकार हिंदी में सृजनात्मक लेखन कर रहे हैं, प्रायः उनकी ओर तो पत्रिका-संपादकों और समीक्षकों की दृष्टि जाती ही नहीं है; और यदि जाती भी है तो केवल गिने-चुने शिखरों पर ही ठहरी रहती है. अतः इस नई और युवा समीक्षक पीढी से यह अपेक्षा रखना स्वाभाविक है कि इसके माध्यम से अधुनातन संचार साधनों द्वारा तमिलनाडु के हिंदी-स्वर देश भर में चर्चित होंगे. 

यह देखकर प्रसन्नता होना स्वाभाविक है कि इस पुस्तक में चेन्नै के कई पीढ़ियों के रचनाकारों का मूल्यांकन एक साथ प्रस्तुत किया गया है. डॉ. बालशौरि रेड्डी , रमेश गुप्त नीरद, डॉ. निर्मला एस. मौर्य, डॉ. पी. के. बाल सुब्रह्मण्यम , डॉ. मधु धवन, डॉ. प्रदीप के. शर्मा, डॉ. चुन्नीलाल शर्मा, प्रहलाद श्रीमाली, डॉ. एम. शेषन, डॉ. वत्सला किरण, ईश्वर करुण, डॉ. श्रीनिवासन, डॉ. गोविंदराजन , सुमन अग्रवाल, गोविन्द मूंदडा , रेखा अग्रवाल की पुस्तक, महेश नक्श  एवं डॉ. शरद रामदेव सिकची की पुस्तकों के  बहाने इस पुस्तक में चेन्नै के बहुभाषाभाषी हिंदी साहित्यकारों की देन से पूरे हिंदी जगत को इस रूप में संभवतः प्रथम बार एक मंच पर परिचित होने का अवसर प्राप्त हो रहा है. अतः यदि यह कहा जाए कि यह अपने आप में एक अनुकरणीय आयोजन है, तो अतिशयोक्ति न होगी.

हिंदी भाषा और साहित्य के विकास को समर्पित इस दूरदर्शितापूर्ण सकारात्मक प्रयत्न में शामिल सभी रचनाधर्मी मित्रों को बधाई देते हुए इस योजना की निरंतरता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं!

- ऋषभदेव शर्मा