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शुक्रवार, 20 जून 2014

खिलना ‘जंगल जुही’ का आक्षितिज अभ्रभेदी शिलाओं के कुंज में

पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा

खिलना ‘जंगल जुही’ का
आक्षितिज अभ्रभेदी शिलाओं के कुंज में

हैदराबाद. आप यहाँ आएँ, रहें, घूमे-फिरें, लौट जाएँ. और कुछ याद रहे न रहे भीतर बाहर सर्वत्र फैला चट्टानों का म्युज़ियम जरूर याद रहेगा. कई बार तो ऐसा लगता है कि तमाम प्राणिजगत इन प्रस्तर शिलाओं की गोद में खेल रहा है यहाँ. कवि-कथाकार-चिंतक रमेशचंद्र शाह इसीलिए इस शहर को अलविदा कहते वक्त बस इतना ही कह पाते हैं – ‘अलविदा आक्षितिज अभ्रभेदी शिलाओं के पुंज हैदराबाद!’
                                                            
रमेशचंद्र शाह (1937) के दर्शन दो दशक पूर्व भोपाल में आदरणीय कैलाशचंद्र पंत की कृपा से हुए थे. गांधी पर उनके व्याख्यान ने प्रभावित ही नहीं आतंकित भी किया था. पिछले दिनों (2012) में उनके दर्शन का फिर से सौभाग्य मिला – वे केंद्रीय हैदराबाद विश्वविद्यालय में एस. राधाकृष्णन पीठ के बहाने कुछ महीनों के लिए यहाँ आए थे. विद्वानों और बड़े लेखकों से मुझे बचपन से ही डर लगता रहा है – कस्बाई मानसिकता से आज भी ग्रस्त हूँ न! सो, जब प्रो. एम. वेंकटेश्वर और डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने गेस्ट हाउस में उनसे मिलने जाने का कार्यक्रम बनाया तो मैं हीले हवाले करने लगा. पर वेंकटेश्वर जी के आगे किसी की चली है? दिन ढले हम लोग पहुँचे. घंटे भर दुनिया जहान की बातें हुईं – लगा यह कोई गोमुख है जिससे निरंतर ज्ञान की गंगा झरती है. पर यह ग्लेशियर उतना भी ठंडा नहीं था – बल्कि बिल्कुम भी ठंडा नहीं : गरमाहट से भरा हुआ, ऊर्जा से भरपूर. खुद उन्होंने अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाई, फोटो खींचे-खिंचवाए. अरे! ये तो बिल्कुल आदमी निकले – हाड मांस वाले; मैं तो ज्ञान की पाषाणमूर्ति समझकर आया था. अस्तु! हैदराबाद के अपने उस प्रवास को रमेशचंद्र शाह ने अपनी डायरी में टाँककर अमर कर दिया है.

किताबघर ने उनकी डायरी के चतुर्थ भाग और यात्रावृत्त को ‘जंगल जुही’ (2014) के नाम से प्रकाशित किया है. प्रो. सुवास कुमार सहित हैदराबाद के तीन सहचरों को समर्पित यह डायरी प्रकारांतर से हैदराबाद को ही समर्पित है. 2 खंड हैं : पहले में डायरी – जंगल जुही, हैदराबाद (जुलाई-दिसंबर 2012). दूसरे में यात्रावृत्त - हैदराबाद और प्राग प्रवास के.

डायरी हो या यात्रावृत्त - मूलतः रचनाकार ने दोनों में स्मृति में अंकित हो गए अनुभवों को शब्दों में पुनः जिया है. यह ग्रहण किए हुए का, भावन किए हुए का, व्यक्तिगत अनुभवों का, निजता की सीमाओं को लांघकर सार्वजनीकरण है. जो देखा, भोगा, महसूसा उसे अपनी सौंदर्यदृष्टि से अभिमंडित करके सारे समाज को वापस लौटा दिया. इसे आत्मदान कहें या प्रतिदान! खैर, कुछ भी हो, पर इसमें दो राय नहीं कि इस अकाल्पनिक गद्य में लेखक का अंतस सहज अनावृत्त हुआ है. बड़ी ललक से, इसीलिए, यह गद्य पाठक की ओर बढ़ता है और उसे अपने औदात्य के आभाचक्र में समेट लेता है. यानि ‘जंगल जुही’ का गद्य सहज-प्रसन्न-उदात्त गद्य है : उत्फुल्ल भी, प्रशमित भी. गज़ब का संतुलन. गज़ब का सम्मोहन.

‘जंगल जुही’ को संदर्भ संबलित और प्रसंग गर्भित अच्छे गद्य की तरह पढ़ने का अपना मजा है. विधा का नाम कुछ भी हो लेकिन कवित्व और लालित्य इस गद्य में सर्वत्र विद्यमान है – दर्शन, चिंतन और आत्मोद्घाटन के साथ. यही कारण है कि यह कृति जीवन के अर्थ की खोज की लेखकीय व्याकुलता का भी पूरा बोध कराती है. अरविंद और गुर्जिएफ़ जैसे संत इस यात्रा में लेखक के साथ साथ चलते हैं – और पाठक के भी. इसी कारण अंत तक पहुँचते पहुँचते यह बात पुख्ता हो जाती है कि अपने प्रति और मानवीय बिरादरी के प्रति जवाबदेही के निर्वाह से प्राप्य कृतार्थता का संतोष इस कृति से लेखक को अवश्य ही मिला होगा.

देखे गए देश और काल के विवरण तो सभी डायरियों और यात्रावृत्तों में होते हैं, लेकिन डायरी और यात्रावृत्त को टूरिस्ट गाइड नहीं बनना होता है. इसलिए इन विवरणों की तुलना में वे पक्ष अधिक महत्वपूर्ण होते हैं जहाँ लेखक की निजता और संवेदनशीलता, वैचारिकता और भावुकता रमणीय अर्थ के साथ व्यंजित होती है. इसी भावाभिव्यंजना के कारण ‘जंगल जुही’ का गद्य पठनीय, मर्मस्पर्शी और प्रीतिकर बन सका है. अनेक स्थलों पर अपने विचार प्रवाह में रमेशचंद्र शाह पाठक को बहाए ले जाते हैं. उदाहरण के लिए जब किसी अंतरराष्ट्रीय काव्योत्सव के बाहने वे पूछते हैं कि ‘पृथ्वी पर इतने देश हैं. सभी में कविता होती है. पर सबको तो ऐसा चाव नहीं जगता *** क्या हमें सचमुच कविता पर, उसकी आह्लादिनी शक्ति पर ही नहीं – उसकी ज्ञानदायिनी शक्ति पर भी इतना विश्वास है?’ तो हमारे मन में भी यह सवाल उठता है कि ‘क्या यह महज हमारी उत्सवधर्मी और प्रदर्शनप्रिय मानसिकता की ही एक और अभिव्यक्ति है? या कि इसके पीछे कोई गहरी सृजनधर्मी सत्यान्वेषिणी चेतना सक्रिय है?’

यह जानना भी अच्छा लगा कि लेखक रमेशचंद्र शाह शास्त्र पर अंतिम विश्वास नहीं करते. लोक में उनकी बड़ी आस्था है. रामटेक में अगस्त्य मुनि का आश्रम होने की लोक मान्यता पर वे विस्मय अवश्य व्यक्त करते हैं, लेकिन अविश्वास नहीं. वाग्देवी से कालिदास को प्रतिभा का वरदान मिलने की मान्यता भी ऐसी ही है. अन्यत्र, वे बड़ी पते की बात कहते हैं ‘और किंवदंतियाँ हमारे देश में यूँ ही नहीं बन जातीं. उनके पीछे कोई न कोई आधार अवश्य होता है.’ दशावतारों की कल्पना को वे इवोल्यूशन की द्योतक मानते हैं. आंध्र प्रदेश भर में नृसिंह अवतार की प्रसन्न और उग्र मूर्तियों की बड़ी महिमा है. यादगिरीगुट्टा की यात्रा में लेखक ने इस महिमा की विवेचना का अवसर निकाल लिया – ‘नृसिंह अवतार तो विशेष रूप से हमारी मानवीय संरचना के आदिम और परवर्ती विकास-स्तरों को आपस में जोड़ने वाला है और यह एक बात इस अवतार की विलक्षण लोकप्रियता के रहस्य के मूल में है. हमारे यहाँ लोक और शास्त्र अन्योन्याश्रित रहे हैं. लोकानुभव ही कालांतर में शास्त्र में रूपांतरित और उन्नीत होता रहा है.’ यह लोक लेखक की धमनियों में निरंतर बजता रहता है. यही कारण है कि प्राग (चेक गणराज्य की राजधानी) में ग्याकोमो पुसीनी के विश्वविख्यात ऑपेरा ‘ला बोहेमे’ को देखते समय उनके भीतर अचानक लड़कपन की रामलीला और नौटंकियों के भूले बिसरे संस्मरण जाग उठते हैं और संबोधि का यह पूर्वप्रश्न उभरता है – ‘तो क्या कला की दुनिया विचारधारा या धर्म विश्वास की दुनिया की तुलना में कहीं अधिक व्यापक-मानवीय और कहीं अधिक सर्वनिष्ठ दुनिया है?’

और अंत में बिना टिप्पणी के, 77 वर्षीय साहित्यकार की ये टिप्पणियाँ -– 
  • इस प्रतीति तक पहुँचने में ही एक पूरा जन्म खप गया./ 
  • समकालीनों से मुझे क्या मिला है? सिवा एक निहायत औपचारिक अंतःकरण की नुमाइशी यारबाशी और उतनी ही ‘समझदार चुप्पियों’ के?/ 
  • आजकल भूल जाता हूँ सब *** क्या यही वृद्धावस्था का पहला लक्षण है?/ 
  • मैं तो इस जंगल जुही की प्राणशक्ति देखकर दंग हूँ./ 
  • असुविधाजनक सत्य बोलना ही चाहिए सार्वजनिक स्थलों पर.

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Ø  रमेशचंद्र शाह/ जंगल जुही/ 
किताब घर, नई दिल्ली/ 2014/
 पृष्ठ 182/ मूल्य – रु. 320/-

-ऋषभ देव शर्मा 

भास्वर भारत / जून 2014 / पृष्ठ 59

गुरुवार, 5 जून 2014

‘सहरा की धड़कनें’ अर्थात अरबी कविता हजार साल पहले

भूमिका

संतोष अलेक्स कई भाषाओं के जानकार हैं तथा कवि और अनुवादक के रूप में इन्होंने अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित की है. इस अनूदित कविता संग्रह ‘सहरा की धड़कनें’ के माध्यम से ये हिंदी पाठकों को हजार साल पुरानी अरबी कविताओं से रू-ब-रू करा रहे हैं. बेशक, इनका यह प्रयास स्तुत्य और स्वागतेय है. 

दरअसल यहाँ जिन कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है इनका संबंध एंडालूसिया से है. (एंडालूसिया में 10वीं से 15वीं शताब्दी के बीच फली-फूली अरब सभ्यता ‘मूर’ अब इतिहास के गर्भ में समा चुकी है.) हिंदी में ये कविताएँ मलयालम और अंग्रेजी के रास्ते आ रही हैं. अंग्रेजी में स्पेनी से आईं जबकि स्पेनी में अरबी से अनुवाद होकर. मूल अरबी पाठ तो संभवतः आज भी अप्रकाशित है और हिंदी का लक्ष्य पाठ गठित होने से पहले इन कविताओं को स्पेनी, अंग्रेजी और मलयालम के तीन तीन फिल्टरों से गुजरना पड़ा है. कहते हैं, अनुवाद में कविता खो जाती है. इसलिए यदि इस लंबी छनाई के बावजूद यहाँ कुछ कविता बची रह गई है तो मानना ही पड़ेगा कि मूल पाठ बहुत सशक्त रहा होगा और अनुवादक भी बेहद सतर्क रहे होंगे. 

प्राचीन मूर सभ्यता उत्तर पश्चिमी अफ्रीका के बरबर और अरब के रेगिस्तान के मुसलमानों ने स्पेन के एंडालूसिया में खड़ी की थी. कालांतर में इसके कालकवलित हो जाने पर इसकी उपलब्धियाँ भी खो गईं. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 1928 में काहिरा की एक दूकान में महान स्पेनी अरब इतिहासकार एमिलियो गार्सिया गोमेज़ ने पुरानी किताबों के ढेर में 1243 की एक छोटी सी पांडुलिपि देखी और वे इसमें एंडालूसिया की अरब सभ्यता के दौरान रची गई इन कविताओं को देखकर चमत्कृत रह गए. गोमेज़ ने इन कविताओं को स्पेनिश में अनुवाद करके प्रकाशित कराया और यह दावा किया कि इन कविताओं के माध्यम से उस सभ्यता की आत्मा और प्रकृति को इतिहास की मोटी किताबों की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. उस समय शायद गोमेज़ ने कल्पना भी न की होगी कि इन कविताओं का स्पेनी की अपनी कविता के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. लेकिन ऐसा हुआ. इन कविताओं ने केवल पाठकों को ही मंत्रमुग्ध नहीं किया बल्कि स्पेनी कविता की ‘सत्ताईस की पीढ़ी’ के कवियों पर भी गहरी छाप छोड़ी. इस आंदोलन के रफेल अलबर्टी और फेडरिको गार्सिया लोर्का (1898-1936) जैसे कवियों ने स्वयं को इस कविता का ऋणी माना है. लोर्का ने तो खुद को इस कविता में गहरे डुबोकर इसकी आत्मा का साक्षात्कार करके उसे ही अपनी कविता में पुनर्जीवित किया है. कहा तो यहाँ तक जाता है कि इस कविता में निहित अध्यात्म, मौलिक रूपकों और अनछुए बिंबों ने समग्र स्पेनी काव्य को झकझोर कर रख दिया था. 

उल्लेखनीय है कि इन कविताओं के मूल संग्रहकर्ता इब्न सईद की मान्यता थी कि कविता को शीतल मंद सुंगंध बयार से ज्यादा नाजुकख़याल और काव्यभाषा को अप्सरा के मुख से ज्यादा खूबसूरत होना चाहिए. कहना न होगा कि अरब एंडालूसिया की ये कविताएँ इस कसौटी पर खरी उतरती हैं. इसीलिए गार्सिया गोमेज़ की यह स्थापना अत्यंत सटीक है कि ये कविताएँ भले ही समग्र और संपूर्ण न हों, टुकड़ों टुकड़ों में बिखरी होने के बावजूद इनमें हीरे की कणिकाओं जैसी दिव्य आभा है. (विस्तृत खोह के साँवले तल में/ तिमिर को भेदकर चमकते हैं पत्थर/ मणि तेजस्क्रिय रेडियो एक्टिव रत्न भी बिखरे. – अंधेरे में, मुक्तिबोध). हीरे की ये कणिकाएँ जिन कवियों के हस्ताक्षरों से चमकी हैं उनमें उस जमाने के बादशाहों, वज़ीरों, शहजादों, खलीफाओं, हकीमों से लेकर आम जन तक शामिल हैं. वह ऐसा दौर था जब सेविल्ला राज्य का साधारण सा गाड़ीवान भी काव्य रचना और समस्यापूर्ति में सिद्धहस्त हुआ करता था. यही नहीं, उस दौर में दावतनामे, माफीनामे, शिकायतें और सामान्य पत्राचार भी कवितात्मक हुआ करते थे. इसीलिए इन कविताओं में उस दौर के खासोआम के सुख-दुःख, राग-विराग तथा प्रकृति-परिवेश का ही अंकन नहीं हुआ है बल्कि सुंदरियों से लेकर घोड़ों, युद्धों और पानी तक को काव्य का विषय बनाया गया है. 

‘सेहरा की धड़कनें’ में संकलित कविताओं के अवलोकन से कम से कम यह तो साफ़ हो ही जाता है कि हजार वर्ष पुरानी इन अरबी कविताओं का मूल चरित्र मुख्यतः प्रतीकात्मक है, इनमें रंगीन दृश्यबंध सम्मिलित हैं और इनमें मरुस्थल के रूप की प्राकृतिक आभा है. ये कविताएँ प्रेम के दोनों पक्षों और विविध मनोदशाओं को तो उकेरती हैं ही, उसे देह के उत्सव के साथ आत्मा का पर्व भी बनाती हैं. इतना ही नहीं, ये कविताएँ मनुष्य और प्रकृति के सहज स्वच्छंद संबंध का भी आइना है जिसमें बगीचे, फूल, पर्वत, नदी और झरने अपनी स्वाभाविक छटा बिखेर रहे हैं. सौंदर्यविधान, उपमान योजना, बिंब गठन और मानवीकरण की दृष्टि से भी ये कविताएँ मर्मस्पर्शी बन पड़ी हैं. आप पाएंगे कि इब्न अब्द रब्बीही (860-940), इब्न ज़ाख, अबुल हसन अली इब्न हिस्न (11वीं शती), इब्न फराज (10वीं शती), इब्राहिम इब्न उस्मान (12वीं शती), इब्न इयाद (12वीं शती), इदरिस इब्न अल यमनी (11वीं शती), मोहम्मद इब्न ग़ालिब अल रुसफी (11वीं शती), अबू अमीर इब्न अल हमराह (12वीं शती) तथा यूसुफ इब्न हारुन अल रमदी (917-1122) जैसे कवियों की रचनाएँ अनुभूति और अभिव्यक्ति के धरातल पर अत्यंत मर्मस्पर्शी और सहज संप्रेषणीय हैं. 

अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्स और प्रकाशक माया मृग ने इस कविता संग्रह को हिंदी में लाने का चुनौती भरा काम बड़ी निष्ठा से संपन्न किया है. इस हेतु ये दोनों साधुवाद के पात्र हैं. 


5 जून 2014                                                                         - ऋषभ देव शर्मा

विश्व पर्यावरण दिवस                                                          rishabhadsharma@gmail.com

बुधवार, 4 जून 2014

परमप्रेम रूपा है भक्ति

भक्ति प्रेम की उच्चतम स्थिति का नाम है. वह परमप्रेम रूपा है. यों भी कहा जाता है कि प्रेम के साथ जब श्रद्धा का योग हो जाता है तो प्रेमी भक्ति की ओर अग्रसर होने लगता है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी व्याख्या करते हुए ठीक ही कहा है कि “जब पूज्य भाव की वृद्धि के साथ श्रद्धाभाजन से सामीप्यलाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब ह्रदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए. जब श्रद्धेय के दर्शन, श्रवण, कीर्तन, ध्यान आदि से ही आनंद का अनुभव न हो, जब उससे संबंध रखने वाले श्रद्धा के विषयों के अतिरिक्त बातों की ओर भी मन आकर्षित होने लगे, तब भक्ति रस का संचार समझना चाहिए. जब श्रद्धेय का उठाना, चलना, फिरना, हँसना, बोलना, क्रोध करना आदि भी हमें अच्छा लगने लगे तब हम समझ लें कि हम उसके भक्त हो गए.”

श्रद्धा और प्रेम का यह दुर्लभ संयोग जिसके अनुभव में आ गया वह ही सच्चा भक्त है. कबीर हों या मीरा, आंडाल हों या रामदासु – उनका जीवन भक्ति के इसी परम प्रेममय स्वरूप का दर्शन कराता है. कबीर के वचन इस परमप्रेम को तरह तरह से समझाने की कोशिश करते प्रतीत होते हैं. कबीर के लिए प्रेम ऐसी ज्योति है जिसके प्रकाशित होने से अनंत योग का जागरण हो जाता है. यह प्रकाश संशय को जड़ से मिटा देता है क्योंकि प्रेम और संशय एक साथ रह नहीं सकते. संशय मिटा तो समझो कि प्रिय आन मिला. यह प्रिय कबीर के लिए दुलहिन आत्मा का कंत राजाराम भरतार है. उसके आने की सूचना मिलते ही भक्त का मन नाचने लगता है, मंगलाचरण गूँजने लगते हैं.

कैसे पाता है कोई कबीर अपने इस भरतार को? प्रेम से. क्या है प्रेम? कबीर बताते हैं कि प्रिय के हिय में प्रवेश के लिए बस एक शर्त है. प्रेमी को केवल इतना करना होगा कि अपने सिर को उतार कर धरती पर रख दे. बहुत नीचा है इस घर का दरवाज़ा, सिर उठा कर आप इसमें घुस नहीं सकते. सिर ज़मीन पर रखा, अहं रहित हुए तो यह दरवाज़ा खुद ब खुद खुल जाता है. विचित्र दरवाज़ा है. सांकल भीतर की तरफ लगी है और खुलता बाहर से है. बाहर से खोलने के लिए ज्ञान काम नहीं आता, पांडित्य का वश नहीं चलता. समर्पण काम आता है, प्रेम के ढाई आखर का एकमात्र मंत्र चलता है.

पंडित-ज्ञानी भला क्या प्रेम करेंगे? वे तो ज्ञान के रास्ते चलते हैं और अज्ञात तत्व को खोजते हैं. कबीर जैसे भक्त प्रेम के रास्ते चलते हैं और खुद को खोकर प्रिय को पाते हैं. भक्ति का मोती डूबने से मिलता है, गहरे पैठने से मिलता है, किनारे बैठे रहने से नहीं. गहरे पैठोगे, तो ही साक्षात्कार संभव होगा. इस साक्षात्कार का रहस्य भी कबीर संकेत से समझा गए हैं. बस इतना करना है कि अपने अंतर्चक्षुओं को प्रिय मिलन का कक्ष बना लेना है. पुतलियाँ सेज बन जाएँगी. पलकें आप से आप पर्दे गिरा देंगी. इस एकाग्र मनोदशा में ही उस प्रिय को रिझाना है –
पिंजर प्रेम प्रकासिया, जाग्या जोग अनंत
संसा खूटा सुख भया, मिल्या पियारा कंत
 
यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं
शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे इहि माहि
 
पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
 
जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ
मैं बपुरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठ
 
नयनन की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय
पलकों की चिक डारिके, पिय को लियो रिझाय

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रविवार, 11 मई 2014

अतिरंजना और फैंटेसी में लिपटा क्रूर सामाजिक सत्य (सुकेश साहनी की लघुकथाएं)

सुकेश साहनी [1956] कई दशकों से हिंदी लघुकथा साहित्य के परिवर्धन में सक्रिय हैं तथा उनकी रचनाएँ कई भाषाओं में अनूदित और चर्चित रही हैं। सुकेश का लेखकीय व्यक्तित्व अपने समशील रचनाकारों की तरह यथार्थ की पकड़ और संप्रेषण की सहजता के आग्रह से निर्मित है लेकिन जो बात उन्हें अलग पहचान देती है वह उनके शिल्प की मौलिकता में निहित है। इसमें संदेह नहीं कि उनकी लघुकथाओं का विधान किसी एक ढर्रे पर लीकोंलीक नहीं चलता बल्कि कथ्य के अनुरूप अभिव्यक्ति को मारकता प्रदान करने के लिए वे शैली-शिल्प के स्तर पर तरह तरह के प्रयोग करते दिखाई देते हैं। लघुकथा की प्रभावशीलता के लिए व्यंग्य, ध्वनि या व्यंजना की शक्ति को वे पहचानते हैं और उसका भली प्रकार इस्तेमाल करने में कुशल हैं। अतिरंजना और फैंटेसी का उन जैसा सटीक प्रयोग हर किसी के वश की बात नहीं। विस्मय और आकस्मिकता को भी सुकेश अच्छी तरह साध लेते है तथा साधारण स्थितियों के माध्यम से असाधारण निष्कर्षों को दर्शना भी उन्हें अपनी विधा का उस्ताद बनाता है। संकेतों और अप्रस्तुतों की योजना उनकी कथाओं को काव्यभाषा का अतिरिक्त संस्कार प्रदान करती है। साथ ही यह भी कहना ज़रूरी है कि मनुष्य और समाज की तमामतर विकृतियों और विच्युतियों के समकालीन बोध के बावजूद यह कथाकार पराजित या हताश नहीं है बल्कि मनुष्यता की सर्वोपरिता में विश्वास के कारण उसकी कलम जुझारू पात्रों का सृजन करने से बाज नहीं आती। यही वह चीज़ है जो सुकेश साहनी के लघुकथाकार को सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित रचनाकार का दर्जा दिलाने में समर्थ है। 

लघुकथा अपनी सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और व्यंजकता में बहुत बार कविता के सर्वाधिक निकट की विधा प्रतीत होती है। संक्षिप्तता या सामासिकता तो इस विधा की केंद्रीय शर्त है ही। यही कारण है कि यहाँ शीर्षक भी कथ्य और शिल्प का अविभाज्य अंग होता है। इस दृष्टि से सुकेश के कुछ शीर्षक खूब सटीक बन पड़े हैं - गोश्त की गंध, चादर, आइसबर्ग, नपुंसक, शिनाख्त। ये सभी कथ्य के सबसे मार्मिक और विचलित करने वाले अंश को अजाने ही अग्रप्रस्तुत कर देते हैं। 

इसके अलावा अपनी इन लघुकाय रचनाओं में सुकेश समापन के संबंध में काफी सतर्क प्रतीत होते हैं। आरंभ कहीं से भी कर सकते हैं वे, और उसे रोचक भी बना सकते हैं; पर अंत के मामले में वे रिस्क लेने के पक्षधर नहीं हैं। वे अपने प्रतिपाद्य को पाठक के मन-मस्तिष्क में रोपित करना चाहते हैं ताकि लघुकथा अपने सामाजिक उद्देश्य में सफल हो सके भले ही इसके लिए उन्हें अंत में लेखकीय टिप्पणी जोडनी पड़े। दरअसल इस तकनीक द्वारा वे व्यंजना को अभिधा में ढालते हैं और रचना को सुख-बोध्य बनाने का यत्न करते हैं। यही कारण है कि 'गोश्त की गंध' के अंत में वे यह कहना नहीं भूलते कि 'काश, यह गोश्त की गंध उसे बहुत पहले ही महसूस हो गई होती!' 'चादर' का अंत भी प्रति-उत्कर्ष से किया गया है जो पाठक को एक्टिव बनाना चाहता है - 'मैंने उसी क्षण उस खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंका।' 'जागरूक' का अंत इसकी तुलना में अधिक सांकेतिक है - 'उनके आदेश पर बहुत से वाचमैन लाठियाँ-डंडे लेकर कोठियों से बाहर निकले और उस कुत्ते पर पिल पड़े।' 
आइसबर्ग, नपुंसक और शिनाख्त का भी समापन लेखकीय टिप्पणी और चरम-घटना को जोड़कर अत्यंत कलापूर्ण और प्रभावी ढंग से किया गया है। ‘आइसबर्ग’ के अंतिम अनुच्छेद में कई सारी भीतरी और बाहरी घटनाएँ तीव्रता के साथ घटित होती हैं और पाठक की चेतना को झटका-सा देती हैं. यह विचित्र विरोधाभास अथवा विडंबना ही है कि अब तक असुरक्षित अनुभव करता हुआ जो युवक बार-बार भयग्रस्त होकर अपनी पहचान बदल रहा था, उत्तेजित सिखों के परस्पर झगड़ने पर खुद को सुरक्षित महसूस करता है. लेखक यहाँ यह भी सूचना देता है कि दंगाग्रस्त क्षेत्र में यह युवक अपने दोस्त के घर दो दिन बिताकर आया है इसीलिए उस युवक को दंगे के भयावह आमानुषिक दृश्य भी याद आते हैं. लेकिन लेखक अपनी कहानी को एक सकारात्मक नोट पर समाप्त करता है – बेटे की शरारतों की मधुर स्मृति के साथ. यथा – “एकाएक लगा कि वह बेहद थक गया है. कर्फ्यू के बीच दोस्त के घर बिताए गए दो दिन उसकी आँखों में तैर गए – लुटती दुकानें .... भागते चीखते लोग .... जलते मकान ... टनटनाती दमकलें. उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया. अगले ही क्षण वह सीट से सिर टिकाये अपने बेटे की नन्हीं शरारतों को याद कर मुस्करा रहा था.” इसी प्रकार ‘नपुंसक’ का अंत विपथन (डिफ्लेक्शन) की तकनीक से किया गया है. उठा लाई गई मजदूरिन पर सामूहिक दुष्कर्म कर रहे युवकों के बीच शेखर अपनी संवेदनशीलता के कारण विरल आचरण करता है परंतु कापुरुष कहे जाने के डर से अपने साथियों पर इसे प्रकट नहीं करता. परिणामतः उसका अंतरंग सवयं उसे धिक्कारता है मानो मुक्तिदाता सवयं पौरुषहीनता का शिकार हो – “अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए अपने ही पदचाप से उसके दिमाग में धमाके से हो रहे थे – नपुंसक ... नपुंसक ...! मुक्तिदाता! ... नपुंसक!” ‘शिनाख्त’ का अंत इस दृष्टि से विशिष्ट है कि इसके माध्यम से आज के मनुष्य की पैसे की भूख का वह रूप सामने आता है जिसे लाशखोरी ही कहा जा सकता है. जैसे ही यह घोषणा होती है कि सांप्रदायिक दंगों में मारे गए लोगों के लिए पाँच-पाँच लाख रुपया मुआवजा दिया जाएगा, वैसे ही बलात्कार के बाद क्रूरतापूर्वक मार दी गई अज्ञात युवती के अनेक रिश्तेदार पैदा हो जाते हैं – ‘सर! ताज्जुब है. *** उस सिर कटी युवती की लाश पर अपना दावा करने वाले बहुत से लोग बाहर खड़े हैं, सर!’x

वस्तु चयन में लेखक ने सामाजिक यथार्थ पर दृष्टि केंद्रित रखी है। दहेज, घरेलू हिंसा, बलात्कार, स्त्री का बहुमुखी शोषण, सांप्रदायिकता, धार्मिक पाखंड, उपद्रव, समाज की संवेदनहीनता, अंधविश्वास, विवेकहीनता, क्रूरता, अमानुषिकता, भीड़ का उन्माद, मानवीय संबंधों का क्षरण, मीडिया, श्रम से जुड़ा आत्मसम्मान, बालश्रम, वृद्धावस्था, गरीब की साधनहीनता, मध्यवर्ग की लालसा, हिंदुस्तानियों की अंग्रेज़ियत और बाजारवाद का चक्रव्यूह जैसे प्रत्येक संवेदनशील प्राणी को विचलित करने वाले ज्वलंत विषयों को उन्होंने मार्मिक घटनाओं और जीवंत पात्रों के सहारे झकझोरने वाली अभिव्यंजना प्रदान की है। कथ्य और शिल्प की अनुरूपता के कारण ही ये लघुकथाएँ चुटियल होने का अहसास दिलाती हैं और साथ ही चोट भी करती हैं। मर्मस्थल पर वार करने में इनकी चरितार्थता का मर्म निहित है। 
अतिरंजना, फैंटेसी, आकस्मिकता और विस्मय तत्व के सहारे बुनी गई कहानियों में सुकेश ने सामाजिक यथार्थ के क्रूर और असामाजिक चेहरे के विद्रूप को रूपायित करने में पूरी सफलता पाई है। इस प्रकार की लघुकथाओं में पाठक को विचलित करने और आत्मसाक्षात्कार के लिए विवश करने की ताकत दिखाई देती है। अगर कहा जाए कि इस शिल्प में सुकेश साहनी की कहानी कला सर्वाधिक प्रभविष्णुता के साथ उभरी है, तो शायद गलत न होगा। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए 'गोश्त की गंध', 'चादर', 'जागरूक' और 'ओए बबली' को देखा जा सकता है। ‘गोश्त की गंध’ में दामाद जब भोजन के लिए बैठता है तो यह देखकर वह सन्न रह जाता है कि सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिलकुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे. आगे यह भी बताया गया है कि सास, ससुर और साले के किस-किस अंग का गोश्त दामाद की खातिरदारी के लिए उतारा गया है और किस तरह उसे छिपाने की असफल कोशिश केवल इसलिए की जा रही है कि दामाद नाराज न हो जाए. ‘चादर’ भी प्रतीकात्मक है. पवित्र नगर और पवित्र पर्वत की कल्पना का रहस्य तब खुलता है जब आख्याता अपनी चादर पर खून के दाग देखता है. और यह जानकर सन्न रह जाता है कि सभी की चादरें खून से लाल और तर थीं जबकि सभी हट्टे-कट्टे थे और कोई खूनखराबा भी नहीं हुआ था. चेतना को झटका तो तब लगता है जब यह बात समझ में आती है कि जिसकी चादर जितनी अधिक रक्तरंजित है वह उतना ही आश्वस्त होकर मूंछें ऐंठ रहा है. सांप्रदायिक दंगों की जेनेसिस पर ऐसी कहानियाँ शायद कम ही लिखी गई होंगी. ‘जागरूक’ की अतिरंजना और आकस्मिकता इन दोनों कहानियों से भिन्न प्रकार की है. यहाँ संकटग्रस्त युवती की चीख-पुकार पर सभ्य संभ्रांत भद्रलोक कान मूँदे सोया रहता है. लेकिन लावारिस कुत्ते बदमाशों पर भौंकते हैं. वश न चलने पर कुलीन कोठियों के विशाल बंद दरवाजों तक भी जाते हैं. व्यंग्यपूर्वक लेखक यह दर्ज करता है कि इस प्रयास पर लोहे के बड़े-बड़े गेटों के उस पार तैनात विदेशी नस्ल के पालतू कुत्ते उसे हिकारत से देखने लगे. अंततः जब गुंडे बलात्कार के अपने उद्देश्य में सफल होते दीखते हैं गली का कुत्ता मुँह उठाकर जोर-जोरे से रोने लगता है. लड़की का रोना जिन्होंने नहीं सुना उन्हें कुत्ते का रोना सुन जाता है क्योंकि कुत्ते का रोना अशुभ होता है. लड़की का रोना क्या होता है – शुभ या अशुभ? ऐसे समाज का क्या होगा – कल्याण या विनाश? कई सवाल पाठक को बेचैन करते हैं; और लेखक सूचना देता है कि भद्र लोग के इशारे पर बहुत से वाचमैन अशुभसूचक कुत्ते को मार रहे हैं. लावारिस कुत्तों की तुलना में हमारा यह तथाकथित भद्रलोक किस तरह का पामेरियन कुत्ता है! कुत्ते जागरूक हैं, और मनुष्य? ‘ओए बबली’ में लेखक ने स्वप्न की तकनीक अपनाई है. पानी की खोज! निरंतर और असमाप्त खोज. पानी नहीं मिलता. रेत मिलती है. गंगा-जमुनी दोआबा रेगिस्तान में बदल जाता है. कुआँ मिलता है - टशन और प्यास के विज्ञापनों वाली खूबसूरत लड़कियों के बीच. कुएँ में पानी नहीं है, बर्फ के ढेले हैं, कूल ड्रिंक्स की बोतलें हैं. माँ के लिए पानी खोजती बेटी फ्रॉक में बर्फ के ढेले भरकर दौड़ती है पर बर्फ तो बिना पिघले ही उड़नछू हो जाती है! इस बीच माँ कुआँ खोद लेती है. स्वप्न टूटता है माँ के इस निर्देश के साथ कि “चल ... जल्दी कर, बेटी! बर्तनों की कतारें लगने लगी हैं. पानी का टैंकर आता ही होगा. आज तो घर में खाना पकाने के लिए भी पानी नहीं हैं ... बबली!!” और इस तरह आभासी विश्व पर यथार्थ विश्व हावी हो जाता है. कल्पना और फैंटेसी का खोल तोड़कर भीषण यथार्थ पाठक को अपनी गिरफ़त में ले लेता है.

अपनी कथाभाषा के गठन में सुकेश जहाँ सहजता और प्रतीकात्मकता को मुहावरेदानी और आमफहम शब्दावली के सहारे एक साथ साधते हैं, वहीं सटीक विशेषणों, उपमानों और विवरणों के सहारे अभिव्यंजना को सौंदर्यपूर्ण भी बनाते हैं। ये उनकी कथारचना के वे इलाके हैं जो उन्हें कथाकार के साथ साथ उत्कृष्ट शैलीकार के रूप में प्रतिष्ठित कराने के निमित्त पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध कराते हैं। अतः सामाजिक यथार्थ और कलात्मकता को अपनी लघुकथाओं में साथ साथ संभव कर सकने वाले लेखकों की पंक्ति में सुकेश साहनी की प्रतिष्ठा सुनिश्चित मानी जानी चाहिए।

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पडाव और पड़ताल  (खंड 2) / 2014  
संपादक : बलराम अग्रवाल
[छह कथाकारों की चुनिंदा लघुकथाएं और उनकी पड़ताल]
दिशा प्रकाशान, 138/16 त्रिनगर, दिल्ली - 110035
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सुदूर मणिपुर में हिंदी

पुस्तक समीक्षा : ऋषभ देव शर्मा
सुदूर मणिपुर में हिंदी
-      ऋषभ देव शर्मा

मणिपुर पूर्वोत्तर की सात बहनों में अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक संपदा के कारण विलक्षण है. यहाँ हिंदी के प्रचार-प्रसार, सृजन और विस्तार की गाथा भी उतनी ही विलक्षण है. इस अनेक उतार चढ़ावों से भरी गाथा को डॉ. अरिबम ब्रजकुमार शर्मा ने ‘हिंदी को मणिपुर की देन’ (2014) में बेहद ईमानदारी और निष्ठा के साथ पूरे हिंदी जगत के सामने रखा है. स्मरणीय है कि उनके के पिता पं. अरिबम राधामोहन शर्मा को मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन की शुरूआत का श्रेय प्राप्त है. अपने पिता के मार्ग का अनुसरण करते हुए डॉ. ब्रजकुमार शर्मा ने भी हिंदी सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाया और साथ ही मणिपुर के हिंदी साहित्य और पत्रकारिता से भी जीवंत रूप से जुड़े रहे. इस ग्रंथ को उनकी हिंदी साधना का नवनीत भी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी.

स्मरणीय है कि भिन्न-भिन्न समाजों के पारस्परिक संबंध उनकी भाषाओं में रचे गए साहित्य और अनुवाद में पहचाने जा सकते हैं. अब इसमें पत्रकारिता-भाषाई पत्रकारिता भी जुड गई है. इससे समाजों के आधुनिक ताने-बाने को पहचानना अधिक आसान हो गया है. एक दूसरा तथ्य यह है कि किसी भाषा को आतंरिक शक्ति जहाँ उसके अपने मूल समाज से मिलती है वहीं उस समाज से भी मिलती है, जो उसे आर्थिक या सांस्कृतिक कारणों से अपना लेता है. मणिपुरी समाज ने हिंदी भाषा को वही शक्ति प्रदान की है. भारतीय जनता की सामान्य अभिव्यक्ति की भाषा बनने का संदर्भ हो अथवा राष्ट्रभाषा का स्तर पा लेने वाली भाषा का, हिंदी को दोनों ही रूपों में मणिपुरी समाज ने शक्तिशाली बनाया है.

डॉ. अरिबम ब्रजकुमार शर्मा ने अपनी इस पुस्तक में मणिपुर के हिंदी साहित्य और हिंदी पत्रकारिता का जो विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है, उससे पता चलता है कि मणिपुरी भाषा के समृद्ध पारंपरिक रूप तथा समर्थ रचनात्मक चेतना से हिंदी अनेक रूपों में लाभान्वित हुई है. लेखक ने जितना अपनी ओर से कहा है, उतना ही ऐतिहासिक तथा उपलब्ध साहित्यिक स्रोतों का सहारा भी लिया है. यह तुलनात्मक दृष्टि से सच तक पहुँचने का सही मार्ग है. लेखक का श्रम सराहनीय भी है, फलदायी भी.
हिंदी को मणिपुरी की देन / 
अरिबम ब्रजकुमार शर्मा /
2014/ यश पब्लिकेशंस,
1/11848 पंचशील गार्डन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली – 110 032 /
पृष्ठ – 304/  मूल्य – रु.895

भास्वर भारत/ मई 2014/ पृष्ठ 61