फ़ॉलोअर

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

द्वितीय 'आचार्य हस्ती सेवा-सम्मान' डॉ. राधेश्याम शुक्ल को दिया गया


15  जनवरी 2012  को हैदराबाद में जैनाचार्य हस्तीमल जी की स्मृति में स्थापित न्यास की ओर से इस वर्ष का आचार्य हस्ती सेवा-सम्मान 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल को प्रदान किया गया. अध्यक्षता जैन-रत्न सुरेंद्र लूणिया ने की और मुख्य अतिथि के रूप में चेन्नई की जैन संस्था के अधिकारी मंचासीन हुए. अपुन को विशेष अतिथि के रूप में बोलने को बुलाया गया.  





[चित्र :  हरिकृष्णा और  संपत देवी मुरारका]

बुधवार, 18 जनवरी 2012

गुलज़ार : गुफ़्तगू के दौरान

हैदराबाद लिटरेरी फेस्टिवल (16/17/18 जनवरी 2012) की पहली शाम 'सुकृता पुल कुमार की गुलज़ार से गुफ़्तगू' के कारण स्मरणीय बन गई. दिन भर की थकन जैसे हवा हो गई. सरहद और बुढिया वाली कविताएं यों तो पहले की सुनी-पढ़ी थीं पर आमने-सामने कवि के मुख से सुनने का मज़ा और ही था. चलते-चलते भी उन्होंने छात्रों की माँग पर किताब पर भी एक कविता सुनाई. लिपि ने कुछ चित्र भी लिए -


'गुफ़्तगू' के दौरान भी, और सवेरे उद्घाटन में भी, पवन के. वर्मा और गुलज़ार दोनों ने ही ज़ोर देकर कहा कि इस तरह के 'फेस्टिवल' का अंग्रेजीमे स्वरूप मानसिक औपनिवेशिकता का द्योतक है और कि ऐसे अवसरों पर भारतीय भाषा, भारतीय संस्कृति और भारतीयता को केंद्र में रखा जाना चाहिए.


हिंदी के अखबारों में तो इस बड़ी और महत्वपूर्ण घटना का कोई ज़िक्र आज दिखाई नहीं दिया. अलबत्ता अंग्रेजी प्रेस ने अवश्य  कवर किया. एक अखबार ने तो 'साहित्यकारों का क्रंदन' ही शीर्षक बना डाला.
      [चित्र : लिपि भारद्वाज]
द्रष्टव्य-  
Litterateurs lament ‘English Raj’
Need to preserve one's language, culture stressed

Poor turnout at festival

रविवार, 8 जनवरी 2012

तेलुगु नाटक 'अक्षर' : अनूदित पाठ की भूमिका

शुभाशंसा

अनुवाद समाज के लिए उतना ही जरूरी है जितनी भाषा. भाषा के बिना किसी समुदाय के सदस्य जिस प्रकार संवादहीन हो सकते हैं उसी प्रकार अनुवाद के अभाव में भिन्न समुदायों का परस्पर संवाद संभव नहीं है. इसलिए अनुवाद एक ऐसी बहुभाषिक गतिविधि है जो अलग अलग भाषा समुदायों के बीच संवाद सेतु बनाती है. प्रसन्नता की बात है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद की इस गतिविधि के कारण अलग अलग भाषा समुदायों के बीच आपसी समझ का विकास हो रहा है. अनुवाद के माध्यम से यह बात भी पुष्ट होती है कि विभिन्न भाषाओं के साहित्य के मूलभूत मानवीय सरोकार एक समान हैं. आज के समय में जीवन मूल्यों का क्षरण दयनीय अवस्था तक पहुँच गया है और आम आदमी भ्रष्टाचार के जाले में बुरी तरह फँसकर छटपटा रहा है. इस क्रूर यथार्थ को सभी भारतीय भाषाओं के लेखक शिद्दत से महसूस कर रहे हैं और अभिव्यक्त कर रहे हैं. श्री बी.विश्वनाथाचारी द्वारा अनूदित श्री नंदिराजु सुब्बाराव का तेलुगु नाटक ‘अक्षर’ भी इसका अपवाद नहीं है.

‘अक्षर’ एक प्रयोगशील नाटक है जिसे नुक्कड़ नाटक के रूप में भी खेला जा सकता है. इसके केंद्र में लुटा पिटा आम आदमी है. समाज का जो विशिष्ट वर्ग है, भद्र लोक है वह सब प्रकार की सुख सुविधाओं से संपन्न है. दूसरी ओर आम आदमी सब प्रकार की सुख सुविधाओं से वंचित है. आर्थिक अभावों के कारण वह पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम जैसी जिंदगी बसर करने को मजबूर है. फिर भी चाहता है कि अपनी अगली पीढ़ी को बेहतर जिंदगी दे सके, आजादी मुहैया करा सके. लेकिन उसकी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं हो पाती. वह अपने बेटे को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाता इसलिए बेटा बेरोजगार रह जाता है. बेटी के लिए दूल्हों के बाजार में ऊँचा दहेज नहीं दे पाता इसलिए वह अभिशप्त जीवन भोगती है. पत्नी के लिए अपने अंग बेचकर भी कुछ साँसें नहीं खरीद पाता इसलिए वह दम तोड़ देती है. रिश्ते नातों की व्यर्थता, शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा जैसी संस्थाओं के पतन और उपभोक्तावाद के विषैले प्रभाव को इस नाटक में व्यंग्य के माध्यम से पूरी तल्खी के साथ उभारा गया है. घर की तलाश करता आम आदमी अंत तक असफल रहता है. निस्संदेह यह संवेदना केवल तेलुगु भाषा और आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं है बल्कि सारे भारत की कमोबेश यही कहानी है.

इस अनुवाद के माध्यम से हिंदी के पाठक तेलुगु नाटक की समसामयिक चिंता से रू-ब-रू होंगे. साथ ही इसमें निहित व्यंग्य उन्हें विचलित भी करेगा. ऐसा मेरा विश्वास है.

मूल लेखक और अनुवादक को इस कृति के प्रकाशन के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ.


७.१.२०११ 

रविवार, 1 जनवरी 2012

श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर ...


पिछले कई वर्षों से उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद की शोधछात्रा श्रीमती सीमा मिश्रा ३१ दिसंबर को श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर संगोष्ठी का आयोजन करती रही हैं. उन पर एमफिल के बाद पीएचडी भी वे उन्हीं पर कर रही थीं. इस बार श्रीलाल शुक्ल कों ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया लेकिन कुछ ही दिन बाद वे पंचतत्व में लीं हो गए. यों इस वर्ष [३१.१२.२०११] की संगोष्ठी उनकी स्मृति कों समर्पित की गई.

अध्यक्षता अपुन के जिम्मे आई. मुख्य अतिथि रहे चंडीगढ से पधारे प्रो. अमर सिंह वधान. ''हिंदी साहित्य को श्रीलाल शुक्ल का प्रदेय'' पर मुख्य व्याख्यान प्रो. टी. मोहन सिंह ने दिया ; सीमा मिश्र भी बोलीं. विशेष अतिथि डॉ. अहिल्या मिश्र थीं और संचालक डॉ. जी.नीरजा. सीमा की किताब ''श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'राग  दरबारी' का राजनैतिक संदर्भ'' का लोकार्पण किया डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने. अच्छी-खासी चर्चा हुई.

संपत देवी मुरारका जी ने खूब फोटो खींचे ; और मुझे भेज भी दिए.