ऋषभ उवाच

साहित्य : सृजन और समीक्षा

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शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

‘‘भाषा का संसार’’: कहि न जाय का कहिए!



प्रो. दिलीप सिंह (1951) ने समाजभाषाविज्ञान को अपने अध्ययन और अनुसंधान का केंद्र बनाया है। वे साहित्य और भाषा पर विचार करते समय सामाजिक संदर्भ को सदा ध्यान रखते हैं। साहित्य का संसार और भाषा का संसार उनके निकट अलग-अलग नहीं है। स्मरणीय है कि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने एक कविता प्रधान मासिक पत्रिका में ‘कविता पाठ विमर्ष’ पर धारावाहिक लेखन किया था और साथ ही दैनिक पत्र स्वतंत्र वार्ता में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान पर भी धारावाहिक लेख लिखे थे जिनमें भाषा और समाज के परस्पर संबंध से लेकर भाषाविज्ञान की अधुनातन प्रणालियों तक की व्याख्या की गई थी। भाषा विषयक उनके इस चिंतन को सुगम रूप में उनकी नई कृति ‘भाषा का संसार’ (2008) में देखा जा सकता है। इस कृति के शीर्षक की व्याख्या करते हुए कोष्ठक में लिखा गया है - आधुनिक भाषाविज्ञान की सुगम भूमिका। सचमुच यह कृति आधुनिक भाषाविज्ञान को समझने के लिए सहज और सुगम मार्ग का निर्माण करने में समर्थ है।


लेखक के लिए भाषा मानो संपूर्ण संसार है। अगर ‘भाषा का संसार’ को ‘भाषा ही संसार’ भी कह दिया जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी - वैसे भी भारतीय चिंतन मूलतः वाक् केंद्रित ही तो है! प्रो. दिलीप सिंह मानते हैं कि भाषा एक साथ बहुत कुछ है अर्थात् यदि भाषा एक ओर संप्रेषण की बहुमुखी व्यवस्था है तो दूसरी ओर सोचने-विचारने का माध्यम हैं, तीसरी ओर भाषा ही साहित्यिक सृष्टि का कलात्मक साधन है।चौथी ओर वे भाषा को एक सामाजिक संस्था मानते है तो यह भी मानते है कि भारत जैसे देश में भाषा राजनैतिक विवाद का सर्वकालिक मुद्दा है। वे ध्यान दिलाते है कि भाषा किसी देश को एकता के सूत्र में जोड़नेवाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व है जो उसके विकास का माध्यम बनता है। लेकिन उन्हें यह बात नहीं सुहाती कि हम भाषा को मिली-मिलाई चीज़ मान लेते हैं। उनका मानना है कि भाषा के प्रति उदासीनता हमारी अपनी भाषाओं के विकास और व्यवहार को अवरुद्ध करती है। अपनी भाषा के प्रति हमारी सजगता और दृष्टि से हमारे पूरे भाषा समाज के विकास पर प्रभाव पड़ता है। इसीलिए वे दृढ़ शब्दों मे कहते है कि अपनी भाषा के प्रति सकारात्मक और व्यापक दृष्टिकोण अपनाए बिना न तो हमारा सामाजिक विकास संभव है न ही मानसिक।


इस पुस्तक में भाषा, संप्रेषण और व्याकरण के जटिल रिश्तों की गाँठें भी खोली गई है। भाषा एक व्यवस्था है -इस सत्य को स्वीकारते हुए भी लेखक ने इस स्थापना पर अधिक बल दिया है कि भाषा कोई जड़ या रूढ़ व्यवस्था नहीं है। उसके साथ व्याकरण ही नहीं बोध और संप्रेषण का भी गहरा जुड़ाव है। संप्रेषण की क्षमता के लिए भाषा प्रयोग की उपयुक्तता की आवश्यकता होती है। इसे लेखक ने भाषा के समाज स्वीकृत विकल्पों के प्रयोग की क्षमता के रूप में व्याख्यायित किया है और इस पुस्तक द्वारा भाषा के बदलते परिप्रेक्ष्य को रूपायित करने का प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने भाषा क्या है, भाषा क्या करती है तथा भाषा के लिए भाषाविज्ञान किस तरह विक्सित हुआ है जैसे प्रश्नों पर अपने पाठक को सामने रखकर खुला चिंतन किया है।



पुस्तक का पहला खंड जहाँ भाषा के संबंध में हमारी धारणा, सिद्धांत, व्यवहार, व्यक्ति और संप्रेषण से उसके संबंध और भाषा की सर्जनात्मकता पर केंद्रित है, वहीं दूसरे खंड में सस्यूर, चौम्स्की, लेबाव, हैलिडे और डेल हाइम्स जैसे आधुनिक पाश्चात्य भाषावैज्ञानिकों की मान्यताओं का सुबोध शैली में विवेचन किया गया है। उदाहरण के लिए, भाषा और संप्रेषण के संबंध की चर्चा करते हुए एक स्थान पर वे लिखते हैं कि ‘‘संप्रेषण एक खेल है (हैलिडे)। जब दो टीमें कोई खेल खेलती हैं तो उन्हें उस खेल के नियमों पर परस्पर सहमत होना होता है, तभी खेल अपनी परिणति तक पहुँच पाता है। इसमें संदेह नहीं कि हम किसी से तभी बातचीत कर पाते हैं जब हमारे और उसके बीच भाषा-व्यवहार का ‘एग्रीड’ (साझा) समुच्चय (सेट) का साधन है, खुद में संप्रेषण है (पटनायक)। भाषा की सामाजिक उपादेयता यही है कि वह संप्रेषण है।’’


जब हम भाषा पर विचार करते हैं तो सहज ही उसकी सर्जनात्मकता का प्रश्न भी सामने आता है। यदि सर्जनात्मक संभावनाएँ न हो तो भाषा रूढ़िबद्ध होकर मरने के लिए अभिशप्त होगी। इसके विपरीत सर्जनात्मकता उसे नवनवोन्मेषशालिनी जीवन्तता से भरा पूरा बनाए रखती हैं। इस सर्जनात्मकता को भी भाषा प्रयोक्ता निरंतर नई धार देता चलता है। लेखक ने इसके साधक तत्वों की ओर भी बखूबी संकेत किया है - ‘‘कहने की जरूरत नहीं कि हमें अपनी भाषाओं में अलंकारों, प्रतीकों, बिंबों, मुहावरों, कहावतों, कथनों, अभिव्यक्तियों का जो समृद्ध जखीरा प्राप्त है वह भाषा की सर्जनात्मक शक्ति की संभावनाओं के सतत उत्खनन से ही निर्मित हुआ है। भाषा में सर्जनात्मकता जितने गहरे पैबस्त है, मनुष्य का सर्जक मन उतना ही उसे नए रंग, नई छटा और नए स्वर देने को बेचैन रहता है और इस तरह भाषा की सर्जनात्मकता निरंतर निखरती रहती है। उसका प्रयोक्ता उसे खराद पर चढ़ाता रहता है। इसीलिए भाषा-व्यवहार सदैव नवप्रवर्तनकारी (इनोवेटिव) और सर्जनात्मक (क्रिएटिव) हुआ करता है।’’


इसमें संदेह नहीं कि भाषा वैविध्य के कारण भाषा अध्ययन की दृष्टियों में समय-समय पर अनेक बदलाव आए हैं और उसके संदर्भ भी बदले हैं । यही कारण है कि किसी के लिए भाषा एक व्यवस्था है तो किसी के लिए व्यवस्थाओं की व्यवस्था, एक के लिए वह मानव मन की सर्जनात्मक शक्ति है तो दूसरे के लिए मानव व्यवहार की सामाजिक शक्ति। कहना न होगा कि प्रो. दिलीप सिंह ने इस कृति में परिवर्तनशील भाषादृष्टि और भाषासंदर्भ का सुंदर विवेचन किया है।


कृति का तीसरा खंड भारतीय भाषाचिंतकों को समर्पित है। यहाँ डॉ. धीरेंद्र वर्मा, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ.देवेंद्र नाथ शर्मा, पंडित विद्यानिवास मिश्र, प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, प्रो. सुरेश कुमार, प्रो.शिवेंद्र किशोर वर्मा, प्रो. राजाराम मेहरोत्रा, डॉ.भोलानाथ तिवारी, डॉ.कैलाश चंद्र भाटिया और डॉ.हरदेव बाहरी के भाषाचिंतन का विवेचन किया गया है जिससे आधुनिक भारतीय भाषाविज्ञान एक मुकम्मल तस्वीर उभरकर सामने आती है। निश्चय ही लेखक की भाषादृष्टि और इतिहास दृष्टि का समुचित परिपाक इस खंड में हुआ है।


चौथे खंड में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की कतिपय शाखाओं और धारणाओं को उदाहरणों सहित खोलकर समझाया गया है। इनमें भाषा शिक्षण, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, अनुवाद विज्ञान और कोश विज्ञान के साथ-साथ प्राकृतिक भाषा संसाधन तथा कंप्यूटर प्रणाली को सम्मिलित किया गया है। कंप्यूटर भाषा की चर्चा करते हुए इस तथ्य पर बल दिया गया है कि भाषा क्या है से आगे बढ़कर भाषा कैसे काम करती है का प्रश्न इस प्रयोग क्षेत्र के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।


पांचवें खंड में प्रो. दिलीप सिंह ने भाषा अध्ययन की आधुनिक संकल्पनाओं की व्याख्या की है। इन संकल्पनाओं में भाषा समुदाय, द्विभाषिकता, बहुभाषिकता, कोड मिश्रण, कोड परिवर्तन, पिजिन, क्रियोल, भाषाद्वैत, अधिशासी भाषा, अधिशासित भाषा, मानकीकरण, आधुनिकीकरण और भाषा नियोजन शामिल हैं । आजकल मीडिया की मिश्रित हिंदी को लेकर अनेक प्रकार की चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं और यह निष्कर्ष दे दिया जाता है कि बाज़ार के दबाव के कारण मीडिया हिंदी की हत्या कर रहा है। इस संबंध में प्रो. दिलीप सिंह तटस्थतापूर्वक विचार करते हुए कहते है, ‘‘भाषा की शुद्धता का समर्थक वर्ग इसे हिंदी भाषा का अपमान और अवनति मानकर देख रहा है। यदि हम इसे भाषा संपर्क और भाषा विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अवमिश्रण से भाषाएँ भ्रष्ट नहीं होती हैं, उनकी अभिव्यंजना शक्ति बढ़ती है।’’ यहाँ प्रश्न उठता है कि इस भाषाई मिश्रण और परिवर्तन की क्या कोई सीमारेखा नहीं है। लेखक ने इसका भी उत्तर दिया है। वे बताते हैं कि भाषा मिश्रण में भी प्रतिबंध होते है जैसे -


1. एक भाषा के वाक्य में दूसरी भाषा का उपवाक्य मान्य नहीं है: वह लड़का, हूम यू मेट यस्टरडे, फेल हो गया।

2. एक भाषा के दो वाक्यों के बीच दूसरी भाषा का संयोजक मान्य नहीं है: मैं पढ़ना चाहता था बट नहीं पढ़ सका।

3. एक भाषा के उपवाक्य के बाद दूसरी भाषा के उपवाक्य में समुच्चय बोधक दूसरी भाषा का ही होना चाहिए: कल तुम समय से नहीं आए देन आई विल टर्न यू आउट (मान्य), कल तुम समय से नहीं आए तो आई विलटर्न यू आउट (अमान्य)।

4. हिंदी के वाक्यों में अंग्रेज़ी के निर्धारक, क्रमसूचक, संख्यासूचक का प्रयोग अमान्य है: दैट आदमी मूर्ख है, फस्र्ट लड़का अच्छा है, फाइव छात्र अनुपस्थित हैं।


अन्यत्र लेखक ने आधुनिक भाषा के रूप में संचार माध्यमों की हिंदी की विषेषताएँ इस प्रकार गिनाई हैं -

1. सहजता और संप्रेषणीयता

2. तकनीकीपन

3. प्रभावशीलता (जैसे शीर्ष पंक्ति का पैनापन)

4. भाषा प्रवाह (मिश्रित शैली का प्रयोग जो जनभाषा के निकट है)

5. संक्षिप्तियों का व्यापक प्रयोग (जैसे इंका, दक्षेस, भाजपा)

6. कर्मवाच्य का प्रयोग (पाया गया है, टीम बनाई गई, भेजा गया)

7. समाचार प्रारंभ करने वाली खास अभिव्यक्तियाँ (सूचना मिली है, ज्ञात हुआ है, बताया जाता है, - का कहना है)



इस प्रकार स्पष्ट है कि भाषा की सैद्धांतिकी से लेकर उसके आधुनिकतम व्यावहारिक रूप तक का विवचेन इस पुस्तक को सही अर्थों में ‘भाषा का संसार’ सिद्ध करता है। पुस्तक के समाहार शीर्षक अंतिम खंड में लेखक ने यह स्थापना की है कि ‘जड़ नहीं अब भाषाविज्ञान’ और यह प्रतिपादित किया है कि मानव जीवन में भाषा का स्थान इतना केंद्रीय है कि भाषाविज्ञान की परिधि में मिथकों, वर्जित भाषा प्रयोगों, नाते-रिश्तों की भूमिकाओं, वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न आचरणों और रंग शब्दों के अध्ययन को भी समेटा जा सकता है तथा इनके प्रारूप बनाए जा सकते हैं। भाषा विमर्श के अद्यतन सरोकारों को समेटने वाली इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य भाषा और भाषाविज्ञान की ऐसी पीठिका तैयार करना है जो हर खासोआम को भाषा रूपी उस सशक्त माध्यम का परिचय दे सके जिसका वह रात-दिन प्रयोग करता है। दुहराने की आवश्यकता नहीं है कि पुस्तक अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफल है।




`भाषा का संसार ' /
प्रो. दिलीप सिंह/
वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002/
प्रथम संस्करण: 2008/
250 रु/
180 पृष्ठ (सजिल्द)


प्रस्तुतकर्ता RISHABHA DEO SHARMA ऋषभदेव शर्मा पर 9:04:00 pm 5 टिप्‍पणियां:
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भाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन की गीता




हिंदी के प्रमुख समकालीन भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह (1951) हिंदी भाषाविज्ञान को अपने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान विषयक लेखन और चिंतन द्वारा निरंतर समृद्ध कर रहे हैं। समाज भाषाविज्ञान और शैलीविज्ञान में विशेष रुचि रखने वाले डॉ. दिलीप सिंह की एक दुर्लभ योग्यता यह है कि वे ऐसे सव्यसाची अध्येता और अध्यापक हैं जो भाषाविज्ञान और साहित्य दोनों का एक साथ लक्ष्यवेध करने में समर्थ हैं .यही कारण है कि उनका लेखन न तो निरा भाषिक अध्ययन है और न मात्र भावयात्रा। इसका परिणाम यह हुआ है कि उनकी पुस्तकें भाषा केंद्रित होने के साथ-साथ अपनी परिधि में साहित्य को भली प्रकार समेटती हैं। यह विशेषता उनकी पुस्तक ‘भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण’ (2007) के अवलोकन से भी प्रमाणित होती है।


‘भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण’ के लक्ष्य पाठक के रूप में लेखक के समक्ष अन्य भाषा और विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण करने वाले अध्यापक रहे हैं। ऐसे अध्यापकों के निमित्त एक संपूर्ण पुस्तक का अभाव लंबे समय से खटकता रहा है क्योंकि अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण पर हिंदी में पुस्तकों का कतई टोटा है। ‘‘इस तरह की जो किताबें हिंदी में प्रकाशित हैं उनमें से अधिकतर व्याकरण-शिक्षण की परिधि का तक सीमित हैं। इसका एक कारण तो यह है कि इन पुस्तकों के लेखक या तो शुद्ध भाषावैज्ञानिक हैं या हिंदी के वैयाकरण, अतः वे सिद्धांत चर्चा से बाहर नहीं निकल पाते और संरचना केंद्रित भाषा शिक्षण को ही भाषा अधिगम का प्रथम और अंतिम सोपान मानते हैं। दूसरा कारण यह है कि भाषावैज्ञानिक पृष्ठभूमि के इन लेखकों की साहित्य-भाषा में तनिक भी रुचि नहीं है जबकि अन्य भाषा के शिक्षण का बहुत बड़ा हिस्सा पाठ केंद्रित होता है। भारत के भाषाविद् और साहित्यवेत्ता दो खेमों में बँटे हुए हैं। भाषाविज्ञान साहित्य से और साहित्यकार-आलोचक भाषाविज्ञान से अपने को कोसों दूर रखते हैं। अन्य देशों में ऐसा नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि साहित्यिक कृति में भाषा अध्ययन की तथा भाषा में सर्जनात्मकता की अनंत संभावनाएँ निहित हैं। कारण कुछ भी हों, अन्य भाषा शिक्षक को संबोधित सामग्री का हिंदी में नितांत अभाव है, इसमें दो राय नहीं। हिंदीतर क्षेत्रों तथा विश्व के अन्य देशों में हिंदी पढ़ानेवालों को यह पुस्तक ध्यान में रखकर तैयार की गई है।’’



पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर दिए गए इस प्रचारक वक्तव्य में मैं यह भी जोड़ना चाहूँगा कि अगर इसे केवल अन्य भाषा शिक्षण की पुस्तक माना जाए तो यह लेखक और पुस्तक दोनों के प्रति अन्याय होगा। मेरी राय में तो प्रथम भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने-पढ़ाने वालों के लिए भी यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी और आवश्यक है। इतना ही नहीं , साहित्य समीक्षा के लिए भी इस पुस्तक से नई दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इस नई दृष्टि का संबंध है साहित्य अध्ययन के लिए भाषा, साहित्य और संस्कृति के त्रिक को साधने से।



प्रो. दिलीप सिंह की यह मान्यता इस पुस्तक में व्यावहारिक रूप में प्रतिफलित हुई है कि भाषा शिक्षण द्वारा व्यक्ति के भाषा व्यवहार ही नहीं उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को धार दी जा सकती है। व्यक्तित्व विकास की इस प्रक्रिया में साहित्य शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि उससे व्यक्ति के संज्ञानात्मक और सोचने को कौशल को निखारा जा सकता है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह मान्यता है कि किसी भी कथन/अभिव्यक्ति/पाठ में साहित्य और भाषा के बहाने सामाजिक-सांस्कृतिक घटक पिरोए गए होते हैं जिनके उद्घाटन के बिना उसका पढ़ना-पढ़ाना अधूरा रह जाता है। अतः भाषा अध्ययन के रास्ते किसी समाज की संस्कृति तक पहुँचना कैसे संभव होता है यह सीखना-सिखाना बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें संदेह नहीं यह पुस्तक इन लक्ष्यों की प्राप्ति को संभव बनाने में समर्थ है।



- मेरे विचार से प्रो. दिलीप सिंह की दूसरी किताबों की तरह ‘भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण’ की भी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक ने भाषाविज्ञान के सिद्धांतों को अनुप्रयोगात्मक और व्यावहारिक बनाकर प्रस्तुत किया है।


- दूसरी ध्यान खींचने वाली बात यह है कि इसमें भाषा शिक्षण के सिद्धांतों को हिंदी के पाठों के जरिए सामने लाया गया है।


- तीसरी बात यह कि लेखक के समक्ष अपना लक्ष्य पाठक सदा उपस्थित रहा है और इसीलिए पुस्तक में अनेक स्थलों पर शिक्षण बिंदु निर्धारित किए गए हैं। ऐसा इसलिए भी हो सका है कि मूल रूप में यह पुस्तक इसी विषय पर शिक्षकों और प्रशिक्षणार्थियों के समक्ष तीन दिन में दिए गए नौ व्याख्यानों का लिखित रूप है। इसलिए इसमें जीवंत संवाद लगातार चलता दिखाई देता है - कक्षा की तरह।

- चौथी बात यह कि द्वितीय भाषा हिंदी के शिक्षक को इस पुस्तक के रूप में इस तरह की व्यावहारिक हिंदी शिक्षण की कृति से पहली बार परिचित होने का अवसर मिल रहा है।


- पाँचवीं विशेषता इस पुस्तक की यह है कि इसमें हिंदी शिक्षण के इतिहास का क्रमिक परिचय भी दिया गया है और उसे व्यापक संदर्भ में विवेचित किया गया है। पुस्तक को समझने के लिए यह विवेचन सुदृढ़ पीठिका का काम करता है।

- छठी विशेषता जो इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने और सहेजकर रखने की चीज़ बनाती है वह यह है कि भाषा और साहित्य के माध्यम से संस्कृति शिक्षण पर इस किताब में पहली बार व्यावहारिक चर्चा की गई है जो अध्यापक और समीक्षक से लेकर सामान्य पाठक तक के लिए मार्गदर्शक हो सकती है।


- सातवीं विशेषता यह है कि प्रो. दिलीप सिंह की यह पुस्तक उनके अपने व्यक्तित्व के अनुरूप यह प्रतिपादित करती है कि भाषा और साहित्य दोनों एक दूसरे के माध्यम से पुष्ट होते हैं, एक दूसरे को पुष्ट करते हैं और संस्कृति के वाहक होते हैं।


- विशेषताएँ चाहे जितनी गिनाई जा सकती है लेकिन इस पुस्तक की आठवीं विशेषता के रूप में मैं यह कहना चाहूँगा कि यह कृति अपने पाठक को विविध उदाहरणों के माध्यम से यह समझाने में सर्वथा समर्थ है कि विविध प्रकार के आचरण, शिष्टाचार, विनम्रता आदि को कोई संस्कृति किस प्रकार अपनाती है तथा उनकी अभिव्यक्ति भाषा और साहित्य में किस प्रकार अंतःसलिला बनकर विद्यमान रहती है।




कुल मिलाकर भाषा, साहित्य और संस्कृति के त्रिक की साधना के लिए प्रो. दिलीप सिंह की यह कृति गीता की भाँति अध्ययन, मनन और चिंतन के योग्य है।


भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण /
प्रो. दिलीप सिंह /
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली /
2007 / 295 रुपये / 224 पृष्ठ (सजिल्द) |

प्रस्तुतकर्ता RISHABHA DEO SHARMA ऋषभदेव शर्मा पर 10:24:00 am 1 टिप्पणी:
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गुरुवार, 3 सितंबर 2009

अ.भा राजभाषा पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न

प्रस्तुतकर्ता RISHABHA DEO SHARMA ऋषभदेव शर्मा पर 9:22:00 am 1 टिप्पणी:
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विषय : गतिविधि, भाषा

बुधवार, 2 सितंबर 2009

शोध, यात्रा और साक्षात्कार



हैदराबाद के हिंदी साहित्यिक परिदृश्य के संबंध में कुछ समय पूर्व तक यह समझा जाता था कि यहाँ हिंदी कवियों, और उनमें भी अभ्यास कवियों, की भरमार है, या फिर शोध प्रबंधों का बोलबाला है। परंतु इधर स्थिति काफी बदली है। कवियों और शोध प्रबंधकारों की फसल तो पहले की तरह ही लहलहा रही है लेकिन नए गद्यकारों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है। प्रसन्नता की बात यह है कि व्यंग्य, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, समीक्षा, यात्रावृत्त, निबंध सहित विविध आधुनिक गद्य विधाओं में जो लेखन इधर सामने आ रहा है वह विषय और प्रस्तुति दोनों ही दृष्टियों से ध्यान आकृष्ट करता है तथा उसकी गुणवत्ता भी हैदराबाद के हिंदी गद्य के भविष्य के संबंध में आश्वस्त करती है। इसी संदर्भ में इस बार जहाँ हम एक शोध (कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण) की चर्चा कर रहे है वहीं एक-एक यात्रावृत्तांत (यात्राक्रम) तथा साक्षात्कार/भेंटवार्ता (सुर्ख़ियों में लोग) से भी पाठकों को परिचित कराना चाहते हैं।

1.

साहित्य की विविध विधाओं में नाटक का शास्त्र सबसे पहले तैयार हुआ क्योंकि इसका संबंध जीवंत प्रस्तुति से है। किसी भी विधा को नाटक में ढाला जा सकता है। कहानियों का मंचन तो बहुत प्रचलित है ही। डॉ.. करण सिंह ऊटवाल ने अपनी पुस्तक ‘कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण’ (2008) में इसी विषय पर शोध प्रस्तुत किया है। विभिन्न साहित्यिक और मीडिया विषयक विधाओं का परिचय देने के बाद उन्होंने किसी एक साहित्यिक रूप के दूसरे रूप में अंतरण के चार भेद किए हैं - रूपांतरण, भाषांतरण, माध्यमांतरण और लिप्यंतरण।

इसमें संदेह नहीं कि नाट्य रूपांतरण का इतिहास बहुत पुराना है। पौराणिक आख्यानों, भक्ति साहित्य में वर्णित लीलाओं, रामायण-महाभारत और लोकसाहित्य से लेकर कथा, कहानी, उपन्यास और संचार के माध्यमों से संबंधित विधाओं तक का नाट्य रूपांतर समय-समय पर होता रहा है। रामलीला और रासलीला हो या हरिकथा और तमाशा सब इस विषय क्षेत्र में समा जाते हैं। परंतु करण सिंह ने अपने संक्षिप्त ग्रंथ में केवल कहानी के रंगमंच और नाट्य रूपांतरों पर विचार किया है। इसके अंतर्गत उपन्यास के नाट्य रूपांतर को भी नहीं लिया गया है।

हिंदी में रूपांतरण का इतिहास बताने के बाद लेखक ने अलग-अलग अध्यायों में धूप का एक टुकड़ा (निर्मल वर्मा), डेढ़ इंच ऊपर (निर्मल वर्मा) तथा इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर (हरिशंकर परसाई) की मंचीय प्रस्तुतियों का विवेचन किया है। इस विवेचन के लिए प्रस्तुतीकरण के विधान, प्रस्तुति के रूप, दृश्य विधान, आरंभ, अंत, संवाद, समय, स्थान, वातावरण, पात्र, भाषा शैली, दृश्य परिवर्तन, कथा परिवर्तन, संवाद परिवर्तन, प्रभाव और प्रतिक्रिया को आधार बनाया गया है। इन्हीं आधारों पर और भी विस्तुत कार्य किया जा सकता है। डॉ. करण सिंह ऊटवाल सक्रिय रूप से नाटक और रंगमंच से जुड़े हुए है, इसलिए उनसे ऐसे अधिक व्यापक ग्रंथ की अपेक्षा करना उचित ही होगा।


2.

संपतदेवी मुरारका सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों में रुचिपूर्वक आगे रहने वाली धर्मप्राण महिला हैं। उन्हें तीर्थाटन का शौक है। अपने परिवार के साथ वे देश-विदेश में अनेक यात्राएँ कर चुकी हैं। समय-समय पर उनके कुछ यात्रावृत्त प्रकाशित भी हुए हैं। अब उन्होंने ‘यात्राक्रम’ : प्रथम भाग (2008) के माध्यम से उन यात्रावृत्तों को विधिवत पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है।


‘यात्राक्रम’ के लगभग सभी यात्रावृत्त किसी ने किसी धार्मिक स्थल से संबंधित हैं। इस प्रथम खंड में कुल आठ यात्रावृत्त सम्मिलित हैं - यात्रा वैष्णवदेवी, यात्रा नैनादेवी, यात्रा रामनगर की, मथुरा वृंदावन की ओर (विषय सूची में इसका शीर्षक ‘मथुरा दक्षिण भारत की’ छपा है!), यात्रा दक्षिण भारत की, यात्रा बद्रीनाथ-केदारनाथ, गंगोत्री-यमुनोत्री और उत्तरांचल की यात्रा तथा हरिद्वार का महाकुम्भ । साथ ही आर्ट पेपर पर चौदह पृष्ठों की रंगीन चित्रावली भी संजोई गई है।


परिवार के साथ धार्मिक यात्राओं के ये वृत्तांत कई कारणों से ध्यान खींचते है। लेखिका का विनम्र परंतु स्वाभिमानी व्यक्तित्व उनके अस्थाशील और दृढ़ निश्चयी मानस की झांकियों के साथ स्थान-स्थान पर झलकता है। ये यात्रावृत्त कोरे विवरण भर नहीं है बल्कि लेखिका ने अनुभव के साथ-साथ अनुभूति को इस तरह पिरोया है कि उनकी भाव प्रवणता पाठक को किसी कहानी की तरह अपने साथ बहा ले जाती है। हर दर्शनीय स्थल के साथ किसी न किसी ऐतिहासिक संदर्भ, पौराणिक प्रसंग, लोक विश्वास या किंवदंती का संबंध होता है, लेखिका ने अपने यात्रावृत्तों में ऐसी अंतर्कथाओं का समावेश करके भी कथा रस की सृष्टि की है। प्रकृति और मनुष्यों के विवरण के साथ-साथ क्षेत्रीय संस्कृति और लोकाचार को भी इन यात्रावृत्तों में समेटा गया है जिससे इनकी प्रामाणिकता में वृद्धि हुई है। कुछ स्थलों पर भाषा की काव्यात्मकता भी आकर्षक बन पड़ी है।


कुल मिलाकर सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा शैली में रचित यह पुस्तक पठनीय, दर्शनीय और यात्रा प्रेमियों के लिए संग्रहणीय भी है। ‘यात्राक्रम’ के दूसरे खंड की प्रतीक्षा रहेगी।


3.

‘सुर्ख़ियों में लोग’ (2008) में युवा पत्रकार फकीर मोहम्मद सलीम (1973) द्वारा समय-समय पर लिखी गई भेंटवार्ताएँ संकलित है। ये भेंटवार्ताएँ मुख्यतः हैदराबाद के साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाले विशिष्ट लोगों से संबंधित हैं। महाकवि शेषेन्द्र शर्मा, कमल प्रसाद ‘कमल’, वेमूरि आंजनेय शर्मा, पद्मविभूषण पंडित जसराज, पद्मश्री मुज्तबा हुसैन, प्रो. वसंत चक्रवर्ती, जीलानी बानो, नरेंद्र लूथर, राजबहादुर गौड़, प्रो. शमीम जयराजपुरी और पद्मश्री जगदीश मित्तल से लेकर गद्दर तक 27 व्यक्तित्वों की संक्षिप्त लेकिन बहुआयामी छवियाँ इन भेंटवार्ताओं में सजाई गई है।


इसमें संदेह नहीं कि ‘सुर्ख़ियों में लोग’ में संकलित सभी भेंटवार्ताएँ पूर्व निर्धारित प्रश्नावली के चौखटे में तराशी गई हैं , तथापि जहाँ कहीं अवसर मिला है मुक्त चर्चा से भी परहेज़ नहीं किया गया है। इन प्रश्नों और चर्चाओं से कई तरह की अंतरंग जानकारियाँ और व्यक्तिगत सूचनाएँ तो प्रकट हुई ही हैं, साक्षात्कृत व्यक्तित्व के जीवन संघर्ष की गाथा भी उजागर हुई है जो इन्हें पठनीयता और रोचकता प्रदान करती है।


लेखक के मन में हैदराबाद और हिंदी के प्रति विशेष लगाव है। इसीलिए सभी विशिष्ट व्यक्तियों से इन दोनों विषयों पर अवश्य बातचीत की गई है। परिणामस्वरूप बहुआयामी चित्र भी उभर सके है हैदराबादी तहजीब और यहाँ की हिंदी के। जैसे पंडित जसराज देवीबाग में बचपन में खेले कबड्डी और गिल्ली डंडे़ के खेलों को याद करते हैं और जोर देकर कहते हैं कि मैं हैदराबादी हूँ, हैदराबाद ने मुझे मिटाकर बनाया है, यहाँ के कण-कण से मुझे अपनापन झलकता है, मेरे हैदराबाद प्रेम का पहला कारण यही है कि मैंने भी तो गंडिपेट का पानी पिया है, यहाँ की मिट्टी में एक तरह की खुषबू महसूस करता हूँ और यही खुशबू श्रद्धा में बदल जाती है। शहर के बदलाव उन्हें अच्छे लगते हैं लेकिन ज़रा देखें मंजूर अहमद मंजूर इस बारे में क्या कहते है, ‘‘घर छोटे हो गए है, उसी तरह जहनों का विकास भी सीमित हो गया है। रेलवे कंपार्टमेंट जैसे घरों में रह कर लोगों की सोच भी सीमित हो गई है। ज़हनी सुकून नहीं है। पहले लोग मिरची-चटनी में ही खुश रहते थे। अब बिरियानी मिलती है, तो भी ज़बान पर शिकवा है।’’


वेमूरि आंजनेय शर्मा की इस चिंता को भी भेंटवार्ता में बखूबी उभारा गया है कि हिंदी को उसका समुचित स्थान तब तक नहीं मिलेगा जब तक तकनीकी पाठ्यक्रमों में हिंदी भाषा का प्रवेश न हो। इस भेंटवार्ता में यह बात भी उभर कर सामने आई है कि हिंदी प्रचार संस्थाओं का काम अब बहुत बढ़ गया है। गाँव-गाँव जाकर प्रचार करने और कक्षाएँ चलाने के लिए शिक्षकों की आवश्यकता है, पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन जरूरी है, परंतु इस कार्य के लिए सरकार से मिलने वाला अनुदान बहुत अपर्याप्त है। दूसरी ओर डॉ.. विजयराघव रेड्डी का राग एकदम अलग ही है। उन्हें लगता है, रुपया काफी खर्च किया जा रहा है, उसके अनुपात में काम नहीं हो रहा है। वे मानते हैं कि हिंदी सीखने और सिखाने वालों में अब पहले सी लगन नहीं रही।


इन तमाम विचारों पर बहस करने का यहाँ अवसर नहीं है। फिलहाल इतना ही कि इस संग्रह का सबसे महत्वपूर्ण और सफल साक्षात्कार जगदीश मित्तल का है जिसमें उनकी कलाप्रेरणा से लेकर रचना प्रक्रिया और वैचारिकता के साथ-साथ कई घरेलू प्रसंग भी उभरकर सामने आ सके हैं।


अंततः प्रसिद्ध लोकगायक, कवि एवं क्रांतिकारी गद्दर से भेंटवार्ता के एक अंश के साथ आज की पुस्तक चर्चा को विराम .........

‘‘जमीनदारी का विरोध करने वाले नक्सली आंदोलन को 30 वर्ष हो गए हैं, लेकिन आज भी कई आदिवासी गाँव जमीनदारों के चंगुल में हैं। दिन-प्रतिदिन पुलिस का जुल्म आम जनता पर बढ़ता ही जा रहा है। ऐसी स्थिति में सीने पर बंदूक रख कर क्या बातचीत हो सकती है?’’


1. कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण/डॉ. करण सिंह ऊटवाल/जवाहर पुस्तकालय, सदर बाजार, मथुरा-281 001/2008/रु. 150/पृष्ठ 120 (सजिल्द)

2. यात्राक्रम: प्रथम भाग/संपत देवी मुरारका/मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/2008/रु. 200/पृष्ठ 182 (सजिल्द)

3. सुर्ख़ियों में लोग/एफ.एम. सलीम/शगूफा पब्लिकेशन, 31, बैचलर्स क्वार्टर, एम.जे.मार्केट, हैदराबाद-1/2008/रु. 100/पृष्ठ 152 (पेपर बैक)

प्रस्तुतकर्ता RISHABHA DEO SHARMA ऋषभदेव शर्मा पर 6:32:00 pm 2 टिप्‍पणियां:
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विषय : अपने याहू ३६० ब्लॉग से, पुस्तक चर्चा, समीक्षा

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

‘‘स्त्री विमर्श और साहित्य’’ विषयक व्याख्यान संपन्न




हैदराबाद, 1 सितंबर 2009 (प्रेस विज्ञप्ति)।

‘‘समाज और विचार के केंद्र में स्त्री का आना हमारे समय की एक बड़ी परिघटना है जो ऐसे सामाजिक परिवर्तन की पूर्वसूचना है जिसमें पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा निर्मित परंपरागत स्त्री संहिता की तथाकथित मर्यादाएँ तड़तड़ाकर टूट रही हैं और स्त्री अस्मिता स्वयं को सशक्त रूप में अभिव्यक्त कर रही है।’’

ये विचार मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के एकाडेमिक स्टाफ कालिज में हिंदी प्राध्यापकों के निमित्त ‘विविध विमर्श’ केंद्रित पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में आज उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने ‘‘स्त्री विमर्श और साहित्य’’ विषयक व्याख्यानमाला के अंतर्गत बोलते हुए व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि स्त्री विमर्श के भारतीय संदर्भ को सिमौन द बोउवार और केट मिलेट जैसी पश्चिमी लेखिकाओं की अपेक्षा महादेवी वर्मा की स्थापनाओं की सहायता से बेहतर ढंग से व्याख्यायित किया जा सकता है।

डॉ. शर्मा ने लगभग 25 कम्प्यूटूर-स्लाइडों की सहायता से विषय की प्रस्तुति को रोचक बनाते हुए स्त्रीत्ववादी विमर्श के इतिहास, स्त्रीवाद की मान्यताओं, स्त्रीलेखन और स्त्री भाषा के वैशिष्ट्य तथा साहित्य के स्त्रीपाठ के प्रतिमानों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए और कहा कि सार्वजनिक जीवन में आत्मनिर्भर स्त्री की सार्थक और रचनात्मक भूमिका द्वारा ही स्त्री विमर्श परिपूर्णता प्राप्त कर सकता है।

आरंभ में मानविकी संकाय के डीन प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी ने अतिथि वक्ता का परिचय दिया। चर्चा परिचर्चा के उपरांत डॉ. रत्नाकर के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ व्याख्यानमाला का समापन हुआ।
प्रस्तुतकर्ता RISHABHA DEO SHARMA ऋषभदेव शर्मा पर 11:31:00 pm 1 टिप्पणी:
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