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शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

असगर वजाहत के कथा संग्रह 'डेमोक्रेसिया' की समीक्षा

('भास्वर भारत' / जनवरी-फरवरी 2014 / पृष्ठ 54)

डेमोक्रेसिया अर्थात लोकतंत्र की भदेस भणिति
समीक्षक : ऋषभ देव शर्मा 
वरिष्ठ कथाकार असगर वजाहत हिंदी कहानी-उपन्यास के क्षेत्र में पिछले पाँच दशक से सक्रिय हैं. वे कथ्य और शिल्प की दृष्टि से निरंतर कुछ-न-कुछ नया करते रहते हैं. ‘डेमोक्रेसिया’ (2013) की कहानियाँ भी उनकी नव-नवोन्मेषशालिनी मेधा की परिचायक हैं. संग्रह का शीर्षक अपने आप में इसका द्योतक है. एक तरफ तो यह लोक और तद्भवता की सूचना देता है तथा दूसरी ओर लोकतंत्र के विडंबनापूर्ण, त्रासद और हास्यास्पद होते चले जाने को उभारता है. डेमोक्रेसी के भीतर से उभरती निरंकुशता, बेपरवाही और हताशा जैसी स्वतंत्र भारत की सच्चाइयाँ इस संग्रह की कहानियों में कुछ इस तरह साकार होती हैं कि पढ़ने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
समाज के निरंतर अमानुषिक और क्रूर होते जाने को भी लेखक ने बखूबी दर्ज किया है. संग्रह की पहली ही कहानी ‘ड्रेन में रहने वाली लड़कियाँ’ इसका ज्वलंत प्रमाण है. यह कहानी असगर वजाहत को एक किस्सागो और शैलीकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए काफी है. लेखक ने समसामयिक वीभत्स सच को फैंटेसी के साथ जोड़कर संसार से लड़कियों के गायब होते जाने और नालियों में आबाद होते जाने की कल्पना के सहारे पुरुषवादी मानसिकता पर गहरी चोट की है. ‘ड्रेन में रहने वाली लड़कियाँ’ शीर्षक यह कहानी स्त्री विमर्श की भी श्रेष्ठ कहानी मानी जा सकती है. यह स्त्री विमर्श तब चरम पर पहुँचता है जब गटर में रहने वाली लड़की को पाने के लिए गटर में उतरने वाले हिम्मती पुरुष को दूसरे सब पुरुष अपना पुरुषत्व दे देते हैं. तो भी अंततः वह किसी भी लड़की को ड्रेन से बाहर लाने में सफल नहीं होता बल्कि जब ड्रेन से वापस आता है तो दुनिया के सारे पुरुषों से लिए गए पुरुषत्व को खो चुका होता है. लेखक एक व्यंग्योक्ति के साथ कहानी को पूरा करता है – ‘हे, आजकल संसार में रहने वाले आदमियो, तुम्हारे पास और कुछ हो या न हो, पुरुषत्व नहीं है जबकि ‘ड्रेन’ में रहने वाली लड़कियाँ, लड़कियाँ हैं, पर उनके पास पुरुषत्व है.’ तमाम पुरुषों से पुरुषत्व इकट्ठा करने की कल्पना दुर्गा के अवतार की याद दिलाती है जिन्हें महिषासुर का मर्दन करने के लिए समस्त देवताओं ने अपनी शक्तियाँ दी थीं. सामूहिक शक्ति प्राप्त करके देवी तो विजयी हो गई थी लेकिन इस कहानी का हिम्मती पुरुष पराजित होता है. एक स्त्री विरोधी समाज का भविष्य इसके अलावा और हो भी क्या सकता है?
यह तो हुई संग्रह की पहली कहानी. आगे बढ़ने से पहले एक भार फिर से ‘भूमिका’ पलटकर देख लें. कहानी कला और अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में असगर वजाहत ने यहाँ कुछ बड़े पते की बातें कही हैं – 1. हर अभिव्यक्ति को रोचक होना चाहिए. 2. रचना कुछ मूल्यों, विचारों, प्रतिक्रियाओं, अस्वीकृतियों के बिना निरर्थक है. 3. समाज को अधिक मानवीय समाज बनाना ही कलाओं का काम रहा है. 4. अच्छी रचना का रहस्य कई तरह के अनुपातों में छिपा होता है. 5. अनुपातों का बिगड़ना, उनसे खिलावाड़ करना, उसे तोड़ना और जोड़ना – अनुपात का विस्तार और कला की सुंदरता में शुमार होता है. 6. खिलाड़ी और लेखक दोनों अपने क्षेत्रों में ‘अद्भुत’ की तलाश करते हैं. 7. एक शैली की चपेट में आ जाना रचनाकार की मौत होती है. 8. जीवन इतना नंगा हो गया है कि अब लेखक उसकी परतें क्या उखाड़ेगा! 9. मानवीय संबंधों में जितनी गिरावट आई है, मनुष्य का जीवन जितना मूल्यहीन हुआ है, सत्ता जैसा निर्मम नाच दिखा रही है, मूल्यहीनता की जो स्थिति है, स्वार्थ साधने की जो पराकाष्ठा है, हिंसा और अपराध का बोलबाला है, सत्ता और धन के लिए कुछ भी कर देने की होड़, असहिष्णुता और दूसरे को अपमानित करने का भाव जो आज हमारे समाज में है, वह पहले नहीं था. आज हम अजीब मोड़ पर खड़े हैं. रचनाकार के लिए यह चुनौतियों से भरा समय है. 10. साहित्यिक विमर्श राजनैतिक स्तर पर उपेक्षित जातियों, समूहों तथा समुदायों के स्थापित होने के विमर्श है. राजनीति में जिनको जिनको स्वर मिलता गया उन्होंने साहित्य में अपने विमर्श खड़े करने शुरू कर दिए. 11. मेरे लिए कहानी लिखना लगातार कठिन होता जा रहा है. 12. अखबारी लेखन और कहानी लेखन के अंतर्द्वंद्व ने मेरी कहानियों पर प्रभाव डाला है. पहला प्रभाव यह पड़ा है कि मेरी कहानियों से केंद्रीय पात्र गायब हो गए हैं. अब समय मेरी कहानियों का प्रमुख पात्र है. 13. व्यंग्य, हास्य, नाटकीयता आदि के माध्यम से अपने समय और समाज को समझने का काम मुझे अच्छा लगता है. 14. उत्तर आधुनिकता और दूसरे साहित्यिक-सामाजिक आंदोलन जो कहीं और किसी और देश के इतिहास और समाज में महत्वपूर्ण हो सकते हैं, वे हमारे यहाँ भी होंगे, यह मानना ज्यादती होती. दरअसल हम पश्चिम से आक्रांत हैं.
इन लेखकीय स्थापनाओं और उद्घाटनों के आलोक में यदि ‘डेमोक्रेसिया’ की कहानियों को देखा जाए तो कहना होगा कि ये कहानियाँ हमारे आज के समय और समाज के अमूर्तन से उपजी कहानियाँ हैं जिनमें प्रतीक विधान और फैंटेसी के रास्ते भारतीय लोकतंत्र की व्यापक सच्चाइयों को हास्यास्पद और पैरोडीवत स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है. इस प्रस्तुति में एक ऐसी नाटकीयता है जो हास्य को करुणा से और पैरोडी को पैथोस से जोड़कर करुणहास्य की सृष्टि करती है. यहाँ सामूहिक मानवीय संवेदना केंद्र में है जिसे हम इक्कीसवीं सदी के इन आरंभिक वर्षों के भारतीय जनमानस की संवेदना भी कहा सकते हैं. लेखक ने विचारधारा और विमर्श के दबाव से इन कहानियों को बचाया है इसलिए ये कहानियाँ वर्गों और समुदायों की नहीं मनुष्यों की कहानियाँ हैं. यथास्थान कहानी सुनाने के अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हुए भदेस भणिति के माध्यम से डेमोक्रेसी के डेमोक्रेसिया बन जाने की उपहासास्पद शोकांतिका को संप्रेषित करने में इस कहानी संग्रह की चरितार्थता स्वयं सिद्ध है. प्रमाणस्वरूप ‘मुखमंत्री और डेमोक्रेसिया’ शृंखला की इस संक्षिप्त सी कहानी को देखा जा सकता है –

“मुखमंत्री कोसी नदी में से निकले. उनके एक हाथ में पूड़ियों का थाल और दूसरे हाथ में मिठाईयों का थाल है.
मुखमंत्री ने आवाज़ लगाई, “आईए जो-जो हमारे वोटर हैं, भोजन कर लीजिए.” सब लोग भोजन पर टूट पड़े. थाल सफाचट हो गए.
कुछ लोगों में मुखमंत्री से कहा, “आपके विरोधियों ने भी भोजन कर लिया है.”
मुखमंत्री ने विरोधियों को पकड़ा. उनके गले में हाथ डाला और गिन-गिनकर एक-एक पूड़ी और एक-एक मिठाई का टुकड़ा निकाल लिया.
फिर मुखमंत्री बोला, “जाइए उनका खाइए जिन्हें वोट देते हैं .. अरे ये तो डेमोक्रेसिया है भइया.”
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डेमोक्रेसिया,
असगर वजाहत, 
2013, 
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 
मूल्य : रु. 250, 
पृष्ठ – 144
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