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रविवार, 28 जुलाई 2013

नामवर सिंह की रस में भींजती युवा तस्वीर : 'प्रारंभिक रचनाएँ '



प्रारंभिक रचनाएँ : नामवर सिंह / 
(सं) भारत यायावर/
 राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली / 
पृष्ठ – 248 / 
मूल्य – रु. 450/-
“हिमगिरि पार फूटा प्रात !
प्राण की ओ निर्झरी ! 
गिरि पार फूटा प्रात ! 

किरण रंजित शिखर सतरंगी 
लपट से जल उठे हैं 
चाँदनी के दीप में पुखराज 
सौ-सौ बज उठे हैं 
घाटियों में अलस तरल प्रमाद गलिता रात !” 

दुनिया उन्हें आलोचक के रूप में जानती है. लेकिन वे मूलतः कवि हैं. आप चाहें तो उनकी आलोचना को भी कविता की तरह पढ़ सकते हैं. अगर कचरा साफ़ करने का नागरिक धर्म उन्होंने न अपना लिया होता तो आज हम उन्हें शिखरस्थ सृजनशील साहित्यकार के रूप में जानते. 

हमारा अभिप्राय डॉ.नामवर सिंह से है जिनकी सृजनात्मक साहित्यचेतना का अकाट्य प्रमाण हमारे सामने है. भारत यायावर के संपादन में प्रकाशित नामवर सिंह की ‘प्रारंभिक रचनाएँ’ (2013) उनके प्रारंभिक लेखन की बानगी तो हैं ही, “इनके द्वारा हम नामवर सिंह के साहित्यिक विकास की जड़ों को भी पहचान सकते हैं और उनके प्रारंभिक साहित्य जीवन के भावबोध एवं विचारों की भी पड़ताल कर सकते हैं.” (पृ.6)

इस पुस्तक के पहले खंड में कविताएँ संकलित हैं; और जैसा कि कभी त्रिलोचन ने लिखा था – नामवर सिंह की पुस्तक-पगी आँखें प्रकृति और जीवन के अछूते दृश्यों का चित्र भी दिखा सकती हैं, यह उनका पाठक पहली ही नजर में पहचान जाएगा. एक कवि के रूप में नामवर जी के मुख्य सरोकार प्रकृति, प्रेम और जन से जुड़े हैं. संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी साहित्य के साथ ही लोक जीवन के रस में रची हुई है उनकी काव्यचेतना. इसीलिए वे अपने गीतों में प्रसाद के साथ ओज गुण को भली प्रकार साध पाते हैं जिससे एक युवा कवि के मन में दहकती आग का पता चला है – “सिंधु थी, देवापगा थी / किंतु था न प्रवाह उनमें / हिंद था, हम थे, न थी पर / वह दहकती दाह हममें / पर उठा तुमने दिया उर-सिंधु में वह ज्वार !” (पृ.24/ राजर्षि). महात्मा गांधी के निधन पर तमाम भाषाओं में जाने कितना कुछ लिखा गया लेकिन युवा कवि नामवर ने आग और प्रकाश का जो उड़ता हुआ बिंब रचा वह अछूता है – “मुँद गईं लपट की पंखड़ियाँ / उड़ गया ज्योति का हंस मुक्त / फैला सहस्र दिन की पांखें/ छा गया, किंतु वसुधा वियुक्त.” (पृ.39/ आदित्य पुरुष गांधी). कवि की सौंदर्यदृष्टि का पसारा इतनी दूर तक है कि चंद्रमा के चित्रण की सारी परंपरा के पार जाकर वह दिन में उगे चाँद को भी इस रीझ के साथ देख लेती है कि – “बादल के टुकड़े सा दिन के / तीसरे पहर में उगा चाँद.” (पृ.45/ तिर रही धान की लहरों पर). दरअसल यह दृष्टि हमारे उस किसान की दृष्टि है जिसे किरणों की पिचकारियों के बीच झुर्रियों भरा सिवान कुम्हड़े के फूल सा विहंस उठता (पृ.44/ सुनहरा विहान) दिखाई देता है. 

काव्यभाषा लय, ताल, छंद - सब पर कवि नामवर का अनन्य अधिकार प्रतीत होता है. और बिंबविधान ! कुछ कहने की अपेक्षा एक विहंगावलोकन उचित होगा – क्यों जल जल, घुल घुल, रो रोकर, तड़प तडप रह जाता बादल?/ लह लह लह लहराती घासों पर छम छम नाच रहा है पानी/ फुफकारते हुए ब्रजेश नाग पर उठो / छलकती है नयन में उठ उठ हृदय की बात / गिरि गिरि के दीप जला साँझ जा रही / दिन का वह ऐरावत दूर जा रहा गिरि पथ, कर में रवि-कमल विनत, सुरभि आ रही ! / जोत का जल पोंछती सी छाँह, धूप में रह रह उभर आए / फागुनी शाम अंगूरी उजास, बतास में जंगली गंध का डूबना/ पारदर्शी नील जल में सिहरती शैवाल / विजन गिरि पथ पर चटकती पत्तियों का लास / पकते गुड़ की गरम गंध ले सहसा आया मीठा झोंका.

दूसरे खंड में विविध विधाओं की गद्य रचनाएँ हैं – एक कहानी, सात आलोचनात्मक निबंध, दो रम्य रचनाएँ, एक व्यक्ति चित्र और तीन समीक्षाएँ. ये सभी रचनाएँ प्रमाणित करती हैं कि 25 की उम्र तक नामवर जी ने गद्य और आलोचना की अपनी शैली विकसित कर ली थी जो पहले के गद्यकारों से अलग है – अध्ययन की प्रौढ़ता, अनुभव की प्रामाणिकता, विचार की स्पष्टता, प्रतिपादन की निर्भ्रांतता, मूल्यांकन की विवेकशीलता, भाषा की अर्थगर्भता और शैली की व्यंजकता. ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे’ शीर्षक रम्य रचना वर्षा ऋतु पर एक और ललित निबंध भर नहीं है. इस अभिनव मेघदूत में राजनीति का गहरा बोध है. ‘कहानी की कहानी’ भी युवा रचनाकार के जनवादी रुझान में रची पची है. कथानायक का नाम ही अत्यंत व्यंजनापूर्ण है – खरपत्तू. आलोचना और समीक्षा में दो टूक बात करने की सफाई ध्यान खींचती है – गोस्वामी जी का रामराज्य व्यावहारिक सत और आनंद का प्रतीक है जिसमें समाज की रक्षा और मंगलकामना निहित है. (पृ.71) / शुक्ल जी आधुनिक पुनरुत्थान युग के चरम उत्कर्ष की उपज थे. वे ‘निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीपशिखोदय’ कहे जा सकते हैं. (पृ. 85) / कविता ऐसी लिखनी है जिसके चारों ओर तथाकथित काव्यात्मकता का कोई आवरण न हो. वह इतनी पारदर्शी हो कि हम कविता को न देखें, जो कविता में है सीधे उसी को देखें. (पृ.99) / चित्रांकन चाहे प्रकृति का हो, चाहे मन की किसी अनिर्वचनीय भावना का, अज्ञेय उसमें माहिर हैं. (पृ.102) / निस्संदेह सामाजिक यथार्थवाद की सच्ची कविता लोक काव्य से ही उत्पन्न और विकसित होगी. (पृ.117) / भोगना ही काफी नहीं है, जानना और समझना भी जरूरी है. शांतिप्रिय के दृष्टिकोण में इसी दूसरे पक्ष की कमी है. (पृ.122).

तीसरा खंड है ‘बकलम खुद’ - इसी नाम से 1951 में प्रकाशित संग्रह के कुल 17 व्यक्तिव्यंजक निबंध. त्रिलोचन ने इन्हें निर्वैयक्तिक वैयक्तिकता, चुनौती, संयत व्यंग्य और आत्मीत्यता के लिए उल्लेखनीय माना था. इन निबंधों में वाग्मिता की प्रखरता और चुटकी लेने का अंदाज खास तौर पर ध्यान खींचता है – इस युग में प्रायः स्थान रिक्त करने के लिए ही कहा जाता है. पूर्ति के लिए तो केवल मैं ही कह रहा हूँ. (... के कर कमलों में.) / मैं नहीं चाहता कि पुस्तक की खाली कनात के बाहर खड़ी होकर भूमिका विचित्र अंगी-भंगी के साथ भीतरी तमाशे की महिमा गा गाकर टिकट बेचे. (भूमिका). / कभी कभी यह थंडर ताला इतनी साहित्यिक रुचि वाला साबित होता है कि राष्ट्रभाषा के द्वार पर भी अपने आप लटक जाता है. (अब हम स्वतंत्र है) / जिनके पास चाँदी की आँखें नहीं हैं उन कवियों को इस पतझर में भी वसंत कैसे दिखाई पड़ रहा है? (मदन महीपजू को बालक बसंत).

हिंदी जगत को संपादक भारत यायावर और राजकमल प्रकाशन के प्रति आभारी होना चाहिए कि उन्होंने आलोचक नामवर सिंह की विराटता की ओट में जाने कब से ओझल पड़ी कविमना युवा नामवर की रस में भींजती तस्वीर सामने लाकर धर दी है. 

और अंत में, पाठकों के आत्मविमर्श हेतु ‘लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं’ का यह अंश ... 
“देखा गया कि देशी जबानें सब-की-सब कट चुकी थीं लेकिन विदेशी जबान न जाने कैसे साफ-साफ बच गई थी और उसमें कहीं भी लहू नहीं लगा था – बल्कि वह तो हँस रही थी. अंत में लंबी जबान को घायल तथा युद्ध-अपराधी समझकर 15 वर्ष के लिए वनवास दे दिया गया और सर्वसम्मति से यही तय रहा कि चूँकि विदेशी जबान सबसे स्वस्थ, सुंदर और सबल है, इसलिए तब तक राज-रानी उसे ही बनाया जाए ! सबने उससे हाथ मिलाया, टीका किया. मनोरंजन का अंत गंभीर निर्णय के रूप में प्रकट हुआ !” 


भास्वर भारत/ जुलाई 2013 / पृष्ठ 50. 

दादू दर्शन बिन क्यों जीवै.....

पुस्तक : दादू पंथ : साहित्य और समाज दर्शन, 
लेखक : डॉ.ओकेन लेगो, 
संस्करण : 2013, 
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 
1/10753, गली नं. 3, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा,
कीर्ति मंदिर के पास, दिल्ली – 110032,
पृष्ठ : 199, 
मूल्य : रु. 495 (हार्डबाउंड).
 डॉ.ओकेन लेगो (1976) मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के गंभीर अध्येता हैं. साथ ही अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय जीवन, समाज, संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं. वे अरुणाचल के उन प्रारंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापन और शोध को नई दिशा दी है. ‘दादू पंथ : साहित्य और समाज दर्शन’ (2013) उनका अत्यंत परिश्रमपूर्वक तैयार किया गया ग्रंथ है. अपने अध्ययन को प्रामाणिक बनाने के लिए उन्होंने दादूपंथ से जुड़े तमाम स्थानों का भ्रमण और सर्वेक्षण करके यह प्रतिपादित किया है कि दादू और दादूपंथी संतों ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान और धर्म साधना के क्षेत्र में पर्याप्त मौलिक योगदान किया है. 

यह ग्रंथ इस तथ्य को रेखांकित करने में पूर्ण समर्थ है कि दादू भारतीय समाज के उस जागरण के प्रतिनिधि हैं जिसे सच्चे अर्थों में भारतीय जागरण माना जाता है. भले ही यह जागरण मध्यकाल में आया और भले ही इस जागरण की ओर अध्येताओं का ध्यान अच्छी तरह न गया हो, किंतु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वही भारतवर्ष का प्रथम जागरण है और उसी में आधुनिक भारत की नींव के तत्व छिपे हुए हैं. वास्तविकता यह है कि जिसे हम मध्यकाल अथवा हिंदी साहित्य की दृष्टि से भक्तिकाल कहते हैं, वह गहरे अर्थ में समाज के उठ खड़े होने का समय है. विशेष रूप से इस काल में वह समाज अपने पैरों पर उठकर खड़ा होना शुरू हुआ, जिसे अनेक शताब्दियों से पददलित और शोषित बनाया हुआ था. इतना ही नहीं, इस समाज को सामंती तथा अभिजात शक्तियों ने पूरी तरह कुचलने का षड्यंत्र किया था. यह षड्यंत्र इतना भयानक था कि अगर सफल हो जाता तो आधुनिक भारत की एक विद्रूप तस्वीर हमारे सामने होती. शायद हम विश्व समाज के समक्ष गर्व के साथ सिर उठाकर खड़े होने लायक न रहते.

साहित्य की जड़ मनोवृत्तियों और प्रतिगामी प्रवृत्तियों का प्रश्न भी इसी के साथ जुड़ा है. मध्यकाल में साहित्य की जड़ता और रचनापरक आभिजात्य पर सोचा-समझा आक्रमण किया गया. यह आक्रमण उन संतों और भक्तों ने किया, जो सीधे जमीन से जीवन ग्रहण करके तत्कालीन समाज को बदलने के मार्ग पर चले थे. ये संत और भक्त सामाजिक क्रांतिकारी थे. इनके मन में मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्थापित करने की साध थी. ये संस्कृति को शास्त्र की पकड़ से बाहर निकालना चाहते थे और उस साधारण जन से जोड़ना चाहते थे, जिसके जीवन में यह संस्कृति अपने सही अर्थ में विकसित होती है, किंतु जिसे हर युग में निहित स्वार्थी शक्तियाँ अपने कब्जे में कर लेती हैं और अपने इशारों पर नचाने में लग जाती हैं. संतों और भक्तों ने इस सत्य को समझा तथा अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्य और जन का ऐसा गहरा संबंध निर्मित किया कि जो अंत में संस्कृति और जीवन दोनों को रूढ़ियों से मुक्त करता है और निर्माण के स्वाधीन मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. 

दादू के समाज दर्शन का यह एक केंद्रीय बिंदु है और डॉ.ओकेन लेगो ने अपने अध्ययन में इसे भली प्रकार रेखांकित किया है. लेखक ने निर्गुण संत साहित्य के वैभव पर विस्तृत चर्चा करते हुए दादू वाणी के विविध अंगों का गहन विवेचन किया है. कबीर की भाँति दादू की रचनावली में भी साखियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में पद सम्मिलित हैं. लेखक ने इनका विवेचन करते हुए दादू के भक्त हृदय की अच्छी पहचान कराई है. यहाँ दादू ऐसी वियोगिनी बन गए हैं जो विरह में शरीर को भी नहीं संभाल पा रही है. प्रिय दर्शन के लिए रात-दिन तड़पती है. विविध उपाय करती है. बैचैन रहती है. नाम पुकारती है. राह जोहती है. विरह के बाण से घायल वह स्वयं अपनी दशा को भी नहीं समझ पाती – 
“फिरे उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै.
राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै.
व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारै.
दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारै.”

आगे दादूपंथी संतों की रचनाशीलता का विवेचन किया गया है. दादू के 52 प्रमुख शिष्य माने जाते हैं. यहाँ गरीबदास, सुंदरदास (छोटे), रज्जबदास, जगजीवनदास, जगन्नाथदास, बखना, वाजिंद, निश्चलदास, खेमदास और राघवदास पर अच्छी चर्चा की गई है. साथ ही संत साहित्य की संग्रहपद्धति और दादूपंथ की शाखाओं पर भी विस्तृत चर्चा है. अंत में दादूपंथ के संतों के अभिव्यक्ति कौशल का भी विवेचन किया गया है. संत साहित्य की सामाजिक दृष्टि को समझने के लिए अत्यंत उपादेय ग्रंथ. 


भास्वर भारत/ जुलाई 2013/ पृष्ठ 51.


रविवार, 14 जुलाई 2013

अनिर्वचनीय है परमप्रेम

[भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारदीय भक्तिसूत्र का 'तदीय सर्वस्व' नाम से 1874 में अनुवाद और भाष्य किया था. उसी के कतिपय अंश........]

ॐ अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः
[अब हम यहाँ से भक्ति की व्याख्या करते हैं].
सा कस्मै परम प्रेम रूपा/ अमृत स्वरूपा च 
[वह ईश्वर से परम प्रेम रूपा है/ और अमृत स्वरूप है].
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति  अमृतो भवति  तृप्तो भवति
[जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध होता है, अमृत होता है और तृप्त होता है].

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ॐ अनिर्वचनीयम् प्रेमस्वरूपं
[प्रेम का स्वरूप कहा नहीं जा सकता].
मूकास्वादनवत्
[गूंगे के स्वाद की भाँति].
प्रकाशते क्कापि पात्रे
[(तथापि) कभी किसी पात्र (अधिकारी) में स्वयं प्रकाश पाता है].
गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण वर्द्धमानम् अविच्छिन्नम् सूक्ष्मतरम् अनुभवरूपं
[(प्रेम का स्वरूप) गुणों से रहित, कामनाओं से रहित, प्रतिक्षण में वृद्धिगत, अविच्छिन्न, सूक्ष्मतर केवल अनुभवरूप है].
तम्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति
[उसको पाकर उसी को देखता है, उसी को सुनता है, उसी को बोलता है और उसी का चिंतन करता है].