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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

पंत का जीवन दर्शन : लोकायतन के विशेष संदर्भ में [भूमिका]


दो शब्द

बीसवीं शताब्दी की भारतीय कविता में महाकवि सुमित्रानंदन पंत का अप्रतिम महत्त्व है. वे सौंदर्य, राष्ट्रीय चेतना और मनुष्यता के वैतालिक थे. उनकी काव्ययात्रा मिट्टी के स्वर्ण बनने की यात्रा है जिसे ‘लोकायतन’ में अपनी मंजिल मिलती है. डॉ. मो. रियाजुल अंसारी ने अपने प्रस्तुत ग्रंथ में कठोर साधना करके ‘लोकायतन’ में अनुस्यूत पंत के जीवन दर्शन को अत्यंत वैज्ञानिक पद्धति से विवेचित किया है. उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा है कि कोई कृतिकार अपनी रचना में एक साथ एक ओर तो अपने आपको अभिव्यक्त करता है तथा दूसरी ओर स्वयं का अतिक्रमण करके लोक जीवन के व्यापक सुख-दुःख को व्यंजित करता है. 

वस्तुतः लोकायतन व्यक्ति से विराट की ऐसी यात्रा है जो मनुष्यत्व को औदात्य से इस प्रकार मंडित करती है कि उसके समक्ष ईश्वरत्व लघु लगने लगता है. पंत की यह यात्रा वर्तमान मनुष्य के अगले संस्करण की काव्यात्मक खोज है. इस खोज के पीछे छिपे हैं जीवन दर्शन के वे सूत्र जो प्राचीन भारतीय वाङ्मय से लेकर आधुनिक देशी-विदेशी दार्शनिकों, विशेषतः विवेकानंद, अरविंद, गांधी, मार्क्स, फ्रायड और सार्त्र के चिंतन से गृहीत हैं. ये तमाम सूत्र ‘लोकायतन’ की बुनावट में इस तरह समोये हुए हैं जैसे पुष्प में गंध. डॉ. अंसारी ने इस गुणसूत्रों को इस तरह रेशा रेशा खोलकर दिखाया है कि कवि और काव्य दोनों की मानसिकता के तमाम पहलू अनायास उभर कर सामने आ जाते हैं और यह स्पष्ट होता है कि पंत जी ने ‘लोकायतन’ में जो कवि-स्वप्न देखा है वह मनुष्य को तमाम उच्च जीवन मूल्यों से मंडित करके उसके भीतर नए मनुष्य के अवतरण को संभव बनाने का स्वप्न है. 

इस ग्रंथ के माध्यम से लेखक डॉ. अंसारी पंत-काव्य के गंभीर अध्येता के रूप में सामने आते हैं. कहना न होगा कि ‘लोकायतन’ की रचना के समय कवि के समक्ष ‘भारत भारती’ जैसी लोकप्रिय और ‘कामायनी’ जैसी मिथकीय कृतियाँ चुनौती के रूप में विद्यमान थीं. पंत जी ने इन दोनों रचनाओं के भूत-वर्तमान-भविष्य को एक साथ संबोधित करने तथा मानव सभ्यता और भारतीय संस्कृति का इतिहास एक साथ रचने की काव्य प्रविधि को अपनी कला के संस्पर्श से ‘लोकायतन’ में नया स्वरूप प्रदान किया. लेखक ने प्रतिपादित किया है कि ‘लोकायतन’ पंत जी के संपूर्ण जीवन की संचित भावराशि का प्रत्यंकन है जिसमें उन्होंने ऊर्ध्वचेतना, अंतर्चैतन्य तथा लोकचेतना की समन्वय चेष्टा के रूप में मानव संस्कृति और सभ्यता के क्रमिक विकास की गाथा लिखी है. इस गाथा में प्रसंगवश भारतीय इतिहास का उत्थान-पतन, स्वतन्त्रता आन्दोलन और भावी मनुष्य की ज्योतिर्मयी संभावना की अभिव्यक्ति अत्यंत आकर्षक है जिसके बहाने कवि ने अपने जीवन दर्शन को साकार किया है.

डॉ. मो. रियाजुल अंसारी ने इस ग्रंथ में एक ओर तो यह दर्शाया है कि पंत जी पर विविध दर्शनों का अनेकविध प्रभाव है, लेकिन दूसरी ओर यह भी प्रतिपादित किया है कि महाकवि की उन्मुक्त चिंतनधारा किसी एक दर्शन की अनुयायिनी नहीं है. इस ग्रंथ से यह बात भली प्रकार समझ में आती है कि पंत जी दर्शन के मामले में देशी-विदेशी का भेदभाव नहीं बरतते बल्कि जिस दर्शन में उन्हें अपने अभीष्ट भावी मनुष्य के लिए उपयोगी जो कुछ भी नज़र आता है उसे वे निस्संकोच मनुष्यमात्र की संपत्ति के रूप में ग्रहण कर लेते हैं; और जो काम का नहीं लगता, जीर्ण शीर्ण और थोथा लगता है उसे वे उड़ा देते हैं. भारतीय षड्दर्शन हों या पाश्चात्य विचारकों का चिंतन, वे सबकी परख भावी मनुष्य के अतिमानस की कसौटी पर करते हैं और ठीक से पहचान कर ही संग्रह और त्याग करते हैं. इस दृष्टि से यह ग्रंथ पंत के बहाने विभिन्न भारतीय और पश्चिमी दर्शनों की वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में व्याख्या और आलोचना भी करता चलता है.

पंत-काव्य के प्रेमी और दार्शनिक गुत्थियों के जिज्ञासु पाठकों को डॉ. अंसारी का यह  शोधपूर्ण आलोचना  ग्रंथ विशेष रूप से भाएगा और हिंदी जगत में इस कृति और कृतिकार को समुचित सम्मान और स्नेह मिलेगा – यह मेरी प्रतीति भी है और शुभेच्छा भी!

हार्दिक शुभकामनाओं सहित
-ऋषभ देव शर्मा

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