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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

दक्षिण भारत में उच्च स्तर पर हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की समस्याएँ


हिंदी ही क्या, सभी भाषा और साहित्य के विभागों को इन दिनों लगातार घटती छात्र संख्या की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. उत्तर भारत में प्रथम भाषा होने के कारण हिंदी के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों के लिए छात्रों की कोई कमी नहीं है, लेकिन दक्षिण भारत में जहाँ हिंदी का स्थान दूसरी और तीसरी भाषा जैसा है, एम.ए. तथा शोध कार्य के लिए विद्यार्थियों में आकर्षण बहुत कम दिखाई देता है. हिंदी विभागों के समक्ष पहली चुनौती प्रवेश की समस्या से ही जुड़ी हुई है. इधर मानविकी विषयों के प्रति रुचि घटने का कारण ज्ञान की अपेक्षा कमाई के लिए शिक्षा प्राप्त करने की मनोवृत्ति से जुड़ा हुआ है. इसलिए यह जरूरी है कि हिंदी के अध्ययन-अध्यापन को आकर्षक बनाने के लिए ‘पढ़ाई के साथ कमाई’ की योजनाएं जोड़ी जाएँ और हिंदी के छात्रों व शोधार्थियों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए. यह भी जरूरी है कि परंपरागत पाठ्यक्रमों के अलावा प्रयोजनपरक छोटे-छोटे कार्यक्रम बनाए जाएँ. मंच संचालन, एंकरिंग, टूरिस्ट गाइड के लिए प्रमाण पत्र स्तर के कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं. इसी प्रकार विविध व्यवसायों में काम आने वाली हिंदी के भी स्वतन्त्र कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, जैसे – मेडिकल हिंदी, इंजिनीयरिंग की हिंदी, वकीलों के लिए हिंदी, प्रबंधकों के लिए हिंदी.

दो दशक से अधिक के दक्षिण भारत में स्नातकोत्तर स्तर के अध्यापन और शोध निर्देशन के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यहाँ हमें प्रायः ऐसे छात्रों को पढ़ाना पड़ता हैं जिनकी हिंदी भाषा और साहित्य संबंधी पृष्ठभूमि काफी कमजोर होती है. इनमें से अधिकांश छात्रों ने मुख्य विषय के रूप में डिग्री तक हिंदी नहीं पढ़ी होती. कुछ विद्यार्थी विज्ञान और वाणिज्य आदि धाराओं से आते हैं जिन्हें हिंदी प्रचार सभाओं की प्रवीण आदि उपाधियों के आधार पर एम.ए. में प्रवेश दिया जाता है. वे अवश्य ही बेहतर होते हैं. कमजोर पीठिका के कारण सीधे-सीधे एम.ए. के पाठ्यक्रम में कूद पड़ना यहाँ ज्यादातर छात्रों के लिए एकदम नई दुनिया में जाने जैसा होता है. इसलिए यह आवश्यक है कि आरंभिक कक्षाएँ भाषा कौशलों के विकास पर केंद्रित हों. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘ग’ क्षेत्र के विद्यार्थी के लिए हिंदी लगभग विदेशी भाषी होती है. इसलिए अध्यापकों को वही पद्धति अपनानी चाहिए जो विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाने के लिए जरूरी है. पाठ्य पुस्तकों और आलोचना ग्रंथों के अलावा इन छात्रों को छोटी छोटी रुचिकर पुस्तकों और पत्रिकाओं को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए. ये विद्यार्थी हिंदी के वातावरण में नहीं रहते हैं इसलिए जितनी देर वे परिसर में रहें कम-से-कम उतनी देर के लिए उन्हें हिंदी का वातावरण दिया जाना चाहिए. इसके लिए वार्तालाप, प्रश्न मंच, नाटक, फिल्म और परस्पर चर्चा-परिचर्चा की सहायता लेना उपयोगी होगा. कवियों, लेखकों और कृतियों पर वीडियो दिखाकर चर्चा कराई जा सकती है. हिंदी के कार्टून और कॉमिक्स सुनकर लिखने के लिए कहा जा सकता है. शब्दों से संबंधित कक्षा गतिविधि और स्थिति आधारित वार्तालाप द्वारा सामाजिक भाषा प्रयोग भली प्रकार सिखाया जा सकता है. किसी कार्य की विधि, किसी स्थान तक पहुँचने का रास्ता बताने जैसे अभ्यास कराए जा सकते हैं. यह भी आवश्यक है कि हिंदी भाषा में निहित संस्कृति से भी उन्हें परिचित कराया जाए. जैसे- तू-तुम-आप; यह–ये, वह–वे के अलावा संबोधन, अभिवादन और अभिवादन के प्रत्युत्तर की शैलियाँ. मातृभाषा के प्रभाव के कारण होने वाली त्रुटियों की पहचान करके सही प्रयोगों का बार-बार अभ्यास (ड्रिल) कराना भी बहुत आवश्यक है.

एम.ए.स्तर पर कुछ एकदम नए विषयों के समावेश के कारण भी प्रायः छात्र बिदकते देखे गए हैं. साहित्यशास्त्र, भाषाविज्ञान, सौंदर्यशास्त्र, शैलीविज्ञान, प्रयोजनमूलक भाषा, अनुवाद विज्ञान और जनसंचार आदि विषयों से ये विद्यार्थी पूर्व परिचित नहीं होते और इनकी भारी भरकम सैद्धांतिकी से इतने डर जाते हैं कि विषय में पैठ नहीं पाते. यह जरूरी है कि इन विषयों को रुचिकर रूप में प्रस्तुत करने की दृष्टि से कक्षा में मल्टीमीडिया की सुविधा का यथासंभव प्रयोग किया जाए. शुष्क व्याख्यान के स्थान पर विषय को दृश्य बनाकर प्रस्तुत किया जा सके तो रोचकता उत्पन्न हो सकती है. इन विषयों पर समय समय पर नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए. अध्यापक का अपने विषय का विशेषज्ञ होना तो जरूरी है ही ताकि वह कक्षा में विषय की मूलभूत अवधारणाओं को बोधगम्य रूप में स्पष्ट कर सके. इन विषयों के छोटे-छोटे परिभाषा कोश और उद्धरण कोश भी छात्रों को उपलब्ध काराए जा सकते हैं. अध्यापकगण ऐसे कोश तैयार करके उन्हें इंटरनेट पर भी जारी कर सकते हैं.

जैसा कि पहले कहा जा चुका है दक्षिण भारत के हिंदीतर भाषी विद्यार्थी के लिए हिंदी दूसरी या तीसरी भाषा होती है और उसका संपर्क केवल परिनिष्ठित खड़ीबोली से ही हो पाता है. ऐसी स्थिति में हिंदी का बोली वैविध्य और शैली वैविध्य उसे किसी घने जंगल जैसा प्रतीत होता है. यही कारण है कि वह हिंदी के आदिकालीन और मध्यकालीन साहित्य से घबराता है – कुछ लोकप्रिय कवियों की सरल कविताओं के अलावा. इसी प्रकार हिंदी कथा साहित्य का वह बहुत बड़ा हिस्सा जो आंचलिक है, इस विद्यार्थी को किसी तिलिस्म से कम चुनौतीपूर्ण नहीं लगता. यहाँ तक कि समकालीन कविता और नवगीत की देशजता भी उसे डराती है. ऐसी स्थिति में एक सरल रास्ता यह हो सकता है कि खड़ीबोली से इतर पाठांश पाठ्यक्रम में न रखे जाएँ, लेकिन ऐसा करना अवैज्ञानिक तथा अविवेकपूर्ण होगा. अतः मध्यमार्ग यह है कि आदिकाल और मध्यकाल के पाठांश अपाक्षेकृत कम हों, और जो हों वे भाषा सौंदर्य की समझ को विकसित करने की दृष्टि से चुने जाएँ. मध्यकालीन साहित्य के साथ एक समस्या पौराणिक-सांस्कृतिक संदर्भों की भी है. अतः ऐसे संदर्भों को संबंधित अंतर्कथाओं सहित समझाना जरूरी है. साहित्य के इतिहास के अलग-अलग खंडों को पूर्वापर संबंध द्वारा जोड़कर हिंदी साहित्य में निहित भारतीय चिंता धारा के विकास क्रम से भी छात्रों को परिचित कराना आवश्यक है. ऐसा करके उनमें इतिहास बोध और राष्ट्रीय चेतना का विकास किया जा सकता है.

साहित्य के पल-पल परिवर्तित परिप्रेक्ष्य के कारण भी कई बार विद्यार्थी और शोधार्थी उलझन महसूस करते देखे गए हैं. पाठ्यक्रम की तो अपनी सीमा है लेकिन शोध आदि की दुनिया असीम है. इसलिए यह आवश्यक है कि मध्यकाल, आधुनिकता, समकालीनता, उत्तरआधुनिकता और नित नए विमर्शों से संबंधित अद्यतन चिंतन के साथ हिंदी के विद्यार्थी और अध्यापक दोनों जुड़ें. इसके लिए विभाग में समय-समय पर विशेषज्ञों के व्याख्यान और लेखक से मिलिए जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं. पत्र-पत्रिकाओं के पढ़ने और उन पर चर्चा करने का वातावरण बनाना भी बेहद जरूरी है.

दरअसल शोध के स्तर पर यह देखा गया है कि पुस्तक संस्कृति और पठन अभिरुचि के अभाव के कारण कभी कभी बहुत दयनीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है. आवश्यक है कि शोधकार्य को अपेक्षित गंभीरता से लिया जाए. विषय चयन के समय छात्र की रुचि और निर्देशक की विशेषज्ञता को ध्यान में रखा जाना चाहिए और शोधकार्यों को अंतरराष्ट्रीय शोध मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए. शोधप्रबंधों में चोरी की प्रवृत्ति से बचने के लिए छात्र और निर्देशक दोनों ही में ईमानदार शोध संस्कार होने जरूरी हैं. ऐसा करके हम दक्षिण भारत में हिंदी के उच्च स्तरीय अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान कार्य को सचमुच विश्वसनीय और प्रामाणिक बना सकते हैं. 
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