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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

बहुशास्त्रविद शमशेर


२०१०-११ हिंदी-उर्दू के कई महान कवियों का शताब्दी वर्ष है. देश भर में आयोजन चल रहे हैं. अपना हैदराबाद भी कुछ पीछे नहीं है. छोटी-बड़ी चर्चाएँ, संगोष्ठियाँ शहर के अलग-अलग कोनों में चल रही हैं. अज्ञेय पर पिछले दिनों अच्छी चर्चा हुई - जब विश्वविद्यालय विशेष के पूर्व और वर्त्तमान अध्यक्ष सरस्वती वंदना और दीप प्रज्वलन को ब्राह्मणवादी कह कर ऐसे भिड़े कि .... खैर... जाने दीजेये. 

फिलहाल तो बात ३० दिसंबर को आन्ध्र प्रदेश हिंदी अकादमी में शमशेर बहादुर सिंह  पर आयोजित विशेष व्याख्यान की चल रही है. व्याख्यान किया अपने डॉ.बालकृष्ण शर्मा रोहिताश्व जी ने उन्होंने काफी विस्तार से अज्ञेय, नागार्जुन और शमशेर की अलग-अलग विशेषताएं बताते हुए तीनों को पिछली शताब्दी के मौलिक साहित्यकार साबित किया. रोहिताश्व का ख़ास जोर इस बात पर था कि शमशेर ऐसे विरले कवि हैं जिनकी कविताओं में देशी-विदेशी काव्य शास्त्र, काव्यान्दोलन, कलाआन्दोलन, स्थापत्य, नृत्य शास्त्र और विचारधाराएँ एक साथ प्रतिफलित होती दिखाई देती हैं. 

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

किसी के दर्द से जन्मी वैदिक ऋचाएं.

हैदराबाद के कादम्बिनी क्लब की गोष्ठी हर महीने तीसरे रविवार को होती है. कई माह से डॉ.अहिल्या मिश्र बुला रही थीं. इस बार पकड़ में आ ही गया मैं - अन्यथा यात्राओं के कारण मित्रों से बुराइयां मिल रही थी. नगर की वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती विनीता शर्मा जी का एकल काव्य-पाठ रहा. छह गीत पढ़े उन्होंने. 

- तुम नहीं मिले कहीं हम तलाशते रहे. 
- जिसे हम गीत कहते हैं : किसी के दर्द से जन्मी हुई वैदिक ऋचाएं हैं. 
- गंध में डूबी नहाई रात रानी रात भर महकी.
- जिस घड़ी आप हम वर्ग में बदल गए. 
- किन्तु मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है.
- तब तक आ ही जाना प्रिय तुम जब मैं ओढूं लाल चुनरिया. 

विनीता जी के गीत अनेक अर्थ स्तरों से युक्त होते हैं. उनके विशिष्ट शब्द चयन और औदात्य सृष्टि पर लम्बा व्याख्यान हो गया - घंटे भर का. 


रविवार, 5 दिसंबर 2010

मुंबई दर्शन


साठये महाविद्यालय, मुंबई में तीन दिन की अंतरराष्ट्रीय  संगोष्ठी में जाना हुआ तो ख़ास तौर से प्रो.गोपेश्वर सिंह के आग्रहवश तीसरे दिन संक्षिप्त सा मुंबई-दर्शन भी हो गया. फिलहाल पाँच-दिनी दिल्ली यात्रा की हबड़-दबड़ में हूँ, सो, संगोष्ठी और दर्शन पर बाद में ही कुछ लिखा जा सकेगा.


इस वक्त तो बस इतना कि चार दिसंबर को जब होटल ताज के सामने कुछ मिनट चहलकदमी की तो चिलकती धूप में पसीने-पसीने हो गए. प्रो.दिलीप सिंह तो तरबतर थे. अपनी खोपड़ी से पसीना पोंछते हुए प्रो.गोपेश्वर सिंह ने मेरी तोंद को लक्ष्य किया था - ये! गणेश  जी को पसीना नहीं आता क्या? मैं सदा की तरह बिना जवाब दिए मुस्करा दिया था.. डॉ. महात्मा पांडेय  ज़रूर ज़ोर से हँसे थे.