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रविवार, 13 जून 2010

सृजनात्मक लेखन पर डॉ. गोपाल शर्मा : पाठ 1

बड़ी खराब आदत है मेरी - खुद लिखने से बचना और आसपास वालों को उपदेशियाना कि अमुक लिखिए , तमुक लिखिए. प्रो. दिलीप सिंह ने जब से बाकायदा एक लेख में अपने ढेर सारे लेखन का श्रेय मेरी इस आदत को दिया है कि पठान की मानिंद पीछे पड़ जाता हूँ, तब से ढेट और भी खुल गया है. तब तो और भी अच्छा लगता है जब कोई मित्र सचमुच ऐसी किसी नई योजना को साकार कर डालता है. अपने डॉ. गोपाल शर्मा यों तो स्वयं ही पक्के योजनाधर्मी हैं, पर कभी-कभी हमारी योजनाएँ भी उन्हें भा जाती हैं. पिछले दिनों जब वे लीबिया से आए तो ऐसी ही योजनाओं से निष्पन्न दो लेखमालाओं की पांडुलिपियाँ थमा गए. आनन-फानन दोनों लेखमालाएँ ''स्वतंत्र वार्ता'' के परमउत्साही संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल को सौंप दी गईं. उस पल शुक्ल जी के चहरे पर जो चमक दिखी थी वैसी शायद पुराने ज़माने में किसी ऋषि के चहरे पर च्यवनप्राश खाने से भी न आती होगी. उनमें एक लेखमाला सृजनात्मक लेखन सिखाने से संबंधित थी. इस रविवार ६ जून, २०१० से शुक्ल जी ने उस लेखमाला को प्रकाशित करना आरंभ कर दिया है. पहली किस्त यहाँ उद्धृत है. जैसे-जैसे और छपेंगी वे भी सहेजी जाएँगी.

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Recently there was a workshop on creative writing in IIT Madras, organized by Kamal Haasan. He is planning to make a disjoint narrative film from some of the stories that emerged there. Of course, even he had contributed some. Aamir Khan has also indicated that he is interested in similar projects. Hope some changes are on, soon enough writers may emerge, like Chuck Palahniuk did, from such workshops.

जब भी सृजनात्मक लेखन सीखने की बात आती है, Burroughs याद आते है - आप किसी और की तरह लिखना सीख सकते है, पर अंत में खुदकी एक तकनीक बनानी ही होगी. वरना "first draft is the best" से आप Kerouac जैसा लिखेंगे, अपने जैसा नहीं. तकनीक ज़रूर सीखें, पर उनका सही इस्तेमाल भी - किसी खेल की तरह, सारी तकनीकें बदल सकती हैं.

Hope to learn more from here.

आचार्य उदय ने कहा…

आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!