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शनिवार, 22 नवंबर 2014

'बा-बेला'

दो शब्द

यह सृष्टि प्रेम की लीलाभूमि है. प्रेम ही वह तंतु है जो सृष्टि के विभिन्न पात्रों को परस्पर जोड़ता है – चाहे वे जड़ या चेतन हों, चाहे वे पशु या मनुष्य हों, चाहे वे जलचर या नभचर हों, अथवा चाहे वे स्त्री और पुरुष हों. सृष्टि में विविधता है, अनेकरूपता है, समानताएँ और असमानताएँ हैं. इन सबके संबंधों के ताने-बाने को रचने वाली शक्ति प्रेम ही है. प्रेम को पनपने के लिए संवेदनशीलता चाहिए होती है. केवल अपने आप में रमा रहने वाला कोई भी प्राणी प्रेम नहीं कर सकता. प्रेम के लिए अहं का विगलित होना और आत्म का विस्तार होना मूलभूत आवश्यकता है. संवेदनशीलता किसी भी प्राणी को अहं की अंधेरी सुरंग के दबाव से मुक्त करके आत्मविस्तार की उजली धूप का प्रसार प्रदान करती है. प्रेम तत्व के जागने से आत्मा के आवरण तड़क कर टूट जाते हैं. यह प्रेम ही पशु को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाता है. प्रेम मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाता है और प्रेम छिन जाए तो जीवन नष्ट हो जाता है. यही कारण है कि प्रेम – संयोग और वियोग – का चित्रण सदा से साहित्य के केंद्र में रहा है, आज भी है और आगे भी रहेगा. प्रेम के साथ जुड़ी हुई पीड़ा इस विषय को कभी बासी नहीं होने देती. सब प्रेम कथाएँ बड़ी सीमा तक एक जैसी होती हैं. फिर भी बार बार कही-सुनी जाती हैं, लिखी-पढ़ी जाती हैं. 

हैदराबाद के कवि-कथाकार देवा प्रसाद मयला ने भी एक और प्रेमकथा लिखी है. वे बाल साहित्य की रचना में विशेष रुचि लेते हैं इसलिए अपनी यह प्रेमकथा उन्होंने टार्जन और जंगल बुक आदि के शिल्प में गढ़ने का प्रयास किया है. सृष्टि की आदि प्रेमकथा पक्षी और मनुष्य की प्रेमकथा रही है. देवा प्रसाद मयला की प्रेमकथा वनमानुष और मानवी की प्रेमकथा है जिसमें कई प्रचलित ऐसी लोककथाओं की अनुगूंजें भी सुनाई पड़ती हैं जिनमें पशु और मनुष्य के बीच संवेदना के तंतु प्रेम का संसार रचते हैं. देवा प्रसाद ने एक ऐसे वनमानुष की कल्पना की है जो कबीलाई युद्ध में अपने सब प्रियजन को खो चुका है. उसके लक्ष्यहीन जीवन को तब नई दिशा मिल जाती है जब वह एक लकडबग्घे के चंगुल से एक असहाय लड़की को बचाता है. जटायु भले ही रावण से सीता को न बचा पाया हो पर यहाँ उसकी याद अवश्य आती है. किसी अन्य लोक के प्राणी से उर्वशी की रक्षा करने वाला पुरूरवा भी यहाँ याद आता है. दरअसल उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम कहानी ही सृष्टि की पहली ऐसी प्रेमकथा है जिसमें उड़ने वाले प्राणी और मनुष्य का प्रेम दर्शाया गया है. देवा प्रसाद की प्रेमगाथा में वनमानुष बचाई हुई लड़की का रखवाला बन जाता है क्योंकि वह भी सर्वथा अकेली है. दोनों के बीच साहचर्यजनित संवेदनामूलक उत्सर्गपरक राग का उदय होता है. दोनों एक दूसरे के लिए भावनात्मक जरूरत बन जाते हैं. 

वह प्रेमकथा ही क्या जिसमें संयोग घटित न होते हों. ऐसे संयोग जो वियोग का कारण बनें. मनुष्य कन्या और वनमानुष के अपारिभाषित संबंध पर भी संयोग की मार पड़ती है और मनुष्य कन्या एक दिन गायब हो जाती है. यहाँ फिर अभिशप्त उर्वशी का अंतर्धान होना याद आता है. यह भी याद आता है कि अनेक वर्षों तक बाल लीलाएँ करने औए रास लीला रचाने के बाद गोपियों के मध्य से कृष्ण भी अंतर्धान हो गए थे. प्रेम की यह परिणति कथा में करुणा और त्रास को उत्पन्न करती है. द्रवित हृदय लिए वनमानुष जंगल जंगल, पर्वत पर्वत अपने खोए हुए प्यार को खोजता है. संपूर्ण प्रकृति बिंब प्रतिबिंब भाव से इस प्रेमलीला में बराबर की साझेदार है. इसीलिए संयोग में प्रफुल्लित रहने वाला बन भी वियोग में वनमानुष के साथ धीरे धीरे सूख जाता है. मर जाता है. मीरा की कामना थी कि सारा शरीर भले ही कौए नोच नोचकर खा जाएँ लेकिन पिया मिलन की आस से भरे दो नेत्र बचे रहें. वन और वनमानुष का भी अंत कुछ ऐसा ही है. कहीं कोई लघु मरुद्यान शेष है तो वह मनुष्य कन्या के आने की राह देख रहा है. 

देवा प्रसाद मयला ने ‘बा-बेला’ के रूप में एक रोचक प्रेमकथा रची है जो बच्चों को भी पसंद आएगी और बड़ों को भी. रचनाकार के लेखन में निखार की शुभकामना के साथ इस कृति के प्रकाशन पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ. 

22 नवंबर 2014 -                                                                                                                    ऋषभदेव शर्मा
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