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गुरुवार, 5 जून 2014

‘सहरा की धड़कनें’ अर्थात अरबी कविता हजार साल पहले

भूमिका

संतोष अलेक्स कई भाषाओं के जानकार हैं तथा कवि और अनुवादक के रूप में इन्होंने अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित की है. इस अनूदित कविता संग्रह ‘सहरा की धड़कनें’ के माध्यम से ये हिंदी पाठकों को हजार साल पुरानी अरबी कविताओं से रू-ब-रू करा रहे हैं. बेशक, इनका यह प्रयास स्तुत्य और स्वागतेय है. 

दरअसल यहाँ जिन कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है इनका संबंध एंडालूसिया से है. (एंडालूसिया में 10वीं से 15वीं शताब्दी के बीच फली-फूली अरब सभ्यता ‘मूर’ अब इतिहास के गर्भ में समा चुकी है.) हिंदी में ये कविताएँ मलयालम और अंग्रेजी के रास्ते आ रही हैं. अंग्रेजी में स्पेनी से आईं जबकि स्पेनी में अरबी से अनुवाद होकर. मूल अरबी पाठ तो संभवतः आज भी अप्रकाशित है और हिंदी का लक्ष्य पाठ गठित होने से पहले इन कविताओं को स्पेनी, अंग्रेजी और मलयालम के तीन तीन फिल्टरों से गुजरना पड़ा है. कहते हैं, अनुवाद में कविता खो जाती है. इसलिए यदि इस लंबी छनाई के बावजूद यहाँ कुछ कविता बची रह गई है तो मानना ही पड़ेगा कि मूल पाठ बहुत सशक्त रहा होगा और अनुवादक भी बेहद सतर्क रहे होंगे. 

प्राचीन मूर सभ्यता उत्तर पश्चिमी अफ्रीका के बरबर और अरब के रेगिस्तान के मुसलमानों ने स्पेन के एंडालूसिया में खड़ी की थी. कालांतर में इसके कालकवलित हो जाने पर इसकी उपलब्धियाँ भी खो गईं. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 1928 में काहिरा की एक दूकान में महान स्पेनी अरब इतिहासकार एमिलियो गार्सिया गोमेज़ ने पुरानी किताबों के ढेर में 1243 की एक छोटी सी पांडुलिपि देखी और वे इसमें एंडालूसिया की अरब सभ्यता के दौरान रची गई इन कविताओं को देखकर चमत्कृत रह गए. गोमेज़ ने इन कविताओं को स्पेनिश में अनुवाद करके प्रकाशित कराया और यह दावा किया कि इन कविताओं के माध्यम से उस सभ्यता की आत्मा और प्रकृति को इतिहास की मोटी किताबों की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. उस समय शायद गोमेज़ ने कल्पना भी न की होगी कि इन कविताओं का स्पेनी की अपनी कविता के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है. लेकिन ऐसा हुआ. इन कविताओं ने केवल पाठकों को ही मंत्रमुग्ध नहीं किया बल्कि स्पेनी कविता की ‘सत्ताईस की पीढ़ी’ के कवियों पर भी गहरी छाप छोड़ी. इस आंदोलन के रफेल अलबर्टी और फेडरिको गार्सिया लोर्का (1898-1936) जैसे कवियों ने स्वयं को इस कविता का ऋणी माना है. लोर्का ने तो खुद को इस कविता में गहरे डुबोकर इसकी आत्मा का साक्षात्कार करके उसे ही अपनी कविता में पुनर्जीवित किया है. कहा तो यहाँ तक जाता है कि इस कविता में निहित अध्यात्म, मौलिक रूपकों और अनछुए बिंबों ने समग्र स्पेनी काव्य को झकझोर कर रख दिया था. 

उल्लेखनीय है कि इन कविताओं के मूल संग्रहकर्ता इब्न सईद की मान्यता थी कि कविता को शीतल मंद सुंगंध बयार से ज्यादा नाजुकख़याल और काव्यभाषा को अप्सरा के मुख से ज्यादा खूबसूरत होना चाहिए. कहना न होगा कि अरब एंडालूसिया की ये कविताएँ इस कसौटी पर खरी उतरती हैं. इसीलिए गार्सिया गोमेज़ की यह स्थापना अत्यंत सटीक है कि ये कविताएँ भले ही समग्र और संपूर्ण न हों, टुकड़ों टुकड़ों में बिखरी होने के बावजूद इनमें हीरे की कणिकाओं जैसी दिव्य आभा है. (विस्तृत खोह के साँवले तल में/ तिमिर को भेदकर चमकते हैं पत्थर/ मणि तेजस्क्रिय रेडियो एक्टिव रत्न भी बिखरे. – अंधेरे में, मुक्तिबोध). हीरे की ये कणिकाएँ जिन कवियों के हस्ताक्षरों से चमकी हैं उनमें उस जमाने के बादशाहों, वज़ीरों, शहजादों, खलीफाओं, हकीमों से लेकर आम जन तक शामिल हैं. वह ऐसा दौर था जब सेविल्ला राज्य का साधारण सा गाड़ीवान भी काव्य रचना और समस्यापूर्ति में सिद्धहस्त हुआ करता था. यही नहीं, उस दौर में दावतनामे, माफीनामे, शिकायतें और सामान्य पत्राचार भी कवितात्मक हुआ करते थे. इसीलिए इन कविताओं में उस दौर के खासोआम के सुख-दुःख, राग-विराग तथा प्रकृति-परिवेश का ही अंकन नहीं हुआ है बल्कि सुंदरियों से लेकर घोड़ों, युद्धों और पानी तक को काव्य का विषय बनाया गया है. 

‘सेहरा की धड़कनें’ में संकलित कविताओं के अवलोकन से कम से कम यह तो साफ़ हो ही जाता है कि हजार वर्ष पुरानी इन अरबी कविताओं का मूल चरित्र मुख्यतः प्रतीकात्मक है, इनमें रंगीन दृश्यबंध सम्मिलित हैं और इनमें मरुस्थल के रूप की प्राकृतिक आभा है. ये कविताएँ प्रेम के दोनों पक्षों और विविध मनोदशाओं को तो उकेरती हैं ही, उसे देह के उत्सव के साथ आत्मा का पर्व भी बनाती हैं. इतना ही नहीं, ये कविताएँ मनुष्य और प्रकृति के सहज स्वच्छंद संबंध का भी आइना है जिसमें बगीचे, फूल, पर्वत, नदी और झरने अपनी स्वाभाविक छटा बिखेर रहे हैं. सौंदर्यविधान, उपमान योजना, बिंब गठन और मानवीकरण की दृष्टि से भी ये कविताएँ मर्मस्पर्शी बन पड़ी हैं. आप पाएंगे कि इब्न अब्द रब्बीही (860-940), इब्न ज़ाख, अबुल हसन अली इब्न हिस्न (11वीं शती), इब्न फराज (10वीं शती), इब्राहिम इब्न उस्मान (12वीं शती), इब्न इयाद (12वीं शती), इदरिस इब्न अल यमनी (11वीं शती), मोहम्मद इब्न ग़ालिब अल रुसफी (11वीं शती), अबू अमीर इब्न अल हमराह (12वीं शती) तथा यूसुफ इब्न हारुन अल रमदी (917-1122) जैसे कवियों की रचनाएँ अनुभूति और अभिव्यक्ति के धरातल पर अत्यंत मर्मस्पर्शी और सहज संप्रेषणीय हैं. 

अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्स और प्रकाशक माया मृग ने इस कविता संग्रह को हिंदी में लाने का चुनौती भरा काम बड़ी निष्ठा से संपन्न किया है. इस हेतु ये दोनों साधुवाद के पात्र हैं. 


5 जून 2014                                                                         - ऋषभ देव शर्मा

विश्व पर्यावरण दिवस                                                          rishabhadsharma@gmail.com

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