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सोमवार, 20 जनवरी 2014

‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ पढ़ते हुए

[हैदराबाद के हिंदी दैनिक 'मिलाप' ने 19 जनवरी 2014 के अपने रविवारीय परिशिष्ट 'फुर्सत का पन्ना' में यह समीक्षा स्थानाभाव के कारण अंग-भंग करके छापी है. नीचे पूरा आलेख प्रस्तुत है.]

‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ पढ़ते हुए 



तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ

 ऋषभ देव शर्मा


2013

 पृष्ठ – 204

 मूल्य – रु. 395
 जगत भारती प्रकाशन, सी-3-77, दूरवाणी नगर, 
ए डी ए, नैनी, इलाहाबाद – 211008 (उत्तर प्रदेश )

डॉ. ऋषभ देव शर्मा (1957) कई दशक से दक्षिण भारत में रहकर निष्ठापूर्वक हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे हैं. इस अवधि में आपने एक सफल अध्यापक, जिज्ञासु अनुसंधानकर्ता, सुधी समीक्षक, विवेकशील संपादक और ओजस्वी वक्ता के रूप में ख्याति अर्जित की है. आपकी काव्य कृतियों में तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (स्त्री पक्षीय कविताएँ, 2011), प्रेम बना रहे (2012) और सूँ साँ माणस गंध (2013), आलोचना कृतियों में तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता : आठवाँ-नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000) और कविता का समकाल (2011) तथा संपादित ग्रंथों में अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), अनुवाद : नई पीठिका नए संदर्भ (2003), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), प्रेमचंद की भाषाई चेतना (2006) एवं भाषा की भीतरी परतें (2012) जैसी पुस्तकें बहुप्रशंसित रही हैं. एक खास बात जो डॉ. शर्मा को अपने अनेक समकालीन और समशील रचनाकारों से अलग करती है वह यह है कि आप निरंतर नई प्रतिभाओं को प्रेरित और पोषित करते हैं. शायद यही कारण है कि उन्हें हिंदीतरभाषी हिंदीसेवियों का बड़ा स्नेह मिला है. लगभग एक दशक पूर्व प्रो. दिलीप सिंह ने उनके संबंध में ठीक ही लिखा था कि “हैदराबाद के हिंदी जगत् में ऋषभदेव जी अत्यंत लोकप्रिय हैं. सब उनका साथ चाहते हैं, और वे भी किसी को निराश नहीं करते.” यह लोकप्रियता उन्होंने तेलुगु भाषा और साहित्य के प्रति अपने प्रेम के बल पर अर्जित की है. इस प्रेम की ही परिणति है उनका सद्यःप्रकाशित निबंध संग्रह ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ’ (2013).

इस पुस्तक (तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ) में छह खंड हैं जिनमें 36 आलेख और 1 विस्तृत शोधपत्र सम्मिलित हैं. पहले खंड में आंध्र के महान भक्त कवियों अन्नमाचार्य, रामदास, क्षेत्रय्या, पोतना, मोल्ला और वेंगमाम्बा तथा संत कवि वेमना पर केंद्रित हिंदी पुस्तकों का विवेचन करते हुए भारतीय साहित्य में भक्ति आंदोलन के योगदान पर कुछ टिप्पणियाँ शामिल हैं. दूसरा खंड आधुनिक तेलुगु कविता को समर्पित है. इसमें जिन अनेक तेलुगु कवियों की अनूदित कृतियों की विवेचना की गई है उनमें श्रीश्री, डॉ. सी. नारायण रेड्डी, कालोजी, दिगंबर कविगण (नग्नमुनि, निखिलेश्वर, चेरबंड राजु, महास्वप्न, ज्वालामुखी और भैरवय्या), पेर्वारम, अजंता, वासा प्रभावती, डॉ. एस. शरत ज्योत्स्ना रानी, मुस्लिमवादी कविगण (एस. ए. अज़ीम, अली, ख्वाजा, आजम, दिलावर, शाहजहाना, सिकिंदर, गौस मोहिउद्दीन और स्काई बाबा), डॉ. एन. गोपि, डॉ. शिखामणि, डॉ. सी. भवानी देवी, डॉ. पी. विजयलक्ष्मी पंडित, वाणी रंगाराव, डॉ. मसन चेन्नप्पा और डॉ. एस. वी. सत्यनारायण के नाम शामिल हैं. इसी प्रकार तीसरे और चौथे खंड में कथा साहित्य और नाट्य साहित्य के अनुवादों की तटस्थ समीक्षा देखी जा सकती है. यहाँ विवेचित कृतियाँ हैं बैरिस्टर पार्वतीशम (मोक्कपाटी नरसिंह शास्त्री), द्रौपदी (डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद), नई इमारत के खंडहर (सय्यद सलीम), अहल्या (चलसानी वसुमती), सोने की वर्षा (डॉ. भार्गवी राव), बारिश थम गई (एल. आर. स्वामी), आक्रमण कब का हो चुका (पेद्दिन्टि अशोक कुमार), पंचामृत (डॉ. डी. विजय भास्कर) तथा अक्षर (नंदि राजु सुब्बाराव). साथ ही, आरंभिक भारतीय उपन्यासों पर एक शोधग्रंथ (आर. एस. सर्राजू) और प्रतिनिधि तेलुगु कहानियों के 2 संकलनों की भी विवेचना की गई है जिसके कारण तेलुगु कथा साहित्य के संपूर्ण परिदृश्य का विहंगम अवलोकन संभव हो सका है. पाँचवे खंड में 4 आलेख हैं – तेलुगु साहित्य का परिवर्तनशील परिदृश्य, बीसवीं सदी का तेलुगु साहित्य, हिंदी तेलुगु तुलना और हिंदी में दक्षिण भारतीय साहित्य जिनमें क्रमशः निखिलेश्वर, डॉ. आई. एन. चंद्रशेखर रेड्डी, डॉ. शकीला खानम और डॉ. विजय राघव रेड्डी की हिंदी पुस्तकों के बहाने तेलुगु साहित्य के इतिहास, आलोचना और अनुवाद पक्ष की चर्चा की गई है. पुस्तक के छठे खंड में तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद की परंपरा और उसके प्रदेय पर केंद्रित 56 पृष्ठों का एक सुविस्तृत शोधपत्र प्रकाशित किया गया है. मुझे भी सहलेखक के रूप में इस शोधपत्र के लिए काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. यह अपनी प्रकार का शायद पहला शोधपत्र है जिसमें अनुवाद परंपरा की चर्चा के बाद तेलुगु से अनूदित पाठों का गहराई से विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदी के भाषा समाज को ये अनुवाद किस प्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक और साहित्यिक स्तर पर समृद्ध करते हैं. ‘भास्वर भारत’ (दिसंबर 2013) में प्रो. गोपाल शर्मा ने इस खंड को इस पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंश मानते हुए लिखा है “कहना न होगा कि इस विस्तृत खंड में हिंदी में आए तेलुगु साहित्य के कुछ पाठों से ही ज्ञात हो जाता है कि तेलुगु भाषासमाज की सांस्कृतिक विशेषताएं एक ओर तो समग्र भारत के समान है और दूसरी ओर इसमें किंचित इंद्रधनुषी विभिन्नताएँ भी हैं. तेलुगुभाषी लेखक समय-समय पर तेलुगु जीवन शैली का विवरण-विश्लेषण भी करते जाते हैं और हिंदी के पाठक समझ जाते हैं कि आंध्र जीवनशैली में किन-किन सांस्कृतिक चिह्नों का प्रयोग आज भी हो रहा है. इस प्रकार के तुलनात्मक समाजभाषावैज्ञानिक अध्ययन की हिंदी में यह पहली मिसाल देखने में आई है.” वस्तुतः यह अनुवाद का सेतुधर्म है और प्रो. शर्मा की यह पुस्तक इस सेतुधर्म को ही विशेष रूप से रेखांकित करती है. 

तेलुगु और हिंदी के भाषासमाजों के बीच इस साहित्यिक सेतु के निर्माण में मूल रचनाकारों और प्रस्तुत ग्रंथकार का संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. परंतु यहाँ यह कहना जरूरी है कि यह संवाद अनुवादकों के बल पर ही संभव हुआ है. प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने इस पुस्तक में जिन 23 अनुवादकों के द्वारा अनूदित सामग्री का विवेचन किया है वे हैं डॉ. भीमसेन निर्मल, डॉ. एम. बी. वी. आई. आर. शर्मा, डॉ. निर्मलानंद वात्स्यायन, डॉ. एम. रंगैया, डॉ. पी. माणिक्यांबा, डॉ. जे.एल. रेड्डी, डॉ. टी. मोहन सिंह, प्रो. पी. आदेश्वर राव, डॉ. विजय राघव रेड्डी, डॉ. भागवतुल सीता कुमारी, डॉ. वाई. वेंकटरमण राव, आर. शांता सुंदरी, एस. शंकराचार्लु, निखिलेश्वर, पारनंदि निर्मला, डॉ. आर. सुमनलता, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, जी. परमेश्वर, डॉ. म. लक्ष्मणाचारी, डॉ. वेन्ना वल्लभ राव, डॉ. के. श्याम सुंदर, डॉ. संतोष अलेक्स एवं डॉ. बी. विश्वनाथाचारी. वस्तुतः, जैसा कि प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने ‘भूमिका’ में निर्दिष्ट किया है, “यह ग्रंथ अनूदित साहित्य के प्रति ऋषभ देव शर्मा की सहज संवेदना को प्रदर्शित करता है. भारतीय संदर्भ में हिंदी में इतर भाषा से अनूदित साहित्य मूल भाषासमाज की सांस्कृतिक अस्मिता को समझने के लिए वृहत पाठक वर्ग को अवसर प्रदान करता है. यह ग्रंथ हिंदीभाषी पाठकों एवं शोधार्थियों के लिए तेलुगु साहित्य के गणनीय हिस्से को समझने में न केवल सहायक होगा बल्कि यह शोध के क्षेत्र में नई संभावनाओं को भी विकसित करेगा. तेलुगु साहित्य के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए यह ग्रंथ उत्प्रेरक की भूमिका अवश्य निभाएगा.” 



अंत में, मैं यह उल्लेख करना चाहूँगी कि इस पुस्तक का समर्पण-वाक्य अत्यंत भावपूर्ण और श्लाघनीय है “समकालीन भारतीय कविता के उन्नायक ‘नानीलु’ के प्रवर्तक परम आत्मीय अग्रज कवि प्रो. एन. गोपि को सादर” समर्पित यह कृति हिंदी और तेलुगु साहित्यकारों के बीच भावपूर्ण स्नेह-संबंध की प्रतीक और प्रतिमान बन गई है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रो. ऋषभ देव शर्मा की इस आलोचना कृति को हिंदी के साथ साथ तेलुगु समाज का भी भरपूर स्नेह प्राप्त होगा.
- गुर्रमकोंडा नीरजा  
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