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शनिवार, 6 जून 2009

आतंकवाद और महामंदी के बीच रचनाधर्म का निर्वाह*



आतंकवाद और महामंदी के बीच रचनाधर्म का निर्वाह*


आज जब पत्रकारिता ने बाज़ार की शक्तियों के समक्ष घुटने टेक दिए हैं और विज्ञापन तथा मनोरंजन को ही अपना प्रयोजन बना लिया है .ऐसे में उसके मुनाफाकमाऊ मनोरंजन उद्योग भर बनकर रह जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है.इस परिस्थिति में उन लघु पत्रपत्रिकाओं का महत्त्व और दायित्व बढ़ गया है जो घरफूंक तमाशे के तौर पर निकाली जाती हैं. इनकी दृष्टि लाभ पर नहीं आन्दोलनधर्मिता के निर्वाह पर टिकी होती है.इसी बूते ये पत्रिकाएँ रचनाशीलता और वैचारिकता की रक्षा कर पाती हैं. यह प्रसन्नता की बात है कि हिन्दी में ऐसी अनेक नियमित - अनियमित पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं जो आज के रचनाकर्म की दशा और दिशा के स्वस्थ और सटीक होने का पता देती हैं.इनके मुख्य सरोकार के रूप में इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में घटित देश और दुनिया के घटनाक्रम के विश्लेषण को रेखांकित किया जा सकता है जो विमर्श और रचना दोनों स्तरों पर प्रतिफलित हो रहा है.


इस राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में सर्वाधिक भयावह घटना चक्र आतंकवाद और आर्थिक मंदी से सम्बंधित है. जिस समय दुनिया भर में संचार-क्रान्ति के कन्धों पर सवार २१वीँ शताब्दी के स्वागत की तैयारियाँ हो रही थीं उस समय फूकोयामा ने १९९१ में यह घोषणा की थी कि इतिहास और विचारधारा दोनों का अंत हो गया है. इस अंत का कारण यह माना गया कि शीत युद्ध के दौर में पूंजीवादी और साम्यवादी दो विचारधाराएँ सक्रिय थीं. जिनके द्वंद्व के कारण दुनिया में संतुलन बना हुआ था. परन्तु साम्यवादी गढ़ के ढह जाने से दुनिया मानो एकध्रुवीय बनकर रह गयी , तथा अमरीकी नेतृत्व में पूंजीवादी प्रणाली ही दुनिया की नियति या अंतिम सत्य घोषित कर दी गयी . अमरीकी साम्राज्यवाद के अश्वमेध का घोड़ा विश्वविजय के लिए निकल पड़ा. रातोंरात दुनिया विश्वग्राम में तब्दील हो गयी. या कहें कि विश्वबाज़ार में तब्दील हो गयी. उदारवादी अर्थव्यस्था क्रमशः सीमाविहीन होती गयी. भोगवादी मुनाफा संस्कृति ने उन्मुक्तता के नाम पर पूंजी के आवारापन को खुली छूट दी और इसके साथ ही सूचना क्रांति ने उस वैचारिकी को प्रसारित किया जिसमे इतिहास के अंत, विचारधाराओं के अंत, शब्दों के अंत जैसे उत्तरआधुनिक विमर्श शामिल हैं.


इन विमर्शों ने मिलकर मुनाफे को सर्वव्यापी मूल्य के रूप में प्रतिष्टित किया. अंत की घोषणाओं के पीछे-पीछे एक और विमर्श उभरा जिसके अनुसार आज के समय को सभ्यताओं के युद्ध का समय बताया गया. सेमुअल हटिंगटन ने अमरीका की सरकारी पत्रिका 'फारेन-अफेयर्स' में १९९३ में एक लेख लिखा था - 'द क्लैश आफ सिविलाइजेशन्स' जो बाद में १९९६ में पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुआ. इसमे सभ्यताओं के युद्ध की वैचारिकी को सामने रखते हुए अमेरिकी साम्राज्यवाद के विस्तार की प्रक्रिया को औचित्य प्रदान किया गया है. २०वीँ सदी के विचारधाराओं के शीत युद्ध का स्थान इस वैचारिकी के आने पर सभ्यताओं के संघर्ष ने ले लिया. अफगानिस्तान और इराक की घटनाएँ इसका प्रमाण हैं कि आधुनिकतम हथियारों के साथ इस युग में मध्ययुगीन बर्बरता वापिस आ गयी है जिसे उचित घोषित करते हुए अमेरिका ने सारी दुनिया को धमकाते हुए कहा था कि सभ्यताओं के इस युद्ध में जो देश अमेरिका के साथ हैं वे सभ्य हैं और जो उसके विरोधी हैं वे असभ्य हैं. इसी तर्क का विस्तार २१वीँ सदी में आगे भी होने जा रहा है.. और ऐसा प्रतीत होने लगा है कि आने वाला समय धर्म, संस्कृति आदि की बहुलता का नाश करने के लिए तथाकथित सभ्यताओं के युद्ध का समय होगा.


स्मरण रहे कि नब्बे के बाद से अब तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद और आर्थिक मंदी भयानकतम समस्याएँ रही हैं जिनका सम्बन्ध निश्चय ही सभ्यताओं के युद्ध की उस वैचारिकी से है जिसके सम्बन्ध में हटिंगटन का कथन है कि पश्चिमी अर्थात ईसाई सभ्यता और इस्लाम के बीच प्रतिद्वंद्विता होगी तथा चूँकि पश्चिमी सभ्यता चरम उत्कर्ष पर है इसलिए वह लोकतंत्र और उदारवाद पर आधारित जीवन मूल्यों को वैश्विक स्तर पर फैलाना चाहेगी. यह चाहना ही विस्तारवाद है जो लोकतंत्र और मानवाधिकार का धोखा देकर प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल जैसे संसाधनों वाले देशों को घुटने टेकने के लिए मजबूर करने को प्रणबद्ध है. इस वैचारिकी में पश्चिमी दुनिया, इस्लामी दुनिया, हिन्दू दुनिया और बौद्ध दुनिया जैसे भेद पैदा करके पश्चिमी दुनिया को श्रेष्ट माना गया है और 'एक सभ्यता आधारित विश्व व्यवस्था' का सपना देखा गया है. ऐसा सपना तानाशाही को ही जन्म दे सकता है. इसी के कारण दुनिया भर में धर्म के प्रति पूर्वाग्रह की प्रवृत्ति सघन होती जा रही है, इसी के कारण इस्लामी आतंकवाद को इतना बल मिला है और इसी के कारण मुनाफा संस्कृति के फैलने से आर्थिक महामंदी का दौर आया है.


इस कट्टरवाद और मंदी की तुलना अगर बीसवीं शताब्दी के आरम्भ के वातावरण से की जाए तो याद आएगा कि वह दौर भी ऐसा ही था. दोनों विश्वयुद्धों के पहले आर्थिक मंदी का दौर दौरा था और मंदी के बाद विश्व युद्ध की मार पड़ी थी. आज के समय की भी यही चिंता है कि कहीं सभ्यताओं के युद्ध की वैचारिकी और आर्थिक मंदी की मार दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध के मुँह में न धकेल दे.


''अभिनव कदम - २०'' के सम्पादकीय में जयप्रकाश धूमकेतु ने इस सारे परिदृश्य की विवेचना करते हुए सही कहा है कि आज का वैश्विक संकट पूंजीवादी संरचना का मायाजाल है. वर्त्तमान वैश्विक आतंकवाद और आर्थिक मंदी का संकट पूरी दुनिया में अमेरिका का पैदा किया हुआ है जिसमें वह स्वयं फँस गया है और इस संकट से उबरने का कोई रास्ता अमरीकी पूंजीवाद के पास नहीं है. आज की पीढी का भारतीय रचनाकार इन सब संदर्भो को भारतीय परिप्रेक्ष्य में विवेचित करता है और उसकी फलश्रुति को समकालीन रचनाधर्मिता में परिलक्षित किया जा सकता है.


'अभिनव कदम' के इस अंक में प्रकाशित रचनाओं में आतंकवाद और बाजारवाद के संकट की अभिव्यक्ति अनेक स्थलों पर दिखाई देती है. यों तो अंक में अल्पना मिश्र (मिड डे मील) और हरपाल सिंह अरुष (सिरी किसन का कुनबा) की कहानियां भी हैं, लेकिन मुख्य रूप से पत्रिका कविता को समर्पित प्रतीत होती है. गोपाल कृष्ण, हरिओम, दिनेश कुशवा, श्रीप्रकाश शुक्ल, जीतेन्द्र श्रीवास्तव, सुधांशु कुमार मालवीय, रीता हजेला, केशव शरण, विनय मिश्र, इंदु श्रीवास्तव, रामेश्वर, चंद्रकांत, नमिता सत्येन, उद्भव मिश्र और सरोज पाण्डेय की विविध विधाओं की कविताओं के साथ ऋषभ देव शर्मा की आतंकवाद पर दस कविताएँ भी इस अंक में सम्मिलित हैं.


अंततः इस संकलननुमा अंक में प्रकाशित असद ज़ैदी की वेणुगोपाल की स्मृति को समर्पित कविता "वेणुगोपाल, आदि कवि, १९४२-२००८'' का एक अंश .......

''तुमने देखी एक लम्बी खिंचती जाती अटूट हार, इतनी हार /
कि कोई भी उसका आदी हो जाए ,उस पर आश्रित हो जाए /
वह अच्छी लगने लगे और कुल मिला कर /
उसे जीत की तरह दर्ज करने की प्रथा आम हो जाए...''


*अभिनव कदम -२० / संपादक - जयप्रकाश धूमकेतु / प्रकाश निकुंज, २२३ - पावर हाउस रोड , निजामुद्दीनपुरा , मऊ नाथ भंजन, मऊ - २७५ १०१ [ उत्तरप्रदेश ]/ रु.५०-०० / पृष्ठ ३२८.
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