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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

भाषा-प्रयोक्ता की स्वायत्तता का सम्मान

इसमें संदेह नहीं कि हिन्दी भाषा के क्षेत्रीय, अक्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सदर्भों की विविधता और विराटता के कारण इसमें अनेक शैली - वैविध्य विद्यमान और सम्भव हैं. इसे भाषा की शक्ति माना जाना चाहिए,न कि दुर्बलता या दरिद्रता.

राष्ट्रप्रेम अच्छी वस्तु है, लेकिन कट्टर शुद्धतावाद उसे दुराग्रह द्वारा प्रदूषित करता रहता है. 

भाषाविकास और राष्ट्रीयता का संतुलन क्षुर-धार पर दौड़ने जैसा है - किंचित असावधानी से भाषा जोड़ने के स्थान पर तोड़ने का माध्यम बन सकती है [जो सर्वथा अवांछनीय है] ! 

स्मरण रहे कि प्रत्येक प्रतिभाशाली लेखक की अपनी निजी भाषा अथवा व्यक्तिबोली होती है जिसका आधार स्वरुचि-अनुरूप शब्द-चयन से निर्मित होता है. कोई लेखक किसी अन्य की रुचि के अनुसार शब्द-चयन के लिए बाध्य नहीं है.

अपनी रुचि लेखक पर थोपने का यत्न इतिहास में अनेक बार अनेक आचार्यों ने किया है , परन्तु इसे प्रशंसनीय कभी नहीं माना गया. भाषा के किसी भी स्वयम्भू संरक्षक को आज भी यह अधिकार नहीं है कि वह हिन्दी के शैली-वैविध्य को नष्ट करके उसे जड़ और एकरूपी बना दे !

अतः आइये हम भाषा-प्रयोक्ता की स्वायत्तता का सम्मान करें !

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