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बुधवार, 21 मार्च 2018

(भूमिका) इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यास : विविध विमर्श



उपन्यास को आधुनिक युग का महाकाव्य कहा जाता है. इसका कारण यह है कि इस विधा में महाकाव्य की भाँति संपूर्ण जीवन को समेटने तथा भूत, भविष्य और वर्तमान को एक साथ संबोधित करने की महती संभावनाएँ निहित हैं. यही कारण है कि आधुनिक उपन्यास से हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि वह समकालीन जीवन और जगत की तमाम स्थूल हलचलों और सूक्ष्म धड़कनों को एक साथ समेट कर चले और साथ ही अपनी विश्वदृष्टि द्वारा यथार्थ को लोक मंगलकारी स्वरूप भी प्रदान करे. हम उपन्यासकार से आज यह अपेक्षा करते हैं कि वह हमारे संसार को हमारी नजर से देखे और औरों को दिखाए. उससे यह भी उम्मीद की जाती है कि वह वैचारिक ही नहीं, वास्तविक धरातल पर हमारे साथ खड़ा हुआ और सक्रिय दिखाई दे. 


इक्कीसवीं सदी का हिंदी उपन्यासकार अपनी रचना से की जाने वाली इन महाकाव्यात्मक अपेक्षाओं से भली प्रकार परिचित है और इनके प्रति जागरूक भी. हमारा उपन्यास अब काल्पनिक आदर्श के युग से बहुत आगे निकल चुका है. वह इस वास्तविक दुनिया की सच्चाइयों को उन लोगों के साथ खड़ा होकर भोगता और बखान करता है जो सदियों कथा-रचना के पात्र तो रहे, लेकिन उत्तम पुरुष के रूप में नहीं बल्कि अन्य पुरुष के रूप में. पिछले कुछ दशकों में उपन्यास रचना का अवलोकन वृत्त देश-दुनिया के पारंपरिक नाभिकों से हटकर उस हाशिए पर आया है जहाँ वे तमाम लोग, मुद्दे या समुदाय विद्यमान हैं जिन्हें शताब्दियों तक सभ्यता-विकास के आपाधापी भरे युगों में उपेक्षित रखा गया या कहा जाए कि निरंतर उपस्थित होते हुए भी अनुपस्थित बने रहने के लिए विवश किया गया. आज बदले हुए समय में ये लोग, मुद्दे और समुदाय अपनी उपस्थिति को जोरदार ढंग से रेखांकित कर रहे हैं और अपनी लोकतांत्रिक अस्मिता को पुन: प्रतिष्ठित कर रहे हैं. इससे साहित्य और संस्कृति की पहले से चली आ रही परिभाषाएँ और व्याख्याएँ काफी हद तक निरस्त हुई हैं या बदल गई हैं. मूल्यों को भी अब एकवचनीय केंद्र के स्थान पर बहुवचनीय हाशिए के मानवीय कोण से पुनःपारिभाषित किया जा रहा है; प्राथमिकताओं में बदलाव दृष्टिगोचर हो रहा है. 


डॉ. साहेबहुसैन जहागीरदार ने अपने प्रस्तुत ग्रंथ ‘‘इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यास : विविध विमर्श’’ में बहुत गहराई से हिंदी उपन्यास के चरित्र में आए हुए इस सकारात्मक परिवर्तन के विविध आयामों को रेखांकित किया है. उन्होंने हाशियाकृत विविध समुदायों और मुद्दों के उभार को विविध विमर्शों के रूप में पहचाना है. वे अत्यंत विस्तार से वर्तमान शताब्दी के आरंभिक डेढ़ दशक की गतिविधि और मानसिकता का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तथा देशकाल के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने वाले इक्कीसवीं सदी के उन उपन्यासों की ईमानदारी से निशानदेही करते हैं जिन्होंने विभिन्न हाशियाकृत समुदायों के अस्मिता-संघर्ष को धारदार अभिव्यक्ति प्रदान की है. इसके लिए वे विमर्श के अलग-अलग आधार निर्धारित करते हैं और दर्शाते हैं कि इस कालावधि के उपन्यासकार उत्तम पुरुष के रूप में आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, वृद्ध नागरिकों और पर्यावरण की समस्याओं साहित्य की दुनिया के केंद्र में प्रामाणिकता के साथ और प्रायः इनसाइडर के रूप में स्थापित करने में सफल रहे हैं. निस्संदेह. विमर्श के आयाम और भी हैं लेकिन या तो उनकी अन्य अनेक स्थलों पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है अतः लेखक ने उनके पिष्टपेषण से बचना चाहा है, या फिर अभी कुछ नए विमर्श क्रमशः रूपाकार ग्रहण कर रहे हैं और उनकी पड़ताल से पहले उन्हें और थोड़ा समय दिए जाने की जरूरत है. 


अंत में, मैं यह कहना आवश्यक समझता हूँ कि डॉ. साहेबहुसैन जहागीरदार स्वयं एक सक्रिय कार्यकर्ता हैं - साहित्यिक विमर्शकार से पहले. इसलिए उनका यह अध्ययन=अनुशीलन ‘रहा किनारे बैठ’ वाला नहीं बल्कि ‘गहरे पानी पैठ’ वाला है. वे केवल साक्षी-भाव से आलोचना करने वाले नहीं हैं, भोक्ता-भाव से विमर्श को जीने वाले हैं उनकी यह संलग्नता इस अध्ययन को एक विशिष्ट एवं निजी व्यक्तित्व प्रदान करती है. मुझे विश्वास है कि हिंदी जगत उनके इस वैशिष्ट्य और निजत्व को पहचानेगा और इस कृति तथा कृतिकार को प्रेमपूर्वक अपनाएगा, सराहेगा. 

शुभकामनाओं सहित ...

युगादि-2075 वि./ 18.3.2018                                                                           - ऋषभदेव शर्मा 

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, एरणाकुलम और हैदराबाद केंद्र. आवास: 208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतपुर, हैदराबाद-500013. ईमेल: rishabhadeosharma@yahoo.com

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