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बुधवार, 14 सितंबर 2016

बदलती चुनौतियाँ और हिंदी की आवश्यकता

दैनिक भास्कर, नागपुर : 14 सितंबर, 20 16 : पृष्ठ 15 

सितंबर माह आते ही हिंदी पर्व की गहमागहमी शुरू हो जाती है। हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की वकालत करने वालों से लोग लगभग बेशर्मी के साथ, नहीं तो शरारत के साथ, ये प्रश्न पूछने लगते हैं कि आज की बदलती दुनिया में आम आदमी हिंदी क्यों पढ़े? पढ़े तो कैसे पढ़े? और हिंदी आगे बढ़े तो कैसे बढ़े? ये ऐसे शाश्वत प्रश्न हैं जो कम से कम सौ साल से तो इसी तरह पूछे जा रहे हैं। लेकिन इनके उत्तर सदा एक से नहीं रहते। दुनिया बदलती है तो हमारे चारों ओर का वातावरण बदलता है, चुनौतियाँ बदलती हैं और परिणामस्वरूप उनका सामना करने की तकनीकें भी बदलती हैं। इसमें संदेह नहीं कि इन चुनौतियों के कई उत्तर भी गढ़े-गढ़ाए और शाश्वत हैं। जैसे कि, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है इसलिए सीखनी ही चाहिए अथवा कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा है इसलिए उसका व्यवहार हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन इस सच्चाई से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में कोई संविधानदत्त स्वीकृति और शक्ति प्राप्त नहीं हैं तथा राजभाषा के रूप में भी अंग्रेजी उसे नीचे गिराकर छाती पर चढ़ी बैठी है। अस्तु... 

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि तमाम परिवर्तन और विकास के बावजूद वर्तमान समय में भी शिक्षा की दृष्टि से भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अब भी हमारे देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अशिक्षित या अल्पशिक्षित है। यह अशिक्षित या अल्पशिक्षित जन मुख्य रूप से शहरों से दूर, ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है तथा प्रायः खेतीबाड़ी, छोटा-मोटा कारोबार, मजदूरी या कुटीर उद्योग से अपनी आजीविका कमाता है। इन लोगों और इनके व्यवसायों की अपनी समस्याएँ हैं। प्रायः ये लोग उन्नति के अधुनातन साधनों से या तो परिचित नहीं है या उन तक इनकी पहुँच नहीं है। परिवर्तन और विकास की धारा में यह व्यापक जन समूह तभी शामिल हो सकता है, जब इसे खेतीबाड़ी की नई पद्धतियों की जानकारी हो, नई फसलों और नए बीजों की विशेषताओं और उपलब्धता का अता-पता हो, अपनी फसल के विक्रय के लिए बाजार और उससे जुड़ी ऊँच-नीच का ज्ञान हो, अपने उत्पादों का दाम तय करने के अधिकार का अहसास हो, सरकारी योजनाओं और स्वयंसेवी संगठनों से प्राप्त हो सकने वाली सहयाता विषयक पूरे तंत्र की समझ हो। कृषि, मजदूरी, रोजगार, लघु कुटीर और मध्यम उद्योग धंधों से संबंधित सभी पक्षों का ज्ञान और आवश्यक प्रशिक्षण जब तक इस अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे साधारण जन तक नहीं पहुँचेगा, तब तक विकास को इस देश की जमीनी सच्चाई नहीं बनाया जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये समस्त सूचनाएँ और प्रशिक्षण साधारण जन को उसकी अपनी अपनी भाषा में ही दिए जाने चाहिए। कम-से-कम अंग्रेजी भाषा में तो ऐसा करना इस देश में न तो संभव है और न ही उचित। 

लगभग सौ वर्ष पहले 1918 में जब महात्मा गांधी ने हिंदी को भारतीय स्वाधीनता संग्राम की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रस्तावित और स्वीकृत किया था, तब का भी और अब का भी यही सच है कि जिस व्यापक जन गण को हमें संबोधित करना है या जिस तक तमाम तरह की प्रगति की सूचनाओं को ले जाना है या जिसे विकास की धारा में जोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाना है, उसकी अधिकांश संख्या किसी न किसी बोली के रूप में हिंदी का व्यवहार करती है या अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी का भी कार्यसाधक ज्ञान रखती है। अतः इस तमाम जनसंख्या को स्वतंत्रता के बाद के भारत की उन्नति में भागीदार बनाने के लिए हिंदी पढ़ना-पढ़ाना जरूरी है। अभिप्राय यह है कि हिंदी पढ़कर यह साधारण जन विभिन्न सूचनाओं को प्राप्त कर सकेगा, समझ सकेगा और उनका अपने तथा देश के लिए उपयोग कर सकेगा। साथ ही, अपने अधिकारों को भी वाणी प्रदान कर सकेगा जो किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी जरूरत है। 

दैनिक हिंदी मिलाप, 14 सितंबर '16 : पृष्ठ 9 
अब आप कहेंगे कि, देश के जिन हलकों में हिंदी का संप्रेषण घनत्व अपेक्षाकृत कम है, वहाँ क्या किया जाए? तो इस बारे में मेरा स्पष्ट मत है कि ये समस्त सूचनाएँ और प्रशिक्षण उन्हें उनकी अपनी भाषा में ही मिलने चाहिए। लेकिन प्रशिक्षकों को अंग्रेजी की तुलना में हिंदी के माध्यम से इस ज्ञान को अर्जित करना अधिक वांछनीय है। अर्थात केरल के किसी मछुआरे तक कोई सूचना मलयालम या उसकी बोली में ही पहुँचनी चाहिए, लेकिन इस सूचना की स्रोत भाषा इक्कीसवीं शताब्दी के भारत में अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ ही होनी चाहिए। मेरा दृढ़ मत है कि भारत के सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी विकास और तत्संबंधी ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने का काम अंग्रेजी नहीं कर सकती, क्योंकि आज भी ज्ञान के साहित्य को ग्रहण करने योग्य अंग्रेजी जाने वालों की संख्या बेहद-बेहद कम है। अतः हिंदी और भारतीय भाषाओं का वह कभी भी विकल्प नहीं बन सकती। 

हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत का गहरा रिश्ता इस बात से भी है कि भारत की संस्कृति, धर्म और इतिहास की परंपराएँ अत्यंत प्रामाणिकता के साथ इस भाषा में सुरक्षित और उपलब्ध हैं। दरअसल, अपनी सांस्कृतिक जड़ों तक पहुँचने का माध्यम या साधन किसी राष्ट्र के लिए उसकी अपनी भाषा को ही होना चाहिए। आज इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हिंदी भारत की पहचान बन चुकी है। अन्य भाषाभाषी भी भारतीय नागरिक के रूप में अपनी पहचान हिंदी के माध्यम से रेखांकित करना गौरव का विषय समझते हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी ऐसी माध्यमिक भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है जिसमें आने पर किसी भी अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान अथवा साहित्य अधिक व्यापक जनसमूह तक पहुँचने की संभावनाओं से सम्वृद्ध हो उठता है। यही कारण है कि आज तमिल और तेलुगु से लेकर असमी और मणिपुरी तक के लेखक यह कामना करते हैं कि उनकी कृतियों का अनुवाद हिंदी में उपलब्ध हो। आवश्यकता इस बात की है कि भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक पहचान को ग्रहण करने के लिए तमिलनाडु से मणिपुर तक के सारे साहित्य और ज्ञान-विज्ञान को हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। यहाँ मैं अपने अनुभव से यह भी जोड़ना चाहूँगा कि इस दिशा में बहुत सारा काम हो चुका है। यह संभव है कि भारत के बारे में हिंदी में उपलब्ध सूचनाएँ और विश्लेषण मात्रा की दृष्टि से अंग्रेजी में उपलब्ध जानकारी की तुलना में कम हो, लेकिन प्रामाणिकता की दृष्टि से वह अधिक सटीक और अधुनातन है। यदि आप अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों और उनकी सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में जानना चाहें तो पाएँगे कि अंग्रेजी में उपलब्ध अधिकतर सामग्री अब पुरानी हो चुकी है और उसकी दृष्टि भी उपनिवेशवादी है। इसकी तुलना में हिंदी में अधिक प्रामाणिक, निष्पक्ष और अद्यतन सूचनाएँ उपलब्ध हैं। यही बात अन्य क्षेत्रों और समुदायों के बारे में भी सच हो सकती है। इसलिए यदि इस विशाल राष्ट्र की बहुविध परंपराओं की तह तक पहुँचना है, तो वह भी हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही संभव है। 

अब रहा सवाल यह कि, हिंदी बढ़ेगी कैसे? तो इसके जवाब में मेरा कहना है कि बदली हुई परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ और ‘राजभाषा’ जैसी नारेबाजी से दूर रखकर, ‘भाषा’ के रूप में प्रचारित-प्रसारित किए जाने की जरूरत है – जिसे मनुष्य सूचनाओं के आदान-प्रदान, जिज्ञासाओं की शांति, आत्मा की अभिव्यक्ति और संप्रेषण की सिद्धि के निमित्त सीखा करते हैं। भावुकता और बाध्यता दोनों ही अतियाँ हैं। भाषा मनुष्य की सहज आवश्यकता के रूप में सीखी जाती है। हम इस सहज आवश्यकता का अनुभव करें-कराएँ, तो हिंदी भी सहजता से पढ़ी-पढ़ाई, सीखी-सिखाई जा सकती है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों से लेकर स्वैच्छिक हिंदी प्रचार संस्थाओं तक को चाहिए कि वे अपने घिसेपिटे रवैये को बदलें और हिंदी को अधुनातन ज्ञान की व्यावहारिक भाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करें। इसके लिए उन्हें अन्य भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलना पड़ेगा। भारत जैसे बहुभाषी समाज में यह बहुत जरूरी है कि हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाएँ साथ-साथ एक-दूसरे को समृद्ध  करते हुए अपनी संपन्नता बढ़ाएँ। 

यह भी जरूरी है कि हिंदीतर क्षेत्रों में अब तक हिंदी में जो कुछ काम हुआ है, उसका मूल्यांकन किया जाए और उसकी सार्थकता, प्रामाणिकता तथा आवश्यकता की पहचान करते हुए उसे अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान की जाए। आज जो खुली अर्थ व्यवस्था और भूमंडलीकृत बाजार हमें उपलब्ध है वह एक दोधारी तलवार की तरह है, जिसके द्वारा हम अपनी भाषाओं का विस्तार भी कर सकते हैं और, अगर जागरूक न रहें तो, अपनी भाषाओं को उपेक्षित होते और मरते भी देख सकते हैं। 

अंत में एक बात और। हिंदी की ‘पठनीयता’ और ‘पाठक संख्या’ दोनों को बढ़ाने की जरूरत है। यह अत्यंत चिंताजनक दृश्य है कि हिंदी विभागों से जुड़े हुए हमारे विद्वान प्रायः अपनी साहित्य की दुनिया के कुएँ के ही मेंढक बने रहते हैं। उन्हें साहित्येतर विषय भी पढ़ने चाहिए और पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी की भाँति विज्ञान, राजनीति, कला, अर्थशास्त्र अर्थात समस्त ज्ञान क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए अपने आपको अद्यतन रखना चाहिए और सरल, सहज, सुबोध हिंदी में इस तमाम ज्ञान को साधारण पाठक के लिए सुलभ बनाना चाहिए। पठनीयता बढ़ेगी तो पाठक स्वयं ही बढ़ेंगे। 

- ऋषभदेव शर्मा
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