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रविवार, 16 मार्च 2014

प्रयोजन प्रेरित रचनात्मक वार्तालाप शृंखला : 'साहित्यकारों के साथ संवाद'


भास्वर भारत/  मार्च 2014/ पृष्ठ 54-55.

साक्षात्कार इस अर्थ में अत्यंत रुचिकर विधा है कि उसमें वार्तालाप, संवाद और नाटकीयता जैसे पाठकों को बाँधकर रखने वाले तत्व गंभीर वैचारिकता, सिद्धांत निरूपण, बहस और खंडन-मंडन के साथ जुड़े होते हैं. साक्षात्कार के माध्यम से पाठक इसके लेने वाले और देने वाले दोनों के व्यक्तित्व, वैचारिकता, भावप्रवणता, शक्ति और दुर्बलता को पहचान सकता है. दृश्य माध्यमों ने इसे और भी लोकप्रियता और जीवंतता प्रदान की है. इस रोचक विधा के लिए साक्षात्कार लेने वाले की जितनी अच्छी तैयारी होगी वह जितना अधीत और प्रत्युत्पन्नमति होगा, साक्षात्कारदाता के मानस को उतनी ही गहराई से मथ कर सुविचार के मोती निकाल लाएगा. इसके विपरीत यदि गोताखोर ही डूबने से डरेगा तो किनारे बैठकर लहरें भर गिनता रहेगा और साक्षात्कार उतना ही उथला रह जाएगा. कहने का अभिप्राय यह है कि कोई इस विधा को बच्चों का खेल न समझे. यह बहुत तैयारी माँगने वाली विधा है – बाद में प्रस्तुतीकरण के स्तर पर भी परिश्रम चाहती है, सृजनात्मकता भी. 

साक्षात्कार को ‘प्रयोजन प्रेरित रचनात्मक वार्तालाप’ मानने वाले डॉ. त्रिभुवन राय इसकी सार्थकता ‘वृहत्तर पाठक समुदाय’ तक पहुँचने में मानते हैं तथा इसी संकल्पना के तहत उन्होंने समय समय पर लिए गए साहित्यकारों के साक्षात्कार ‘साहित्यकारों के साथ संवाद’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रस्तुत किए हैं. स्मरणीय है कि डॉ. त्रिभुवन राय समीक्षा के क्षेत्र में भारतीय और पाश्चात्य चिंतन के समन्वय की दिशा में क्रियाशील, संतुलित दृष्टि संपन्न, विचारशील सहृदय समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं. उनकी समीक्षात्मक कृतियों में - मनुष्य के रूप : अध्ययन की दिशाएँ, ध्वनि सिद्धांत और हिंदी के प्रमुख आचार्य, भारतीय समीक्षा सिद्धांत और हिंदी समीक्षक, ध्वन्यालोक और आनंदवर्धन, ध्वनि सिद्धांत : प्रतिपक्ष और विकास, इन्होंने कहा–1, काव्य चिंतन : विविध आयाम, समकालीन काव्यबोध आदि के साथ विवेच्य कृति शामिल है. 

आचार्य त्रिभुवन राय ने अपने साहित्य, शोध और पत्रकारिता के लंबे अनुभव के दौरान अनेक विभूतियों से प्रयोजन-प्रेरित रचनात्मक वार्तालाप किया है. उसी में से यहाँ आठ विभूतियों के नौ साक्षात्कार संकलित है. इस ग्रंथ की महत्ता इन विभूतियों के नामोल्लेख मात्र से ही सिद्ध हो जाती है – यशपाल, इस्मत चुगताई, डॉ. महावीर अधिकारी, डॉ. आनंद प्रकाश जैन, डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित, विवेकी राय, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय और डॉ. रामविलास शर्मा. 

साक्षात्कारों की विषय वस्तु के संबंध में ‘पूर्व संवाद’ में जो बातें कही गई हैं ये उन पर पूरी तरह सटीक उतरते हैं. यथा – (1) साहित्य-समीक्षा के ज्वलंत संदर्भों पर सोचने के लिए विवश करने वाली स्थितियाँ तो यहाँ साक्षात्कृत हुई ही हैं, समसामयिक परिवेश के तीखे सच भी उजागर हुए हैं. (2) नारी-मुक्ति आंदोलन से लेकर सेक्स, प्रेम-विवाह, शिक्षा का मौजूद सच, लेखक और भाषा के रिश्ते, तथ्याभासी छद्म और सच्चे साहित्य को अलग करने वाले तत्वों के साथ वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते दबाव के सम्मुख साहित्य के सिकुड़ते संसार पर यहाँ बेबाक चर्चा हुई है. (3) साहित्य-समीक्षा एवं विचारधारा के संदर्भ में समकालीनता और शाश्वतता, स्वायत्तता, संबद्धता और उत्तर आधुनिकता जैसी प्रवृत्तियों के भीतर पैठकर उनकी परिणतियों को आकलित करने का सफल प्रयास भी यहाँ द्रष्टव्य है.

संस्मरण और प्रश्नोत्तर मिश्रित शैली में रचित इन साक्षात्कारों में आरंभ में संबंधित विभूति का संक्षिप्त वृत्त दिया गया है. आलेखों में यथावसर परिवेश, प्रयोजन और परिस्थितियों का संकेत इन्हें किंचित कथात्मकता भी प्रदान करता है. बीच बीच में डॉ. राय ने अपनी राय भी दर्ज की है - स्वगत कथनों के रूप में. पहला आलेख ‘साहित्य में मानवीय उद्देश्य ही प्रधान होता है’ यशपाल का 27 मई 1972 का साक्षात्कार है जो कुछ कुछ संस्मरण और रेखाचित्र की तरह आरंभ होता है. कलम से चित्र बनाने की डॉ. राय की कला यहाँ दिखाई देती है – ‘लकदक सफ़ेद कुर्ता-पाजामा में मझले कद का दुबला-पतला गेहुआँ रंग का एक ऐसा व्यक्ति, जीवन की उनहत्तर गर्मियों की तपन भी जिसके चेहरे की चमक और रौब को कम नहीं कर पाई है. प्रशस्त कसा हुआ कपाल, उभरी हुई ठोड़ी, नुकीली नाक, गहरी आँख पर सघन-सफ़ेद भौहें. चेहरे पर एक प्रकार की तटस्थता.’ बिलकुल सीधे सवाल. एकदम सटीक जवाब. 

दूसरा साक्षात्कार इस्मत चुगताई का है. गंभीर चर्चा के बीच डॉ. राय हलके-फुलके सवाल भी पूछते चलते हैं जिनके जवाब में कई रोचक जानकारियाँ मिल जाती हैं. जैसे, इस्मत आपा बताती हैं – मैं अपने पलंग पर लेटकर लिखना पसंद करती हूँ और अक्सर रात को लिखना शुरू करके सुबह समाप्त करती हूँ. स्त्री-पुरुष संबंध पर उनकी राय है कि विवाह को मैं जरूरी नहीं मानती और कि विवाह संस्था असल में आर्थिक सुरक्षा के लोभ का नतीजा है. अंतिम अनुच्छेद में साक्षात्कारकर्ता का यह मंतव्य द्रष्टव्य है कि यह महिला क्या इतनी बोल्ड इसलिए है कि बचपन से ही इसमें यह जिद रही है कि वह औरत तो क्या मर्दों से किसी माने में कम नहीं है. 

डॉ. महावीर अधिकारी से राजनीति और साहित्य के संबंधों और जीवन मूल्यों पर केंद्रित चर्चा है. सौंदर्यसृष्टि विषयक प्रश्न के उत्तर में डॉ. अधिकारी कहते हैं – साहित्य में ऐसे सौंदर्य की सृष्टि होनी चाहिए जो आत्मा में रम जाए और उस पर जमे हुए मैल को धो डाले. वे आधुनिक जीवन में व्याप्त स्वार्थपरता और झूठ से विचलित दिखाई देते हैं – ‘अपने हित को प्राथमिकता देना, आज बुद्धिमता का परिचायक माना जा रहा है. मैंने लेखक, कवि, कलाकार, घर के बुजुर्गों, नेता, शिक्षक और धर्मधुरीणों तक को झूठ बोलते देखा और सुना है. ऐसा आचरण तो घोर पतनशीलता का द्योतक है. बेबस, बेसहारा लोगों की तरफ देखने पर तो दोगुना दुःख होता है. वे सत्य पर आरूढ़ रहना चाहते हैं, परंतु उनकी कोई सराहना नहीं होती. लोग निजी लाभ के लिए पार्टियाँ बदलते हैं, विचार भी बदल देते हैं. कौन क्या है, पता ही नहीं लगता! आज के आदमी की आधी शक्ति झूठ के जंगल से बचने में ही खर्च हो जाती है.’

‘दायित्व प्रतिबद्धता की उपज है’ - यह आनंद प्रकाश जैन के साक्षात्कार का केंद्रीयबिंदु भी है और शीर्षक भी. लेखक के लिए आवश्यक गुणों से संबंधित सवाल का जवाब चिंतन करने योग्य है – सबसे बड़ी आवश्यकता आत्मविश्वास और निर्भयता की है तथा ईमानदार निर्भयता साहित्यकार का श्रेष्ठ गुण है. इस साक्षात्कार से प्राप्त होने वाली यह जानकारी चौंकाने वाली लग सकती है कि आनंद प्रकाश जैन ने चंदर के छद्म नाम से – कथित रूप से अपनी सहचरी के सहयोग से लगभग 70-80 उपन्यास लिखे और वे पॉकेट बुक्स में प्रकाशित हुए. 

वरिष्ठ समीक्षक डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित का साक्षात्कार आलोचना पर केंद्रित है. उनकी स्थापना है कि आलोचना एक प्रकार का संवाद है : रचनाकार और उसके आलोचक के बीच. जहाँ तक विचारधारा का प्रश्न है उसका स्थूल और साग्रह प्रयोग न रचना के लिए हितकर है और न आलोचना के लिए. उन्होंने आज के काव्य साहित्य की सबसे बड़ी दुर्बलता के रूप में ‘किसी विराट सोच का अभाव’ को रेखांकित किया है. 

छठा साक्षात्कार विरल ग्रामगंधी चेतना के समर्पित साहित्यकार विवेकी राय का है जो लेखकीय निष्ठा को ही संतुष्टि का स्रोत मानते हैं. उन्होंने यह विचार व्यक्त किया है कि साहित्य और जीवन मूल्यों का अन्योन्याश्रित संबंध है तथा युगीन दबावों से मुक्ति की चुनौती ही आज के सर्जक के सामने प्रमुख चुनौती है. 

‘लेखन आत्महनन है’ - यह शीर्षक है डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के साक्षात्कार का. वे आलोचक से यह अपेक्षा रखते हैं कि इस राजनैतिक युग में वह विचारधारात्मक संघर्ष करे ताकि वर्ग-वर्ण हीन समाज की रचना के समर्थक और शत्रु साहित्य को पृथक कर सके. वे इस विषय पर भी चिंता प्रकट करते हैं कि आज संचार माध्यमों द्वारा उत्तर आधुनिक कला में प्रपंच या छल का आधिपत्य स्थापित किया जा रहा है तथा व्यक्ति की छवि या इमेज व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है – छल ही बल है और छल ही सत्य!

अंत में दो साक्षात्कार डॉ. रामविलास शर्मा के हैं – ‘देश का दूरगामी भविष्य उज्ज्वल है’ तथा ‘बदलाव के लिए बहुत बड़ी क्रांति की जरूरत होगी’. ऋग्वेद, भारतीय सौंदर्यबोध, मनुस्मृति, शिव, कृष्ण, कौटिल्य, भरत मुनि और गांधी से लेकर परमाणु विस्फोट, उदारीकरण और भाषानीति जैसे अनेक विषयों पर व्यापक चर्चा. 

कुल मिलाकर, रोचक, पठनीय, मननीय एवं संग्रहणीय ग्रंथ.   
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 साहित्यकारों के साथ संवाद/ 
डॉ. त्रिभुवन राय/
राज पब्लिशिंग हाउस, जयपुर/ 
2012/ 
पृष्ठ – 159/ 
मूल्य – रु. 695/- 


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