समर्थक

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

नेट की तैयारी : ज़रूरी बातें

उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद : द्विदिवसीय कार्यशाला - दूसरा दिन : ऋषभदेव शर्मा  # 25 फरवरी,2016

 +++++++++++++++++++++++++++++++++++++
-         अर्हता : एम ए – 55% - 28 वर्ष [जे आर एफ]
-         83 विषय – 88 केंद्र – 3 प्रश्नपत्र  - बहुविकल्पी वस्तुनिष्ठ
-         द्वितीय – 100 अंक – 50 x 2 – 1 ½ घंटे
-         तृतीय – १५० अंक – 75 x 2 – 2 ½ घंटे-         NO NEGATIVE MARKING.
 ++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++ 1.         3-4 महीने पहले से तैयारी करें.2.        तृतीय सत्र से ही....3.       नेट के निर्धारित पाठ्यक्रम को परीक्षक की दृष्टि से पढ़ें.4.       पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र/ अभ्यास मालाएं/ MOCK टेस्ट्स – अधिकाधिक ...5.       रटने/उगलने की अपेक्षा अवधारणाओं/ संकल्पनाओं को समझें.6.       पाठ्यक्रम को बहुविकल्पी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के निर्माण की संभावना की दृष्टि से पढ़ें.7.       सतत अभ्यास द्वारा उत्तर देने की अपनी गति सुधारते रहें,8.       और...और...पढ़ें. मुख्य बिंदु नोट करें. सरलता से दोहराने का मानसिक अभ्यास करें. तथ्यों को वर्गीकृत करें.9.       विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करें.
10.    अपनी याददाश्त और एकाग्रता को बढाएं –                                 i.            दोहराएं  :  स्मृति – 24 घंटे में 18% और 1 महीने में 5% शेष.                                ii.            पढने और दोहराने की गति बढाएं.
                              iii.            थकने पर केवल 3 मिनट का विश्राम.
                              iv.            तथ्यों के अंतर्संबंध पहचानकर काल्पनिक चित्र/कथा बनाएं.                               v.            शृंखलाबद्ध करें [ लर्निंग सेक़ुएन्केस].                              vi.            आत्मनिरीक्षण करके अपनी आदतें बदलें.                            vii.            प्रतिदिन कम से कम 6 घंटे स्वाध्याय करें.                           viii.            निरंतरता बनाए रखें.                              ix.            सकारात्मक रहें.-           

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

हिंदी अनुसंधान की नई दिशाएँ


उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद :
कार्यशाला : 18 फरवरी, 2016 :
-----------------------------------------------------------------------------------------  ऋषभदेव शर्मा
1.        परंपरागत दिशाएँ
-    साहित्यकार
-    साहित्यिक कृति
-    साहित्येतिहास : काल
-    साहित्यिक प्रवृत्ति
-    विचारधारा
-    भाषाविज्ञान

2.       परंपरागत शोध-दृष्टियाँ
-    काव्यशास्त्रीय : भारतीय, पाश्चात्य
-    समाजशास्त्रीय
-    ऐतिहासिक
-    मार्क्सवादी
-    मनोविश्लेषणवादी
-    शैलीवैज्ञानिक
-    रूपवादी
-    सौन्दर्यशास्त्रीय
-    मिथकीय

3.       नई शोध-दृष्टियाँ
-    तुलनात्मक अध्ययन : आधुनिक परिप्रेक्ष्य
-    लोक अध्ययन
-    स्त्री विमर्श
-    दलित विमर्श
-    आदिवासी विमर्श
-    अल्पसंख्यक विमर्श
-    पर्यावरण विमर्श
-    वृद्धावस्था विमर्श
-    किन्नर विमर्श

4.       नए शोध-क्षेत्र
-    हिंदी शिक्षण
-    अनुवाद समीक्षा : अनुवाद तुलना
-    प्रतीकांतरण : कथा/ नाट्य
-    राजभाषा क्रियान्वयन
-    पत्रकारिता : सम्पादकीय से विज्ञापन तक
-    टेलिविजन : समाचार से धारावाहिक तक : वस्तु से वास्तु तक 
-    फिल्म : रूपांतरण से उत्तर आधुनिकता तक : पटकथा/ संवाद/ गीत/ प्रतिपाद्य
-    प्रवासी साहित्य : डायस्पोरा / बहिर्गमन / विस्थापन : सांस्कृतिक संदर्भ   
-    लोक साहित्य : संरक्षण/ विवेचन
-    लुप्तप्राय भाषाएँ


शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

नया / सोशल मीडिया : साहित्यिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य






[पुस्तक समीक्षा : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा] ‘कविता के पक्ष में’ प्रबल दावेदारी

कविता के पक्ष में 
ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा
आईएसबीएन - 9788179652596 
2016
तक्षशिला प्रकाशन,
98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, 
नई दिल्ली - 110002 
376 पृष्ठ, सजिल्द
750 रुपए
साहित्य को जीवन के लिए समर्पित और मनुष्यता के लिए प्रतिबद्ध सचेतन सामाजिक क्रियाकलाप मानने वाले विद्वानों की मान्यता रही है कि साहित्य जनचेतना को जगाने का सबसे प्रबल माध्यम है और कविता उसकी सबसे अधिक व्यंजनापूर्ण तथा कलात्मक अभिव्यक्ति है. भाषा की सृजनात्मकता का चरम उत्कर्ष कविता में दिखाई देता है. अनुभव और भाषा के अद्वैत से अर्थ और शब्द का वह सह-संबंध विकसित होता है जिसे रमणीय, मार्मिक तथा रसात्मक कहा गया है. हिंदी कविता ने हजार वर्षों से अधिक के अपने इतिहास में अनुभव और भाषा के इस अद्वैत के अनेक पक्षों का साक्षात्कार किया है. यही कारण है कि साहित्य का इतिहास लिखने वाले और विभिन्न रचनाओं व रचनाकारों की समीक्षा लिखने वाले विद्वानों की रुचि का पहला और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र कविता का क्षेत्र रहा है. 

उन्नीसवीं शताब्दी में जब आधुनिकता का दौर अपने उफान पर था, यह कहा गया कि विज्ञान और तर्क के केंद्रीय हो जाने के कारण अब ईश्वर और धर्म अप्रासंगिक हो गए हैं क्योंकि ये दोनों आस्था और अंधविश्वास पर टिके हुए हैं. यही कारण है कि आगे चलकर ईश्वर की मृत्यु भी घोषित कर दी गई. इसी के साथ यथार्थवादियों ने यह भी कहना शुरू किया कि आदर्श और भावुकता पर टिकी होने के कारण कविता भी अप्रासंगिक हो गई है. चलते-चलते बात यहाँ तक पहुँची कि उत्तर-आधुनिक विमर्शों के उदय के ठीक पहले इतिहास और वृत्तांत से लेकर उपन्यास और कविता तक की मृत्यु घोषित कर दी गई. अपनी-अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करने और अपनी-अपनी सत्ता स्थापित करने की होड़ में संस्कृति, इतिहास, सभ्यता, साहित्य – सबका विखंडन कुछ इस तरह किया जाने लगा मानो सब ओर मनमानी व्याख्याओं से उपजी अराजकता फैली हुई हो. ऐसे समय में हिंदी कविता की यात्रा के बहाने कविता के पक्ष में बात करना इसलिए महत्वपूर्ण प्रतीत होता है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता ने मिलकर जिस पारंपरिक मूल्य व्यवस्था को ध्वस्त किया है उससे उत्पन्न शून्य को भरने के लिए ये दोनों ही कोई समग्र मूल्य व्यवस्था नहीं दे सकीं. आधुनिकता ने ‘व्यक्ति’ और उत्तर-आधुनिकता ने ‘तृष्णा’ के सहारे इस शून्य को भरना चाहा परंतु न तो व्यक्ति कोई मूल्य है और न तृष्णा ही कोई मूल्य है जिसके सहारे पृथ्वीग्रह पर पाई जाने वाली ‘मनुष्य’ नामक प्रजाति की रक्षा की जा सके. मनुष्यता की सुरक्षा चट्टान के रूप में इसीलिए कल भी कविता खड़ी थी और आज भी कविता खड़ी है. 

ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा की समीक्षा-कृति ‘कविता के पक्ष में’ (2016) का प्रस्थान बिंदु यही है कि अनेक उतार चढ़ावों से भरी होने के बावजूद कविता हर काल में मानवता की सुरक्षा चट्टान बनकर जीवन मूल्यों की रक्षा करती रही है. लेखक-द्वय ने कविता के लोकतांत्रिक दायित्व के रूप में जिन प्रयोजनों को बार-बार रेखांकित किया है वे हैं – युग जीवन को अपने में समेटना, समय के सत्य को पकड़ना, मनुष्य को बिना किसी लागलपेट के संबोधित करना, प्रकाश और उष्णता की संघर्षशील संस्कृति की स्थापना करना और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दायित्व बोध का विकास करके क्रांति की भूमिका तैयार करना. यह पुस्तक इस तथ्य को भलीप्रकार स्थापित करती है कि तमाम तरह की मृत्यु-घोषणाओं के बावजूद आज भी कविता मनुष्यता की मातृभाषा है और उसके सौंदर्यबोध को परिष्कृत तथा मनोवृत्तियों को उदात्त बनाने का सामर्थ्य रखती हैं. 

दस खंडों में विभाजित इस समीक्षा-कृति का केंद्रीय विचार यह है कि हिंदी कविता ने कभी अपने चरम लक्ष्य अर्थात मनुष्य को दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया, उसकी कालजयी प्रासंगिकता के पक्ष में यही सबसे बड़ा तर्क है. यह स्थापना अत्यंत रोचक प्रतीत होती है कि समूचे मध्यकाल ही नहीं आधुनिक काल के उदय तक की प्रवृत्तियों के सूत्र हिंदी कविता के आदिकाल में निहित हैं. नाथ-सिद्ध साहित्य को इस कृति में कबीर का पूर्वज माना गया है, तो विद्यापति को परमप्रेमरूपा भक्ति के और काम भाव तथा शरीर सौंदर्य को उत्सव बनाने वाले शृंगार काव्य के मूलबिंदु के रूप में देखा गया है. चंदबरदाई इतिहास और लोक को जोड़ने के कारण जहाँ एक ओर चरित कवियों और प्रेमाख्यानकारों के पूर्वज प्रतीत होते हैं, वहीं वे हिंदी शृंगार काव्य के भी आदिकवि दीखते हैं. अमीर खुसरो तो खड़ीबोली के पहले कवि हैं ही. इस तरह आदिकाल की कविता से जो अलग-अलग धाराएँ बहीं, वे आधुनिक कला तक भी सूखती नहीं हैं. अर्थात हिंदी कविता का जो विशाल वटवृक्ष आज हमारे सामने है उसका मूल आदिकाल रूपी स्वस्थ बीज में से फूटा है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अध्ययन की सुविधा के लिए भले ही हम कविता की यात्रा को कालखंडों में बाँट लेते हों, तथापि वह ऐसा निरंतर और सतत प्रवाह है जिसमें विभिन्न युगों, प्रवृत्तियों, वादों, आंदोलनों और विमर्शों के आरोह-अवरोह, मोड़, लहरें और वर्तुल आते-जाते रहते हैं. ‘गगन मंडल में ऊँधा कूवा’ इस सतत प्रवाह के मूल स्रोत का प्रतीक है. 

‘सुरसरि सम सब कहँ हित कोई’ शीर्षक खंड में कबीर, नानक, जायसी, सूरदास, तुलसीदास, मीराँ और रहीम के काव्य में निहित मानवीय मूल्यों और साधारणता को रेखांकित किया गया है. कबीर की कविता में पाए जाने वाली आक्रामक मुद्रा की व्याख्या करते हुए कहा गया है, “कबीर की राह अक्खड़पने की वह राह है जो मीठे जल की बावड़ी तक जाती है. उसमें मखमल की मसृणता नहीं है, टाट का खुरदरापन है; और यह खुरदरा टाट ही अपने कठोर रेशों की रगड़ से समाज की गंदगी को साफ करता है.” (कविता के पक्ष में, पृ. 51). भदेसता और तद्भवता की अपरिहार्यता स्वीकार करते हुए लेखकद्वय ने आगे कहा है, “यदि कल का कबीर जुलाहा था जिसने ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ को सुरक्षित रखने का मर्म जाना था तो आने वाले कल का कबीर सफाई कर्मचारी भी हो सकता है जो बद से बदतर होती जा रही आज की दुनिया को जीने योग्य – खूबसूरत और बेहतर – बना सके.” (वही, पृ. 51-52). कहना न होगा कि इस बिंदु पर कबीर बानी सहज ही आज के दलित विमर्श से जुड़ जाती है. इस खंड का नानक विषयक निबंध (खुरासान खसमाना कीआ हिंदुस्तान डराइआ) विशेष रूप से द्रष्टव्य है. इसमें उल्लेख किया गया है कि संत कवि नानक ने तत्कालीन राजनैतिक उथल-पुथल और अराजकता का स्पष्ट वर्णन किया है जबकि कबीर से लेकर तुलसी तक भक्ति काल के प्रायः अन्य सभी प्रमुख कवि ऐसे अवसरों पर संकेत से काम लेते हैं. इसी प्रकार सूरदास विषयक निबंध गंवई संस्कार की व्याख्या के कारण ध्यान खींचते हैं. 

‘ज्यों नावक के तीर’ शीर्षक तीसरे खंड में बिहारी और गुरु गोबिंद सिंह के काव्य पर चर्चा है. बिहारी तो भारतीय नागर सौंदर्यबोध और शृंगारिक काव्यभाषा के प्रतिनिधि रचनाकार हैं ही, गुरु गोबिंद सिंह योद्धा कवि हैं. “वे शक्ति के उपासक हैं और युद्ध के प्रेमी. धर्मयुद्ध की चाह के अतिरिक्त कोई वासना उन्हें छूती भी नहीं है. धर्मयुद्ध चाहे मनुष्य के भीतर लड़ा जाए धर्मक्षेत्र में, या बाहर लड़ा जाए कुरुक्षेत्र में, शांति और न्याय के लिए लड़ा जाता है. जब शांति के सारे प्रयास विफल हो रहे हों और आतंक के शिकार देश को बार-बार संयम का पाठ पढ़ाया जा रहा हो, तब गुरु गोबिंद सिंह सचमुच प्रासंगिक लगते हैं.” (वही, पृ.108). 

इस प्रकार 375 पृष्ठों की पुस्तक ‘कविता के पक्ष में’ के 112 पृष्ठ आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल को समर्पित है. इनके दुगने से अधिक पृष्ठ आधुनिक कविता के नाम किए गए. इसका अभिप्राय यह है कि यह पुस्तक आधुनिक कविता की प्रासंगिकता को रेखांकित करने पर विशेष बल देती है. पुस्तक की समीक्षा-दृष्टि और इतिहास चेतना को आगे के खंडों के शीर्षकों से ही समझा जा सकता है. भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और बालकृष्ण शर्मा नवीन को समर्पित चौथे खंड का शीर्षक है ‘हम कौन थे, क्या हो गए’ जो इन कवियों की राष्ट्रीय चेतना की ओर संकेत करता है. पुस्तक के पाँचवे खंड में छायावादी और उत्तर छायावादी काव्य की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना और मानवतावादी विश्वदृष्टि को दृष्टिपथ में रखा गया है. इसका शीर्षक ‘बीती विभावरी जाग री’ गांधी युग की व्यापक जनजागृति का द्योतक है. प्रगतिवादी कवियों में दिनकर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के काव्य की मीमांसा करने वाले खंड छह का शीर्षक ‘कलम देश की बड़ी शक्ति है’ स्पष्ट ही अपनी विषय वस्तु के अनुरूप है. परिवर्तित युगबोध, नए मनुष्य की केंद्रीयता तथा सहज भाषा को नई व्यंजनाओं से अभिमंडित करने की चाह वाले नवकाव्य की मीमांसा ‘भेद खोलेगी बात ही’ शीर्षक सातवें खंड में की गई है. यहाँ शमशेर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह पर चर्चा की गई. इस खंड का शमशेर विषयक निबंध ‘लेकिन बहुत सादा साँवलापन’ इस दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट है कि इसमें रंग शब्दों की विवेचना के माध्यम से विवेच्य कवि का सर्वथा मौलिक पुनर्पाठ प्रस्तुत किया गया है. छठे खंड में नागार्जुन (मेरी भी आभा है इसमें) और केदारनाथ अग्रवाल (काश मैं भी फूलता मेरे भाई अनार) की विवेचना भी इसी दृष्टि से की गई है. अतः यह कहा जा सकता है कि रंग शब्दावली के व्यवहार विषयक समाजभाषिक कसौटी का इन निबंधों में नई आलोचना दृष्टि के रूप में सफल प्रस्ताव और निदर्शन किया गया है. 

पुस्तक के आठवें खंड ‘भाषा में आदमी होने की तमीज’ में राजकमल चौधरी, धूमिल, श्रीकांत वर्मा और दुष्यंत कुमार के बहाने काव्य-वस्तु और काव्यभाषा के बदलाव की विवेचना की गई है. पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में बड़ी ललक से कविता के जनता की ओर बढ़ने और जनपक्षीय तेवर अख्तियार करने की प्रवृत्ति को इस पुस्तक के ‘आप से क्या कुछ छिपाएँ’ शीर्षक खंड-नौ में उभारा गया है. राजेश जोशी, देवराज और अरुण कमल अपने अपने ढंग से इस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं. दसवें खंड का संबंध विमर्शों से है जो हाशियाकृत समुदायों की अभिव्यक्ति को समर्पित है. साहित्य के बड़े केंद्रों से दूर कस्बाई जन-कविता के धारदार तेवर को जगदीश सुधाकर, स्त्री कविता की संयत मुखरता को अनामिका, दलित कविता की असहमत मुद्रा को ओमप्रकाश वाल्मीकि और जनजातीय अभिव्यक्ति के स्त्री पक्ष को निर्मला पुतुल के माध्यम से विवेचित करने वाले इस खंड का शीर्षक ‘हम भी मुँह में जबान रखते हैं’ पर्याप्त व्यंजनापूर्ण है. 

इस पुस्तक की समस्त सामग्री पारदर्शी और पठनीय है. इसकी सुबोधता का एक आधार तो यह है कि यह सामग्री मूलतः समय-समय पर कविता केंद्रित विभिन्न पत्रिकाओं के लिए लिखी गई होने के कारण पाठकोन्मुख है. दूसरा कारण है लेखकद्वय की साफसुथरी इतिहास-दृष्टि और समीक्षा-दृष्टि जिसका फोकस सदा पाठ पर रहता है – किसी सिद्धांत, विचारधारा या वाद विशेष पर नहीं. यही कारण है कि इस पुस्तक में विभिन्न कवियों और उनकी कविता संबंधी निष्पत्तियाँ कृति आधारित हैं. उदाहरणार्थ –

© गोरखनाथ : उनके द्वारा प्रवर्तित योगमार्ग ने भक्ति आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया. (वही, पृ.15). 

© अमीर खुसरो : अपने गीतों में अमीर खुसरो ने लौकिक अनुभवों और आध्यात्मिक अनुभवों को इस तरह पिरोया है कि वे आज भी लोक के कंठहार बने हुए हैं. (वही, पृ. 26).

© विद्यापति : भक्ति और शृंगार का समन्वय करने वाले इन पदों में वस्तुतः कवि ने इन दोनों के बीच की विभाजक रेखा को मिटा दिया है. (वही, पृ. 29)

© जायसी : जायसी की अलौकिक प्रेम-पीर ही उनके काव्य के कथानक की लौकिक प्रेम-पीर में अभिव्यक्त हो उठी है क्योंकि सूफी मत के मानने वाले जायसी संस्कार के कण-कण में अपने प्रेममय प्रभु की सत्ता का अनुभव करते हैं. (वही, पृ. 64).

© सूरदास : राजनीति मनुष्य को लंपट बना देती है. ‘भ्रमरगीत’ का भंवरा इस नगरीय लंपटता का भी प्रतीक है. (वही, पृ. 67).

© तुलसी : तुलसी का सारा जीवन राम के प्रति अनन्य प्रेम द्वारा जीवन और जगत के सब पाप, ताप और कलुष के परिमार्जन की गाथा है. (वही, पृ. 78).

© मीराँ : वस्तुतः मीराँ पूर्ण समर्पण भाव, अकुंठ प्रेम, रूढ़ीभंजन और विद्रोही चेतना के प्रतीक के रूप में भारतीय जन-मन में बसी एक लोकगायिका हैं. (वही, पृ. 99).

© रहीम : काव्य-भाषा के स्तर पर भी कवि (रहीम) ने भारतीय संस्कृति की सामासिकता को साधने का प्रयास किया. उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों की भाषाओं से चयन करके अपने पदों में ऐसी काव्य-भाषा का गठन किया है जिसमें भारतीय लोक अपने इंद्रधनुषी रंग में रंगा दिखाई देता है. (वही, पृ. 102). 

© भारतेंदु हरिश्चंद्र : इस (भारतेंदु) मंडल ने हिंदी साहित्य को अनेक रूढ़ियों से मुक्त किया और अभिव्यंजना के नए तरीके ईजाद किए. इनमें एक प्रमुख तरीका है : हास्य-व्यंग्य के सहारे राष्ट्रीय रोष और वेदना को व्यक्त करना. (वही, पृ. 119).

© जयशंकर प्रसाद : प्रसाद जी ने ‘कामायनी’ के प्रथम सर्ग में यह जताया है कि देव संस्कृति अपने अंतर्विरोधों के कारण नष्ट हो गई और मनुष्य संस्कृति अपनी भीतरी ताकत के दम पर उसके बाद खड़ी हुई. दरअसल यह पुराने भारत की राख में से नए भारत के जी उठने का प्रतीकात्मक आख्यान है. (वही, पृ. 136). 

© निराला : निराला की महाप्राणता का स्रोत वसंत की अनंतता के प्रति उनके परम-विश्वास में निहित है. (वही, पृ. 162). 

© महादेवी : महादेवी वर्मा का संपूर्ण साहित्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित है. उनके गीतों में भारत के जातीय साहित्य की परंपराओं की ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं. (वही, पृ. 184).

© बच्चन : सच ही भीतरी बेचैनी की ज्वाला मदिरा की ज्वाला से बड़ी है. बच्चन ने इस आग को ही आनंद बना दिया. (वही, पृ. 210).

© नागार्जुन : रंग-प्रयोग की दृष्टि से नागार्जुन की कविताओं का अध्ययन करते समय सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला तथ्य यह है कि नागार्जुन ने काले और सफेद रंग के शाश्वत विरोध को पुनः-पुनः चित्रित किया है. अंधकार और प्रकाश का यह द्वंद्व असत् और सत् का द्वंद्व है, अन्याय और न्याय का द्वंद्व है, मृत्यु और जीवन का द्वंद्व है. (वही, पृ. 227).

© अज्ञेय : वाल्मीकि और बुद्ध के इस प्रदेय को अज्ञेय ‘आत्मदान’ के रूप में आधुनिक कविता में पुनराविष्कृत करते हैं. (वही, पृ. 276).

© मुक्तिबोध : ‘अंधेरे में’ फैंटसी पर आधारित, लंबी कविता है. यह आधुनिक राग के मनुष्य, विशेषकर मध्यवर्गीय व्यक्ति के इच्छा, ज्ञान और क्रिया के सामाजिक और राजनैतिक अंतर्द्वंद्व की गाथा है. (वही, पृ. 280). 

© रघुवीर सहाय : सत्ता का यह वधिक चरित्र रघुवीर सहाय की कविता में बार-बार उभरकर आता है. (वही, पृ. 294).

© डॉ. केदारनाथ सिंह : स्वतंत्रता के पक्षधर कवि केदारनाथ सिंह को प्रतिबंध स्वीकार नहीं. वे मनुष्य की ही स्वतंत्रता की बात नहीं करते बल्कि प्रकृति की हर चीज की स्वतंत्रता की बात करते हैं. (वही, पृ. 304).

© धूमिल : हमारी दृढ़ मान्यता है कि धूमिल ‘शब्द’ के प्रयोक्ता भर नहीं थे बल्कि शब्दार्थ के मर्म को पहचानने वाले ऐसे काव्यशास्त्री थे जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से बीसवीं सदी के अंतिम दशक और उत्तरवर्ती कविता का काव्यशास्त्र रचा. (वही, पृ. 321).

© देवराज : पृथ्वीग्रह और मनुष्य जाति के भविष्य के प्रति चिंतित कवि प्रतिरोध और जूझ का सक्रिय पाठ निर्मित करता है और सुखद संसार के स्वप्न देखता है. (वही, पृ. 340). 

© जगदीश सुधाकर : जगदीश सुधाकर जनता के कवि इसलिए हैं कि वे जनता की बात कहते हैं और बिना लागलपेट के कहते हैं. उनकी पीड़ा वास्तव में भारतीय जन गण की पीड़ा है. (वही, पृ. 354).

© निर्मला पुतुल : आदिवासी जीवन के चित्रण को पूर्ण प्रामाणिकता प्रदान करते हुए निर्मला पुतुल ने आदिवासी स्त्रियों की दशा और मानसिकता को भी अपनी कविता में पूरा स्थान दिया है. उनकी कविताओं में संताली सभ्यता और संस्कार की गंध सर्वत्र व्याप्त है. उनमें इस बात का निर्भीकतापूर्वक खुलासा किया गया है कि किस प्रकार सत्ता का चाबुक पददलित पर, खासकर औरतों पर, प्रहार करता है और उनके भीतर इन प्रहारों से मुक्ति पाने की तड़प तथा बेचैनी जाग उठती है. (वही, पृ. 372).

अंततः, आदिकाल से लेकर आज तक की हिंदी कविता के ऊर्जा-बिंदुओं की साफ़-साफ़ पहचान कराने में समर्थ कृति ‘कविता के पक्ष में’ पर केंद्रित इस समस्त विचार-विमर्श से यह स्पष्ट होता है कि हिंदी कविता के हजार वर्षों से अधिक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसकी प्राणधारा सूख गई हो तथा यह कि काव्यप्रवाह की इस जीवंतता का स्रोत कविता की लोकानुरक्ति और जीवनासक्ति में निहित है. 

- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
सह-संपादक ‘स्रवंति'
प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद – 500 004
ईमेल – neerajagkonda@gmail.com












[पुस्तक समीक्षा : डॉ. अर्पणा दीप्ति] 'कविता के पक्ष में' बहस और गवाही

हिन्दी कविता का इतिहास कम से कम एक हजार वर्ष या उससे कुछ अधिक पुराना है| वर्त्तमान समय में यह प्रश्न बार-बार उठाया जाता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के तेज चाल वाले जमाने में कविता के लिए कहाँ जगह बची है? जीवन इतना अधिक गद्यमय हो गया है कि स्वयं कविता में भी गद्य भर गया है| ऐसी स्थिति में कविता रचने, पढ़ने और पढ़ाने की क्या जरूरत है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए डा.ऋषभदेव शर्मा और डा.पूर्णिमा शर्मा की सद्यःप्रकाशित पुस्तक ‘कविता के पक्ष में’ (2016) को पढ़ा जाए तो निराश नहीं होना पड़ेगा | यह प्रश्न इस समीक्षा पुस्तक के केंद्र में है कि 'कविता की आवश्यकता किसी समाज को क्यों होती है?' अथवा 'कविता का धर्म और प्रयोजन क्या है?' लेखकद्वय ने हिन्दी की सहस्रवर्षी काव्ययात्रा का अनुशीलन करके यह बताया है कि कविता का चरम प्रयोजन मनुष्य और मनुष्यता की रक्षा करना है | वे कविता को मनुष्यता की सुरक्षा चट्टान मानते हैं| ‘कविता के पक्ष में’ शीर्षक विवेच्य पुस्तक का केन्द्रीय विचार हिन्दी कविता के इसी जीवनकेन्द्रित, जन-पक्षधर और मूल्यनिष्ठ स्वरूप की पहचान कराना प्रतीत होता है |

376 पृष्ठों वाले इस ग्रन्थ की सामग्री को दस खंडों में ऐतिहासिक क्रम में प्रस्तुत किया गया है| 

पहले खंड ‘गगन मंडल में ऊँधा कुआँ’ में आदिकाल के चार कवियों गोरखनाथ,चंदरबरदाई, अमीर खुसरो और विद्यापति के हवाले से यह दर्शाया गया है कि हिन्दी कविता का आरम्भ सामाजिक-राजनैतिक चेतना और लौकिक व पारलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति की प्रबलता से हुआ|

‘सुरसरि सम सब कहँ हित होई’ शीर्षक दूसरे खंड में भक्तिकाल के प्रमुख कवियों की चर्चा है जिनमें कबीर, नानक, जायसी, सूरदास, तुलसीदास, मीरा और रहीम शामिल हैं| यहाँ यह दर्शाया गया है कि हिन्दी कवियों का भक्ति काव्य एक समाज-सापेक्ष आन्दोलन खड़ा करता है और खंडित होते हुए समाज की रक्षा के लिए धर्म और अध्यात्म का प्रयोग करता है|

तीसरा खंड ‘ज्यों नावक के तीर’ बहुत छोटा सा है| इसमें रीतिकाल के शीर्षस्थ कवि  बिहारी के साथ संत-सिपाही कवि गुरु गोविन्द सिंह शामिल हैं| गुरु गोविन्द सिंह के ‘चंडी चरित्र’ की चर्चा इस खंड को वास्तव में विशिष्ट बनाती है|

चौथे खंड ‘हम कौन थे क्या हो गए हैं’ मैं भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और बालकृष्ण शर्मा नवीन शामिल है| अर्थात भारतेंदु युग और दुवेदी युग की कविता के साथ राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधाराकी विवेचना, नवजागरण और स्वाधीनता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में की गई है|

पुस्तक का पाँचवाँ खंड है ‘बीती विभावरी जाग री’| यहाँ चार प्रमुख छायावादी साहित्यकारों के साथ-साथ उत्तरछायावाद काल के बच्चन जी उपस्थित हैं| इन कवियों की सांस्कृतिक चेतना और मानवतावादी विश्वदृष्टि इस खंड में उभरती है|

‘कलम देश की बड़ी शक्ति है’ शीर्षक छठे खंड में दिनकर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जैसे प्रगतिवादी कवियों की युगीन चेतना पर प्रकाश डाला गया है|

नई कविता पर केन्द्रित सांतवे खंड का शीर्षक है ‘भेद खोलेगी बात ही’| इस खंड में शमशेर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह के कविकर्म की विस्तृत विवेचना करते हुए इसमें आधुनिक बोध और नए मनुष्य की परिकल्पना को उजागर किया गया है|

आठवां खंड राजकमल चौधरी, धूमिल श्रीकांत वर्मा और दुष्यंत कुमार पर केन्द्रित है| ‘भाषा में आदमी होने की तमीज’ शीर्षक यह खंड समकालीन कविता के विद्रोही राजनैतिक प्रस्थान की पड़ताल करता है|

‘आपसे क्या कुछ छिपाएँ’ शीर्षक नौंवें खंड में राजेश जोशी, देवराज और अरुण कमल जैसे पिछली शताब्दी के अंतिम दो दशकों में उभरे तीन कवियों की कविता की मीमांसा की गई है जिन्होंने समकालीन चेतना को जन-पक्ष में अभिव्यक्त किया है|

पुस्तक का अंतिम (दसवाँ) खंड है ‘हम भी मुँह में ज़बान रखते है’| इस खंड में हिन्दी की विमर्शीय कविता के चार नए लोकतांत्रिक केन्द्रों से सम्बन्धित विवेचन शामिल है| जगदीश सुधाकर जहाँ कस्बाई जनविमर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं अनामिका स्त्रीविमर्श, ओमप्रकाश वाल्मीकि दलितविमर्श और निर्मला पुत्तुल आदिवासी विमर्श के प्रतिनिधि रचनाकार हैं|

इस प्रकार विवेच्य ग्रन्थ में हिन्दी के गुरु गोरखनाथ से लेकर निर्मला पूतुल तक की कविता के साक्ष्य के सहारे ‘कविता के पक्ष में’ एक जीवंत बहस को साकार रूप दिया गया है| हिन्दी कविता के अध्येताओं के लिए यह ग्रन्थ अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा|
--------------------
‘कविता के पक्ष में’ / ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा / तक्षशिला प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली–110002 / प्रथम संस्करण–2016 / 750 रुपए / 376 पृष्ठ (सजिल्द)
------------------------


समीक्षक : डॉ. अर्पणा दीप्ति
वासवी स्क्वायर,  बी- 506,स्ट्रीट नं. 82, वेंकटेश्वर एन्क्लेव के पास,
वेनल गड्डा, सुचित्रा जंक्शन, हैदराबाद – 110 064 (तेलंगाना)