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रविवार, 11 मई 2014

अतिरंजना और फैंटेसी में लिपटा क्रूर सामाजिक सत्य (सुकेश साहनी की लघुकथाएं)

सुकेश साहनी [1956] कई दशकों से हिंदी लघुकथा साहित्य के परिवर्धन में सक्रिय हैं तथा उनकी रचनाएँ कई भाषाओं में अनूदित और चर्चित रही हैं। सुकेश का लेखकीय व्यक्तित्व अपने समशील रचनाकारों की तरह यथार्थ की पकड़ और संप्रेषण की सहजता के आग्रह से निर्मित है लेकिन जो बात उन्हें अलग पहचान देती है वह उनके शिल्प की मौलिकता में निहित है। इसमें संदेह नहीं कि उनकी लघुकथाओं का विधान किसी एक ढर्रे पर लीकोंलीक नहीं चलता बल्कि कथ्य के अनुरूप अभिव्यक्ति को मारकता प्रदान करने के लिए वे शैली-शिल्प के स्तर पर तरह तरह के प्रयोग करते दिखाई देते हैं। लघुकथा की प्रभावशीलता के लिए व्यंग्य, ध्वनि या व्यंजना की शक्ति को वे पहचानते हैं और उसका भली प्रकार इस्तेमाल करने में कुशल हैं। अतिरंजना और फैंटेसी का उन जैसा सटीक प्रयोग हर किसी के वश की बात नहीं। विस्मय और आकस्मिकता को भी सुकेश अच्छी तरह साध लेते है तथा साधारण स्थितियों के माध्यम से असाधारण निष्कर्षों को दर्शना भी उन्हें अपनी विधा का उस्ताद बनाता है। संकेतों और अप्रस्तुतों की योजना उनकी कथाओं को काव्यभाषा का अतिरिक्त संस्कार प्रदान करती है। साथ ही यह भी कहना ज़रूरी है कि मनुष्य और समाज की तमामतर विकृतियों और विच्युतियों के समकालीन बोध के बावजूद यह कथाकार पराजित या हताश नहीं है बल्कि मनुष्यता की सर्वोपरिता में विश्वास के कारण उसकी कलम जुझारू पात्रों का सृजन करने से बाज नहीं आती। यही वह चीज़ है जो सुकेश साहनी के लघुकथाकार को सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित रचनाकार का दर्जा दिलाने में समर्थ है। 

लघुकथा अपनी सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और व्यंजकता में बहुत बार कविता के सर्वाधिक निकट की विधा प्रतीत होती है। संक्षिप्तता या सामासिकता तो इस विधा की केंद्रीय शर्त है ही। यही कारण है कि यहाँ शीर्षक भी कथ्य और शिल्प का अविभाज्य अंग होता है। इस दृष्टि से सुकेश के कुछ शीर्षक खूब सटीक बन पड़े हैं - गोश्त की गंध, चादर, आइसबर्ग, नपुंसक, शिनाख्त। ये सभी कथ्य के सबसे मार्मिक और विचलित करने वाले अंश को अजाने ही अग्रप्रस्तुत कर देते हैं। 

इसके अलावा अपनी इन लघुकाय रचनाओं में सुकेश समापन के संबंध में काफी सतर्क प्रतीत होते हैं। आरंभ कहीं से भी कर सकते हैं वे, और उसे रोचक भी बना सकते हैं; पर अंत के मामले में वे रिस्क लेने के पक्षधर नहीं हैं। वे अपने प्रतिपाद्य को पाठक के मन-मस्तिष्क में रोपित करना चाहते हैं ताकि लघुकथा अपने सामाजिक उद्देश्य में सफल हो सके भले ही इसके लिए उन्हें अंत में लेखकीय टिप्पणी जोडनी पड़े। दरअसल इस तकनीक द्वारा वे व्यंजना को अभिधा में ढालते हैं और रचना को सुख-बोध्य बनाने का यत्न करते हैं। यही कारण है कि 'गोश्त की गंध' के अंत में वे यह कहना नहीं भूलते कि 'काश, यह गोश्त की गंध उसे बहुत पहले ही महसूस हो गई होती!' 'चादर' का अंत भी प्रति-उत्कर्ष से किया गया है जो पाठक को एक्टिव बनाना चाहता है - 'मैंने उसी क्षण उस खूनी चादर को अपने जिस्म से उतार फेंका।' 'जागरूक' का अंत इसकी तुलना में अधिक सांकेतिक है - 'उनके आदेश पर बहुत से वाचमैन लाठियाँ-डंडे लेकर कोठियों से बाहर निकले और उस कुत्ते पर पिल पड़े।' 
आइसबर्ग, नपुंसक और शिनाख्त का भी समापन लेखकीय टिप्पणी और चरम-घटना को जोड़कर अत्यंत कलापूर्ण और प्रभावी ढंग से किया गया है। ‘आइसबर्ग’ के अंतिम अनुच्छेद में कई सारी भीतरी और बाहरी घटनाएँ तीव्रता के साथ घटित होती हैं और पाठक की चेतना को झटका-सा देती हैं. यह विचित्र विरोधाभास अथवा विडंबना ही है कि अब तक असुरक्षित अनुभव करता हुआ जो युवक बार-बार भयग्रस्त होकर अपनी पहचान बदल रहा था, उत्तेजित सिखों के परस्पर झगड़ने पर खुद को सुरक्षित महसूस करता है. लेखक यहाँ यह भी सूचना देता है कि दंगाग्रस्त क्षेत्र में यह युवक अपने दोस्त के घर दो दिन बिताकर आया है इसीलिए उस युवक को दंगे के भयावह आमानुषिक दृश्य भी याद आते हैं. लेकिन लेखक अपनी कहानी को एक सकारात्मक नोट पर समाप्त करता है – बेटे की शरारतों की मधुर स्मृति के साथ. यथा – “एकाएक लगा कि वह बेहद थक गया है. कर्फ्यू के बीच दोस्त के घर बिताए गए दो दिन उसकी आँखों में तैर गए – लुटती दुकानें .... भागते चीखते लोग .... जलते मकान ... टनटनाती दमकलें. उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया. अगले ही क्षण वह सीट से सिर टिकाये अपने बेटे की नन्हीं शरारतों को याद कर मुस्करा रहा था.” इसी प्रकार ‘नपुंसक’ का अंत विपथन (डिफ्लेक्शन) की तकनीक से किया गया है. उठा लाई गई मजदूरिन पर सामूहिक दुष्कर्म कर रहे युवकों के बीच शेखर अपनी संवेदनशीलता के कारण विरल आचरण करता है परंतु कापुरुष कहे जाने के डर से अपने साथियों पर इसे प्रकट नहीं करता. परिणामतः उसका अंतरंग सवयं उसे धिक्कारता है मानो मुक्तिदाता सवयं पौरुषहीनता का शिकार हो – “अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए अपने ही पदचाप से उसके दिमाग में धमाके से हो रहे थे – नपुंसक ... नपुंसक ...! मुक्तिदाता! ... नपुंसक!” ‘शिनाख्त’ का अंत इस दृष्टि से विशिष्ट है कि इसके माध्यम से आज के मनुष्य की पैसे की भूख का वह रूप सामने आता है जिसे लाशखोरी ही कहा जा सकता है. जैसे ही यह घोषणा होती है कि सांप्रदायिक दंगों में मारे गए लोगों के लिए पाँच-पाँच लाख रुपया मुआवजा दिया जाएगा, वैसे ही बलात्कार के बाद क्रूरतापूर्वक मार दी गई अज्ञात युवती के अनेक रिश्तेदार पैदा हो जाते हैं – ‘सर! ताज्जुब है. *** उस सिर कटी युवती की लाश पर अपना दावा करने वाले बहुत से लोग बाहर खड़े हैं, सर!’x

वस्तु चयन में लेखक ने सामाजिक यथार्थ पर दृष्टि केंद्रित रखी है। दहेज, घरेलू हिंसा, बलात्कार, स्त्री का बहुमुखी शोषण, सांप्रदायिकता, धार्मिक पाखंड, उपद्रव, समाज की संवेदनहीनता, अंधविश्वास, विवेकहीनता, क्रूरता, अमानुषिकता, भीड़ का उन्माद, मानवीय संबंधों का क्षरण, मीडिया, श्रम से जुड़ा आत्मसम्मान, बालश्रम, वृद्धावस्था, गरीब की साधनहीनता, मध्यवर्ग की लालसा, हिंदुस्तानियों की अंग्रेज़ियत और बाजारवाद का चक्रव्यूह जैसे प्रत्येक संवेदनशील प्राणी को विचलित करने वाले ज्वलंत विषयों को उन्होंने मार्मिक घटनाओं और जीवंत पात्रों के सहारे झकझोरने वाली अभिव्यंजना प्रदान की है। कथ्य और शिल्प की अनुरूपता के कारण ही ये लघुकथाएँ चुटियल होने का अहसास दिलाती हैं और साथ ही चोट भी करती हैं। मर्मस्थल पर वार करने में इनकी चरितार्थता का मर्म निहित है। 
अतिरंजना, फैंटेसी, आकस्मिकता और विस्मय तत्व के सहारे बुनी गई कहानियों में सुकेश ने सामाजिक यथार्थ के क्रूर और असामाजिक चेहरे के विद्रूप को रूपायित करने में पूरी सफलता पाई है। इस प्रकार की लघुकथाओं में पाठक को विचलित करने और आत्मसाक्षात्कार के लिए विवश करने की ताकत दिखाई देती है। अगर कहा जाए कि इस शिल्प में सुकेश साहनी की कहानी कला सर्वाधिक प्रभविष्णुता के साथ उभरी है, तो शायद गलत न होगा। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए 'गोश्त की गंध', 'चादर', 'जागरूक' और 'ओए बबली' को देखा जा सकता है। ‘गोश्त की गंध’ में दामाद जब भोजन के लिए बैठता है तो यह देखकर वह सन्न रह जाता है कि सब्जी की प्लेटों में खून के बीच आदमी के गोश्त के बिलकुल ताजा टुकड़े तैर रहे थे. आगे यह भी बताया गया है कि सास, ससुर और साले के किस-किस अंग का गोश्त दामाद की खातिरदारी के लिए उतारा गया है और किस तरह उसे छिपाने की असफल कोशिश केवल इसलिए की जा रही है कि दामाद नाराज न हो जाए. ‘चादर’ भी प्रतीकात्मक है. पवित्र नगर और पवित्र पर्वत की कल्पना का रहस्य तब खुलता है जब आख्याता अपनी चादर पर खून के दाग देखता है. और यह जानकर सन्न रह जाता है कि सभी की चादरें खून से लाल और तर थीं जबकि सभी हट्टे-कट्टे थे और कोई खूनखराबा भी नहीं हुआ था. चेतना को झटका तो तब लगता है जब यह बात समझ में आती है कि जिसकी चादर जितनी अधिक रक्तरंजित है वह उतना ही आश्वस्त होकर मूंछें ऐंठ रहा है. सांप्रदायिक दंगों की जेनेसिस पर ऐसी कहानियाँ शायद कम ही लिखी गई होंगी. ‘जागरूक’ की अतिरंजना और आकस्मिकता इन दोनों कहानियों से भिन्न प्रकार की है. यहाँ संकटग्रस्त युवती की चीख-पुकार पर सभ्य संभ्रांत भद्रलोक कान मूँदे सोया रहता है. लेकिन लावारिस कुत्ते बदमाशों पर भौंकते हैं. वश न चलने पर कुलीन कोठियों के विशाल बंद दरवाजों तक भी जाते हैं. व्यंग्यपूर्वक लेखक यह दर्ज करता है कि इस प्रयास पर लोहे के बड़े-बड़े गेटों के उस पार तैनात विदेशी नस्ल के पालतू कुत्ते उसे हिकारत से देखने लगे. अंततः जब गुंडे बलात्कार के अपने उद्देश्य में सफल होते दीखते हैं गली का कुत्ता मुँह उठाकर जोर-जोरे से रोने लगता है. लड़की का रोना जिन्होंने नहीं सुना उन्हें कुत्ते का रोना सुन जाता है क्योंकि कुत्ते का रोना अशुभ होता है. लड़की का रोना क्या होता है – शुभ या अशुभ? ऐसे समाज का क्या होगा – कल्याण या विनाश? कई सवाल पाठक को बेचैन करते हैं; और लेखक सूचना देता है कि भद्र लोग के इशारे पर बहुत से वाचमैन अशुभसूचक कुत्ते को मार रहे हैं. लावारिस कुत्तों की तुलना में हमारा यह तथाकथित भद्रलोक किस तरह का पामेरियन कुत्ता है! कुत्ते जागरूक हैं, और मनुष्य? ‘ओए बबली’ में लेखक ने स्वप्न की तकनीक अपनाई है. पानी की खोज! निरंतर और असमाप्त खोज. पानी नहीं मिलता. रेत मिलती है. गंगा-जमुनी दोआबा रेगिस्तान में बदल जाता है. कुआँ मिलता है - टशन और प्यास के विज्ञापनों वाली खूबसूरत लड़कियों के बीच. कुएँ में पानी नहीं है, बर्फ के ढेले हैं, कूल ड्रिंक्स की बोतलें हैं. माँ के लिए पानी खोजती बेटी फ्रॉक में बर्फ के ढेले भरकर दौड़ती है पर बर्फ तो बिना पिघले ही उड़नछू हो जाती है! इस बीच माँ कुआँ खोद लेती है. स्वप्न टूटता है माँ के इस निर्देश के साथ कि “चल ... जल्दी कर, बेटी! बर्तनों की कतारें लगने लगी हैं. पानी का टैंकर आता ही होगा. आज तो घर में खाना पकाने के लिए भी पानी नहीं हैं ... बबली!!” और इस तरह आभासी विश्व पर यथार्थ विश्व हावी हो जाता है. कल्पना और फैंटेसी का खोल तोड़कर भीषण यथार्थ पाठक को अपनी गिरफ़त में ले लेता है.

अपनी कथाभाषा के गठन में सुकेश जहाँ सहजता और प्रतीकात्मकता को मुहावरेदानी और आमफहम शब्दावली के सहारे एक साथ साधते हैं, वहीं सटीक विशेषणों, उपमानों और विवरणों के सहारे अभिव्यंजना को सौंदर्यपूर्ण भी बनाते हैं। ये उनकी कथारचना के वे इलाके हैं जो उन्हें कथाकार के साथ साथ उत्कृष्ट शैलीकार के रूप में प्रतिष्ठित कराने के निमित्त पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध कराते हैं। अतः सामाजिक यथार्थ और कलात्मकता को अपनी लघुकथाओं में साथ साथ संभव कर सकने वाले लेखकों की पंक्ति में सुकेश साहनी की प्रतिष्ठा सुनिश्चित मानी जानी चाहिए।

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पडाव और पड़ताल  (खंड 2) / 2014  
संपादक : बलराम अग्रवाल
[छह कथाकारों की चुनिंदा लघुकथाएं और उनकी पड़ताल]
दिशा प्रकाशान, 138/16 त्रिनगर, दिल्ली - 110035
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सुदूर मणिपुर में हिंदी

पुस्तक समीक्षा : ऋषभ देव शर्मा
सुदूर मणिपुर में हिंदी
-      ऋषभ देव शर्मा

मणिपुर पूर्वोत्तर की सात बहनों में अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक संपदा के कारण विलक्षण है. यहाँ हिंदी के प्रचार-प्रसार, सृजन और विस्तार की गाथा भी उतनी ही विलक्षण है. इस अनेक उतार चढ़ावों से भरी गाथा को डॉ. अरिबम ब्रजकुमार शर्मा ने ‘हिंदी को मणिपुर की देन’ (2014) में बेहद ईमानदारी और निष्ठा के साथ पूरे हिंदी जगत के सामने रखा है. स्मरणीय है कि उनके के पिता पं. अरिबम राधामोहन शर्मा को मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन की शुरूआत का श्रेय प्राप्त है. अपने पिता के मार्ग का अनुसरण करते हुए डॉ. ब्रजकुमार शर्मा ने भी हिंदी सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाया और साथ ही मणिपुर के हिंदी साहित्य और पत्रकारिता से भी जीवंत रूप से जुड़े रहे. इस ग्रंथ को उनकी हिंदी साधना का नवनीत भी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी.

स्मरणीय है कि भिन्न-भिन्न समाजों के पारस्परिक संबंध उनकी भाषाओं में रचे गए साहित्य और अनुवाद में पहचाने जा सकते हैं. अब इसमें पत्रकारिता-भाषाई पत्रकारिता भी जुड गई है. इससे समाजों के आधुनिक ताने-बाने को पहचानना अधिक आसान हो गया है. एक दूसरा तथ्य यह है कि किसी भाषा को आतंरिक शक्ति जहाँ उसके अपने मूल समाज से मिलती है वहीं उस समाज से भी मिलती है, जो उसे आर्थिक या सांस्कृतिक कारणों से अपना लेता है. मणिपुरी समाज ने हिंदी भाषा को वही शक्ति प्रदान की है. भारतीय जनता की सामान्य अभिव्यक्ति की भाषा बनने का संदर्भ हो अथवा राष्ट्रभाषा का स्तर पा लेने वाली भाषा का, हिंदी को दोनों ही रूपों में मणिपुरी समाज ने शक्तिशाली बनाया है.

डॉ. अरिबम ब्रजकुमार शर्मा ने अपनी इस पुस्तक में मणिपुर के हिंदी साहित्य और हिंदी पत्रकारिता का जो विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है, उससे पता चलता है कि मणिपुरी भाषा के समृद्ध पारंपरिक रूप तथा समर्थ रचनात्मक चेतना से हिंदी अनेक रूपों में लाभान्वित हुई है. लेखक ने जितना अपनी ओर से कहा है, उतना ही ऐतिहासिक तथा उपलब्ध साहित्यिक स्रोतों का सहारा भी लिया है. यह तुलनात्मक दृष्टि से सच तक पहुँचने का सही मार्ग है. लेखक का श्रम सराहनीय भी है, फलदायी भी.
हिंदी को मणिपुरी की देन / 
अरिबम ब्रजकुमार शर्मा /
2014/ यश पब्लिकेशंस,
1/11848 पंचशील गार्डन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली – 110 032 /
पृष्ठ – 304/  मूल्य – रु.895

भास्वर भारत/ मई 2014/ पृष्ठ 61