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शुक्रवार, 14 जून 2013

समय की धड़कन गिनती कहानियाँ : 'मत हँसो पद्मावती'

मत हँसो पद्मावती;
निर्मला भुराड़िया;
 2011;
वाणी प्रकाशन, 4695, 21ए,
दरियागंज, नई दिल्ली-110002;
 पृष्ठ – 106;
मूल्य – 200/=
निर्मला भुराड़िया पेशेवर पत्रकार हैं और सामाजिक एवं स्त्री विमर्श विषयक लेखन के लिए खासतौर पर जानी जाती हैं. ‘एक ही कैनवास पर बार बार’ के बाद ‘मत हँसो पद्मावती’ (2011) उनका दूसरा कहानी संग्रह है जिसमें समकालीन परिस्थिति और परिवेश के साथ लेखिका के मनोजगत के द्वंद्वात्मक संबंधों की परिणतियाँ कथाबद्ध हुई हैं. आज और कल का अंतर बहुत बार लेखिका को उद्वेलित करता है और वे वर्तमान में बैठकर अतीत को तथा अतीत में बैठकर वर्तमान को देखते हुए ऐसे शिल्प का निर्माण करती हैं जो कालयात्रा का अनुभव कराता है. निर्मला की कुछ कहानियां बाल-मन के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं लेकिन वे बाल-कहानियाँ नहीं है बल्कि, जैसा कि वे स्वयं बताती हैं, बचपन के मानसिक संसार में सुरक्षित अनुभव इनके केंद्र में है. कुछ भावनात्मक जरूरतें जो तब महसूस होती थीं आज उभकर आती हैं. नन्ही उम्र के ख़्वाब और नन्ही पीड़ाएँ कल्पनाओं में घुलमिलकर नन्ही नायिकाओं के बहाने कहानियों का रूप धर लेती हैं. लेखिका ने यह भी साफ़ कर दिया है कि कोई इस आत्मानुभाव को आत्मकथा न समझे. बस इतना कि लेखिका ने एक छोटे से दर्द को देखे अनदेखे पात्र, भय, असुरक्षा, इच्छा, आकांक्षा और अव्यक्त अनुभवों के सहारे व्यंजित करने का प्रयास किया है. कहना न होगा कि इसमें उन्हें सफलता भी मिली है. 

विवेच्य कहानी संग्रह में जो प्रश्न उठाए गए हैं वे सच्चे और प्रासंगिक हैं. इन कहानियों में कहीं पत्रकारीय जीवन के अनुभव दिखाई देते हैं तो कहीं विकास के नाम पर उजड़ते हुए लोक की पीड़ा के स्वर सुनाई देते हैं. छली जाती हुई औरत, दोहरा आचरण करता हुआ मर्द, गिरते हुए जीवन मूल्य, बढ़ती हुई उपभोग की हवस से लेकर किराए की कोख और मनुष्य की क्लोनिंग तक को निर्मला ने कथ्य बनाया है. इन तमाम विषयों को रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर इतिहास और फैंटसी तक का रचनात्मक उपयोग करते हुए इस तरह पेश किया गया है कि पाठक बहुत बार विचलित भी होता है और आनंदित भी. आज की कॉर्पोरेट-सभ्यता की विडंबनाओं पर व्यंग्य करने से भी लेखिका बाज़ नहीं आती. कहने का अर्थ यह है कि निर्मला भुराड़िया को ज़िंदगी की धड़कनें गिनने और गिनवाने का हुनर आता है. 

अंततः पाठकों के विमर्श हेतु इसी संग्रह की ‘ज़री पॉलिश की जूतियाँ!’ शीर्षक कहानी का यह अंश ....
“उसे हंसी आती है और दुःख भी होता है कि मुहब्बत नाम की शै पर उसे भरोसा न रहा. जितने आवेग से वह दुःख से भरती है, उतने ही आवेग से नफरत से भी. किसी-किसी पल उसे लगता है, सब कुछ नफ़रत के काबिल हो गया. यहाँ तक कि खुद उसकी देह और उसका वजूद तक! उसकी ही क्यों, हर औरत की देह!” 
['भास्वर भारत' / अप्रैल 2013 / पृष्ठ 54]

दकन सा नहीं ठार संसार में

हैदराबाद : मोहल्ले, गली और कूचे :
 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, खंड - 1; 
डॉ.आनंद राज वर्मा; 
2013; 
अकादमिक प्रतिभा, सरस्वती निवास, 
यू -9, नियर सोलंकी रोड, सुभाष पार्क, 
उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059; 
पृष्ठ – 258; 
मूल्य – रु.800 (पेपरबैक), 
रु.1600 (हार्डबाउंड)

हैदराबाद की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक गौरव-गरिमा का गान करते हुए कभी मुल्ला वजही ने कहा था – “दकन है नगीना अंगूठी है जग/ अंगूठी को हुरमत नगीना ही लग/ दकन सा नहीं ठार संसार में/ बंज फ़ाज़िलां का है इस ठार में.” यह आश्चर्यजनक है कि इस पुराने शहर पर हिंदी में कोई प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ नहीं मिलता – अंग्रेज़ी, तेलुगु और उर्दू में तो कई हैं. लंबे समय से अनुभव किए जा रहे इस अभाव की पूर्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास के रूप में डॉ. आनंदराज वर्मा (1937) के ग्रंथ ‘हैदराबाद: मोहल्ले, गली और कूचे : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य’ (2013) का पहला खंड सामने आया है. डॉ.आनंदराज वर्मा बहुभाषाविद खोजी लेखक हैं और जीवविज्ञान की प्राध्यापकी से निवृत्त होने के बाद हैदराबाद के इतिहास और भूगोल की खुदाई गली-गली घूम-घूमकर कर रहे हैं. उनका यह ग्रंथ इस अर्थ में हैदराबाद का सूक्ष्म इतिहास है कि इसमें राजघरानों की तुलना में जनसामान्य की साधारण जीवन-प्रक्रिया से निर्मित होने वाली इस शहर की गाथा को लेखबद्ध किया गया है. 

किसी नगर की विरासत को समझने-समझाने का यह एक उम्दा तरीका  हो सकता है कि उसके गली, कूचे, मोहल्लों की कहानी खोजी जाए और डॉ. वर्मा ने यही किया है. इसमें उन्होंने मोहल्लों के नामों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनके बसानेवालों की जानकारी देते हुए वहाँ के निवासियों के सामाजिक, व्यावसायिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश पर प्रकाश डाला है जो विभिन्न जातियों, वर्गों, संस्कृतियों की सटीक पहचान करने वाली सूक्ष्म दृष्टि का परिणाम है. लेखक ने ऐतिहासिक प्रमाणों से लेकर किंवदंतियों तक के सहारे इस गाथा का सृजन किया है. लेकिन यह कार्य उन्होंने पूरी खोजबीन के साथ और ईमानदारी से किया है. नक्शों, चित्रों और दस्तावेजों से सुसज्जित यह ग्रंथ मुहब्बत की नींव पर खड़े इस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक नगर को लोकवृत्त के रूप में पुनः रचता है. इस लोकवृत्त को लेखक ने एक सफल किस्सागो और शैलीकार के रूप में पेश करते हुए लोकजीवन और लोकरस के साहारे इतिहास के कंकाल में साहित्यिकता के प्राण फूँके हैं. हैदराबाद के गली-कूचों और मंदिर-मस्जिदों की आवाज को जन-जन तक पहुँचाना ही इस ग्रंथ का उद्देश्य रहा है. 

विभिन्न स्थानों के नामकरण संबंधी चर्चा अत्यंत रोचक बन पड़ी है. लेखक ने यह भी विश्लेषण किया है कि हिंदी, उर्दू, तेलुगु और मराठी शब्दों के मेल से बने हुए ये नाम हैदराबाद की बहुसांस्कृतिकता के प्रतीक हैं. नगर, बन, घाट, पुर हिंदी से आए हैं तो आबाद, खिड़की, दायरा, दरीचा, चमन, बुर्ज उर्दू से. इसी प्रकार पल्ले, गूडेम, बंडा, गुट्टा और पुरम तेलुगु से तथा वाडी मराठी से. अनेक मोहल्लों के नाम हिंदी-उर्दू (हिंदुस्तानी) शैली के हैं जैसे – मंडी, बाज़ार, हवेली, गंज, चबूतरा, बावली. कुछ नाम बड़े विस्मयकारी भी हैं – कोका की टट्टी, पंछी बुर्राक, पेटला बुर्ज, सूखे मीर की कमान, कड़वे साहिब की गली, फिसल बंडा. लेखक ने इनके नामकरण का रहस्य रोचक शैली में समझाया है.

मोहल्लों के अलावा इस ग्रंथ में मंदिरों, मठों, अखाड़ों, दरगाहों, छिल्लों, अलावों, आशूरखानों, गुरुद्वारों और जैन मंदिरों का भी जितने विस्तार से शोधपूर्ण विवरण दिया गया है वह इसे इस विषय पर हिंदी का तो पहला ग्रंथ बनाता ही है, अन्य भाषाओं  में भी इसके अनुवाद की जरूरत जताता है. 
['भास्वर भारत' / अप्रैल 2013 / पृष्ठ 54]

सौम्य, अनाक्रामक और पुरुषार्थी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर

शताब्दी संदर्भ

  • मैं ईश्वर में अखंड विश्वास नहीं रखता. मैं तो समझता हूँ, अध्यात्म भी एक खोज है. जिस तरह विज्ञान भौतिक खोज करता है, अध्यात्म पराभौतिक खोज करता है. दोनों और खोज जारी है. उनके प्रश्न जारी हैं – उत्तर तो किसी को मिला नहीं है. – विष्णु प्रभाकर
  • मेरे साहित्य की प्रेरकशक्ति मनुष्य है. अपनी समस्त महानता और हीनता के साथ, अनेक कारणों से मेरा जीवन मनुष्य के विविध रूपों से एकाकार होता रहा और उसका प्रभाव मेरे चिंतन पर पड़ता रहा. कालांतर में वही भावना मेरे साहित्य की प्रेरकशक्ति बनी. त्रासदी में से ही मेरे साहित्य का जन्म हुआ.   – विष्णु प्रभाकर  
  • आजादी से पहले अधिसंख्य लोग देश-प्रेम के कारण ही आंदोलन में भाग लेते थे, लेकिन पेशेवर नेताओं में देश-प्रेम कहाँ? अब कोई भी ऐसा नेता नहीं, जिसे लोग आदर्श मानते हों. फिर भी सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक है. आज भी दक्षिण भारतीय हिमालय की यात्रा करता है और उत्तर का आदमी कन्याकुमारी – रामेश्वरम की. इन यात्राओं में केवल हिंदी का प्रयोग करके काम चलाया जा सकता है. यानी हिंदी जनता की संपर्क भाषा बन चुकी है, राजनीतिज्ञ चाहे कुछ भी कहते रहें. – विष्णु प्रभाकर 


  • अपनी अमर कृति ‘आवारा मसीहा’ (1974) के माध्यम से कालजयी रचनाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ग्रंथावतार को संभव बनाने वाले विष्णु प्रभाकर (21 जून, 1912 – 11 अप्रैल, 2009) को भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने वाला साहित्यकार माना जाता है. एक शताब्दी पहले उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर के एक छोटे से कस्बे मीरांपुर के जिस संयुक्त परिवार में उनका जन्म हुआ वह अपनी एकजुटता के लिए दूर दूर तक जाना जाता था. यहाँ तक कि पेरिस टीवी वाले जब भारत की नारी पर एक फ़िल्म बना रहे थे तो संयुक्त परिवार किस प्रकार रहता है यह दर्शाने के लिए उन्होंने इस परिवार का फिल्मांकन किया था. 
विष्णु प्रभाकर का बचपन लाड़-प्यार में बीता लेकिन किशोरावस्था में उन्हें शिक्षा-दीक्षा के लिए पंजाब में अपने मामा के पास जाना पड़ा. भावुक और अंतर्मुखी प्रकृति के बालक के मन पर माँ से दूर जाने का गहरा असर हुआ. दूसरी ओर कम आयु में बड़प्पन की जिम्मेदारियाँ भी उठाने के कारण उनकी मानसिकता जटिल और परिपक्व होती गई. कुछ विपरीत परिस्थितियों के कारण एक समय ऐसा भी आया कि वे मनुष्य की छाया से भी डरने लगे. ऐसे में स्वाध्याय और लेखन ने उन्हें संभाला. आर्थिक परेशानी के कारण वे कॉलिज तक न पहुँच पाए और आजीविका के लिए उन्हें चपरासी की नौकरी करनी पड़ी. बाद में प्रभाकर परीक्षा उत्तीर्ण करने पर वे विष्णु दयाल/ विष्णु दत्त से विष्णु प्रभाकर बने. संस्कृत में प्राज्ञ और अंग्रेज़ी में बी.ए. भी किया. इस आरंभिक जीवन संघर्ष ने उन्हें मानव चरित्र की जो पहचान दी उसका उपयोग उन्होंने आगे चलकर अपने कथा साहित्य और नाटकों में अत्यंत सफलतापूर्वक किया. बाद में उन्होंने कुछ समय एकाउंटेंट का काम भी किया लेकिन वह उन्हें रास नहीं आया तथा उन्होंने स्वतंत्र लेखन के सहारे जीवन यापन का निर्णय लिया. 1955 -1957 तक वे आकाशवाणी, दिल्ली के नाटक निर्देशक भी रहे. दरअसल आकाशवाणी से जुड़ने पर ही उनका आर्थिक संकट दूर हो पाया.

विष्णु प्रभाकर के लेखकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके जीवन संघर्ष और स्वाध्याय के अतिरिक्त महात्मा गांधी के चिंतन का भी बड़ा हाथ रहा. वे एक प्रकार से कांग्रेस के साहित्यिक सदस्य थे. इसी प्रकार आर्य समाज का भी उन पर गहरा असर पड़ा. उन्होंने त्याग, बलिदान, समर्पण, हिंदू-मुस्लिम एकता, कमजोर वर्गों के प्रति सहानुभूति आदि नैतिक मूल्यों को अपने साहित्य में भी व्यक्त किया और जीवन में भी अपनाया. 

विष्णु प्रभाकर ने विभिन्न विधाओं में प्रभूत लेखन किया. उन्होंने हिंदी साहित्य को कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रावृत्तांत आदि प्रमुख विधाओं में शताधिक कृतियाँ रचकर संपन्न बनाया. ‘आवारा मसीहा’ पर उन्हें पाब्लो नेरुदा सम्मान और सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार से नवाज़ा गया तो ‘सत्ता के आर-पार’ पर भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार और हिंदी अकादमी, दिल्ली का शलाका सम्मान भी उन्हें प्रदान किया गया. अपनी तरह के अभिनव स्त्रीविमर्शात्मक उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ पर विष्णु प्रभाकर को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ. अभिप्राय यह है कि वे आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में लोकप्रिय हिंदी के ऐसे पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकर थे जिन्होंने स्वयं को साहित्यिक जगत की तमाम तरह की गुटबंदियों से अलग रखा और निरंतर भारतीयता को ध्यान में रखकर साहित्य सृजन किया.

भारतीय समाज की गहरी पहचान के कारण विष्णु प्रभाकर ने यह महसूस किया कि स्त्री को आधुनिक सामाजिक जीवन में समुचित सम्मान प्राप्त नहीं है. इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री समस्या को पूरी शिद्दत से उठाया. ‘तट के बंधन’ (1955) में उन्होंने मध्यवर्गीय नारी की समस्याओं का चित्रण किया तो ‘कोई तो’ (1980) और ‘अर्द्धनारीश्वर’ (1992) में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता और स्त्री मुक्ति के भारतीय स्वरूप पर विचार किया. उनके कथा साहित्य में स्त्री अपने सम्मान के लिए लड़ती नज़र आती है. वे मानते हैं कि पुरुष प्रधान समाज ने नारी की अवमानना की कभी चिंता नहीं की और सदा ही पुरुष के पापों का दंड स्त्री को भोगना पड़ता है. ऐसे में उन्होंने स्त्री-पुरुष के मुक्त आसंग के प्रतिदर्श के रूप में शिव-पार्वती के युगल स्वरूप अर्द्धनारीश्वर की प्रस्तावना की है. 

जीवन मूल्यों के निरंतर ह्रास से विष्णु प्रभाकर बहुत चिंतित दिखाई देते हैं. उन्होंने अपने साहित्य में मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय मूल्यों को व्यापक स्थान दिया. उनके अनुसार जब तक राष्ट्रीय मूल्यों का विकास नहीं होगा तब तक पृथकतावादी ताकतों को पराजित नहीं किया जा सकता. राष्ट्रीय मूल्यों के अभाव के कारण ही सांप्रदायिकता, जातीयता और क्षेत्रीयता को हवा मिलती है. वे मानते हैं कि इन समस्याओं से मुक्ति के लिए छात्रों को बचपन से ही देशभक्ति का पाठ पढ़ाना चाहिए. इसीलिए उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती, बंकिमचंद्र, सरदार पटेल, शरतचंद्र, काका कालेलकर, शंकराचार्य, रवींद्रनाथ ठाकुर, बाजीप्रभु देशपांडे, भगत सिंह, गुरुनानक, कमाल पाशा, अहिल्या बाई, गोपबंधु दास, गिजु भाई, हारूँ-अल-रशीद और हजरत उमर जैसे महापुरुषों की बालोपयोगी जीवनियाँ भी लिखीं. 

‘आवारा मसीहा’ विष्णु प्रभाकर की साहित्य साधना का सुमेरु है. इसमें उन्होंने शरत की प्रामाणिक जीवनी एक सच्चे समर्पित शोधकर्ता की तरह खोजकर साहित्य की दुनिया के सामने रखी. यह जानना रोचक होगा कि इस रत्न के लिए उन्होंने चौदह बरसों तक साहित्य और समाज की ख़ाक छानी. ‘धर्मयुग’ के हवाले से यह कहना उचित होगा कि विष्णु प्रभाकर ने न केवल शरत के उपन्यासों, कहानियों, नाटकों, निबन्धों और भाषणों के सागर में डुबकियाँ लगाईं, बल्कि उनके जो संबंधी और मित्र मिल सके उनके साथ भेंटवार्ता की तथा उनके पास उपलब्ध शरत के निजी पत्रों का भी अध्ययन किया. इसके लिए उन्होंने बंगाल, बिहार और बर्मा के उन सभी स्थानों की यात्रा भी की जहाँ शरत रहे अथवा गए थे. इस साधना का ही यह परिणाम हुआ कि हिंदी को ‘आवारा मसीहा’ जैसा गौरवग्रंथ मिल सका.

इसमें संदेह नहीं कि विष्णु प्रभाकर ने अपने सृजनकर्म द्वारा संस्कृति, समाज, इतिहास और सभ्यता पर स्थायी प्रभाव छोड़ा है. वे भारतीय साहित्य के एक कालजयी हस्ताक्षर हैं. अत्यंत सौम्य, चारु और अनाक्रामक अतः दुर्लभ व्यक्तित्व के स्वामी विष्णु प्रभाकर का जीवन पुरुषार्थ और स्वावलंबन का उदाहरण है और उनका साहित्य भारत की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिबिंब. 
[भास्वर भारत / अप्रैल 2013 / पृष्ठ 37]

बुधवार, 12 जून 2013

अरुंधति रॉय का ‘आहत देश’ : प्रचार का विलक्षण गद्य



अरुंधति रॉय का ‘आहत देश’ 

अरुंधति रॉय (1961) मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में सुपरिचित बागी लेखिका है. उनका लेखन बड़ी सीमा तक व्यवस्था विरोधी ही नहीं प्रचारात्मक भी है. यही कारण है कि  ‘आहत देश’(2012)  को पढ़ते समय बराबर ऐसा लगता है कि लेखकीय पक्षधरता अपनी सीमाएँ लाँघकर राजनैतिक पक्षधरता अथवा ‘प्रोपेगंडा’ में तब्दील हो गई है. इसमें संदेह नहीं कि अरुंधति रॉय की तर्कप्रणाली विलक्षण है. और उनके गद्य में सम्मोहन है जिसे नीलाभ ने बखूबी हिंदी में उतारने (अनुवाद) में कोई चूक नहीं की है. अत्यंत सक्षम और सफल अनुवाद. 

इसमें संदेह नहीं कि भूमंडलीकरण (भूमंडीकरण) और असंतुलित विकास की झोंक में भारत की संघ और राज्य सरकारों ने पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों और आपराधिक शक्तियों के साथ  हाथ मिलाकर प्रकृति और पर्यावरण का जिस तरह दोहन किया है और आदिवासी जनजातियों को उजाड़कर मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर अव्यवस्था का जो तांडव चलाया हुआ है वह किसी भी प्रकार प्रशंसनीय और स्वीकार्य नहीं है. विस्थापित हो चुके या होने जा रहे आदिवासियों का अपना घर यानी जल, जंगल और जमीन जब उनके हाथ से जा रहा हो तो उनका आवाज उठाना न्यायसंगत है. और किसी भी संवेदनशील कलमकार को उनके पक्ष में खडा होना ही चाहिए. इस दृष्टि से यदि अरुंधति रॉय वंचितों-शोषितों के साथ खड़ी दिखाई दें तो अनौचित्य नहीं. 

लेकिन समस्या यह है कि राजनैतिक प्रतिबद्धता के चलते यदि कोई साहित्यकार जन प्रतिबद्धता और पार्टी प्रतिबद्धता को एक करके देखे तथा देश की व्यवस्था के लिए खतरा बन चुकी शक्तियों के साथ सहानुभूति ही न रखे बल्कि उनके साथ एकजुट दिखे तो कहना होगा कि राष्ट्रीय संदर्भ में उस साहित्यकार की प्राथमिकता का चयन अनौचित्यपूर्ण है. यही कारण है कि ऐसा साहित्य साहित्य कम और हिंसा की राजनीति करने वालों का प्रचार अधिक लगता है. ‘आहत देश’ (Broken Republic : Three Essays) का किस्सा भी यही है.

इस पुस्तक में तीन लंबे निबंध हैं जो मूलतः एक अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए लिखे गए थे. पहले निबंध में लेखिका ने चिदंबरम जी की खबर ली है. और ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के नाम पर माओवादी कहकर आदिवासियों के सफाये के सरकारी षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है. अभिप्राय यह है कि लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि सरकार विधिवत आदिवासी माओवादी लोगों के खिलाफ सुनियोजित युद्ध चला रही है अतः उन्हें भी आत्मरक्षा के लिए युद्ध का अधिकार है. लेकिन वे आदिवासियों की आड़ में आतंकवादी संगठनों की जनविरोधी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं कहतीं, न ही यह बतातीं कि इन संगठनों के तार कहाँ कहाँ से जुड़े हैं. एक अन्य (तीसरे) निबंध में चेरुकूरि राजकुमार उर्फ कॉमरेड आजाद की आदिलाबाद के जंगलों में आंध्रप्रदेश राज्य पुलिस द्वारा ह्त्या से जुड़े तथ्यों का विवेचन किया गया है. 

परंतु इस पुस्तक का सबसे रोचक और रोमांचक हिस्सा/ किस्सा इसका मध्य भाग है. इस निबंध का शीर्षक है ‘भूमकाल–कॉमरेडों के साथ’, जिसमें भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा माने जाने वाले माओवादी संगठन के लेखिका के दौरे का संस्मरण और रिपोर्ताज की शैली में सचित्र वर्णन है. माओवादियों के असुविधापूर्ण और कष्टों भरे जीवन को देखकर लेखिका ने उनकी जिजीविषा को पहचाना है. और माना है कि ये लोग अपने सपनों के साथ जीते हैं, जबकि बाकी दुनिया अपने दुस्वप्नों के साथ जीती है.

राजनीति अपनी जगह और जल-जंगल-ज़मीन-जीवन की चिंता अपनी जगह. यानी  अरुंधति रॉय को न तो पूरा स्वीकार किया जा सकता है और न पूरा खारिज. उनकी चिंताएँ उत्तरआधुनिक जगत की वे चिंताएँ हैं जो धरती के अस्तित्व से जुड़ी हैं. उनकी व्याख्याएँ उनकी अपनी है जिनसे सहमत होना जरूरी नहीं. 

*आहत देश, 
अरुंधति रॉय, 
अनुवाद – नीलाभ, 
2012, 
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 
पृष्ठ – 183, 
मूल्य – रु. 400/-
'भास्वर भारत'/ जून 2013/ पृष्ठ 52-53

मंगलवार, 11 जून 2013

'कहीं कोई दरवाज़ा' तलाशते अशोक वाजपेयी


(भास्वर भारत/ जून 2013/ पृष्ठ 52)


प्रार्थना  करो कि शब्दों पर भरोसा बना रहे 


‘कहीं कोई दरवाज़ा’ [2013] हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित  वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी [1941] का चौदहवाँ कविता संग्रह है. एक पके हुए कवि का यह कहते हुए युग चेतना के द्वार पर दस्तक देना आश्वस्त करता है कि कविता को लेकर उत्साह और उम्मीद में कोई कमी नहीं हुई है. निरुत्साह और नाउम्मीदी से भरे हुए वर्तमान में 62 कविताओं का यह संग्रह कवि ने इस स्वीकृति के साथ प्रस्तुत किया है कि यह समय दुर्भाग्य से ऐसा समय है जिसमें दरवाज़े तेजी से बंद हो रहे हैं और अंधेरा बढ़ता जा रहा है जिसे चकाचौंध ढाँप नहीं पा रही है. यानि यह अंधेरा चकाचौंध के बावजूद है जो चकाचौंध की व्यर्थता को उजागर करता है. 


ऐसे में कवि अपनी और कविता की चरितार्थता खोजता है. “कई बार कविता दरवाज़े के होने और उसके खुल सकने की उम्मीद में दी गई दस्तक हो सकती है. सख्ती से बंद और पूरी मुस्तैदी से अपने बंद होने का बचाव करने वाले दरवाजे, हो सकता है, आखिरकार न खुलें  पर कविता दस्तक तो दे ही सकती है. यह उम्मीद भी कर सकती है कि उसकी दस्तक से कहीं, हवा में सही या अधर में, कोई दरवाजा खुलता है – खुल सकता है.”  अभिप्राय यह है कि वैभव, ऐश्वर्य, आभिजात्य, देह और पार्थिवता के कवि समझे जाने वाले अशोक वाजपेयी इस कविता संग्रह में एक समाजचेता कवि के रूप में उपस्थित हैं. इस संग्रह में उनकी शब्द, कविता, संबंध, प्रकृति, प्रेम और धरती के अस्तित्व के प्रति चिंताएँ और शुभकामनाएँ एक साथ व्यक्त हुई हैं. 

कवि धरती को बचाने के लिए मनुष्य का आह्वान करता है क्योंकि मनुष्य का सब कुछ लौकिक, पार्थिव, मृण्मय और मटमैला  है – शब्द, कविता, जिजीविषा, आकांक्षा और हाथ सभी कुछ. ऐसे मनुष्य से कवि चाहता है कि खंड खंड पृथ्वी की अखंड वेदना के प्रति वह संवेदित हो और घायलों, बेघरबारों व अकारण मारे जाने वालों की पीड़ा में साझेदार हो. धरती का निरंतर विकास के नाम पर दोहन बेशक इस मनुष्य का गुनाह है. फिर भी कवि चाहता है – “अपने हाथों से उठाओ पृथ्वी/ और महसूस करो कि/ कभी हरी भरी, कभी भूरी सूखी/ उसकी वत्सलता कभी चुकती नहीं है.” (अपने हाथों से उठाओ पृथ्वी). सृजन की सारी संभावनाओं से भरी हुई यह पृथ्वी कभी स्त्री जाति लगती है तो कभी समग्र मानवता. इतनी बड़ी धरती है पर दुःखों को रखने की जगह आज के आदमी के पास नहीं है क्योंकि दुःख तो वाल्मीकि के समय से ही कविता की टोकनी में रखे जाते रहे हैं. बाज़ार हो चुकी दुनिया में आदमी अपने दुःख धरे भी तो कहाँ क्योंकि “यकायक पता चला कि टोकनी नहीं है./ पहले होती थी/ जिसमें कई दुःख और हरी-भरी सब्जियाँ रखा करते थे,/ अब नहीं है -/ दुःख रखने की जगहें धीरे-धीरे  कम हो रही हैं.” (टोकनी). 


ग़ालिब और कबीर अशोक वाजपेयी के प्रिय साहित्यकार हैं. इन्हें वे बार-बार अपनी कविताओं में रचते हैं. खासतौर से इस संग्रह में कबीर लगातार उनके साथ बने हुए हैं. कवि जब देखता है कि आत्मा में अंधेरा बढ़ रहा है, निरपराध खून बहाया जा रहा है जिसकी लालिमा जम कर दुनिया को काला कर रही है तब उसे कहने और चुप रहने की युक्तियों के बीच शब्द का उजियारा याद आता है. (जोत शब्द उजियारा हो). कवि को जब दूर होती प्रकृति से पास आने की प्रार्थना करनी होती है तो वह खुले नयन हँस-हँस देखते हुए पुकारता है – पास आओ. (खुले नयन मैं हँस हाँ देखूँ). ये नयन कबीर के समय से आज तक जाग रहे हैं और रो रहे हैं  क्योंकि दुखिया कबीर के लिए आज भी “कविता सब कुछ के बीतने पर/ अविरल विलाप है -/ पर जो हँस खेल कर/ अपने दिन बिताना चाहते हैं/ वे क्यों कर इस विलाप पर ध्यान दें? (जागै अरु रोवै). सारे रास्ते बंद हो जाते हैं तो गगन किवाड़ खुलता है. पर गगन किवाड़ कहीं गगन में नहीं धरती पर ही है. “क्या संभव है/ कि हम पहचान पाएँ/ कि धरती के किवाड़ ही/ अंततः गगन किवाड़ हैं.” (खुल गए गगन किवाड़). इसके लिए अपना घर बार अपनी धरती को छोड़कर अधर में मँडैया छा सकने का साहस चाहिए. (अधर मँडैया छावै).अशोक वाजपेयी और कबीर अपनी शब्द साधना में लगातार रत हैं. कबीर ने तो शब्द के सहारे अचीन्हे को चीन्ह लिया लेकिन आज का कवि अनास्था के जिस युग में जी रहा है वहाँ अभी तक अपरिचित सा  अंधेरा है – शब्द के बावजूद : “शब्द तो थे/ पर उनसे चीन्ह नहीं पाया/ अपना खूँखार समय,/ अपनी नश्वर नियति, अपना विफल अंतःकरण!” (ताते अनचिन्हार मैं चीन्हा). इसके बावजूद आश्वस्तिकर यह है कि कवि शब्दों पर भरोसा छोड़ने को तैयार नहीं है – 
“प्रार्थना करो
कि शब्दों पर भरोसा बना रहे और
किसी भी हालत में वे कम न पड़ें,
कि सहायता की हर पुकार का तुम उत्तर दे सको,
कि साधन भले कम पद जाएँ देने की इच्छा में कमी न आए,
कि दुनिया की तेज रफ्तार से भले हमकदम न रह सको
पर चलने का संकल्प न घटे.” (करो प्रार्थना)
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कहीं कोई दरवाजा, 

अशोक वाजपेयी, 
2013, 
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 
पृष्ठ – 108, 
मूल्य – रु. 250/-
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मंगलवार, 4 जून 2013

भारत मानवता की जन्मभूमि है – जयशंकर प्रसाद


बीसवीं शताब्दी के दूसरे तीसरे दशक में भारतीय साहित्य में लोकतंत्र और राष्ट्रीयता की चेतना से ओतप्रोत कृतियाँ रची गईं. यह युग ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मानसिक स्तर पर मुक्ति की घोषणा का युग था जिसके एक सिरे पर स्वराज्य को जन्मसिद्ध अधिकार मानने वाले लोकमान्य तिलक तथा दूसरी ओर भारतीय संस्कृति का पुनःअन्वेषण करने वाले गांधी विद्यमान थे. इस नवजागरण कालीन नई राष्ट्रीयता और मुक्ति कामना को व्यक्त करने वाले रचनाकारों में जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1890 – 14 जनवरी 1937) औरों से अलग दीखते हैं. उन्होंने अपने समशील रचनाकारों के साथ मिलाकर जहाँ एक ओर व्यक्तिमन की उन्मुक्ति को प्रकट किया वहीं भारतीय समाज को युगों से जकड़कर रखने वाली सामंतवादी रूढ़ियों और विधि-निषेधों के खिलाफ स्वातंत्र्य चेतना का बिगुल बजाया. 

जयशंकर प्रसाद ने  भारतीयों को याद दिलाया कि यह महादेश जिस महान विरासत का उत्तराधिकारी है उसके होते हुए हमारा गुलाम पड़े रहना हमारी अपनी अकर्मण्यता का प्रतीक है. उन्होंने श्रद्धा जैसे उदात्त पात्र के माध्यम से आशा, संकल्प और निर्भीकता का संदेश दिया कि “डरो मत अरे अमृत संतान/ अग्रसर है मंगलमय वृद्धि/ पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र/ खींची आवेगी सकल समृद्धि.” जैसा कि मुक्तिबोध ने लिखा है, ये पंक्तियाँ इस बात की साक्षिणी हैं कि उस समय का साहित्य देशव्यापी जीवन आशाओं और आदर्शों से न केवल समन्वित हो चुका था वरन् इतना सबल भी हो गया था कि वह देश और व्यक्ति में परिव्याप्त मानव गरिमा को प्रस्तुत कर सके. उनके अनुसार प्रसाद का यह साहित्य इस बात का जीवंत प्रतीक है कि राष्ट्रवाद अब अपने को वर्तमान तथा भविष्य का निर्णायक निर्माता समझता था तथा अपनी अंतिम विजय में उसे संपूर्ण विश्वास हो गया था – ऐसा विश्वास जो जीवन तथ्यों पर, मानव संबंधों पर, जीवन की सृजन शक्तियों पर आधारित है.

जयशंकर प्रसाद ने काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी और निबंध आदि विधाओं में अल्पसमय में प्रभूत लेखन किया और हिंदी को कालजयी कृतियाँ प्रदान कीं. अपनी रचनाओं में उन्होंने राष्ट्रीयता के जिस रूप को प्रतिपादित किया उसमें इतिहासबोध के आधार पर प्राप्त  उनकी यह स्थापना बड़े काम की है कि हम भारतभूमि के मूल निवासी हैं और हमीं ने सारी दुनिया को सभ्यता का पहला पाठ पढ़ाया था, परंतु कालांतर में नित्य विलासी और प्रकृति का दोहन करने वाली प्रवृत्ति ने हमें इतना कमजोर कर दिया कि हम लंबी गुलामी के फेर में फँस गए. प्रसाद जी ने ‘कामायनी’ के प्रथम सर्ग में यह जताया है कि देव संस्कृति अपने अंतर्विरोधों के कारण नष्ट हो गई और मनुष्य संस्कृति अपनी भातरी ताकत के दम पर उसके बाद खड़ी हुई. दरअसल यह पुराने भारत की राख में से नए भारत के जी उठने का प्रतीकात्मक आख्यान है. जैसा कि डॉ.नामवर सिंह मानते हैं, “देव संस्कृति का ध्वंस वस्तुतः हिंदू राजाओं और मुसलमान नवाबों तथा मुग़ल बादशाहों  के विध्वंस का प्रतीक है. उनका नाश इसलिए हुआ कि वे ‘अगतिमय’ थे. इसलिए अंग्रेज़ों ने एक-एक करके भारतीय राजाओं को तोड़ दिया और इस विध्वंस लीला का उत्कट रूप सन 57 दिखाई पड़ा. प्रसाद ने इतिहास की इस मार  को प्रकृति का प्रकोप कहा है.” 

दरअसल प्रसाद का सारा साहित्य इस अगतिमयता या जड़ता से टकराने की प्रेरणा देने वाला शक्ति साहित्य है. उन्होंने कई प्रभाती और जागरण गीतों की रचना की जो शक्ति और चेतना के आवाहन से परिपूर्ण हैं. ‘प्रथम प्रभात’, ‘आँखों से अलख जगाने को’, ‘अब जागो जीवन के प्रभात’ और ‘बीती विभावरी जाग री’ जैसे गीत राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष की प्ररणा से जुड़े हैं. कवि बार-बार पुकार-पुकार कर जागने और जगाने की बात करता है. ‘आँसू’ जैसा प्रेम काव्य भी इससे अछूता नहीं है – 
“वह मेरे प्रेम विहँसते जागो, मेरे मधुवन में, फिर मधुर भावनाओं का कलरव हो इस जीवन में !मेरी आहों में जागो सुस्मित में सोने वाले ! **** ****हे जन्म-जन्म के जीवन साथी संसृति के दुख में;पावन प्रभात हो जावे जागो आलस के सुख में !”
अपने नाटकों में प्रसाद अधिक मुखर प्रतीत होते हैं – छायावादी सांकेतिकता से आगे बढ़कर सीधे युद्ध की मुद्रा में!  उनके नाटक आज भी उस समय बहुत प्रासंगिक लगते हैं जब हम भारतीय क्षेत्रवाद और भाषावाद के नाम पर अपने देश के टुकड़े करने पर उतारू होते दीखते हैं. आज के पृथकतावादियों को चाणक्य की यह पुकार क्यों नहीं सुनाई देती – “तुम मालव हो और यह मागध, यही तुम्हारे मान का अवसान है न? परंतु आत्मासम्मान इतने से ही संतुष्ट नहीं होगा. मालव और मागध को भूलकर जब तुम आर्यावर्त का नाम लोगे, तभी वह मिलेगा. क्या तुम नहीं देखते हो कि आगामी दिवसों में आर्यावर्त के सब स्वतंत्र राष्ट्र एक अनंतर दूसरे विदेशी विजेता से पददलित होंगे?” कहना न होगा कि यदि आज का भारत अलगाववादी साजिशों का शिकार हो गया तो नई तरह की गुलामी इस देश को झेलनी पड़ सकती है. 

प्रसाद जी चाहते थे कि भारत की संस्कृति और सभ्यता मनुष्यता के उस उच्च शिखर तक पहुंचे कि दुनिया के किसी भी देश के लोग यहाँ पहुँचकर सहारा और शांति पा सकें. वे भारत को त्याग और ज्ञान के पालने के रूप में देखते थे और मानते थी कि अन्य देश जहाँ मनुष्यों की जन्मभूमि है यह भारत मानवता की जन्मभूमि है. 

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत के स्वाधीन लोकतंत्र बनने से बीस साल पहले क्रांतद्रष्टा साहित्यकार जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक ‘चंद्रगुप्त’ [1931] में मगध के माध्यम से स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वप्न देखा था और चाणक्य के उद्बोधन के रूप में अपनी अभीष्ट व्यवस्था की रूपरेखा इस प्रकार प्रस्तुत कर दी थी – “मगध के स्वतंत्र नागरिकों को बधाई है. आज आप लोगों के राष्ट्र का नवीन जन्म दिवस है. स्मरण रखना होगा को ईश्वर ने सब मनुष्यों को स्वतंत्र उत्पन्न किया है, परंतु व्यक्तिगत स्वतंत्रता वहीं तक दी जा सकती है, जहाँ दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा न पड़े यही राष्ट्रीय नियमों का मूल है. .... मंत्रिपरिषद की सम्मति से मगध और आर्यावर्त के कल्याण में लगो.”

आर्यावर्त के कल्याण में लगने के इस आवाहन के संदर्भ में ‘चंद्रगुप्त’ नाटक का ही यह प्रसिद्ध आवाहन गीत याद हो आना स्वाभाविक है - 
“हिमाद्रि तुंग शृंग से
 प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला
स्वतंत्रता पुकारती –
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ है – बढ़े चलो बढ़े चलो !
असंख्य कीर्ति रश्मियाँ
 विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के
रुको न शूर साहसी !
अराति सैन्य सिंधु में सुवाडवाग्नि से जलो !
प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो !”
 - भास्वर भारत,  जनवरी-फरवरी  2013, पृष्ठ 51. 

सोमवार, 3 जून 2013

भक्ति ही नहीं, शृंगार साहित्य भी दक्षिण की देन

भारत को खंड खंड करने के अनेक प्रयासों के बावजूद समय समय पर ऐसे उदाहरण सामने आते रहते हैं जो इस देश की सामासिकता और अखंडता को प्रमाणित करते हैं. षड्यंत्रपूर्वक भारतीय संस्कृति को आर्य संस्कृति और द्रविड़ संस्कृति में बाँटना या भारतीय भाषाओं को आर्य भाषा और द्रविड़ भाषा कहकर अलगाना वास्तव में राष्ट्र को विखंडित करने के षड्यंत्र के रूप में ही सामने आया था. लेकिन इतिहास और संस्कृति के भारतीय अध्येताओं ने यह दिखा दिया कि ऊपरी भेदभाव के बावजूद भीतर से भारतीय जनमानस एक हैं. भक्ति आंदोलन इस सांस्कृतिक एकता की एक बड़ी मिसाल है. आर्य-द्रविड़ विभाजन को स्वीकार करने वाले भी इस तथ्य से इनकार नहीं करते कि भक्ति का जो उभार उत्तर भारत में 15वीं-16वीं शताब्दी में सामने आया उसकी प्रेरणा दक्षिण भारत के भक्ति साहित्य में निहित है जिसका रचनाकाल 6-9 वीं शताब्दी तक माना जाता है. नायनमार और आलवार भक्तों की इन रचनाओं से ही अनुग्रह और प्रतिपत्ति का वह तत्व विकसित हुआ जिसने परवर्ती काल में भक्ति आंदोलन के केंद्रीय मूल्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की. निश्चय ही भारत की धार्मिक समन्वयमूलक सामाजिक संस्कृति के लिए यह तमिल प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान रहा है.
भारतीय संस्कृति और साहित्य को द्रविड़ों, विशेषकर तमिलों, के योगदान की सूची में इधर यह नया तथ्य भी आ जुड़ा है कि भक्ति ही नहीं शृंगार साहित्य का भी उद्गम द्रविड़ क्षेत्र ही है. यह स्थापना हिंदी और तमिल साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ एम.शेषन ने अपने ग्रंथ ‘तमिल साहित्य : एक परिदृश्य’ (2012) में साहित्यिक और भाषाई अंतर्साक्ष्यों के आधार पर की है. डॉ शेषन की स्थापना प्रत्यक्ष के स्थान पर अनुमान-प्रमाण पर आधारित होते हुए भी इस दृष्टि से ग्राह्य प्रतीत होती है कि इससे उत्तर और दक्षिण की भाषाओं का प्राचीन काल से ही आपसी संबंध एक बार फिर साबित होता है – भले ही स्वयं शेषन जी संस्कृत/ हिंदी और तमिल के अलग अलग भाषा परिवार मानते है.
डॉ शेषन ने यह लाख टके का सवाल उठाया है कि हिंदी का रीतिकालीन शृंगार काव्य अपनी तमाम प्रवृत्तियों में जिस ‘गाथाशप्तसती’ के निकट प्रतीत होता है उसकी प्रेरणाभूमि क्या थी और फिर लाख टके का यह जवाब भी दिया है कि जिन काव्य-रूढ़ियों और काव्य-परंपराओं की आधारभित्ति पर रीतिकाव्य में शृंगारपरक मुक्तकों की रचना हुई वे रूढ़ियाँ अनेक शताब्दीपूर्व प्राकृत में रचित ‘गाथाशप्तसती’ के युग में  दक्षिण भारत के लोक जीवन से प्रस्फुटित हुई थीं. अपनी बात को उन्होंने 500 ई पूर्व से 300 ई तक रचित तमिल संगम काव्य के आधार पर सिद्ध किया है जो मूलतः शृंगार काव्य है.

वास्तव में डॉ शेषन की यह स्थापना बहुत महत्वपूर्ण है और इस दिशा में गहन अनुसंधान की आवश्यकता है ताकि भारतीय साहित्य की मूलभूत प्रेरणाओं को नस्लवादी सोच से ऊपर उठकर पहचाना जा सके. आज जब वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत के पूर्वज एक ही नस्ल के थे तो फिर यह क्यों नहीं स्वीकार किया जाना चाहिए कि भारतीय लोकमानस में शृंगार की धारा एक जैसी अकुंठ प्रवाहित होती रही है!
शेषन जी के ग्रंथ में तमिल प्रजाति की प्राचीनता से लेकर तमिल साहित्य में महिलाओं के योगदान तक पर केंद्रित 22 शोधपूर्ण और प्रामाणिक निबंध संकलित हैं. ये निबंध भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषताओं को भी सामने लाने का काम करते हैं. सभी साहित्य और संस्कृति प्रेमियों क लिए यह एक अनिवार्यतः पठनीय और विचारणीय ग्रंथ है.
तमिल साहित्य : एक परिचय
डॉ एम.शेषन 
2012 
अभिव्यक्ति प्रकाशन, 29/61, गली नं. 11, विश्वास नगर, दिल्ली – 110032, 
पृष्ठ – 232, 
मूल्य – रु. 97/-
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                                                                                             - भास्वर भारत - दिसंबर 2012- पृष्ठ 60.

आतंकवाद एक हिंसक विचारधारा है

वर्तमान विश्व को सबसे बड़ा खतरा जिस एक चीज से है वह है आतंकवाद. रक्तबीज की तरह आतंकवाद खुद अपने रक्तबिंदुओं में से नए भीषण, क्रूर, नृशंस और पैशाचिक स्वरूपों में प्रकट होता रहता है. आतंकवाद व्यवस्थित प्रकार से हिंसा का ऐसा प्रयोग है जिसके द्वारा व्यापक जनसंख्या को भयभीत करके किसी विशेष प्रकार का राजनैतिक लक्ष्य प्राप्त किया जा सके. वामपंथी और दक्षिणपंथी राजनैतिक संस्थाएँ, राष्ट्रीय और धार्मिक संगठन और विद्रोही जन ही नहीं, सेना, गुप्तचर और आसूचना संस्था तथा पुलिस जैसे राष्ट्रीय संगठन भी आतंकवाद का रास्ता अपनाते देखे गए हैं. वास्तव में यह एक विवादित अर्थ वाला शब्द है लेकिन यह तय है कि आतंकवाद में हिंसा या हिंसा के डर का समावेश अनिवार्य रूप से होता है. वास्तव में यह एक प्रकार का वाद है जो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए नए नए तरीके अपनाते हुए व्यक्ति, समूह, समुदाय, सरकार अथवा वैश्विक समाज को भयभीत करता है, भयादोहन की नई नई तकनीकें ईजाद करता है तथा न तो राष्ट्रीय कानूनों को मानता है और न ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को स्वीकार करता है. 

विश्वजीत ‘सपन’ (1968) द्वारा लिखित ‘आतंकवाद : एक परिचय’ (2011) इस अत्यंत चुनौतीपूर्ण वैश्विक समस्या पर अत्यंत प्रामाणिक और शोधपूर्ण ग्रंथ है. स्मरणीय है कि विश्वजीत ‘सपन’ 1994 से भारतीय पुलिस सेवा में कार्यरत हैं तथा इस समस्या से वैचारिक और व्यावहारिक स्तर पर जूझते रहे हैं. इस समस्या को संपूर्णता और गहराई से विश्लेषित करने के विचार से उन्होंने कुछ वर्ष पहले एक साप्ताहिक पत्र के लिए स्थायी स्तंभ के अंतर्गत जो कुछ लिखा उसे ही सहेज सँवार कर अब इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. 

लेखक ने विस्तार से आतंकवाद की अवधारणा, उत्पत्ति, स्वरूप और प्रकार पर प्रकाश डालते हुए इसके विभिन्न कारणों की पड़ताल की है. आतंकवाद की चुनौतियों का जायजा लेते हुए भारत में आतंकवाद के विस्तार का मानचित्र प्रस्तुत किया गया है कि कैसे पंजाब पर छाया आतंक पूरे भारत पर छा गया और किस प्रकार जम्मू एवं कश्मीर राज्य एक सुनियोजित आतंकवाद का शिकार हुआ. इसी प्रसंग में पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में आतंकवाद के फैलाव का भी विश्लेषण किया गया है. लेखक ने नक्सलवाद पर भी प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत की है तथा देश में आतंकवाद के कारणों की समीक्षा करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि आतंकी बनते हैं और बनाए भी जाते हैं. 

आज पूरी दुनिया जिस खास तरह के आतंकवाद से त्रस्त है वह है मजहबी आतंकवाद. लेखक ने इसका विश्लेषण इस्लामिक आतंकवाद के तहत किया है. दरअसल धार्मिक आतंकियों की इच्छा सदा से सामूहिक हत्या के हथियारों के इस्तेमाल की रही है जो उन्हें बेनकाब करने के लिए काफी है. ऐसे तमाम संगठन मनुष्यविरोधी तथा लोकद्रोही, अतः ईश्वरद्रोही, ही माने जाने चाहिए. लेखक ने याद दिलाया है कि ओसामा बिन लादेन ने अपने अनुयायियों को यह पाठ पढ़ाया था कि इस्लाम को बचाने के लिए वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रकशन का इस्तेमाल इस्लामसम्मत है. उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया है कि सिक्ख धर्म से वास्ता रखने वाले आतंकवादियों ने अपने धर्मग्रंथ को ऐसी लड़ाइयों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जबकि इस्लामी आतंकवादियों ने कुरआन को अपनी ढाल बनाने की भरसक कोशिशें की हैं. यही कारण है कि उनके पास ‘उन्मादियों’ की कमी नहीं है. दूसरी ओर इस सच से भी लेखक ने इनकार नहीं किया है कि अधिकतर मुसलमान इस बर्बर आतंकवाद के बिलकुल खिलाफ हैं. इसके पश्चात लेखक ने विस्तार से आतंकवाद और जिहाद पर प्रकाश डाला है और यह दर्शाया है कि जिहाद वह नहीं है जैसा चंद कट्टरपंथियों द्वारा बताया और सिखाया जा रहा है. 

आगे आतंकवाद से लड़ने की रणनीति, इसके समाधान और रोकथाम के लिए जन सामान्य की भूमिका पर विचार किया गया है. स्मरण रहे कि भारत जैसा महादेश दशकों से आतंकवाद से जूझ रहा है. परंतु उसे उखाड़ फेंकने में सफल नहीं हो पाया है. इसके बावजूद लेखक का यह कथन भी विचारणीय है कि “यह तो कहना ही गलत होगा कि हमने अब तक कुछ नहीं किया है बल्कि हमें यह कहना चाहिए कि हम अब तक इसे जड़ से समाप्त नहीं कर सके हैं, लेकिन हमने अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी से कोशिश की और इन्हें कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ने से रोकने में कामयाब भी रहे हैं. वरना इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान की तरह हमारा भी देश इनके चंगुल में पूरी तरह से फँस चुका होता. हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारी सेना और पुलिस ने हजारों अधिकारियों एवं कर्मचारियों की कुर्बानियाँ दी हैं. उन कुर्बानियों को यह कहकर कि इन्होंने कुछ नहीं किया, झूठा साबित नहीं किया जा सकता.” 
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आतंकवाद : एक परिचय, 
विश्वजीत ‘सपन’, 
2011, 
आकृति प्रकाशन, एफ – 29, सादतपुर एक्स., दिल्ली – 110094, 
पृष्ठ – 303, 
मूल्य – रु. 630/- 
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- भास्वर भारत - दिसंबर 2012- पृष्ठ 59-60.

दान से नहीं होगा टिकाऊ विकास

पूर्व राष्ट्रपति और जाने माने वैज्ञानिक ए.पी.जे.अब्दुल कलाम अपने कृतित्व और चिंतन के कारण 21 वीं शताब्दी के भारतीय नागरिकों के प्रेरणापुरुष हैं. उन्होंने भारत को आर्थिक रूप से विकसित विश्वशक्ति बनाने के सपने को साकार रूप देने के लिए एक कार्ययोजना प्रस्तुत की थी. वस्तुतः उन्होंने देश विदेश के अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर अपनी स्थापनाओं को प्रतिपादित किया है. ‘खुशहाल व समृद्ध विश्व’ (2012) शीर्षक से प्रकाशित उनकी और उनके सहयोगी सृजन पाल सिंह की कृति मूलतः अंग्रेज़ी में लिखी गई ‘टारगेट 3 बिलियन’ का हिंदी अनुवाद है. इस कृति की भी प्रथम विशेषता यही है कि यह लेखक के प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित है. डॉ कलाम ने इस यथार्थ का गहराई से विवेचन किया है कि वैश्विक समाज में अभी तक शहरी और ग्रामीण इलाकों में बड़ी खाई है जो आय के स्तर और मानवीय सुविधाओं की गुणवत्ता के अंतर के रूप में दिखाई देती है. यदि हम सुखी, शांत और समृद्ध दुनिया चाहते हैं तो इस खाई को पाटना जरूरी है. यह पुस्तक इसी संदर्भ में टिकाऊ विकास प्रणाली की रणनीति सुझाने का प्रयास करती है. 

खुशहाल और समृद्ध विश्व के लिए यहाँ जिस योजना का प्रारूप दिया गया है उसका नाम है पुरा (PURA – Provision of Urban Amenities in Rural Areas) . इसका उद्देश्य विश्व के ग्रामीण लोगों की स्थितियों को सुधारना और उन्हें टिकाऊ विकास प्रदान करना है. स्मरणीय है कि विश्व के अल्पविकसित और विकासशील देशों में ही नहीं बल्कि विकसित देशों के भी कुछ भागों में ग्रामीण जनजीवन अत्यंत पिछड़ा हुआ है और ऐसे ग्रामीणों की प्रतिभा तथा संसाधन उपेक्षित पड़े रह जाते हैं. अभावों की स्थिति का सामना कर रहे और विकास के अवसरों से वंचित दुनिया के ऐसे ग्रामीणों की जनसंख्या तीन अरब से अधिक है. तीन अरब की यह जनसंख्या वैश्विक नीति निर्माण, राष्ट्रीय शासन तथा कॉरपोरेट सेक्टर की दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए भी विकास के अवसरों से वंचित है लेकिन यदि स्थितियाँ ऐसी ही बनी रहीं तो एक न एक दिन यही जनसंख्या वर्त्तमान आर्थिक सभ्यता के लिए विस्फोटकारी साबित होगी. लेखकों ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि निरंतर बढ़ते लोकतांत्रिक विश्व में, इन्हीं के पास सरकार की चाभी होगी और ये विश्व में वृद्धिशील बाजार और उद्योगों के लिए स्रोत केंद्र भी प्रस्तुत करेंगे. इसलिए सात अरब की जनसंख्या वाले वर्तमान जगत को स्थिर और स्थाई रखने के लिए इन तीन अरब लोगों के विकास पर सबसे पहले ध्यान देना होगा तथा इनके लिए समुचित रोजगार मुहैया कराने होंगे.

अनेक वर्षों से यह देखने में आया है कि पिछड़े समुदायों को आगे लाने के लिए आरक्षण और दान की नीति अपना ली जाती है. परंतु आरक्षण और दान से स्थायी विकास के स्थान पर अकर्मण्यता और परनिर्भरता जैसे रोग ही पनपते हैं. ऐसी स्थिति में यह पुस्तक विस्तार से यह स्पष्ट करती है कि सरकार, निजीक्षेत्र और समुदाय आपस में निकटता से मिलकर ऐसे सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में काम कर सकते हैं जो दान के बजाय सशक्तीकरण पर आधारित हो. 

इस पुस्तक की यह एक बड़ी विशेषता है कि इसमें एक ओर तो भारतीय ग्रामीण क्षेत्र की चुनौतियों और अवसरों का आकलन किया गया है तथा दूसरी ओर इस प्रकार के दिशा निर्देश भी दिए गए हैं कि अब तक अनछुए रहे व्यापक तथा विस्तृत ग्रामीण क्षेत्र में उतरने के लिए दुनिया के किसी भी सक्षम उद्यमी को किस प्रकार की कार्यप्रणाली अपनानी चाहिए. नीति निर्माताओं और उद्यमिता क्षेत्र के लिए एक मार्गदर्शक कृति!
खुशहाल व समृद्ध विश्व 
 एपीजे अब्दुल कलाम और सृजन पाल सिंह 
2012
प्रभात प्रकाशन,
4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली – 110002 
पृष्ठ – 328
मूल्य – 400/-
- भास्वर भारत - दिसंबर 2012- पृष्ठ 59.

रविवार, 2 जून 2013

लालित्य में लिपटा इतिहास

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई के पूर्व वैज्ञानिक और भारतीय राजस्व सेवा, नई दिल्ली में आयकर आयुक्त गोपाल कमल विज्ञान, दर्शन और इतिहास के मर्मज्ञ विद्वान हैं. भारतीय संस्कृति उनका विशेष रुचि क्षेत्र है. ‘हिंद महासागर का सांस्कृतिक इतिहास’ (2012) में उन्होंने सांस्कृतिक दृष्टि से हिंद महासागर की अंतर्यात्रा का ब्यौरा दिया है. यह ग्रंथ दक्षिण पूर्व एशिया, हिंदुस्तान और हिंद महासागर के सांस्कृतिक इतिहास और नैतिक भूगोल को अत्यंत रोचक, काव्यात्मक, कथारस से परिपूर्ण और ललित शैली में प्रस्तुत करता है. दक्षिण पूर्व एशिया और  भारत के लगभग चार हजार वर्ष पुराने संबंधों को यहाँ फिर फिर इसलिए खंगाला गया है कि इन देशों के भावी संबंधों को सुदृढ़ पीठिका प्राप्त हो सके.
हिंद महासागर के देशों की भौगोलिक एकरूपता को भी सामने लाने वाली यह इतिहास-कृति विविध प्रकार की शोध सामग्री पर आधारित, अतः ठोस और प्रामाणिक, है लेखक की यह चिंता अत्यंत प्रासंगिक है कि स्वतंत्रता आंदोलन तक के इतिहास लेखन में भारतीयपन की उपेक्षा की प्रवृत्ति बढ़ रही है. इसीलिए स्थानीयता और हाशियाकृत समुदायों को केंद्र में लाने का प्रयास करने वाली यह कृति भारतीयपन को निरंतर अग्रप्रस्तुत करती चलती है.
सर्वथा मौलिक शैली में लिखित यह सांस्कृतिक इतिहास दस खंडों में विभाजित है. जैसे – मौनसून उपनिषद, मैंने पूछा, इतिहास लिखूंगा, अंकोर के आसपास, डूबंत जहाज़ों का इतिहास, शून्य जहाजी, मौनसून प्रेडिक्शन नदियाँ, कहानी मौनसून दे....व, सागर से ऐसी क्या दूरी, आग्नेय एशिया हिंदुस्तान नैतिक भूगोल और चौहद्दी.
गोपाल कमल संस्कार से कवि हैं. इतिहास की यात्रा भी वे कविता के साथ करते हैं. कोलंबस का दिशा काक उन्हें वेदों के दवा सुपर्णा की याद दिलाता है तो मौनसून के मिजाज की बात करते समय उन्हें कालिदास और साधु साध्वियों के चातुर्मास याद आते हैं. यानि शुद्ध इतिहास की खोज करने चलें तो यहाँ सब कुछ गड्डमड्ड प्रतीत हो सकता है, लेकिन लालित्य में इतिहास रस के खोजी निराश नहीं होंगे. उन्हें ऐसे प्रश्नों के उत्तर यहाँ मिलेंगे जैसे –
“डूबना डोंगी का
तट का
जहाजी, नमाजी का
आनेवाले कल का
बीत गए माजी का
बहते उनचास पवन
बहतीं नदियाँ पुननुन 
भादों में भरी-पूरी
डूबी कैसे डोंगी?”
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हिंद महासागर का सांस्कृतिक इतिहास, 
लेखक – गोपाल कमल, 2012, 
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन, 
1-बी, नेताजी सुभाष  मार्ग, 
नई दिल्ली – 110002, 
पृष्ठ – 448, 
मूल्य–700
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                                                                                                - भास्वर भारत - नवंबर 2012- पृष्ठ 53.

जैन चित्रांकन परंपरा पर एक अनूठा ग्रंथ

भारत की कला परंपरा समग्रता की अवधारणा पर केंद्रित है क्योंकि यहाँ आनंद, रस और सौंदर्य को अखंड माना गया है. किसी भी काल की कला को ले ले, वह अपने समय के विश्वास, उल्लास, उत्सव और संघर्ष को सहजता से अभिव्यक्त करती दीखती है. यह सहजता हमारे कला दर्शन का ही नहीं जीवन दर्शन का भी केंद्रीय मूल्य है. कलाकार का अपना जीवन भी सहज हो, सहज कला के लिए यह भी आवश्यक माना गया है. संभवतः यही कारण है कि अनेक उत्कृष्ट कलाकार सहज जीवन जीने वाले साधु रहे हैं जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से निजता का विसर्जन करते हुए आत्मदान को सिद्ध किया है और अपने लिए नाम तक नहीं कमाया है. जैन कला का इन कला मूल्यों को प्रतिष्ठित करने में बड़ा योगदान रहा. जैन परंपरा को यह श्रेय जाता है कि उसने अत्यंत प्राचीन समय में सचित्र ग्रंथों की रचना की और भारत की चित्रांकन परंपरा को अप्रतिहत रूप से जारी रखा. इस तथ्य पर विस्मय किया जा सकता है कि अनेक मुस्लिम आक्रमणों के तहत हुए ध्वंस और संहार के बीच जैन कला परंपरा ने अपने आपको अक्षुण्ण बनाए रखा. 

‘जैन चित्रांकन परंपरा’ (2012) में प्रसिद्ध साहित्यकार और कला समीक्षक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने गहन अध्यवसायपूर्वक इस परंपरा की पहचान कराई है. उच्च कोटि के आर्ट पेपर पर मुद्रित इस बड़े आकार के नयनाभिराम ग्रंथ में लेखक की जीवन साधना रूपायित हुई है. उन्होंने इसमें जैन दर्शन तथा जैन चित्रांकन परंपरा की यथासंभव संपूर्ण जानकारी सहेजना का सफल उद्यम किया है. इसका मुख्य उपजीव्य ग्रंथ ‘आहोर कल्पसूत्र’ है. मुग़ल कलम के पहले आश्रयदाता सम्राट अकबर के काल में निर्मित ‘आहोर कल्पसूत्र’ को लेखक ने एक ऐसी विरल धरोहर माना है जिसका निर्माण मुग़ल कलम से सर्वथा अप्रभावित पारंपरिक जैन शैली में राजस्थान के जालौर जिले की तहसील आहोर में हुआ. लेखक ने विस्तार से पश्चिम भारतीय शैली में निर्मित इसके चित्रों का विवेचन किया है और आँखों से लेकर परिधानों तक के अंकन की विशेषताओं की व्याख्या की हैं. 

‘आहोर कल्पसूत्र’ की चित्रावली के अंतर्गत इस ग्रंथ में संजोई गई कृतियाँ अत्यंत आकर्षक और प्रभावी हैं. प्रत्येक प्रतिकृति के नीचे उस चित्र का शीर्षक और संक्षिप्त विवरण दिया गया है. कलाप्रेमियों और संस्कृति के अध्येताओं के लिए अनिवार्य ग्रंथ!

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‘जैन चित्रांकन परंपरा’, लेखक – नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, 2012, प्रकाशक – बेनी माधव प्रकाशन गृह, इंदिरा गांधी वार्ड, हरदा – 461331 (म.प्र.), पृष्ठ – 319, मूल्य – रु.1500
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                                                                                                 - भास्वर भारत - नवंबर 2012- पृष्ठ 52.

रेखांकनों–सूक्तियों में गाँधी

पिछली शताब्दी के दुनिया भर के चिंतन को जिन महापुरुषों ने स्थायी रूप से प्रभावित किया उनमें महात्मा गांधी का नाम अग्रगण्य है. महात्मा गांधी अपने समय के सर्वाधिक प्रगतिशील चिंतकों में थे. उन्होंने भारत की आत्मा को पहचाना था – अपने अन्वेषण द्वारा. उनके लिए सत्य सर्वोपरि था – ईश्वरस्थानीय. उन्होंने राष्ट्रभक्ति को इतना व्यापक बना दिया था कि विश्व प्रेम और मानव प्रेम तक उसकी परिधि में समा गए थे. उन्होंने अनुभव की प्रामाणिकता तथा कथनी और करनी की एकरूपता पर बल दिया एवं व्यक्ति और समाज को द्वंद्व-संबंध के रूप में नहीं सह-संबंध के रूप में व्याखायित किया – अपने उदाहरण द्वारा चरितार्थ भी. यही कारण है कि जीवानानुभव से निःसृत उनकी सूक्तियाँ व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों का काम करती हैं. 

गांधी चिंतन की प्रासंगिकता 21 वीं सदी में और भी बढ़ गई है क्योंकि आज का मनुष्य सब ओर से लोभ और भय से घिरा हुआ है – बाजार और राजनीति के आतंक के साये में. यही कारण है कि जब किसी भी वेश में गांधी चिंतन वर्तमान पीढ़ी के समक्ष आता है तो वह उससे चमत्कृत भी होती है और  प्रभावित भी. इस दृष्टि से गांधी चिंतन आज भी अपने नए नए पाठों में टटकापन लिए हुए प्रतीत होता है. डॉ जे.पी.वैद्य द्वारा प्रस्तुत माहात्मा गांधी के रेखांकनों और सूक्तियों का संकलन ‘बापू ने कहा था’ (2012) ऐसा ही ताजा टटका पुनर्पाठ है. 174 पृष्ठ की इस नयनाभिराम द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) पुस्तक का हर पृष्ठ बहुमूल्य है – सहेजने लायक है. डॉ जे.पी.वैद्य अत्यंत समर्पित और प्रतिबद्ध गांधीवादी हैं. वे यों तो प्रख्यात चिकित्सक हैं लेकिन कवि और कहानीकार के साथ साथ रेखाचित्र और कार्टूनकार के रूप में भी उन्होंने बड़ी प्रतिष्ठा कमाई है. वे इस बात के लिए चिंतित रहते हैं कि आज के भारतीय समाज और उसके जीवन में गांधी तत्व की कमी होती जा रही है. वे यह भी महसूस करते हैं कि महात्मा गांधी इतने सरल थे कि आज के टेढ़ी सोच वाले मनुष्यों के लिए उन्हें समझ पाना या उनके मार्ग पर चलना असंभव प्रतीत होता है. इसीलिए उनकी उक्तियों को डॉ वैद्य ने रंगीन रेखांकनों एवं कार्टूनों के माध्यम से जन जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है.

‘बापू ने कहा था’ के प्रथम खंड में महात्मा गांधी के लेखन के कुछ अंश संजोए गए हैं जिनमें स्वतंत्रता, प्रेम, सत्याग्रह और अहिंसा जैसे विषयों पर उनकी स्पष्ट मान्यताओं को अभिव्यक्ति मिली है. इससे पता चलता है कि महात्मा गांधी स्वतंत्रता और रामराज्य को पर्याय मानते थे और चाहते थे कि राजनैतिक, आर्थिक और नैतिक स्वतंत्रता रामराज्य के लिए आधारभूत मूल त्रिकोण का काम करें. कहने कि आवश्यकता नहीं है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी गांधी द्वारा परिकल्पित इस त्रिआयामी आजादी को पाना अभी शेष है. आगे गांधी जी का जीवन क्रम और उनके आंदोलन संबंधी सूचनाएं सूचीबद्ध की गई हैं. इस सारी सामग्री को पुस्तक का पूर्व भाग कहा जा सकता है. इसी प्रकार उत्तर भाग में विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेताओं और महापुरुषों की गांधी के प्रति श्रद्धांजलियों को चित्रों के साथ सहेजा गया है. 

पुस्तक का मध्य भाग, जो 102 पृष्ठों का है, डॉ वैद्य द्वारा बनाए गए रेखांकनों और कार्टूनों को समर्पित है. प्रत्येक पृष्ठ पर गांधी की एक सूक्ति भी अंकित की गई है. रेखाचित्रों और सूक्तियों का परस्पर तालमेल अत्यंत आकर्षक और प्रभावी है क्योंकि दोनों एक-दूसरे के संप्रेषण में सहयोग करते दिखाई देते हैं – सहअस्तित्व की धारणा को साकार करते हुए. इन चित्रों और सूक्तियों में गांधी का विश्व दर्शन समाया हुआ है जो अत्यंत सरल, सहज और मानवीय है. उदाहरण के लिए पृष्ठ 91 पर महात्मा गांधी का जो स्केच दिया गया है वह पार्श्व दृश्य है – माथे पर तीन रेखाएँ, हल्की मुस्कान के साथ बोलती सी मुद्रा और चेहरे की मांसपेशियाँ खड़ी समांतर रेखाओं के माध्यम से खिलती हुई सी. नीचे यह उद्धरण कि 
अभय में सब प्रकार के डर का
अभाव होना चाहिए ...
मौत का डर – मारपीट का डर ....
भूख का डर – अपमान का डर ....
लोक लाज का डर – भूत प्रेत का डर ...
किसी क्रोध का डर ....
और इन सब डरों से मुक्ति ही
‘अभय’ है .....
 

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‘बापू ने कहा था’, लेखक – डॉ जे पी वैद्य, 2012, प्रकाशन – अंकुशराव कदम, सचिव, महात्मा गांधी मिशन, एन – 6, सी आई डी सी ओ, औरंगाबाद – 431 003, पृष्ठ – 174, मूल्य – रु.250
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