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शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

समकालीन हिंदी आलोचना में भारतीयता


                                                        
समकालीन हिंदी आलोचना में भारतीयता के प्रतिमान का विकास करने वालों में डॉ. रामविलास शर्मा का नाम सबसे पहले लिया जाना चाहिए. उन्होंने हिंदी जाति की जो व्यापक अवधारणा प्रस्तावित की वह आलोचना की भारतीय दृष्टि का एक प्रस्थान बिंदु मानी जा सकती है. हिंदी अपनी विभिन्न अधीनस्थ बोलियों के रूप में जिस व्यापक जनसमूह की भाषा है उसे उन्होंने हिंदी जाति कहा और हिंदी अस्मिता को भारतीय अस्मिता के एक पहलू के रूप में व्याख्यायित किया. उनकी आलोचना दृष्टि तमाम पश्चिमी चिंतकों और विशेष रूप से मार्क्स की स्थापनाओं से संचालित होने के बावजूद भारतीय वाङ्मय के चिंतन-मनन से उत्पन्न इतिहास बोध द्वारा निर्देशित होती है. 1980 के बाद के अपने लेखन में इसी कारण वे यूरोपियन-अमेरिकन-शिकागो स्कूलों को चुनौती देते दिखाई देते हैं. उन्होंने ‘इतिहास दर्शन’ में भारत में आर्यों के कहीं और से आगमन के सिद्धांत को चुनौती दी और ऋग्वेद के आधार पर तत्कालीन भारत को जन (लघु जाति, नेशनलिटी) सिद्ध किया जिसमें श्रम विभाजन के कारण रक्त संबंध टूट रहे थे और व्यक्तिगत संपत्ति का विकास हो रहा था. ऋग्वेद के कवियों के इतिहास बोध की चर्चा करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा कहते हैं कि ऋग्वेद की रचना से पहले उसके रचनाकारों के पूर्वजों की कई पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं तथा जो लोग भारत पर आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत प्रचारित करते हैं वे इन आर्यों के कई पीढ़ियों तक भारत में बसे रहने की बात नहीं कहते. डॉ. शर्मा ने दिखाया है कि भारतीय आर्यों को जिस हिंदी-ईरानी शाखा से जोड़ा जाता है वह भारत पर ईरान के आक्रमण से बनी है. वे देवकथाओं की व्याख्या करते समय दानवों को भारत के आदिवासी मान लेने की कल्पना का भी खंडन करते हैं और उनकी व्याख्या प्राकृतिक परिघटनाओं के रूप में करने पर जोर देते हैं. हिंदी जाति के इतिहास को अगर पीछे तक ले जाया जाए तो उसे ऋग्वेद में प्राप्त सरस्वती नदी के साथ जोड़ा जा सकता है. डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार “’’वह (सरस्वती) आर्यों के प्रिय नदी है, उसी के किनारे उन्होंने बहुत सा वैदिक काव्य रचा था. वह उनके प्राकृतिक परिवेश का सबसे महत्वपूर्ण अंश है. इसी के तटवर्ती क्षेत्र में आर्य अपने कृषितंत्र का विकास करते हैं, यहीं वे उन पाँच तत्वों की कल्पना करते हैं जिनसे मनुष्य समेत सारा ब्रह्मांड रचा गया. वैदिक आर्यों का प्राकृतिक परिवेश इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह आर्यों को इतिहास के धुँधलके से बाहर निकालकर उन्हें एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित कर देता है. जिस विशाल प्रदेश में अब जातीय भाषा के रूप में हिंदी का व्यवहार होता है, उसी का उत्तर-पश्चिमी भाग वह क्षेत्र है.’’”

डॉ. रामविलास शर्मा जब प्रेमचंद, भारतेंदु, निराला, रामचंद्र शुक्ल और महावीर प्रसाद द्विवेदी पर आलोचना ग्रंथ लिखते हैं तो आलोचना की अपनी भारतीय दृष्टि को व्यावहारिक रूप देते हैं. नंदकिशोर नवल ने उनकी पुस्तक ‘प्रेमचंद’ के बारे में सही लिखा है कि “इस पुस्तक में डॉ. शर्मा ने भारतीय समाज की बनावट का परिचय देते हुए यह दिखलाया कि प्रेमचंद ने विभिन्न वर्गों और उनके बीच के संबंधों का किस रूप में चित्रण किया है और उन वर्गों में से कौन सा वर्ग मिट रहा है और कौन सा वर्ग उठ रहा है.” ‘प्रेमचंद और उनका युग’ में भी डॉ. शर्मा ने 20वीं सदी के भारतीय समाज में आ रहे परिवर्तन के संदर्भ में प्रेमचंद के साहित्य की व्याख्या करते हुए दर्शाया कि एक ओर तो भारतीय जनता साम्राज्यवादी सामंती जुए के नीचे कसमसा रही थी तथा दूसरी ओर राष्ट्रीय पराधीनता और घरेलू दासता दोनों से पिसती हुई नारी स्वाधीनता के लिए हाथ फैलाने लगी थी. इसके साथ ही उन्होंने प्रेमचंद द्वारा चित्रित हिंदुस्तान के बदलते हुए किसान के चित्र की भी विवेचना की. दरअसल भारतीय जमीन की समझ के कारण ही यह संभव हुआ कि डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी आलोचना को मध्यवर्ग के जंजाल से मुक्त करके किसान की ओर उन्मुख कर सके. कबीर और तुलसी तक भी उन्हें इसी भारतीय कृषि संस्कृति की उपज प्रतीत होते हैं. भारतेंदु को तो वे आधुनिक युग के गुणसूत्रों में विद्यमान मानते ही हैं. भारतेंदु के ‘अंधेर नगरी’ को उन्होंने जन साहित्य का आदर्श और उस युग के निबंधों को हिंदी की अपनी चीज़ कहा. वे आधुनिक साहित्य को मध्यकाल से काटकर या उसके विरोधी के रूप में नहीं देखते बल्कि यह रेखांकित करते हैं कि भारतेंदु की विचारधारा पर भक्त कवियों की रचनाओं में प्राप्त जनवादी विचारों का गहरा असर था. उन्होंने भारतेंदु के समाज सुधार संबंधी विचारों को भक्त कवियों के साथ जोड़ा. वे मानते हैं कि भारतेंदु की वाणी का मूल स्वर प्रेम है जिसकी दीक्षा उन्हें भक्त कवियों से प्राप्त हुई तथा इस प्रेम के आधार पर उन्होंने जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छुआछूत, सामाजिक विषमता आदि का विरोध करना सीखा. इसी प्रकार वे जब यह कहते हैं कि मनुष्य और उसका दुःख ही निराला को महान कवि बनाता है और कि निराला मानव दुःख के ही नहीं उससे मुक्ति की प्रबल कामना के भी कवि हैं तो वे निराला के भावबोध को उनकी स्वाधीनता की भावना के साथ जोड़कर देख रहे होते हैं. वे बताते हैं कि निराला की विचारधारा का महत्व यह है उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक क्रांति के रूप में देखा, उस क्रांति के प्रत्येक स्तर को तीक्ष्ण विश्लेषक की दृष्टि से देखा और इन स्तरों के परस्पर संबंध को पहचाना. उनकी दृष्टि में निराला का स्वाधीनता प्रेम नेताओं के स्वाधीनता प्रेम से भिन्न था, वे देश के नाम पर देश की जनता को भूलते नहीं – देश को स्वाधीन होना है इसी जनता के सुखी समृद्ध जीवन के लिए. यह देशप्रेम ही गंभीर मानवीय करुणा के रूप में निराला की क्रांतिकारी भावधारा के प्रेरक बनते हैं. यहाँ तक कि निराला की काव्यकला को भी डॉ. रामविलास शर्मा राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन और उस आंदोलन में सुने हुए भाषणों से जोड़कर देखते हैं. प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखना भी डॉ. शर्मा की आलोचना का एक भारतीय सूत्र है. यह भारतीयता का तत्व ही था जिसके कारण छायावाद के पतन और विरोध के वातावरण में भी डॉ. शर्मा उसे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के आगे बढ़े हुए दौर की अभिव्यक्ति कह सके. उन्होंने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन संकीर्ण रूढ़ियों को छोड़कर स्वराज की जिस व्यापक कल्पना की ओर बढ़ रहा था उसका विजयघोष सबसे पहले छायावादी कविता में सुन पड़ा. ‘प्रगति और परंपरा’ में उन्होंने यह दर्शाया है कि छायावादी आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन दोनों ही का आधार आरंभ में मध्यवर्ग तक सीमित होने के कारण संकीर्ण था जिसे आगे चलकर जन-साधारण का व्यापक आधार ग्रहण करना पड़ा – “’’जब तक राष्ट्रीय आंदोलन में जन-साधारण अपने पूर्ण महत्व के साथ प्रतिष्ठित नहीं हुए यानी किसानों और मजदूरों का संघर्ष स्वाधीनता के आंदोलन का अंग नहीं बन गया, तब तक इस आंदोलन की सीमाएँ छायावादी साहित्य में भी प्रतिबिंबित हुईं. असंतोष और विद्रोह के साथ पलायन और रहस्यवादी अस्पष्ट चिंतन की प्रवृत्ति भी जागी. कुछ दिन बाद ज्यों-ज्यों देश का जन आंदोलन समर्थ होता गया, त्यों-त्यों यह बात साफ़ होती गई कि छायावादी साहित्य में या तो रहस्यवादी चिंतन ही रहेगा या जनसाधारण को लेकर उसका विद्रोही पक्ष आगे बढ़ेगा. सन 30 के आंदोलन के बाद छायावादी कवियों में जो एक परिवर्तन दिखाई देता है उसका कारण देश का यह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन है.”’’ वस्तुतः रामविलास शर्मा प्रगतिशीलता को भारतीय संदर्भ में आत्मसात करके उसे अपनी तरह व्याख्यायित करते हैं. उनकी इस व्याख्या में भारतीय किसान, भारतीय मिट्टी, भारतीय पुराण, भारतीय साहित्य और भारत की साधना पद्धतियों का महत्वपूर्ण स्थान है और इसी में उनकी आलोचना की भारतीयता निहित है. इसी तरह जब वे भारतीय भाषाओं पर विचार करते हैं तो वहाँ भी भारतीय भाषिक दृष्टि और व्याकरण की परंपरा को नहीं छोड़ते. 

समकालीन हिंदी आलोचना के एक और शिखर हस्ताक्षर नामवर सिंह भी प्रगतिशील परंपरा से ही संबद्ध है परंतु उनकी आलोचना में भी जो कुछ आकर्षक है वह किसी-न-किसी रूप में भारतीय जमीन से जुड़ा हुआ है. उत्तरार्द्ध में तो उनके विचारों में काफी परिवर्तन भी परिलक्षित किया जा सकता है जिसका सार है कि उनकी आलोचना में क्रमशः भारतीय दृष्टि प्रमुख होती गई है. नामवर सिंह ने भारतीयता को भाग्यवादी और निष्क्रिय मानने वाली पश्चिमी धारणा को खंडित करने वाले साहित्यकारों की ओर विशेष ध्यान दिया है. रामविलास शर्मा की तरह ही उनका ध्यान भी इस तथ्य पर लगातार बना रहता है कि भारत किसानों का देश है और भारतीय संस्कृति कृषि संस्कृति है. यही कारण है कि वे भारतीय उपन्यास को अंग्रेज़ी उपन्यास की परंपरा में रखना पसंद नहीं करते. उनके विचार से “औपनिवेशिक प्रश्न तत्वतः किसान प्रश्न है और औपनिवेशिक दासता के सभी रूपों से किसान की मुक्ति में ही भारत की मुक्ति है, यह बोध राष्ट्रीय चेतना में एक गुणात्मक छलाँग का संकेत है. प्रेमचंद का संपूर्ण प्रौढ़ लेखन इसी बोध का सर्जनात्मक विकास है जिसकी मुख्य उपलब्धियाँ ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ हैं. प्रेमचंद की इसी चेतना और सर्जना में उनकी भारतीयता की परिकल्पना विकसित हुई है.” यही कारण है कि डॉ.नामवर सिंह प्रेमचंद का संबंध अंग्रेज़ी उपन्यासकारों से न जोड़कर उड़िया उपन्यासकार फ़कीर मोहन सेनापति से जोड़ते हैं. वे यह सिद्ध करते हैं कि पश्चिम में उपन्यास का उदय भले ही एक बुर्जुआ रूप में हुआ है किंतु भारतीय उपन्यास का विकास मुख्यतः औपनिवेशिक दासता में छटपटाते हुए किसान की जीवन गाथा से हुआ है तथा फ़कीर मोहन सेनापति का उड़िया उपन्यास ‘छमाण आठ गुँठ’ (छह बीघा जमीन) और प्रेमचंद के तमाम किसान जीवन पर आधारित उपन्यास भारतीय उपन्यास की लोकधर्मी परंपरा का निर्माण करते हैं. वे यह भी रेखांकित करते हैं कि इस लोकधर्मी परंपरा के स्थापित होने में अंग्रेज़ी उपन्यास से कोई सहयोग नहीं मिला बल्कि व्यवधान अवश्य पड़ा – ““उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से पहले ही भारतीय उपन्यास अपनी अस्मिता प्राप्त कर चुका था. उसने इस अस्मिता का निर्माण किया था. इस अस्मिता का निर्माण अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद के विरोध की प्रक्रिया में हुआ था, अंग्रेज़ी ढंग के ‘नावेल’ की नक़ल से नहीं. अंग्रेज़ी ‘नावेल’ ने तो भारतीय उपन्यास के विकासक्रम में उल्टे बाधा डाली.”’’ वे मानते हैं कि इस लोकधर्मी परंपरा के सूत्र और भी पहले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के रोमांसधर्मी उपन्यासों में मिलते हैं क्योंकि इस प्रथम भारतीय उपन्यासकार के लेखन में भारतीय लोक अपनी पूरी विशिष्टता के साथ विद्यमान है. डॉ.नामवर सिंह जब इस लोक अथवा ग्रामीण जीवन को अपनी आलोचना का प्रतिमान बनाते हैं तो वे हिंदी आलोचना का भारतीय प्रतिदर्श गढ़ रहे होते हैं. भारतीयता की अच्छी चर्चा नामवर जी ने प्रेमचंद के संदर्भ में की है और यह समझाने का प्रयास किया है कि भारतीयता किसानवाद का पर्याय नहीं है. वे बताते हैं कि स्वयं प्रेमचंद को किसानवाद का तरफदार समझना भूल होगी क्योंकि किसान प्रेमचंद के कथा साहित्य के समान ही भारतीय उपन्यास का केंद्र भर है जहाँ खड़े होकर उपन्यासकार समूचे भारतीय समाज को पूरे परिप्रेक्ष्य में उन्मीलित करता है. वे यह भी बताते हैं कि भारतीयता का अर्थ हठपूर्वक पश्चिम का तिरस्कार करना नहीं है. 

डॉ.नामवर सिंह ने मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र को भारतीय परिस्थिति के संदर्भ में विवेचित करने का प्रामाणिक प्रयास किया है. उन्हें यह देखकर विस्मय होता है कि आजादी की लड़ाई के दिनों में जब भारत की सारी जनता एक साथ मिलकर लड़ रही थी तो मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों में वर्गभेद की चेतना जरूरत से ज्यादा प्रबल थी और जब आजादी मिलने के बाद समाज में वर्गभेद स्पष्ट होकर उभरने लगा तो बुद्धिजीवियों की वह वर्ग चेतना धीरे-धीरे कुंठित होने लगी. वर्गभेद बढ़ने के साथ वर्गबोध के इस ह्रास को उन्होंने मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की जड़ता से जोड़ा है और पर्याप्त उल्लसित भाव से इस जड़ता को तोड़ने वाले दलित स्वर का स्वागत किया है – “”मराठी के दलित लेखकों ने एक अलग वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र बनाने का नारा दिया है. अभी तक वह शास्त्र बना भले ही न हो, लेकिन सौंदर्यबोध का एक विकल्प तो सामने आया ही, इसमें कोई संदेह नहीं. मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र अभी तक उसकी उपेक्षा ही करता आया है. दुविधा शायद वर्ग-वर्ण के द्वैत अथवा द्वंद्व को लेकर है. किंतु इसमें कोई शक नहीं कि अंततः इस चुनौती को स्वीकार करना ही पड़ेगा. प्रश्न प्रभुत्व का है, सत्ता का है और यह ऐसा प्रश्न है जिसकी उपेक्षा सौंदर्यशास्त्र भी नहीं कर सकता – मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र तो और भी नहीं.” ” कहना न होगा कि यह दलित सौंदर्यशास्त्र वर्ण, जाति, धर्म और संप्रदाय जैसे खानों में बँटे हुए बहुवचनीय भारतीय समाज की अपनी मिट्टी से पैदा होने वाला सौंदर्यशास्त्र है. 

डॉ. नामवर सिंह की आलोचना में निहित भारतीयता उनके छायावाद संबंधी विवेचन में खुलकर सामने आती है. यहाँ तक कि छायावादी कवि की ‘मैं’ शैली को व्यक्तिवाद के नाम पर गरियाने से बचते हुए वे इसे हिंदी की संपूर्ण काव्य परंपरा के साथ जोड़कर देखते हैं. वे याद दिलाते हैं कि मध्य युग में भक्त कवियों ने केवल आत्मनिवेदन में इस आत्मीय पद्धति का सहारा लिया है लेकिन छायावाद युग की व्यैक्तिक अभिव्यक्ति भक्तों के आत्मनिवेदन से कहीं अधिक आगे की चीज है. पुराने कवि की तुलना में अपने निजत्व को सीधे ढंग से व्यक्त करने की यह छूट कवि ने समाज से पहली बार ली और इसका यह परिणाम हुआ कि कविता में जहाँ देवताओं के प्रेम का वर्णन होता था वह स्थान साधारण मनुष्य ने ले लिया. इसे डॉ.नामवर सिंह ने ‘जनतांत्रिक भाव की विजय’ कहा है. छायावादी काव्य की आत्मकथात्मकता को डॉ.नामवर सिंह ने आत्माभिव्यक्ति की स्वाधीनता के रूप में देखा है और इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में व्यक्ति की स्वाधीनता का बीजमंत्र माना है. दरअसल डॉ.नामवर सिंह जब हिंदी के किसी साहित्यकार या साहित्यिक प्रवृत्ति की चर्चा करते हैं तो भले ही सामाजिक आलोचना के सिद्धांत विदेशी विचारकों से ग्रहण करते हों, उन साहित्यकारों और प्रवृत्तियों का स्थान निर्धारण अथवा मूल्यांकन वे समग्र भारतीय साहित्य की परंपरा के परिप्रेक्ष्य में करते हैं जिसमें एक ओर संस्कृत से अपभ्रंश तक की विरासत शामिल है तो दूसरी ओर हिंदी और उर्दू के साथ तमाम आधुनिक भारतीय भाषाएँ. यही कारण है कि वे त्रिलोचन और नागार्जुन जैसे कवियों को ठेठ हिंदुस्तानी कवि के रूप में विश्लेषित कर पाते हैं. 


डॉ.रामविलास शर्मा और डॉ.नामवर सिंह के अतिरिक्त सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ से लेकर विजय बहादुर सिंह, रमेशचंद्र शाह, प्रभाकर श्रोत्रिय और भगवान सिंह तक ऐसे आलोचकों की एक विस्तृत श्रेणी है जिन्होंने अपने आलोचना कर्म में भारतीय चिंतन की कसौटियों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है. वस्तुतः भारतीय साहित्य चिंतन की परंपरा अत्यंत प्रौढ़ है और आलोचना के निकष के रूप में उसका इस्तेमाल अपेक्षाकृत अधिक अध्यवसाय की मांग करता है.इसके बावजूद हिंदी के समकालीन आलोचकों में यह सराहनीय प्रवृत्ति दिखाई देती है कि वे इन सिद्धांतों का पाश्चात्य विचार सरणि के साथ सामंजस्य खोजते हैं तथा पश्चिमी विचारों को भारतीय संदर्भ में ढालकर ही ग्रहण करते हैं.

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

तेलंगाना के किसानों की व्यथा की कथाएँ [भूमिका]


भूमिका

पेद्दिन्टि अशोक कुमार 21 वीं शताब्दी के अत्यंत प्रखर और संभावनाशील तेलुगु कहानीकार हैं. उन्हें ज़मीन से जुड़े ऐसे लेखक के रूप में पहचाना जाता है जिसे आंध्रप्रदेश, विशेष रूप से तेलंगाना अंचल की समस्याओं और सरोकारों की गहरी पहचान है. विभिन्न भाषाओं में अनूदित और विविध पुरस्कारों से सम्मानित अशोक कुमार एक उपन्यास और पाँच कहानी संग्रह तेलुगु साहित्य जगत को दे चुके हैं. यहाँ उनके तीन विशिष्ट कहानी संग्रहों से चुनी हुई 11 प्रतिनिधि कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है. इस प्रतिनिधि कहानी संकलन से हिंदी के पाठक तेलुगु के इस जनपक्षीय कथाकार की संवेदना और रचनाशैली से परिचित हो सकेंगे. 

पेद्दिन्टि अशोक कुमार मूलतः किसान जीवन के रचनाकार हैं. उन्होंने भूमंडलीकरण और बाज़ारीकरण के तेलंगाना के गाँवों पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को निकट से देखा-जाना है और विपरीत परिस्थितियों में पड़े हुए किसानों की आत्महत्या के दारुण सत्य को भी अपनी कलम से उकेरा है. आर्थिक विकास का जो मॉडल पिछले दशकों में भारत सरकार ने अपनाया है वह किस प्रकार किसानों और गरीबों की हत्या कर रहा है और किस प्रकार अमेरिका तथा फ्रांस जैसे देशों की दादागिरी झेलने को अभिशप्त आज का भारत नई गुलामी की ओर बढ़ रहा है – इस सबको किसी प्रकार की राजनैतिक नारेबाजी में फँसे बिना आम आदमी की त्रासदी के रूप में बयान करने वाली ये कहानियाँ पेद्दिन्टि अशोक कुमार को हमारे समय का जागरूक पहरुआ साबित करती हैं. 

अशोक की कहानियों का किसान और गरीब आदमी आज भी भोला, सीधा, सच्चा, ईमानदार और धर्मभीरु है. वह न तो बाजार के हथकंडे जानता है न राजनीति की चालें. यही कारण है कि उसे छलना बेहद आसान है और इसीलिए चालाक लोग लगातार उसे लूट रहे हैं, उसका शोषण कर रहे हैं, उसे मरने पर मजबूर कर रहे हैं. लेखक को यह बात बहुत सालती है कि किसानों और खेत मजदूरों के संगठन समाप्त हो गए हैं और विश्व बैंक के हाथों की कठपुतली बने नेता इस विभीषिका से अनजान हैं कि गुलाब के बगीचों से गुजरने के लिए लोगों को मास्क लगाने पड रहे हैं अन्यथा कीटनाशक दवाओं के नाम पर छिड़का जाने वाला ज़हर किसी को भी बेहोश कर सकता है. एडी-चोटी का जोर लगाकर भी कोई भूमंडलीकरण के कारण कुचले जाते हुए किसान मजदूरों को बचा नहीं सकता. बाजार की तमाम उपभोक्तावादी ताकतें राजनीति और प्रशासन के साथ मिलकर मानो देश के साधारण आदमी के खिलाफ गोलबंद हो गई हैं. अशोक कुमार इन ताकतों के आक्रमणों के प्रति सजग हैं लेकिन यह भी जानते हैं कि इनके सामने आम आदमी निरस्त्र और निरीह है क्योंकि क़ानून और मीडिया भी अंततः इन्हीं के हाथ में हैं. लेखक इस बात से बेहद विचलित हैं कि आक्रमण का विरोध करने के एक मात्र बचेखुचे नागरिक अधिकार को भी ध्वस्त कर दिया गया है जो जनतंत्र को विफल और समाप्त करने वाला कृत्य है. 

इसमें संदेह नहीं कि परिस्थितियाँ बेहद बयावह और यथार्थ बेहद अमानुषिक हो चुका है. धन केंद्रीय जीवन मूल्य बन गया है. धोखाधड़ी, चालाकी, मिलावट, भ्रष्टाचार और झूठ मानो जीने की शर्त बन गए हैं. न डॉक्टर विश्वसनीय रह गए हैं न व्यापारी. लगता है कि हर आदमी किसी-न-किसी तरह चोरी में लिप्त है और पुलिस चोरों के साथ है. न्याय खरीदा-बेचा जा रहा है. शहर तो शहर गाँवों तक का पानी और वायुमंडल विषाक्त हो चुका है. धार्मिक कृत्यों के लिए बैल के गोबर को गाय का गोबर कहकर बेचा जा रहा है. किसान की फसल दलाल के पेट में जाती देखकर धरती गुस्से में है. गाँव के गाँव मरघट बनते जा रहे हैं. जनता रूपी बैल मरणासन्न है और गिद्ध महाभोज की तैयारी कर रहे हैं. मनुष्य और मनुष्य के संबंध संदेह की दरार के शिकार होते जा रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के खेल के बावजूद बाल मजदूरी एक क्रूर सच्चाई की तरह सामने है तथा साम्प्रदायिकता के नाम पर पाखंडपूर्ण राजनीति देश की सामासिक संस्कृति को निगल रही है. यह सब कुछ अशोक कुमार की कहानियों में इस तरह सजीव पात्रों और घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत हुआ है कि पाठक की चेतना को बार बार तेज झटके लगते हैं. कहानीकार अपने पाठक को इस समस्त समसामयिक अवांछित गतिविधि के प्रति सचेत करने में सफल हैं. लेकिन यह जरूर मनाना होगा कि इन तमाम परिस्थितियों के बीच अशोक कुमार द्वारा रचित साधारण आदमी एक अदम्य निष्ठा से भरा हुआ है. वह तमाम सुविधा भोगी वर्गों की तरह इस उपभोक्तावादी तंत्र के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करता. उसे टूटना और हारना मंजूर है लेकिन अपनी ईमानदारी को छोड़कर खून सने पैसे कमाना गवारा नहीं. यही वह ज्योत्स्ना है जो सारे अँधेरे को चीरकर पाठक तक जिजीविषा के रूप में पहुँचती है और भारत की नींव का निर्माण करने वाले किसान के बुनयादी चरित्र को सामने लाती है.  

तेलुगु की इन समकालीन कहानियों का चयन और अनुवाद वरिष्ठ अनुवादक आर.शांता सुंदरी ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक किया है. शांता सुंदरी जी लंबे समय से अनुवाद की साधना से जुड़ी हुई हैं. तेलुगु, हिंदी, अंग्रेज़ी की लगभग 50 से अधिक किताबों का अनुवाद करते करते उन्होंने सिद्धावस्था प्राप्त कर ली है. हिंदी और तेलुगु दोनों भाषाओं के मुहावरे पर उनकी कमाल की पकड़ है. अशोक के पाठ में जो विवरण की बारीकियाँ हैं, काव्यात्मकता है, मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग है, किस्सागोई है, और है परिस्थिति तथा पात्र के अनुरूप भाषा का बदलता स्वरूप; अनुवादक आर. शांता सुंदरी ने उस सबके प्रति न्याय किया है. यही कारण है  कि इस अनूदित पाठ में अद्भुत पठनीयता मिलती है जो पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती है. निस्संदेह इस अनुवाद कार्य द्वारा हिंदी और तेलुगु भाषा समुदायों के बीच का साहित्य सेतु और सुदृढ़ होगा.

लेखक और अनुवादक दोनों को साधुवाद देते हुए मैं यह विश्वास करता हूँ कि हिंदी जगत में इस कृति का व्यापक स्वागत और भरपूर सम्मान होगा. 

शुभकामनाओं सहित 

-ऋषभ देव शर्मा

पंत का जीवन दर्शन : लोकायतन के विशेष संदर्भ में [भूमिका]


दो शब्द

बीसवीं शताब्दी की भारतीय कविता में महाकवि सुमित्रानंदन पंत का अप्रतिम महत्त्व है. वे सौंदर्य, राष्ट्रीय चेतना और मनुष्यता के वैतालिक थे. उनकी काव्ययात्रा मिट्टी के स्वर्ण बनने की यात्रा है जिसे ‘लोकायतन’ में अपनी मंजिल मिलती है. डॉ. मो. रियाजुल अंसारी ने अपने प्रस्तुत ग्रंथ में कठोर साधना करके ‘लोकायतन’ में अनुस्यूत पंत के जीवन दर्शन को अत्यंत वैज्ञानिक पद्धति से विवेचित किया है. उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा है कि कोई कृतिकार अपनी रचना में एक साथ एक ओर तो अपने आपको अभिव्यक्त करता है तथा दूसरी ओर स्वयं का अतिक्रमण करके लोक जीवन के व्यापक सुख-दुःख को व्यंजित करता है. 

वस्तुतः लोकायतन व्यक्ति से विराट की ऐसी यात्रा है जो मनुष्यत्व को औदात्य से इस प्रकार मंडित करती है कि उसके समक्ष ईश्वरत्व लघु लगने लगता है. पंत की यह यात्रा वर्तमान मनुष्य के अगले संस्करण की काव्यात्मक खोज है. इस खोज के पीछे छिपे हैं जीवन दर्शन के वे सूत्र जो प्राचीन भारतीय वाङ्मय से लेकर आधुनिक देशी-विदेशी दार्शनिकों, विशेषतः विवेकानंद, अरविंद, गांधी, मार्क्स, फ्रायड और सार्त्र के चिंतन से गृहीत हैं. ये तमाम सूत्र ‘लोकायतन’ की बुनावट में इस तरह समोये हुए हैं जैसे पुष्प में गंध. डॉ. अंसारी ने इस गुणसूत्रों को इस तरह रेशा रेशा खोलकर दिखाया है कि कवि और काव्य दोनों की मानसिकता के तमाम पहलू अनायास उभर कर सामने आ जाते हैं और यह स्पष्ट होता है कि पंत जी ने ‘लोकायतन’ में जो कवि-स्वप्न देखा है वह मनुष्य को तमाम उच्च जीवन मूल्यों से मंडित करके उसके भीतर नए मनुष्य के अवतरण को संभव बनाने का स्वप्न है. 

इस ग्रंथ के माध्यम से लेखक डॉ. अंसारी पंत-काव्य के गंभीर अध्येता के रूप में सामने आते हैं. कहना न होगा कि ‘लोकायतन’ की रचना के समय कवि के समक्ष ‘भारत भारती’ जैसी लोकप्रिय और ‘कामायनी’ जैसी मिथकीय कृतियाँ चुनौती के रूप में विद्यमान थीं. पंत जी ने इन दोनों रचनाओं के भूत-वर्तमान-भविष्य को एक साथ संबोधित करने तथा मानव सभ्यता और भारतीय संस्कृति का इतिहास एक साथ रचने की काव्य प्रविधि को अपनी कला के संस्पर्श से ‘लोकायतन’ में नया स्वरूप प्रदान किया. लेखक ने प्रतिपादित किया है कि ‘लोकायतन’ पंत जी के संपूर्ण जीवन की संचित भावराशि का प्रत्यंकन है जिसमें उन्होंने ऊर्ध्वचेतना, अंतर्चैतन्य तथा लोकचेतना की समन्वय चेष्टा के रूप में मानव संस्कृति और सभ्यता के क्रमिक विकास की गाथा लिखी है. इस गाथा में प्रसंगवश भारतीय इतिहास का उत्थान-पतन, स्वतन्त्रता आन्दोलन और भावी मनुष्य की ज्योतिर्मयी संभावना की अभिव्यक्ति अत्यंत आकर्षक है जिसके बहाने कवि ने अपने जीवन दर्शन को साकार किया है.

डॉ. मो. रियाजुल अंसारी ने इस ग्रंथ में एक ओर तो यह दर्शाया है कि पंत जी पर विविध दर्शनों का अनेकविध प्रभाव है, लेकिन दूसरी ओर यह भी प्रतिपादित किया है कि महाकवि की उन्मुक्त चिंतनधारा किसी एक दर्शन की अनुयायिनी नहीं है. इस ग्रंथ से यह बात भली प्रकार समझ में आती है कि पंत जी दर्शन के मामले में देशी-विदेशी का भेदभाव नहीं बरतते बल्कि जिस दर्शन में उन्हें अपने अभीष्ट भावी मनुष्य के लिए उपयोगी जो कुछ भी नज़र आता है उसे वे निस्संकोच मनुष्यमात्र की संपत्ति के रूप में ग्रहण कर लेते हैं; और जो काम का नहीं लगता, जीर्ण शीर्ण और थोथा लगता है उसे वे उड़ा देते हैं. भारतीय षड्दर्शन हों या पाश्चात्य विचारकों का चिंतन, वे सबकी परख भावी मनुष्य के अतिमानस की कसौटी पर करते हैं और ठीक से पहचान कर ही संग्रह और त्याग करते हैं. इस दृष्टि से यह ग्रंथ पंत के बहाने विभिन्न भारतीय और पश्चिमी दर्शनों की वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में व्याख्या और आलोचना भी करता चलता है.

पंत-काव्य के प्रेमी और दार्शनिक गुत्थियों के जिज्ञासु पाठकों को डॉ. अंसारी का यह  शोधपूर्ण आलोचना  ग्रंथ विशेष रूप से भाएगा और हिंदी जगत में इस कृति और कृतिकार को समुचित सम्मान और स्नेह मिलेगा – यह मेरी प्रतीति भी है और शुभेच्छा भी!

हार्दिक शुभकामनाओं सहित
-ऋषभ देव शर्मा

दक्षिण भारत में उच्च स्तर पर हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की समस्याएँ


हिंदी ही क्या, सभी भाषा और साहित्य के विभागों को इन दिनों लगातार घटती छात्र संख्या की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. उत्तर भारत में प्रथम भाषा होने के कारण हिंदी के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों के लिए छात्रों की कोई कमी नहीं है, लेकिन दक्षिण भारत में जहाँ हिंदी का स्थान दूसरी और तीसरी भाषा जैसा है, एम.ए. तथा शोध कार्य के लिए विद्यार्थियों में आकर्षण बहुत कम दिखाई देता है. हिंदी विभागों के समक्ष पहली चुनौती प्रवेश की समस्या से ही जुड़ी हुई है. इधर मानविकी विषयों के प्रति रुचि घटने का कारण ज्ञान की अपेक्षा कमाई के लिए शिक्षा प्राप्त करने की मनोवृत्ति से जुड़ा हुआ है. इसलिए यह जरूरी है कि हिंदी के अध्ययन-अध्यापन को आकर्षक बनाने के लिए ‘पढ़ाई के साथ कमाई’ की योजनाएं जोड़ी जाएँ और हिंदी के छात्रों व शोधार्थियों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए. यह भी जरूरी है कि परंपरागत पाठ्यक्रमों के अलावा प्रयोजनपरक छोटे-छोटे कार्यक्रम बनाए जाएँ. मंच संचालन, एंकरिंग, टूरिस्ट गाइड के लिए प्रमाण पत्र स्तर के कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं. इसी प्रकार विविध व्यवसायों में काम आने वाली हिंदी के भी स्वतन्त्र कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, जैसे – मेडिकल हिंदी, इंजिनीयरिंग की हिंदी, वकीलों के लिए हिंदी, प्रबंधकों के लिए हिंदी.

दो दशक से अधिक के दक्षिण भारत में स्नातकोत्तर स्तर के अध्यापन और शोध निर्देशन के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यहाँ हमें प्रायः ऐसे छात्रों को पढ़ाना पड़ता हैं जिनकी हिंदी भाषा और साहित्य संबंधी पृष्ठभूमि काफी कमजोर होती है. इनमें से अधिकांश छात्रों ने मुख्य विषय के रूप में डिग्री तक हिंदी नहीं पढ़ी होती. कुछ विद्यार्थी विज्ञान और वाणिज्य आदि धाराओं से आते हैं जिन्हें हिंदी प्रचार सभाओं की प्रवीण आदि उपाधियों के आधार पर एम.ए. में प्रवेश दिया जाता है. वे अवश्य ही बेहतर होते हैं. कमजोर पीठिका के कारण सीधे-सीधे एम.ए. के पाठ्यक्रम में कूद पड़ना यहाँ ज्यादातर छात्रों के लिए एकदम नई दुनिया में जाने जैसा होता है. इसलिए यह आवश्यक है कि आरंभिक कक्षाएँ भाषा कौशलों के विकास पर केंद्रित हों. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘ग’ क्षेत्र के विद्यार्थी के लिए हिंदी लगभग विदेशी भाषी होती है. इसलिए अध्यापकों को वही पद्धति अपनानी चाहिए जो विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाने के लिए जरूरी है. पाठ्य पुस्तकों और आलोचना ग्रंथों के अलावा इन छात्रों को छोटी छोटी रुचिकर पुस्तकों और पत्रिकाओं को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए. ये विद्यार्थी हिंदी के वातावरण में नहीं रहते हैं इसलिए जितनी देर वे परिसर में रहें कम-से-कम उतनी देर के लिए उन्हें हिंदी का वातावरण दिया जाना चाहिए. इसके लिए वार्तालाप, प्रश्न मंच, नाटक, फिल्म और परस्पर चर्चा-परिचर्चा की सहायता लेना उपयोगी होगा. कवियों, लेखकों और कृतियों पर वीडियो दिखाकर चर्चा कराई जा सकती है. हिंदी के कार्टून और कॉमिक्स सुनकर लिखने के लिए कहा जा सकता है. शब्दों से संबंधित कक्षा गतिविधि और स्थिति आधारित वार्तालाप द्वारा सामाजिक भाषा प्रयोग भली प्रकार सिखाया जा सकता है. किसी कार्य की विधि, किसी स्थान तक पहुँचने का रास्ता बताने जैसे अभ्यास कराए जा सकते हैं. यह भी आवश्यक है कि हिंदी भाषा में निहित संस्कृति से भी उन्हें परिचित कराया जाए. जैसे- तू-तुम-आप; यह–ये, वह–वे के अलावा संबोधन, अभिवादन और अभिवादन के प्रत्युत्तर की शैलियाँ. मातृभाषा के प्रभाव के कारण होने वाली त्रुटियों की पहचान करके सही प्रयोगों का बार-बार अभ्यास (ड्रिल) कराना भी बहुत आवश्यक है.

एम.ए.स्तर पर कुछ एकदम नए विषयों के समावेश के कारण भी प्रायः छात्र बिदकते देखे गए हैं. साहित्यशास्त्र, भाषाविज्ञान, सौंदर्यशास्त्र, शैलीविज्ञान, प्रयोजनमूलक भाषा, अनुवाद विज्ञान और जनसंचार आदि विषयों से ये विद्यार्थी पूर्व परिचित नहीं होते और इनकी भारी भरकम सैद्धांतिकी से इतने डर जाते हैं कि विषय में पैठ नहीं पाते. यह जरूरी है कि इन विषयों को रुचिकर रूप में प्रस्तुत करने की दृष्टि से कक्षा में मल्टीमीडिया की सुविधा का यथासंभव प्रयोग किया जाए. शुष्क व्याख्यान के स्थान पर विषय को दृश्य बनाकर प्रस्तुत किया जा सके तो रोचकता उत्पन्न हो सकती है. इन विषयों पर समय समय पर नवीकरण पाठ्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए. अध्यापक का अपने विषय का विशेषज्ञ होना तो जरूरी है ही ताकि वह कक्षा में विषय की मूलभूत अवधारणाओं को बोधगम्य रूप में स्पष्ट कर सके. इन विषयों के छोटे-छोटे परिभाषा कोश और उद्धरण कोश भी छात्रों को उपलब्ध काराए जा सकते हैं. अध्यापकगण ऐसे कोश तैयार करके उन्हें इंटरनेट पर भी जारी कर सकते हैं.

जैसा कि पहले कहा जा चुका है दक्षिण भारत के हिंदीतर भाषी विद्यार्थी के लिए हिंदी दूसरी या तीसरी भाषा होती है और उसका संपर्क केवल परिनिष्ठित खड़ीबोली से ही हो पाता है. ऐसी स्थिति में हिंदी का बोली वैविध्य और शैली वैविध्य उसे किसी घने जंगल जैसा प्रतीत होता है. यही कारण है कि वह हिंदी के आदिकालीन और मध्यकालीन साहित्य से घबराता है – कुछ लोकप्रिय कवियों की सरल कविताओं के अलावा. इसी प्रकार हिंदी कथा साहित्य का वह बहुत बड़ा हिस्सा जो आंचलिक है, इस विद्यार्थी को किसी तिलिस्म से कम चुनौतीपूर्ण नहीं लगता. यहाँ तक कि समकालीन कविता और नवगीत की देशजता भी उसे डराती है. ऐसी स्थिति में एक सरल रास्ता यह हो सकता है कि खड़ीबोली से इतर पाठांश पाठ्यक्रम में न रखे जाएँ, लेकिन ऐसा करना अवैज्ञानिक तथा अविवेकपूर्ण होगा. अतः मध्यमार्ग यह है कि आदिकाल और मध्यकाल के पाठांश अपाक्षेकृत कम हों, और जो हों वे भाषा सौंदर्य की समझ को विकसित करने की दृष्टि से चुने जाएँ. मध्यकालीन साहित्य के साथ एक समस्या पौराणिक-सांस्कृतिक संदर्भों की भी है. अतः ऐसे संदर्भों को संबंधित अंतर्कथाओं सहित समझाना जरूरी है. साहित्य के इतिहास के अलग-अलग खंडों को पूर्वापर संबंध द्वारा जोड़कर हिंदी साहित्य में निहित भारतीय चिंता धारा के विकास क्रम से भी छात्रों को परिचित कराना आवश्यक है. ऐसा करके उनमें इतिहास बोध और राष्ट्रीय चेतना का विकास किया जा सकता है.

साहित्य के पल-पल परिवर्तित परिप्रेक्ष्य के कारण भी कई बार विद्यार्थी और शोधार्थी उलझन महसूस करते देखे गए हैं. पाठ्यक्रम की तो अपनी सीमा है लेकिन शोध आदि की दुनिया असीम है. इसलिए यह आवश्यक है कि मध्यकाल, आधुनिकता, समकालीनता, उत्तरआधुनिकता और नित नए विमर्शों से संबंधित अद्यतन चिंतन के साथ हिंदी के विद्यार्थी और अध्यापक दोनों जुड़ें. इसके लिए विभाग में समय-समय पर विशेषज्ञों के व्याख्यान और लेखक से मिलिए जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं. पत्र-पत्रिकाओं के पढ़ने और उन पर चर्चा करने का वातावरण बनाना भी बेहद जरूरी है.

दरअसल शोध के स्तर पर यह देखा गया है कि पुस्तक संस्कृति और पठन अभिरुचि के अभाव के कारण कभी कभी बहुत दयनीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है. आवश्यक है कि शोधकार्य को अपेक्षित गंभीरता से लिया जाए. विषय चयन के समय छात्र की रुचि और निर्देशक की विशेषज्ञता को ध्यान में रखा जाना चाहिए और शोधकार्यों को अंतरराष्ट्रीय शोध मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए. शोधप्रबंधों में चोरी की प्रवृत्ति से बचने के लिए छात्र और निर्देशक दोनों ही में ईमानदार शोध संस्कार होने जरूरी हैं. ऐसा करके हम दक्षिण भारत में हिंदी के उच्च स्तरीय अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान कार्य को सचमुच विश्वसनीय और प्रामाणिक बना सकते हैं.