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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

(कविता का समकाल -३) समकालीन संवेदना एवं रचनाधर्मिता


समकालीन संवेदना एवं रचनाधर्मिता

कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/
लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745

समकालीन रचनाधर्मिताके समकालीन संवेदनाके साथ रिश्तों की चर्चा को रचनाधर्मिता के बिंदु से शुरू करना चाहें तो यों कहा जा सकता है कि जीवन में रस की तलाश रचना का धर्म है जिसे सौंदर्य-सृजन भी कहा जा सकता है। इस सृजनात्मक खोज में रचनाकार को समकालीनता का निर्वाह भी करना होता है और अतिक्रमण भी - उसकी यात्रा डूबकर पार उतरने जैसी है - पानी में रहकर भी पानी का दाग़ न लगने जैसी नहीं। रचनाधर्म न तो समय का अनुकरण करके निभ सकता है और न तिरस्कार करके ही,  दोनों में सहयोग और संतुलन की अपेक्षा सदा बनी रहती है। अपने समय को पूरी ऊर्जा के साथ जीने वाली रचनाधर्मिता ही समकालीनता का प्रमाण देते हुए उसका अतिक्रमण कर सकती है। तभी वह आत्म के विस्तार को इस प्रकार उपलब्ध कर पाती है कि रचनाकार के माध्यम से सबकी आत्मस्थितियों का अंकन और सबकी प्रश्नाकुलता का सहसंवेदन समानुभूति के धरातल पर संभव हो सके। उदाहरण के लिए आज का रचनाकार जब समकालीन राजनीति और समाज के संबंधों पर दृष्टिपात करता है, उनके बीच से गुजरता है तो उसे एक ओर तो राजनैतिक दुरभिसंधियों की व्याख्या करना आवश्यक जान पड़ता है जिसके लिए वह सपाटबयानी और विवरणात्मकता का खतरा उठाकर भी अपनी रचना में वर्णनात्मकता को प्रश्रय देता दीखता है 
-
‘‘समय गुजर जाता है
जैसे सरकारी वसूली के लिए साहब दौरे पर
फिलहाल सूखा है
इसलिए वसूली स्थगित
पिटने पर आदमी के बेहोहोने पर
जैसे पीटना स्थगित।‘‘
(विनोद कुमार शुक्ल, रायपुर बिलासपुर संभाग)।

जबकि दूसरी ओर समकालीन राजनीति की दुष्चरित्रता की यह पहचान उसके भीतर अरुचि और जुगुप्सा जगाती है जिसकी अभिव्यक्ति आक्रो और व्यंग्य के माध्यम से स्वाभाविक प्रतीत होती है। तंत्र की विराटता के समक्ष व्यक्ति की साधनहीनता और तटस्थता के खतरे को देखते हुए समकालीन रचनाधर्मिता आज ही नहीं, बल्कि आज जैसे हर संकट काल में - संघर्षशीलता को बचाए रखने की चुनौती का सामना करने के लिए अभिव्यक्ति के नए उपकरणों की खोज करती है और पुराने उपकरणों पर नई धार रखती है-
‘‘गायब हो जाएगा
यदि नमक बाजार से
समुद्र दुश्मनों के कब्जे़ में भी होगा
हम थोड़ा-सा बचा रखेंगे नमक
अपने पसीनों में
अपने रक्त में
अपने आँसुओं में
आखिरी दिनों तक।‘‘
(विनोद दास, नमक)।

इक्कीसवीं शताब्दी में हिंदी कविता में एक बार फिर कथात्मकता, छंद और लय की वापसी को रचनाधर्म के इसी अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।
                
इसमें संदेह नहीं कि साहित्य की सार्थकता संवेदना का विस्तार करने में निहित है, तभी वह संस्कृति का अंग बन पाता है। संवेदना का इतना विस्तार हो कि स्व-पर के भेद विलीन हो जाएँ और व्यक्ति अपनी उपलब्धि का लोक की खातिर विसर्जन करते हुए आत्मदान को तत्पर हो सके -
‘‘जो लिखते हैं कविताएँ
और करते हैं प्यार
वो धरती को थोड़ा और चौड़ा करते हैं
थोड़ा और गहरा
थोड़ा और नम।‘‘
(विश्वनाथ प्रसाद तिवारी/बेहतर दुनिया के लिए)।
               
संवेदना के विस्तार का यह मार्ग निवृत्ति और विरक्ति का नहीं, उपलब्धि और आत्मदान का मार्ग है। निवृत्ति यदि अविकारी पुरुष का धर्म है तो संवेदना विकारी प्रकृति का गुण; और रचना इन दोनों के बीच आवाजाही का उभयमुखी मार्ग, कर्मयोग! संवेदना ही वह शक्ति है जिसके सहारे साहित्य समाज में निरंतर चलनेवाली अमानवीकरण की प्रक्रिया के विरुद्ध सार्थक हस्तक्षेप करता है। आज साहित्यिक रचनाधर्मिता की प्रासंगिकता को बार-बार प्रश्नांकित किया जा रहा है परंतु साहित्य का ऐसा कोई विकल्प अभी तक नहीं खोजा जा सका है जो समकालीन जगत को अमानवीकरण के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान कर सके - जीवन और प्रेम के शाश्वत मूल्यों को विकसित कर सके। इस सुरक्षा और विकास के धर्म का निर्वाह करने के लिए रचनाकार की संवेदना आज भी सामाजिक संरचना के साथ लगातार टकराती और नए सपने सिरजती चल रही है। चित्तवृत्तियों के निरंतर जड़ीभूत बिखराव के बीच रचनाधर्मिता उनके संश्लेषण और समन्वय द्वारा संवेदना को मानवजाति का सुरक्षा कवच बनाती है। कालगति के साथ बदलती लोक की चित्तवृत्ति और संवेदना को आत्मसात करते हुए अपनी अभिव्यक्ति को उसके अनुरूप ढाल कर ही रचनाधर्म का निर्वाह किया जा सकता है। इसी से कृति में समकालीनता का समावे होता है। वर्तमान समय में जबकि निस्संगता का संक्रमण मनुष्यता को निरंतर आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहा है, संवेदनशीलता और भावुकता की प्रतिष्ठा अपरिहार्य प्रतीत होने लगी है, तभी रचनाकार प्रामाणिक रूप में व्यक्तिगतहोने के साथ-साथ मार्मिक रूप में सार्वभौमहो सकता है। यही समकालीन संवेदना के संदर्भ में रचनाधर्मिता की सार्थकता होगी।
               
किसी भी समय की समकालीन संवेदना का निर्माण व्यक्ति, वर्तमान संदर्भ में रचनाकार, के अपने अनुभवों से होता है। उत्तरधुनिकता के आज के दौर में संवेदना के स्तर पर रचनाकार पश्चिम और पूर्व के संस्कारों के कराव को झेल रहा है। एक समय था कि बड़े जोर-शोर से विराट के विरुद्ध लघु के व्यक्तित्व को रचनाधर्मिता की केंद्रीय चिंता के रूप में मान्यता दी गई थी और क्रमश: लघुचेतना को ही मानवचेतना का पर्याय बना दिया गया। इधर कुछ दकों से हर केंद्र के टूटने की चर्चाएँ जोरों पर हैं तथा हाशिए के नाम पर स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, पर्यावरण विमर्श तथा काव्य और कथा के स्थान पर आत्मकथा, संस्मरण, जीवनी, साक्षात्कार और यात्रावृत्त की प्रतिष्ठा की बातें की जा रही हैं। रचनाधर्मिता को मनुष्यता और साहित्य के खंडसत्यों के रूप में इनका वरण करने के लिए कहना पूर्णसत्य के साक्षात्कार से इंकार करने जैसा है। इसीलिए यह देखने में आया है कि विगत दशकों में किसी भी कथित परिधिगत विमर्श से जुड़ी रचनाधर्मिता आरंभ में विस्फोट का आभास देने के बाद क्रमश: पूर्णतर होने की खातिर केंद्रीय सरोकारों से संबंद्ध हो गई है। नए रचनाकार को उपेक्षित और बंजर पड़ी ज़मीनें तो तोड़नी ही पड़ती हैं।  इसी से यह तय होता है कि उसका अपने समय के साथ कैसा संबंध है -
‘‘उसके बारे में कविता करना
हिमाकत की बात होगी
और वह मैं नहीं करूँगा
मैं सिर्फ आपको आमंत्रित करूँगा
कि आप आएँ और मेरे साथ सीधे
उस आग तक चलें
उस चूल्हे तक जहाँ वह पक रही है
एक अद्भुत ताप और गरिमा के साथ
समूची आग को गंध में बदलती हुई
दुनिया की सबसे आश्चर्यजनक वस्तु
वह पक रही है।‘‘
(केदारनाथ सिंह, रोटी)।

रचनाधर्मिता की पूर्णता तभी है जब वह रचना और समय के संबंध के उन बिंदुओं को भी उभारे जहाँ विरोध और असामंजस्य है, अन्यथा बेहतर जीवनस्थितियों की खोज के रूप में रस की खोज का उद्देश्य संपन्न नहीं हो सकता। समकालीनता से असहमति को दृढ़ शब्दों में व्यक्त करने से ही समकालीन रचनाधर्मिता की पुष्टि होती है। यह असहमति ही रचनाकार को अपना एक प्रतिसंसार रचने को प्रेरित करती है, एक अधिक संगत और सामंजस्यपूर्ण समाज का स्वप्न देखने को प्रेरित करती है।

समकालीन संवेदना को काल के पार ले जाने वाला तत्व परंपरा को उसकी देन के रूप में रेखांकित किया जाता है। देने से पहले जरूरी है यह जानना कि परंपरा से प्राप्त क्या हुआ है। यदि आज का रचनाकार परंपरा को कुछ देना चाहता है तो वह ऐसा परंपरा से कटकर कदापि नहीं कर सकता। परंपरा उसे श्रुति और स्मृति के रूप में प्राप्त हुई है अर्थात् मिथकों तथा इतिहासवृत्तों के रूप में। साहित्य में अतीत की वर्तमानता के ये दो सृजनात्मक उपकरण हैं: और वर्तमान को भविष्य तक भी ये ही ले जाएँगे। अतः समकालीन संवेदना और रचनाधर्मिता श्रुति और स्मृति के प्रति उदासीन नहीं हो सकती।

साहित्य यदि संवेदना का विस्तारक है तो आज भी उसकी मूलभूत चिंता व्यक्ति, वर्ग या वर्ण न होकर मनुष्य है। इस चिंता का एक आयाम है मनुष्य का प्रकृति के साथ संबंध अथवा परिवे। परिवे के प्रति समकालीन संवेदनशीलता एक ओर जहाँ पेड़, चिड़िया, झरने और पर्यावरण के माध्यम से व्यक्त हो रही है, वहीं गाँव और शहर के बीच रचनाकार के मन की सतत आवाजाही संस्कृति और सभ्यता के विविध तत्वों के विरोधों में सामंजस्य की तला का प्रतीक है
‘‘अभी-अभी धरती की नाभि खोल जो बाहर आया
कौन जानता कितनी सदियों यह पृथ्वी की नस नाड़ी में घूमा
जीवन के आरंभ से लेकर आज अभी तक
धरती को जो रहा भिगोए
वही पुराना जल यह अपना
पहली ही पहली बार हमने तुमने देखा झरना
झरते जल को देख हिला
अपने भीतर का भी
जल।‘‘
(अरुण कमल, झरना)।

मनुष्य और मनुष्य के संबंधों को आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखने के साथ-साथ घर-परिवार और रिश्ते-नातों के अमानवीकरण के कारणों की पड़ताल समकालीन संवेदनशीलता की चिंता का दूसरा आयाम है जिसकी रचनात्मक परिणति स्त्री, माँ, बहन, लड़की, पिता और घर के प्रति जागरूकता के रूप में सामने आ रही है -
‘‘लहर लहर पर
डोल रहा, पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल मत गरजो-बरसो
चट्टानों से
लगता है डर
x x x
घर रचाया था
हथेली पर किसी ने
उंगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहंदियाँ
धूप में फीकी हुई।‘‘
(कविता वाचक्नवी, घर)।

इस चिंता का तीसरा आयाम पूरी तरह मानसिक है जो एक ओर प्रेम से जुड़ता है और दूसरी ओर अध्यात्म से -
‘‘ईश्वर एक लाठी है
जिसके सहारे अब तक चल रहे हैं पिता
मैं जानता हूँ कहाँ कहाँ
दरक गई है उनकी कमज़ोर लाठी
रात में जब सोते हैं पिता
लाठी के अंदर चलते हैं घुन
वे उनकी नींद में पहुँच जाते हैं।‘‘
(स्वप्निल, श्वर एक लाठी है)।

इसी का संबंध मनुष्य के अस्तित्व बोध से है। व्यक्तिगत और वर्गगत अस्मिताओं के टकराव तथा लोकतंत्र और युद्ध की समस्या के प्रति रचनाकार की जागरूकता इसी का प्रमाण है। मनुष्य,  उसके परिवेऔर अस्तित्व से संबंधित इन समस्त चिताओं को रचना में ढालने के लिए सृजनात्मक कल्पना की आवश्यकता होती है जिसके लिए गहन जीवनानुभव और साक्षात्कार चाहिए। साहित्य के नाम पर लिखित और मुद्रित शब्दों के भंडार में यदि मानवचेतना को ऊर्जा का संस्कार देने की संभावनाएँ न दीख रही हों, तो समझना चाहिए कि समकालीन रचनाकार के अपने अनुभव और साक्षात्कार में अभी कुछ अपरिपक्वता है -
‘‘बुनियादी हैं आपके सरोकार
जैसे इस दुनिया की नींव में धंसाए हुए
हवा, पानी, धूप, कुछ भी उन तक नहीं पहुँचता
इतिहास के पन्ने चाटने वाले
नमक से भी अपरिचित हैं आप।‘‘
(मंगले डबराल, सरोकार)।

समकालीनता जब पक जाती है तो अपनी साखीआप देती है। रचनात्मक परिपक्वता आने पर रचनाकार में नैतिक साहस आता है जिसके सहारे वह रूढ़ियों पर चोट करता है - भले ही वे रूढ़ियाँ नैतिकता की ही क्यों न हों!

रूढ़ियाँ समकालीनता की भी हैं। स्मृतिविहीनता हमारे समय की एक ऐसी ही रूढ़ि है जो सारी समकालीनता को वायवीय और सारे आक्रो को प्रलाप बना देती है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श ने स्मृतिविहीनता से ग्रस्त होकर खूब गलतबयानी की है। डिस्पोजे़बल कल्चर की उपभोगवादी दृष्टि समकालीनता की दूसरी ख़तरनाक रूढ़ि है जिसका प्रचार उदारवादी व्यवस्था के नाम पर तेजी से हो रहा है और मनुष्य तथा उसके परिवे के बीच की संवेदनशीलता छीजती जा रही है। इस रूढ़ि का केंद्र है बाज़ार, जिसका तोड़ है परिवार। बाज़ार ने नई तरह की पाखंड-प्रियता को जन्म दिया है जिससे वचन और कर्म में भयंकर दूरी पैदा हो गई है। झूठ बोलना और दादागिरी करना, विश्वासघात करना और उपदे देना सामाजिक और राजनैतिक आचरण की नई अंतरराष्ट्रीय रूढ़ियाँ हैं जिन्हें निर्लज्जता की ही संज्ञा दी जा सकती है। सामाजिक घृणा, आतंक और हिंसा के माहौल में जब लोक और लोकतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ा हुआ हो, तब सामाजिक न्याय और मानवाधिकार की दुहाई भी समकालीन संवेदना को रूढ़िग्रस्त बना सकती है। बौद्धिक निर्भीकता के ह्रास के कारण ये नई रूढ़ियाँ पनप रही हैं। समकालीन रचनाधर्मिता के समक्ष साहित्य की जो नई रूढ़ियाँ हैं उनमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक दायित्व में विरोध,  स्वानुभूति और सहानुभूति में विरोध,  परिधि और केंद्र में विरोध,  सृजन और संचार में विरोध - जैसी रूढ़ियाँ प्रमुख हैं। एक रूढ़ि साहित्य की वाचिक परंपरा और मुद्रित शब्द के विरोध की भी है जिसके कारण समकालीन साहित्य पठनीयता के संकट से घिरा हुआ प्रतीत होता है।

अंत में, कुछ चर्चा उन बिंदुओं की भी की जा सकती है जो समकालीन रचनाधर्मिता की विश्वसनीयता के बिंदु हो सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि आज का मनुष्य जानकारियों के घटाटोप से आक्रांत है,  इसलिए रचना में संवेदना की तनिक सी भी अपर्याप्तता या दुर्बलता उसे अस्वीकार्य बना सकती है। यों रचना की शक्ति का पहला बिंदु है संवेदना की गहनता और परिपक्वता, जिससे मानव अनुभूति की प्रामाणिकता की पुनः स्थापना हो सके। सृजन क्ति का दूसरा बिंदु है लोकचित्त की पहचान का। समकालीन रचनाकार को लोकचित्त में बसे बिंबों और विश्वासों से तादात्म्य स्थापित करना होगा अन्यथा प्रेषणीयता की समस्या और भी जटिल हो जाएगी। समकालीन रचनाधर्मिता की ऊर्जा का तीसरा बिंदु विचार है, पंरतु यह भी सत्य है कि यदि संवेदना में न ढल सके तो विचार साहित्य का विलोम सिद्ध होता है। समकालीन रचनाधर्मिता के समक्ष विचार को संवेदना में ढालने की चुनौती उपस्थित है और इसका समाधान तभी संभव है जबकि रचनाकार यह ध्यान रखे कि वह जीवनरस का खोजी और सौंदर्य का अन्वेषक है। ऐसा करके वह स्थानीयता और तात्कालिकता के बावजूद सार्वभौमता और विश्वदृष्टि को साध सकता है। साहित्यिक ऊर्जा का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है - नई भाषा की तला का बिंदु। जब जब साहित्य भाषा जड़ीभूत होती है तब तब रचनाकार अपनी भाषिक संवेदना को संपन्नतर बनाने के लिए लोकभाषा की शरण में जाता है। आज भी समकालीन संवेदना और रचनाधर्मिता को देसीपन के इसी संस्कार की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

(कविता का समकाल-2) नई कविता का पुनर्पाठ : राष्ट्रीयता का संदर्भ


कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/
लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500 रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745

नई कविता का पुनर्पाठ : राष्ट्रीयता का संदर्भ



राष्ट्रीय चेतना नई कविता को एक अत्यंत समृद्ध काव्य-परंपरा के रूप में प्राप्त हुई। नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के कारण भारतेंदु युग से प्रगतिवाद तक राष्ट्रीय धारा निरंतर प्रवाहमान दिखाई देती है। तारसप्तककी संक्रमणकालीन कविता भी इससे अछूती नहीं है। ‘‘प्राचीन गौरव का स्मरण, उपलब्धियों का अंकन, राष्ट्र की वर्तमान स्थिति, परतंत्र राष्ट्र को स्वतंत्र बनाने का संकल्प आदि राष्ट्रीयता के विविध पक्षों पर अधिकांश कवियों ने कविताएँ रचीं। नए कवि ने इस समृद्ध परंपरा का सूक्ष्म निरीक्षण कर एक ऐसे राष्ट्रीय बोध का विकास किया, जिसमें राष्ट्र की वर्तमान स्थिति का अंकन और निर्माण का संकल्प प्रमुख था। नए कवि के मन में राष्ट्रीय गौरव भी है और सजगता भी।‘‘ (डॉ. देवराज, नई कविता की परख, सार्थक प्रकाशन,  2003., पृ.सं. 95)

इसमें संदेह नहीं कि सारा का सारा आधुनिक हिंदी साहित्य किसी न किसी रूप में राष्ट्रीयता से ही जुड़कर सार्थकता प्राप्त करता है। जहाँ छायावादी कविता ने रोमानी-राष्ट्रीयता को परिपुष्ट किया है, वहीं नई कविता ने उसे नया तेवर प्रदान किया। नई कविता ने जिस राष्ट्रीयता का विकास किया उसका अर्थ पारंपरिक सीमा से बंधा नहीं है वरन् उसमें अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णनों से आगे बढ़कर राष्ट्रीयता को बौद्धिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया गया है। इस कविता ने राजनैतिक उथल-पुथल के बीच रूपाकार ग्रहण किया। राष्ट्रीय संघर्ष की पृष्ठभूमि से उभरी नई कविता ने भारत-भारती को एशिया के कमल पर स्थित जागरण की आरती के रूप में देखा -
‘‘एशिया के कमल पर तुम भारती सी
पूर्व के जनजागरण की आरती सी
इस सदी के साथ केसर चरण धरकर
आ गईं तुम भूमि स्वर्ग संवारती सी
अमृत नदियों का जहाँ है सोम संगम
यह कपूरी लौ उठी उनकी मनोरम
लौट आई देश की ज्यों गंध गरिमा
चंद्र तन, नक्षत्र मन, ले ज्ञान संयम।‘‘
(गिरिजा कुमार माथुर, धूप के धान)

नई कविता की राष्ट्रीयता भौगोलिक सीमाओं तक अपने को संकीर्ण नहीं बनाती और इस प्रकार सांप्रदायिक राष्ट्रीयता से परे अंतरराष्ट्रीयता का संस्पर्श करती दिखाई देती है-
‘‘तेरे नायकत्व में है गतिशील मन जहाँ
सतत विराटतर होते हुए
कर्म और चिंतन की दिशा में-
उस मुक्ति-स्वर्ग में ही, मेरे पिता
जाग उठे मेरा देश।‘‘
(बालकृष्ण राव, अर्द्धशती)

नई कविता की राष्ट्रीय चेतना राष्ट्रीय गौरव के साथ-साथ राष्ट्रीय-शर्म को भी पहचानती है। स्वातंत्र्योत्तर काल में राष्ट्रीय विकास की असंतुलित गति के कारणों को यह कविता समझती है और व्यंग्य से भर उठती है -
‘‘राष्ट्रीय राजमार्ग प्रादेशिक पशुः
योजना आयोग वाले करें तो क्या करें
बिचारे उगाते हैं
आयातित रासायनिक खाद से
अंतरराष्ट्रीय करमकल्ले।‘‘
(अज्ञेय, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ)
अज्ञेय ने ‘‘आजादी के बीस बरस‘‘  की उपलब्धि का मूल्यांकन करते हुए कहा कि -
‘‘आजादी के बीस बरस से
बीस बरस की आजादी से
तुम्हें कुछ नहीं मिला
मिली सिर्फ आजादी।‘‘
(अज्ञेय, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ)
सपनों के टूटने के साथ-साथ वर्गवाद और जातिवाद के पनपने से स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय आत्मा और अस्मिता के घायल होने की घटना ने नए कवि को विचलित कर दिया। सत्ता के केंद्रीकरण, सांप्रदायिकता के उभार और भ्रष्टाचार की सर्वव्यापकता पर कविता का व्यंग्य करना उसकी राष्ट्रीय चेतना का ही एक पक्ष है -
‘‘देस रे देस
तेरे सिर पर कोल्हू
इसका भार तू कैसे ढोएगा
जिसे पेरेंगे जाट, बाम्हन
बनिया, तेली, खत्री
मौलवीं, कायथ, मसीही
जाटव, सरदार, भूमिहार, अहीर
और वे सारे घेरे के बाहर के बेचारे जो नहीं पहचानते अपनी तकदीर।‘‘
(अज्ञेय, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ)

मुक्तिबोध भारतीय जागरण को एशिया के जागरण का मूल मानते हैं। भारतमाता एक वृद्ध माँ है, जिसके अंतर से एक उल्का निकलती है और तारे टूटते हैं तो एशिया जागता है -
‘‘जब वृद्धा माँ के अंतर की
धुंधली लौ के अंतर में से
उल्का निकली, तारे टूटे
तभी एशिया जाग उठा था
छाती के भीतर की ज्वाला
जब बांकी शमशीर, हुई थी
(आंगन में तुलसी को नीरव
घर की गहरी पीर हुई थी)
तभी एशिया जाग उठा था
हिंदुस्तानी  जनता का तब
लौह दंड बेलाग उठा था।‘‘
(मुक्तिबोध, भूरी-भूरी खाक धूल)
कवि जनसंघर्ष की चेतना को पहचानता है और उसे अक्षुण्ण रखने के लिए कविता को जनमुक्ति के अभियान से सीधे-सीधे जोड़ता है -
‘‘ओ नागात्मन
संक्रमण काल में धीर धरो
ईमान न जाने दो
तुम भटक चलो
इन अंधकार मैदानों में सर-सर करते
शत उपेक्षित भूमि में फिंके
चुपचाप छिपाए गए
शुक्र, गुरु, बुध, मंगल
कचरे की पर्तों से ढके तुम्हें मिल जाएंगे।‘‘
(मुक्तिबोध, भूरी-भूरी खाक धूल)

धर्मवीर भारती ने भी अपनी कविताओं में राष्ट्रीयता को मुखर अभिव्यक्ति प्रदान की है। उनकी कविता सुभाष की मृत्यु पर इस दृष्टि से उल्लेखनीय है -
‘‘किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
धीमे-धीमे जबकि पड़ गया  होगा  बिल्कुल शांत
और रह गया होगा जब वह स्वर्ग-देश  एकांत
खोल कफन ताका होगा तुमने भारत की ओर।‘‘
(धर्मवीर भारती, ठंडा लोहा)
सच ही सुभाष जैसे देशभक्त के लिए स्वर्ग का सुख नहीं, अपने देश की स्वतंत्रता अधिक महत्वपूर्ण होती है तभी तो वह कफन खेाल कर स्वर्ग को नहीं भारत को निहारता है कि पुनः जन्म लेकर मातृभूमि की सेवा कर सके, उसे मुक्त करने के सपने को पूरा कर सके।
स्वतंत्रता के बाद भारत में राजनैतिक स्तर पर आडंबर और व्यक्तिपूजा का क्रमशः भयंकर प्रसार हुआ है। साथ ही, उपभोक्तावाद तथा अपसंस्कृति के आक्रमण ने भी राष्ट्र की प्रगति को पंगु बनाने में कोर-कसर नहीं रखी है। यह आक्रमण प्रच्छन्न है और प्रत्यक्ष आक्रमण की अपेक्षा अधिक खतरनाक है। कवि को इस खतरे का अहसास बहुत पहले हो गया था, तभी तो उसने कहा था-
‘‘ढंग है नया
लेकिन बात यह पुरानी है
घोड़ों पर रखकर या फिल्मों में रंग कर
वे जंजीरे केवल जंजीरें ही लाए हैं
और भी पहले वे कई बार आए हैं।‘‘
(धर्मवीर भारती, ठंडा लोहा)

ऐसे में राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण और संरक्षण की जिम्मेदारी बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों पर आती है, लेकिन जैसा कि मुक्तिबोध ने देखा था-
‘‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं
उनके खयाल से यह सब गप है
मात्र किंवदंती
रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध ये सब लोग
नपुंसक भोग शिरा जालों में उलझे।‘‘
(मुक्तिबोध, चाँद का मुंह टेढ़ा है)

उसी क्रम में धर्मवीर भारती ने भी तल्ख लहजे में कहा-
‘‘युद्धक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में मुझको ढूँढ़ोगे तुम व्यर्थ
आज तो मिलूँगा मैं तुमको पराए अंतःपुर में
चाटुकार विद्वानों,  मूर्खा महिषियों
अशिक्षित विदूषकों से घिरा हुआ
मैं जो हूँ नृपति विराट का विश्वस्त दास
नृत्य, गीत, कविता, कलाओं का ज्ञाता
किंतु हरदम भयाक्रांत।‘‘
(धर्मवीर भारती, सात गीत वर्ष)

राष्ट्रीय-संस्कृति को परिपुष्ट करने में हमारी असफलता ने राष्ट्रविरोधी जिस विकृति को फलने-फूलने का अवसर दिया, वह है सांप्रदायिकता। शमशेर बहादुर सिंह सांप्रदायिक उन्माद से लगातार मरते शहरों की बढ़ती संख्या के प्रति सही ही चिंतित हैं।  भारत देश की ईद: 1980 मुरादाबादजैसी कविता में  जहाँ वे एक ओर ईद,  मुहर्रम,  होली और शिवरात्रि जैसे त्योहारों पर भड़काए जाने वाले सांप्रदायिक दंगों के मर्म को पहचानने का सफल प्रयास करते हैं वहीं ‘‘धार्मिक दंगों की राजनीति‘‘ जैसी कविता में इनके पीछे छिपी शक्तियों को बेनकाब करते हैं -
‘‘जो धर्मों के अखाडे़ हैं
उन्हें लड़वा दिया जाए
जरूरत क्या है कि हिंदुस्तान पर
हमला किया जाए।‘‘
(शमशेर: काल तुझसे होड़ है मेरी)

यही वह राष्ट्रीय खतरा था जिसके प्रति गिरिजा कुमार माथुर ने नव स्वतंत्र राष्ट्र को 1950 में ही सावधान किया था-
‘‘आज जीत की रात पहरुए
सावधान रहना
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना।‘‘
(गिरिजा कुमार माथुर: पंद्रह अगस्त)
‘‘अविरल है मंजिल यह
है न आखिरी विराम
इस प्रशस्त मार्ग चले
देख  देश, नगर, ग्राम।‘‘
(गिरिजा कुमार माथुर: युगारंभ)
लेकिन हम सावधान नहीं रहे और परिणामस्वरूप हमारा राष्ट्रीय चरित्र निरंतर पतन के गर्त में गिरता चला गया। रामराज्य और सुराज्य की कल्पना आकाश कुसुम बन गई और एक ऐसी दमघोंटू व्यवस्था में रहने को देश विवश हो गया जिसकी कामना न हमारे पूर्वजों ने की थी और न हमने-
‘‘और हर बार
ठोस जमीं छत से टकराता हूँ
बाहर निकलने का उपाय
अब न कोई है
मुझे बेहद प्यास लगी है
पर आसपास हत्यारे कुएँ हैं
जिनमें मैं सिर्फ गिर सकता हूँ
घुप्प अंधेरे वाली
एक अंधी बंद दुनिया है
जो मैंने न रची थी
न माँगी थी
-वह दुनिया मेरी है।‘‘
(गिरिजा कुमार माथुर: जो बँध नहीं सका)

भारतभूषण अग्रवाल भी इन हत्यारे कुँओं की निशानदेही करते दिखाई देते हैं। वे एक ओर तो पूर्वजों से प्रश्न करते हैं कि -
‘‘दीप्त थीं शिखाएँ जो
धूमहीन निष्कलंक तेज की सवारियाँ
ताम्रारुण लपटें जो पहुँचती थीं व्योम तक
तारों के माथे भी पसीजते थे जिनकी भभक से
तप्तालोक जिनका
हमारे इस अंधे युग पथ की आशा था
कहाँ हैं वे
जवाब दो
     तुम : ओ ज्योतिवाहियो
     तुम : जिन्हें सौंपी थी इतिहास ने
           वह अग्निमयी शक्ति की मंगलनिधि
     तुम : ओ मेरे पूर्वजो।‘‘
(भारतभूषण अग्रवाल: ओ अप्रस्तुत मन)
तथा दूसरी ओर अतीत-मोह से मुक्त होकर अंधकूप से निकलने की शक्ति का आह्वान करते हैं -
‘‘ बढ़े चलो, बढ़े चलो - मगर बढ़ें तो हम कहाँ?
कि रास्ता ही जब नहीं,  तो डाल दें कदम कहाँ?
हमें प्रयाण के लिए, न व्याख्यान चाहिए
पड़े हैं अंधकूप में,  हमें उठान चाहिए।‘‘
(भारतभूषण अग्रवाल: ओ अप्रस्तुत मन)
लेकिन उठान की संभावनाएँ धूमिल हैं क्योंकि यह कार्य लोकतंत्र में जिस संस्था के सुपुर्द किया गया था, वह राष्ट्रसेवक या राष्ट्रपोषक बनने के बजाय राष्ट्रशोषक बनकर रह गई है-
‘‘संसद भवन में शहद का एक छत्ता लगा है
जिसकी मधुमक्खियाँ फूलों से नहीं घावों से मधु चूसती हैं
और रानी मक्खी कुछ नहीं करती
बस मिंककोट पहनती है।‘‘
(भारतभूषण अग्रवाल: एक उठा हुआ हा)
जगदीश  गुप्त ने अपनी कविता में उन स्थितियों पर व्यंग्य किया है जिनके कारण इस महान देश की महानता तक कलंकित हो रही है-
‘‘क्या कहा कवींद्र
महामानव समुद्र है हमारा यह देश?
रुको
अपने परिकल्पित विराट दिव्य रूपक में
मेरा लघु स्वर भी मिल जाने दो
क्षार से विषमता के
लहर लहर कुंठित है
स्वार्थों के पंकिल तल में
सारे मणि मुक्ता खोए हैं
भेदभाव के हिम से बूंद बूंद ठिठुरी है।‘‘
(जगदीश गुप्त, शब्द दंश)
नई कविता ने राष्ट्रीयता के संकटकाल में राष्ट्रीय परंपरा और राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति गहन आस्था का भी चित्रण किया है।  जब भारत के ज्योतिर्मय तुषार किरीट पर चीन कुछ मकोड़ों की तरह रेंगता हुआ चढ़ आया था तो कवि ने देश के आहत स्वाभिमान को जगाने और स्वयं को राष्ट्रीय बलिदानियों की परंपरा में जोड़ने की आकांक्षा व्यक्त की थी-
‘‘काल से भी अधिक होता है भयावह
किसी आहत स्वाभिमानी देश का
जागा हुआ अभिमान।‘‘
(जगदीश गुप्त, हिमविद्ध)

नई कविता देश  के इस स्वाभिमान और देशवासियों की इस राष्ट्रीयता आस्था के प्रति पूर्णतः निष्ठावान है, परंतु वह गौरव-गाथा के व्यामोह में इस तरह फँसने को कतई तैयार नहीं है कि स्वातंत्र्योत्तर काल में राष्ट्री-शर्म के स्मारक बने नेताओं के चरित्र की अनदेखी करे। इस कविता की राष्ट्रीय चेतना के पाठ की परिपूर्णता के लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रीयता को क्षति पहुँचाने वाली राजनीति पर व्यंग्यपूर्ण प्रहार के पाठ को भी उसमें शामिल किया जाए। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में कुल किस्सा यह है कि-
‘‘घंत मंत दुई कौड़ी पावा
कौड़ी लै के दिल्ली जावा
दिल्ली हम का चाकर कीन्ह
दिल दिमाग भूसा भर दीन्ह
भूसा ले हम शेर बनावा
ओह से एक दुकान चलावा
देख दुकान सब किहिन प्रणाम
नेता बनेन कमाएन नाम
नाम दिहिस संसद में सीट
ओह पर बैठ के कीन्हा बीट
बीट देख छाया खुशयाली
जनता हँसेसि बजाइस ताली
ताली से ऐसी मति फिरी
पुरानी दीवार उठी,  नई दीवार गिरी।‘‘
(सर्वेश्वर,  कविताएँ-2)