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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

भाषा संस्कृति संगम


भारत डिग्री कॉलेज फॉर वोमेन, काचीगुडा,हैदराबाद में २९ दिसंबर २०११  को ''भाषा-संस्कृति संगमम'' का आयोजन किया गया. वयोवृद्ध प्रो. ए.सुब्बा राव ने अंग्रेजी और उसमें बुनी संस्कृति पर समाज भाषा वैज्ञानिक नज़रिए से प्रकाश डाला , तो कवि और भाषातत्ववेत्ता प्रो. एम. सूर्यनारायण मूर्ति ने विस्तार से समझाया कि किस तरह तेलुगु भाषा और तेलुगु संस्कृति आज खतरे में हैं.

अपुन के जिम्मे तो भारतीय संस्कृति पर बोलना आया था. सो पंडित-द्वय अर्थात प.हजारी प्रसाद द्विवेदी और प.विद्या निवास मिश्र का सहारा लेकर अविरोधी धर्म, पुरुषार्थ चतुष्टय, आश्रम व्यवस्था, तीन ऋण तथा  तीन द [दमन-दान-दया] की व्याख्या कर दी और मुक्तिबोध का सहारा लेकर '' जो भी है उससे बेहतर चाहिए'' का नारा बुलंद कर डाला. [अरे हाँ, मुक्तिबोध से याद आया - उन पर केंद्रित फिल्म ''सतह से उठता  आदमी'' लाया है बेटा मुझे दिखाने के लिए. कल उसे दिल्ली लौटना है. चलूँ, वह फिल्म देख डालूँ. वरना बालक का दिल टूट जाएगा.]

विदा २०११

यह लो, एक बरस बीत गया

हम प्रेम की प्रतीक्षा में
बस लड़ते ही रह गए
साल भर

इसी तरह गँवा दिए
साल दर साल
लड़ते लड़ते
प्रेम की प्रतीक्षा में

बहुत खरोंचें दीं हम दोनों ने
एक दूसरे को

बहुत अपराध किए
बहुत सताया एक दूजे को
एक दूजे का प्यार जानते हुए भी

समय तेज़ी से दौड़ने लगा है
पिछले हर बरस से तेज

इस तीव्र काल प्रवाह में
कल हो न हो
फिर समय मिले न मिले

क्षमा माँग लूँ तुमसे
तुम जो धरती हो
तुम जो आकाश हो
तुम जो जल हो, वायु हो
तुम जो अग्नि हो, प्राण हो ,प्रेम हो
मैंने तुम्हें बहुत सताया , बहुत बहुत सताया
मेरे अपराधों को क्षमा करना

नए वर्ष में
फिर मिलेंगे हम
नए हर्ष से

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

आज कमल जी आए थे

काफी वक्त गुजर गया जब डॉ. राम कुमार तिवारी जी [निर्दोष] ने उप्पुगुडा [हैदराबाद] में मेधावी छात्रों कों सम्मानित और पुरस्कृत करने के लिए कार्यक्रम रखा था. पर आज वह प्रसंग ताज़ा हो आया. हुआ यों कि वयोवृद्ध कवि सत्यनारायण शर्मा 'कमल' जी उनके यहाँ होते हुए मेरे पास आए संस्थान में, तो तिवारी जी ने उनके हाथ उस आयोजन के कुछ फोटो भी भिजवा दिए.



शर्मा जी आयु के नवें दशक में हैं. अपने सुपुत्र के साथ आए थे. बहुत अशक्त हो गए हैं. ऊंचा तो वे सुनते ही हैं. पर आज पहली बार उन्हें बेंत के सहारे झुककर चलते देखा तो मैं धक्क रह गया. पता चला कि दोनों घुटने जवाब दे चुके हैं और आपरेशन करने से डॉक्टरों ने मना कर दिया है क्योंकि हृदय झेल नहीं पाएगा. अभी पिछले वर्ष जब मिले तो शर्मा जी इतने थके और पराजित से न थे. पर आज... उनकी आवाज में ...खा ...ली ....प ....न.....सा था.बोले  - साल छः महीने का जीवन है अब क्या आपरेशन करावें? सब परिचितों का हालचाल पूछते रहे .१५ मिनट रुके होंगे मेरे पास. मैं भी निकल रहा था. वे भी निकल गए. पर मन भारी हो गया. परमात्मा उन्हें स्वस्थ रखे....वे दीर्घायु हों...!

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

कलंब की संगोष्ठी के चित्र

कलंब [महाराष्ट्र] में २३/२४ दिसंबर २०११  को संपन्न ''पत्रकारिता के बदलते स्वरूप'' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन और समापन समारोह के कुछ चित्र  [जिनमें हमारा भी थोबड़ा दिखाई दे रहा है] संयोजक डॉ. साकोले दत्ता ने भेजे हैं. स्लाइड-शो प्रस्तुत है :

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

तेलुगु समाज का दर्पण बनती लघुकथाएँ


लघुकथा उपन्यास और कहानी की तुलना में अपेक्षाकृत नई विधा है, और कम चर्चित भी. सत्तरोत्तर काल में हिंदी में इस विधा की रचना ने आंदोलन का रूप ग्रहण किया. तब से वहाँ यह विधा खूब फल फूल रही है. यह जानना विस्मयकारी हो सकता है कि तेलुगु में अब भी लघुकथा आरंभिक अवस्था में ही है. विभिन्न भारतीय भाषाओं की लघुकथाओं के अध्येता बलराम अग्रवाल बताते हैं कि समकालीन तेलुगु कथा साहित्य में लघुकथा लेखन की स्थिति हिंदी, यहाँ तक कि मलयालम लघुकथा लेखन से भी नितांत भिन्न एवं कमजोर प्रतीत होती है. उनके अनुसार तेलुगु में लघुकथा की भाषा एवं कथ्य अभी भी कहानी से ही प्रभावित हैं. इसी कारण जब हम उनके द्वारा संपादित सोलह कथाकारों की 106 ‘तेलुगु की मानक लघुकथाएं’ (2010) देखते हैं जिनका अनुवाद पारनंदि निर्मला ने किया है तो साफ लगता है कि तेलुगु लघुकथा का कहानी के संस्कार से मुक्त होना अभी बाकी है – तभी उसमें झकझोरने और विचलित करने की व्यंजना शक्ति का विस्तार होगा.
यहाँ लघुकथा के संबंध में भूमिका (लघुकथा : आकार का अनुशासन) में व्यक्त बलराम अग्रवाल के ये विचार देखे जा सकते हैं – “मात्र आकार का ही छोटा या बड़ा होना किसी भी विधा के लिए मूल्य स्थापित नहीं कर सकता. लेकिन वही मूल्यवान-महत्वपूर्ण माना जाता रहा है जो अपने युगीन जनजीवन की परतें उघाड़, पाठकों को उसके नग्न यथार्थ से परिचित करवा सके; जो शोषक और शोषित – दोनों के मध्य पुल बन. उन्हें उनके उत्थान व पतन पर लगे प्रश्न चिह्नों से अवगत करा, ‘सही’ करने के प्रति उनमें चेतना जागृत करा सके; जो हर ‘गलत’ के विरुद्ध संघर्ष कर सकने वाली जुझारू भूमिका निभा सके तथा जो सामान्यजन के दुःख-दर्द को वहन कर उन्हें यथावत पाठकों तक संप्रेषित कर उन्हें कुछ सोचने पर बाध्य कर सके. चूंकि लघुकथा में इन क्षमताओं का अभाव नहीं है, इसीलिए वह मूल्यवान बनी है, मात्र आकार की लघुता के कारण ही नहीं. फिर भी, आकारीय लघुता इसकी एक विशेषता मानी गई है.” लघुकथा कों उन्होंने फ्लैश फिक्शन का समानार्थी मानते हुए कौंध कथा भी कहा है. 

इसमें संदेह नहीं कि कथ्य की जिन विशेषताओं की ओर ऊपर इशारा किया गया है तेलुगु की ये मानक लघुकथाएं उनसे संपन्न हैं. इनके सरोकारों में आंध्र प्रदेश के ग्रामीण जीवन की परेशानियां, पुलिस और उग्रवादियों के दोहरे आतंक को झेलने की विवशता, धार्मिक कृत्यों के नाम पर पाखंड और अंधविश्वास की व्याप्ति, भारतीय लोकतंत्र की असफलता, लैंगिक भेदभाव झेलती लड़की की वेदना, गरीबी, भ्रष्टाचार, मूल्यह्रास, संबंधों का छीजते जाना और मध्य वर्ग के जीवन की यांत्रिकता आदि तमाम तरह की समकालीन चिंताएं शामिल हैं. शिल्प की दृष्टि से चुटीलापन कुछ कम देखने में आया है जो लघुकथा को वैचारिक हलचल का आधार बनाता है. 

तेलुगु की ये लघुकथाएं हिंदी पाठक को अपने सरोकारों के माध्यम से जहाँ उसकी पहले से परिचित कष्ट और वेदना से भरी हुई दुनिया का दर्शन कराती हैं वहीं उसके समक्ष तेलुगु लोक के अपेक्षाकृत अपरिचित जगत का झरोखा भी खोलती हैं. वह जान पाता है कि देवी माँ को तेलुगु प्रदेश में आदरपूर्वक 'अम्मावारू' कहा जाता है और किसी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक संबोधित करने के लिए हिंदी के ‘जी’ की भाँति ‘गारू’ का प्रयोग किया जाता है. देवी पूजा के अवसर पर पीले कपड़े पहन कर औरतें नीम की टहनियाँ हाथ में लेकर बाल बिखेर बिखेर कर उसी तरह तन्मय होकर नाचती हैं जिस तरह हिंदी प्रदेशों में देवी या भैरव के भक्त नाचते हैं. उन पर हल्दी मिले पानी के कलश उड़ेले जाते हैं. संक्रांति के तीसरे दिन ‘कनुमा’ के अवसर पर पुलिहोरा, बूरुलु, मीठे बडे, मीठे चीले और मुर्गी का मांस बनाया जाता है. लड़कियों को साड़ी ब्लाउज और दामादों को नए कपड़े दिए जाते हैं. किसी महिला के घर आने पर यहाँ उसे विदा करते समय साड़ी ब्लाउज, नारियल, केला, फूल, पान, हल्दी और कुमकुम देने की प्रथा है. लोक संबंधी इस प्रकार की अनेक जानकारियाँ हिंदी के पाठक को सांस्कृतिक स्तर पर संपन्नतर और समृद्धतर बनाती हैं. इस दृष्टि से यह चयन अत्यंत वैविध्यपूर्ण और उपादेय है तथा ये लघुकथाएं तेलुगु समाज का दर्पण कहे जाने की हक़दार हैं. 

इन लघुकथाओं का अनुवाद तेलुगु और हिंदी में एक समान गति रखनेवाली वरिष्ठ लेखिका पारनंदि निर्मला ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक इस प्रकार किया है कि पाठक को यह सामग्री अनूदित प्रतीत नहीं होती. भाषा शैली की यह प्रांजलता और प्रवाहशीलता अनुवादक के रूप में उनकी लंबी साधना का सुफल है, इसमें संदेह नहीं. 


चर्चित पुस्तक – तेलुगु की मानक लघुकथाएं 
अनुवादक – पारनंदि निर्मला  
संपादक – बलराम अग्रवाल
प्रकाशक- मित्तल एंड संस, विजय ब्लाक, लक्ष्मीनगर, दिल्ली – 110092  
संस्करण – प्रथम : 2010
पृष्ठ - 175
मूल्य – 300 रुपए

रविवार, 25 दिसंबर 2011

गूँगा तमाशबीन बना क्यों खड़ा है तू ? : सवाल पत्रकारिता से


२३/२४  दिसंबर,  २०११
कलंब, महाराष्ट्र; 
शिक्षण महर्षि ज्ञानदेव मोहेकर महाविद्यालय.
द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : उद्घाटन सत्र समापन सत्र में  
शुभाशंसा भाषण : ऋषभ देव शर्मा

हिंदी और मराठी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप
-         १८३२: मराठी का पहला अखबार : दर्पण: मुंबई से: संपादक बालशास्त्री जांभेकर : उद्देश्य वाक्य – ‘’लोक-स्थिति, धर्म-रीति में उपयोगी परिवर्तन घटित करना.’’

-          ‘ज्ञानप्रकाश’ [अखबार] :१८ अप्रैल १८७८ ; ‘’भारत का शासन सुन्दर परन्तु छिनाल स्त्री की भांति है.उसका सौंदर्य आकर्षक एवं मोहक है.लेकिन वह अत्यंत धूर्त, धोखा देने वाली और बेरहम है. एक बार वह प्रेम से देखेगी तो दूसरे ही क्षण किसी कों घायल करेगी.’’

-          कष्ट विलासिनी [पत्र] पुणे : ‘’अंग्रेजी राज्यकर्ता लुच्चे हैं.......लेकिन सब एकजुट हो जायं तो इन उचक्कों कों हकालना कुछ कठिन नहीं है.’’ [१८८०]

-          लोकमान्य तिलक –१८८० से १९२० तक  केसरी और मराठा – स्वतंत्रता चाहने वाली जनता की विजय गाथा. ‘’मेरे क्लेश से मेरे कार्य का उत्कर्ष होगा, संभवतः यही ईश्वर का संकेत है.’’

-          स्वातंत्र्योत्तर काल में दो बड़े परिवर्तन-

-          १.पत्रकारिता/समाज की सर्वांगीण उन्नति के उद्देश्य के स्थान पर/ व्यापार या व्यवसाय/ मिशन बनाम प्रोफेशन . २.संपादक की जनजीवन से प्रतिबद्धता महत्वहीन हो गई/ लाभ अर्जित करना/ संपादक का कद घटा, जनता कों प्रभावित करने की शक्ति भी घटी.

-          [स्रोत- भारतीय भाषा पत्रकारिता:एक अवलोकन में डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर का निबंध]

आज की पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के कुछ पहलू
[लिपि भारद्वाज से चर्चा के आधार पर]
१.       इतने सारे न्यूज़ चैनल / २४ घंटे न्यूज़ फॉर्मेट/ इसलिए न्यूज़ के साथ नॉन-न्यूज़ भी/ बाबागण.
२.      सब कुछ को सनसनीखेज कर दिया गया है/ पैकेजिंग ऐसी कि सबकी पुतलियाँ बड़ी हों / मर्डर स्टोरी में बैकग्राउंड म्यूजिक डाल देंगे/ रेप का नाट्य रूपांतर.
३.      विश्वसनीयता और प्रामाणिकता दांव पर/ गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा/ पीपली लाइव/ चार न्यूज़ चैनल – चार भिन्न विवरण/ हमारे सूत्र के अनुसार ४० – १००- २० मरे.
४.     कारण/ पाठक-दर्शक को यही चाहिए/ यही बिकता है./ डीडी न्यूज़ प्लेन और बोरिंग./ बरखा दत्त चिल्लाएगी – वी द पीपुल...इण्डिया क्वेश्चंस....सनसनी पैदा होती है.....भले ही वाहन इण्डिया के नाम पर १५ लोग हों.
५.     दो प्रकार के न्यूज़ फोर्मेट/ एक – ब्लाक. दो- इंटीग्रेटेड/ ब्लाक फोर्मेट – बीबीसी,डीडी- औपचारिक सेटिंग्स, औपचारिक भाषा , औपचारिक भूषा./ इंटीग्रेटेड फोर्मेट – अपेक्षाकृत इन्फोर्मल- प्रस्तुतीकरण की शैली, वेशभूषा, सेटिंग्स. मुख्य अंतर  कि ब्लोक फोर्मेट का स्वरूप स्थिर होता है – अलग अलग खण्डों के लिए संतुलित अवधि निर्धारित होती है/ इंटीग्रेटेड फॉर्मेट लचीला – मैच जीता तो वही प्रथम समाचार...साथ ही आक्रामक भाषा.
६.      प्रोक्सिमिटी - स्थानीयता महत्वपूर्ण/ अंतरराष्ट्रीय समाचार तभी लीड जब उसमें कुछ इण्डिया-कनेक्शन हो./ क्षेत्रीय और लोक भाषाओँ और लोक संस्कृति को केंद्रीय स्थान/ कल तक हाशिए पर थे.
७.     मुखपृष्ठ सम्पूर्णतः विज्ञापन कों समर्पित.....आगे देखिये!.
८.      पेड न्यूज़/ भारतीय पत्रकारिता जगत में नया संकट...न्यू क्राइसिस इन इण्डिया/ जर्नलिस्म फॉर सेल/ चार तरह के पॅकेज – १. अतिशयतापूर्ण न्यूज़ स्टोरी; २. अतिशयतापूर्ण न्यूज़ स्टोरी प्लस एड; ३. प्लस प्रोफाइल; ४. प्लस निगेटिव कैंपेन./ मनी फॉर स्पेस/ अनैतिक/ लिफ़ाफ़े देना पुरानी  बात हो गई./ इलेक्शन प्रीमियम का प्रकाशन/ महाराष्ट्र के चुनावों में वोटिंग से तीन दिन पहले अशोक चह्वाण का स्तुतिगान समाचार के रूप में/ लोकमत – पुढारी pudhari- महाराष्ट्र टाइम्स / प्रतिष्ठित परस्पर प्रतिद्वंद्वी मराठी दैनिक / करोड़ों का विज्ञापन – हमारे संवाददाता की बाईलाइन के साथ/ घोषित खर्च रु. ११,३७९/- मात्र/ अशोक पर्व...विकास पर्व.
९.       संपादक नामक संस्था कमज़ोर / एम जे अकबर को उनके अपने अखबार से निकाल बाहर किया गया.
१०.   भाषा पक्ष... सरलीकरण की प्रवृत्ति...भाषा मिश्रण-खतरनाक स्तर तक......सरकार की सब्जी में ज़हर नहीं...अलर्ट हो जाओ टीम इण्डिया....डी यू स्टूडेंट का दिन दहाड़े मर्डर....विवेक विहार में रिटायर्ड टीचर की हत्या...टेरर लिंक की जांच हो.../साथ ही  प्रगतिशील भाषा की छवि और नई नई प्रोक्तियों-प्रयुक्तियों का विकास/ उत्तर संस्कृति...फास्ट लाइफ ....संक्षेपण प्रवृत्ति.../ तल्ख़, धारदार, तिलमिला देने वाली भाषा.....पुलिस का तांडव, धोनी सेना ने धूल चटाई, दो शून्य से रौंदा,...आतंकवादी हमले में दहला पाक...फिर बरसीं लाठियां...मोदी कों फंसाने के लिए साज़िश रच रहा है केन्द्र.../ नजाकत नफासत के ज़माने लद गए./ देहभाषा और अनुतान का प्रयोग. ‘’जनपद सुख बोध्य’’ भाषारूप की तलाश की छटपटाहट.
११.   पत्रकारिता/मीडिया के मूल्य क्षरण को समाज में अन्यत्र-सर्वत्र व्याप्त मूल्य क्षरण की ही अभिव्यक्ति अथवा उत्तरजीविता[सर्वाइवल] की अपरिहार्य मजबूरी कहकर उचित सिद्ध करने के प्रयास हमारी दृष्टि में अनुचित/ व्यावसायिकता का निदर्शन भर नहीं मीडिया, बल्कि बाजारवाद मीडिया के पंखों पर चढ़कर आया है और अब मीडिया उपभोक्तावाद का प्रसारक बना हुआ है. व्यावसायिकता के बावजूद सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व बोध अपेक्षित.
१२.  तेवरी अंश -
माना कि भारत वर्ष यह संयम की खान है
झंडे के बीच चक्र का लेकिन निशान है.

कुछ  लोग जेब में उसे धर घूम रहे हैं
सबसे विशाल विश्व में जो संविधान है.

गूँगा तमाशबीन बना क्यों खड़ा है तू
तेरी कलम कलम नहीं, युग की ज़ुबान है.

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए उन्मुखीकरण


मैसूर.बारह से पंद्रह दिसंबर,२०११. क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण  परिषद् [नई दिल्ली] के तत्वावधान में चार दिन का उन्मुखीकरण कार्यक्रम था. यानी जिसे अंग्रेजी में ओरिएंटेशन  प्रोग्राम कहते हैं. कर्नाटक और केरल के  केंद्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों के हिंदी अध्यापक आए थे - करीब चालीस - जिन्हें हिंदी शिक्षण में नवाचार की ओर उन्मुख करना था. 

विशेषज्ञ  अथवा संसाधक की हैसियत से एनसीईआरटी  से कार्यक्रम संयोजक नरेश कोहली और प्रो. संध्या सिंह  आए थे. दोनों ने बड़े विस्तार से पाठ्यचर्या से लेकर सतत और समग्र मूल्यांकन तक पर खुल कर चर्चा की. देखने में आया कि अध्यापकवृंद अभी मूल्यांकन की नई पद्धति [सीसीई] को हज़म नहीं कर पाया है - भला ऐसे में उसे अभिभावकों के गले कैसे उतारा जा सकता है. किसी को लगता है कि उसे अध्यापक से पटवारी बना दिया गया है तो किसी को लगता है कि इससे छात्रों में गैर-ज़िम्मेदारी बढ़ रही है. यह भी पता चला कि शिक्षा के विकेंद्रीकरण के ये प्रयास कुछ स्थलों पर अधिकारियों की तानाशाही का आधार बन रहे हैं. कुल मिला कर ढेर सारा कन्फ्यूज़न!!!

हिंदू कॉलेज, सोनीपत के एसोशिएट प्रोफ़ेसर और हास्य कवि डॉ. अशोक बत्रा परिषद् के बाहर से आए विशेषज्ञों में थे, मेरे अलावा.  डॉ. बत्रा वर्तनी और व्याकरण के अधिकारी विद्वान् हैं - हर स्तर के लिए उन्होंने व्याकरण की किताबें लिखी हैं. सम्मोहक वक्ता हैं. उन्होंने चारों दिन वर्तनी को समर्पित किए तथा एक सर्वेक्षण भी कर डाला कि प्रतिभागी अध्यापक भ्रमात्मक वर्तनियों में किन रूपों को सही मानते हैं. बत्रा जी जीवंत बन्दे हैं. खूब हँसाते हैं. व्याकरण को प्रतीक बनाकर कई  कविताएं  भी उन्होंने लिख रखी हैं - मेरे आग्रह पर सुनाई भी. और हाँ, हममें वही पहले थे जो पहली ही शाम बाज़ार जाकर खूब सारी खरीदारी कर आए - मैसूर सिल्क. बोले वरना श्रीमती जी घुसने नहीं देंगी.

इस कार्यक्रम का एक लाभ यह हुआ कि दो वरिष्ठ भाषावैज्ञानिक विद्वानों को सुनने का अवसर मिल गया - प्रो.जे सी शर्मा और प्रो राजेश सचदेवा. दोनों मैसूर के भारतीय भाषा संस्थान से सम्बद्ध रहे हैं. उन्होंने विस्तार से समझाया कि अन्य भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाते समय व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से किस तरह मदद ली जानी चाहिए.

अब बचे अपुन. पहले दिन नरेश जी ने कहा कि द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की पीठिका बनाते हुए अन्य भाषा की अवधारणा पर चर्चा करूँ - कर दी. दूसरे दिन कथेतर गद्य विधाओं के शिक्षण पर बात करते हुए कक्षा आठ में शामिल सोमदत्त के पत्र  ''चिट्ठियों में यूरोप'' के भाषिक शिक्षण बिंदु निकाल कर दिखाए तो अध्यापकों को अच्छा लगा. तीसरे-चौथे दिन कविता शिक्षण की चर्चा में सोहन लाल द्विवेदी की 'ओस' और त्रिलोचन की 'उठ किसान ओ' के विश्लेषण में उन्होंने भी आगे बढ़कर हिस्सा लिया और जो लोग यह मान रहे थे कि भाषा की चिंदी-चिंदी करने से कविता का आनंद खो सकता है उन्हें भी लगने लगा कि पाठ के भीतर से ही कविता के मर्म तक पहुँचने का रास्ता बनाया जा सकता है. कुल मिलकर यह कि मज़ा आया.

वापसी में तीन दिन बेंगलूरू रुका - भतीजी के घर. सारे समय बालाजी और मैं प्रोफ़ेसर दिलीप सिंह जी के अभिनंदन ग्रंथ  के प्रूफ देखने में जुटे रहे; फिर भी नातिन परी के साथ खेलने का मौका मिल गया. उस शैतान की खाला  ने मुझे सारे खेलों में पीट दिया - बेहद सुखकर लगता है अपनी तीसरी पीढी के हाथों हारना! पर उसे इतने से चैन नहीं पडा. अपनी गुडिया के सिंगार का पिटारा निकाल लाई और मेरे दाएँ हाथ के पाँचों नाखून अलग-अलग रंग की पॉलिश से रंग डाले. अभी भी वह रंग उतरा नहीं है.....और कल मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में शोधार्थियों को संबोधित करने जाना है. चलूँ, रंग-रिमूवर ढूँढ लूँ.

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

असहमति बुद्धिजीवियों का स्थायी भाव है!


चित्र-परिचय :
1 . साहित्य मंथन की 'साहित्य-संध्या' के अवसर पर लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा. 
2 . 'साहित्य-संध्या' के अवसर पर व्यंग्य-वाचन करते हुए भगवान दास जोपट. साथ में हैं गुरु दयाल अग्रवाल, डॉ.देवेन्द्र शर्मा, ज्योति नारायण, पुरवा और गीतिका कोम्मूरी.


असहमति बुद्धिजीवियों का स्थायी भाव है! 
हैदराबाद, 10  दिसंबर 2011 .

बुद्धिजीवी बुद्धि खाकर जीने वाले ऐसे जीवों को कहा जाता है जो दिन-रात दुनिया-जहान की चिंता में घुल-घुल कर दुबले होते रहते हैं. इन्हें औरों से अलग पहचाना जा सकता है क्योंकि ये दूसरों से अलग ही रहते हैं. आम तौर से चेहरे  पर विराजमान गंभीर  मनहूसियत और बढ़ी हुए फ्रेंच दाढी इन्हें सामान्य लोगों से अलग करती हैं. हर स्वयंसिद्ध सत्य भी इन्हें बिना बौद्धिक  कसरत के ग्राह्य नहीं होता इसलिए आप इन्हें कभी भी कहीं भी अंतहीन बहसों में उलझा पा सकते हैं. असहमति बुद्धिजीवियों का स्थायी भाव है. 

ये उद्गार वरिष्ठ व्यंग्यकार  भगवान दास जोपट ने यहाँ 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में संपन्न 'साहित्य-संध्या' में अपना ''बुद्धिजीवी'' शीर्षक व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए प्रकट किए.

साहित्य-संध्या में विनीता शर्मा, गीतिका कोम्मुरी, ज्योति नारायण, पुरवा, मनोरमा अग्रवाल, डॉ. पूर्णिमा शर्मा , डॉ. देवेन्द्र शर्मा, गुरुदयाल अग्रवाल, पी एस नारायण, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, भगवान दास जोपट , लक्ष्मी नारायण अग्रवाल तथा संयोजक डॉ. बी बालाजी ने समसामयिक विषयों पर विमर्श के साथ विविध रसों की कविताएँ पढ़ीं.