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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

काव्यशास्त्र और अनुवाद समीक्षा


डॉ.शकीला ख़ानम (1965) कई भाषाओं की जानकार हैं और लंबे समय से काव्यशास्त्र, अनुवाद, भाषा शिक्षण, तुलनात्मक साहित्य, राजभाषा, दूरस्थ शिक्षा, स्त्री विमर्श और ई-लर्निंग संबंधी शोध कार्यों से जुड़ी रही हैं. उनके वैदुष्‍य को उजागर करनेवाली दो पुस्तकें गत दिनों सामने आई हैं - 'आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास' (2010) एवं 'काव्यानुवाद की समस्याएँ' (2010). ये दोनों ही कृतियाँ अत्यंत अध्‍यवसायपूर्ण गहन अध्ययन और सुलझी हुई शोधदृष्‍टि का परिणाम हैं. इनसे लेखिका के बहुपठ होने का भी पता चलता है. 




इनमें से आलोचना सिद्धांतों से संबंधित पुस्तक भारतीय और पश्‍चिमी काव्यशास्त्र और आलोचना की परंपरा का विवेचन करते हुए आधुनिक काल में हिंदी और तेलुगु के आलोचना साहित्य की काव्यशास्त्रीय अथवा सैद्धांतिक उपलब्धियों का तुलनात्मक आकलन करती है. लेखिका ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि इन दोनों भाषाओं का आधुनिक आलोचना साहित्य पूर्वी और पश्‍चिमी काव्यशास्त्र से किस रूप में प्रभावित हुआ है और आधुनिक आलोचकों ने कौन सी मौलिक स्थापनाएँ की हैं. 


हिंदी आलोचना की चर्चा करते हुए लेखिका ने इसके प्रवर्तन का श्रेय भारतेंदु हरिश्‍चंद्र को उचित ही दिया है, जिन्होंने हिंदी में साहित्य की आत्मा का सवाल पहले पहल उठाया था. डॉ.शकीला का विचार है कि भारतेंदुकालीन आलोचना यूरोप की पुनर्जागरणकालीन आलोचना के समकक्ष है. इसी प्रकार उन्हें द्विवेदी युग की मान्यताएँ पश्‍चिमी दर्शनवादी युग की शास्त्रीयता संबंधी मान्यताओं के समकक्ष प्रतीत होती हैं. इसके समांतर हिंदी पाठकों के लिए यह जानकारी अत्यंत रोचक हो सकती है कि आधुनिक तेलुगु साहित्य में विभिन्न आलोचना सिद्धांतों का विकास आंदोलन के रूप में हुआ है. कंदुकूरि वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु (1848 - 1919) को इसका प्रवर्तक माना जाता है. आगे विश्‍वनाथ सत्यनारायण ने इसे नई दिशा दी जिसे 'काव्यशिल्पानुशीलन युग' के रूप में जाना जाता है. आगे समन्‍वय युग में समन्वयात्मक, विश्‍लेषणात्मक और तुलनात्मक आलोचना का विकास हुआ और 1970 के बाद विभिन्न वादों और विमर्शों से प्रभावित समीक्षा युग का उन्मेष हुआ. तेलुगु आलोचना के ये विभिन्न युग हिंदी आलोचना के लगभग समसामयिक ही हैं और भारतीय साहित्य की एक जैसी प्रवृत्ति्यों के द्‍योतक हैं. 

डॉ.शकीला ख़ानम ने 'आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास' में दोनों भाषाओं में आलोचना के उद्‍भव और विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करने के उपरांत यह दर्शाया है कि इन दोनों ने भारतीय काव्यशास्त्र के रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, औचित्य तथा वक्रोक्‍ति जैसे सिद्धांतों को ग्रहण करते हुए उनका कुछ न कुछ विकास किया है. इसी प्रकार दोनों ने ही प्लेटो, अरस्तु, लांजाइनस, होरेस और दांते जैसे पश्‍चिमी काव्यशास्त्रियों के सिद्धांतों को ग्रहण किया है और अभिव्यंजनावाद, काल्पनिकवाद, हेतुवाद, मार्क्सवाद, मानवतावाद, बिंबवाद, प्रतीकवाद, अस्तित्ववाद, अनुभूतिवाद और विप्‍लववाद आदि का विकास किया है. लेखिका ने ग्रहण और विकास के विभिन्न बिंदुओं का निर्धारण करते हुए इन सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में सफलतापूर्वक आधुनिक हिंदी और तेलुगु आलोचना के सत्व का निरूपण किया है. हिंदी पाठकों के लिए यह जानना रोचक होगा कि तेलुगु में रस सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या करते हुए डॉ.जी.वी.सुब्रह्‍मण्यम्‌ ने यह प्रतिपादित किया है कि धर्मवीर रस सर्वोपरि रस है और रामायण तथा महाभारत दोनों का अंगीरस धर्मवीर ही है. उन्होंने आनंदवर्धन के इस मत को स्वीकार नहीं किया कि रामायण करुण रस प्रधान काव्य है. इसके विपरीत वे मानते हैं कि राम के जीवन में शोक स्थायी भाव नहीं है केवल संचारी है; तथा इसमें धर्म का उत्साह स्थायी भाव है. उन्होंने यह भी कहा है कि लोकधर्म व्यक्‍तिधर्म से श्रेष्‍ठ है. शोक का उदय होने पर भी धर्म उस पर शासन करता है, इसलिए पूर्वरामायण की तरह उत्तररामायण में भी धर्मोत्साह ही स्थायी भाव है; अतः धर्मवीर अंगीरस है और करुण अंग है. 

जैसा कि डॉ.नगेंद्र ने कहा है, "कम से कम हिंदी के पास इतना मूल धन अवश्‍य विद्‍यमान है कि इसके आधार पर एक अच्छे काव्यशास्त्र का निर्माण किया जा सकता है." यह बात केवल हिंदी ही नहीं आज की ज्यादातर साहित्यिक भारतीय भाषाओं के संबंध में कही जा सकती है. विभिन्न भाषाओं के साहित्य समीक्षकों ने संस्कृत और पश्‍चिमी काव्यशास्त्र की प्रतिपत्तियों को अंतिम न मानते हुए उनमें नई स्थापनाएँ जोड़ी हैं. हिंदी आलोचकों के सिरमौर आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल ने आलोचना के लिए मूल स्रोत रसवाद को चुना है लेकिन वे संस्कृत रसवाद की पुनरावृत्ति भर नहीं करते. शकीला जी बताती है कि संस्कृत आचार्यों की मान्यता थी कि अनुभूति एक अलौकिक वस्तु है. शुक्ल जी इसके विपरीत रसानुभूति के स्वरूप पर विचार करते हुए कहते हैं कि रसानुभूति प्रत्यक्ष या वास्तविक अनुभूत से सर्वथा पृथक कोई अंतर्वृत्ति नहीं है बल्कि उसी का एक उदात्त और अवदात रूप है. शुक्ल जी के अनुसार कविता का कार्य मनुष्य के हृदय को स्वार्थमुक्‍त करना है. साधारणीकरण के पक्षपाती होने के कारण उन्होंने कविता में व्यक्‍तिवैचित्र्य को प्रमुखता देने वाले पश्‍चिमी काव्य सिद्धांत का विरोध किया. इसी प्रकार नंददुलारे वाजपेयी ने भी रस को काव्य की मानवतावादी सत्ता से जोड़ा तथा नगेंद्र ने रस सिद्धांत की परिधि का इतना विस्तार किया कि अभिजात्यवाद, स्वच्छंदतावाद, यथार्थवाद, अभिव्यंजनावाद, प्रभाववाद और प्रतीकवाद तक भी उसके घेरे में आ गए. डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सांस्कृतिक चेतना के नैरंतर्य और मानवतावाद को आलोचना का मूलबिंदु बनाया. आगे भी वामपंथी आलोचकों ने मार्क्सवादी विचारधारा का भारतीयकरण करते हुए उसे नवीन आयाम प्रदान किए. डॉ.शकीला मानती हैं कि रामविलास शर्मा ने आलोचना के माध्यम से उसी सामंती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचंद और निराला ने.  इसी क्रम में उन्होंने समकालीन रचनाओं के सही संदर्भ की पहचान को डॉ.नामवर सिंह की सबसे बड़ी विशेषता माना है.

आधुनिक तेलुगु आलोचना के सत्व का निरूपण करते हुए डॉ.शकीला ख़ानम ने परंपरा के साथ प्रयोग के समन्वय को प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में रेखांकित किया है और कहा है कि यह एक तरह से आंध्र-चरित्र की विशेषता है कि यहाँ परंपरा से पूर्णतया विच्छेद कभी स्वीकार नहीं किया गया. अपनी बात के समर्थन के लिए लेखिका ने भाव कवित्वम्‌ (छायावाद), अभ्युदय कवित्वमु (मार्क्सवाद), वचन कविता (गद्‍य कविता) और विप्‍लव कवित्वमु (जनवाद) द्वारा आलोचना के आधुनिक मानदंड़ों के विकास की चर्चा की है. वे यह बताती हैं कि इन सभी आंदोलनों से जुड़े आलोचकों ने प्रगति और परंपरा का सुंदर समन्वय किया है.  कोडवटिगंटि कुटुंबराव के 'साहित्य प्रयोजनम्‌' में उनके मार्क्सवादी और मानवतावादी विचारों का परिचय मिलता है. डॉ.सुप्रसन्न कृत 'साहित्य विवेचना' को तेलुगु के सर्वश्रेष्‍ठ समीक्षा ग्रंथों में माना गया है. गौरीपति वेंकटसुब्बय्या की पुस्तक 'चलम' और 'अक्षराभिषेकम्‌', डी.राजाराव की पुस्तक 'लाइफ आफ गोपीचंद' और एन.गुरुप्रसाद के 'आंध्र पत्रिका' के वार्षिक अंकों में प्रकाशित लेखों में प्रगतिशील आलोचना की प्रवृत्तियाँ दृष्‍टिगोचर होती हैं. 

लेखिका ने गद्‍य की विभिन्न विधाओं के परिप्रेक्ष्य में प्रतिमानों के विकास को तेलुगु आलोचना के निजी व्यक्‍तित्व की पहचान माना है. इस दृष्‍टि से कल्लूरि वेंकटनारायण राव कृत  कवित्ववेदी, शिष्टा रामकृष्ण शास्त्री और आरुद्रा के तेलुगु साहित्य के इतिहास और डॉ.सी.नारायण रेड्डी तथा प्रो.जी.जे.सोमयाजी के तेलुगु भाषा के इतिहास के ग्रंथ उल्लेखनीय हैं. स्मरण रहे कि कॉडवेल ने तेलुगु को द्रविड परिवार की भाषा बताया था परंतु डॉ.सी.नारायण रेड्डी ने इसे संस्कृत और प्राकृत से जन्मी भाषा माना है. ऐसी अनेक जानकारियाँ और स्थापानाएँ डॉ.खानम के ग्रंथ 'आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास' को हिंदी पाठकों के लिए एक आवश्‍यक ग्रंथ बनाती हैं.


अपनी दूसरी पुस्तक 'काव्यानुवाद की समस्याएँ' में भी डॉ.शकीला ख़ानम ने हिंदी और तेलुगु कविता के तुलनात्मक संदर्भ को केंद्र में रखा है जिसके कारण वह भी एक संग्रहणीय पुस्तक बन गई है. अनुवाद की समस्याओं पर एकपक्षीय सैद्धांतिक चर्चाएँ तो बहुत होती रहती हैं लेकिन इन समस्याओं को अनुवाद-समीक्षा और अनुवाद-मूल्याकंन के साथ जोड़कर डॉ.शकीला ख़ानम ने वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है. जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य 'कामायनी' के हिंदी से तेलुगु तथा सी.नारायण रेड्डी के महाकाव्य 'विश्‍वंभरा' के तेलुगु से हिंदी अनुवादों की समीक्षा पर केंद्रित यह कृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें लेखिका ने व्यावहारिक संदर्भों के आधार पर काव्यानुवाद के संद्धांतों का निरूपण करने का भी सफल प्रयास किया है.

अनुवादक की व्यक्‍तिगत रुचि किस प्रकार अनूदित पाठ को प्रभावित करती है, इसका एक रोचक उदाहरण यह है कि 'कामायनी' के विभिन्न सर्गों के शीर्षकों का तेलुगु अनुवाद करते समय डॉ.आई.पांडुरंगराव ने 'अ' अक्षर के प्रति अतिरिक्‍त मोह के कारण सभी सर्गों का नामकरण 'अ/आ' से कर दिया है जिसके कारण काफी गड़बड़ी पैदा हो गई है. श्रद्धा और इड़ा केवल मनोवृत्तियाँ नहीं हैं बल्कि पात्र भी हैं परंतु इनका अनुवाद 'आह्‍लादम्‌' और 'असंतृप्‍ति' कर दिया गया है जो अपर्याप्‍त है. लेखिका ने इस ओर इशारा किया है तथा 'कामायनी' और 'विश्‍वंभरा' के अनूदित पाठों में मूल की तुलना में उपलब्ध परिवर्तनों का विवेचन आठ आधारों पर सोदाहरण किया है. ये आधार हैं - अर्थ संवृद्धि, अर्थ संकोच, अर्थ परिवर्तन, क्रम परिवर्तन, पुनरुक्‍ति, विशेषण, काल परिवर्तन तथा लोकोक्‍तियाँ और मुहावरे. कहना न होगा कि ये आधार इतने व्यापक  हैं कि किसी भी अनूदित पाठ का विश्‍लेषण करने के लिए इनका भली भाँति उपयोग किया जा सकता है. वस्तुविधान की भाँति ही रूपविधान के स्तर पर भी मूल और अनूदित पाठों की तुलना करके शकीला जी ने काव्यशास्त्र में अपनी पैठ को प्रमाणित किया है. इसके बाद उन्होंने दोनों विवेच्य काव्यों के उन शब्दों पर ध्यान केंद्रित किया है जो अनुवादक को इसलिए भ्रमित कर सकते हैं कि वे समानरूपी होते हुए भी भिन्नार्थी हैं. यह सामग्री सामान्य पाठक के लिए भी अत्यंत रोचक है क्योंकि हिंदी में यदि 'सारा' संपूर्ण या सम्स्त का द्‍योतक है तो तेलुगु में उसका अर्थ दारू या शराब हो जाता है. 'पाप' दुष्‍कृत्य तो है ही आँख की पुतली भी है. 'अनुमान' तेलुगु में 'अंदाजा' नहीं है 'शंका' और 'संदेह' है. 'काय' का अर्थ वहाँ 'फल' है और 'वासना' का प्रयोग 'कामना' की अपेक्षा 'खुशबू' के अर्थ में होता है. 'जड़' का अर्थ तेलुगु में 'वेणी' है और 'पग' दुश्मनी बन गया है. अभिप्राय यह है कि ऊपर से एक जैसे दिखने वाले शब्द भीतर से एक जैसे नहीं हैं - भिन्न अर्थ के द्‍योतक हैं, अतः अनुवादक से अतिरिक्‍त सतर्कता चाहते हैं.


आलोचना शास्त्र और अनुवाद चिंतन जैसे दुरूह विषयों पर अत्यंत रोचक शैली में लिखी गई ये दोनों ही पुस्तकें लेखिका के गहन अध्ययन और विषय पर अधिकार का तो पता देती ही हैं, सहज प्रतिपादन की शक्‍ति को भी इंगित करती हैं. इन विषयों के गंभीर अध्येताओं को ये दोनों ही कृतियाँ अवश्‍य पठनीय प्रतीत होंगी; और संग्रहणीय भी.

1. आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास/ डॉ.शकीला ख़ानम/ 2010 (प्रथम संस्करण)/ मिलिंद प्रकाशन, 4-3-178/2, कंदस्वामी बाग, हनुमान व्यायामशाला की गली, सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद - 500 095 / 144 पृष्ठ / 200 रुपए.

2. काव्यानुवाद की समस्याएँ/ डॉ.शकीला ख़ानम/ 2010 (प्रथम संस्करण)/ मिलिंद प्रकाशन, 4-3-178/2, कंदस्वामी बाग, हनुमान व्यायामशाला की गली, सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद - 500 095 / 114 पृष्ठ / 150 रुपए



गुरुवार, 14 जुलाई 2011

गुरु-पूर्णिमा

||गुरु-पूर्णिमा||

यों तो माता-पिता-गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किसी तिथि-वार-पर्व की ज़रूरत नहीं, पर 'गुरु पूर्णिमा' मेरे लिए बचपन से ही रोमांचकारी उत्सव रहा है. माता-पिता-गुरु ने कभी मुझे उपदेशा नहीं, पर माता-पिता ही अपने दैनंदिन जीवन के माध्यम से मेरे गुरु बन गए. जाने किस गुरु-पूर्णिमा पर पित्ताजी का 'गौरव' देखकर तय कर लिया कि किसी और को 'गुरु' नहीं कहना है. पिताजी को तुलसी का गुरु-वंदना प्रसंग अतिप्रिय था; मुझे भी है.  पर विचित्र बात यह है कि  जब-जब कबीर को पढता-पढाता हूँ तो हर दोहे में पितु-वचन की साखी का बोध होता है.
सतगुर हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग | 
बरस्या बादल प्रेम का ,भीजि गया सब अंग || 

शनिवार, 2 जुलाई 2011

अधबुनी रस्सी : एक परिकथा





सच्चिदानंद चतुर्वेदी (1958) का उपन्यास `अधबुनी रस्सी : एक परिकथा' (2009) आंचलिक उपन्यासों और ग्राम कथाओं की परंपरा का विकास करने वाला अद्यतन प्रयास है. वस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से इसके नयेपन को निरखा परखा जा सकता है. सौ साल पहले `हिंद स्वराज' के रूप में महात्मा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र की जिस रस्सी को बुनना शुरू किया था वह आज भी अधबुनी ही है! उपन्यास की कथाभूमि डमरुआ गाँव है लेकिन उसका ध्वन्यर्थ है भारतवर्ष. इसी कारण भारतीय लोकतंत्र के स्वप्न और उनके टूटने की त्रासदी इसके पृष्ठ पृष्ठ पर अंकित जान पड़ती है. डॉ. वेणुगोपाल ने 'अधबुनी रस्सी' को `मैला आँचल' और `अलग अलग वैतरणी' की परंपरा में रखा है, मैं इस सूची में `राग दरबारी' को भी जोड़ना चाहूँगा क्योंकि अत्यंत महीन व्यंग्य भी रस्सी की बुनावट में आद्यंत शामिल है जो गाहे बगाहे पाठक की संवेदना को चीरता चलता है.

`अधबुनी रस्सी' ने मुझे अपनी कथा शैली के कारण खास तौर से आकर्षित किया. यहाँ लेखक को कोई जल्दबाजी नहीं है वह आराम से ठेठ ग्रामीण भारतीय शैली में किस्सा बयान करता हुआ सा लगता है. कहीं कहीं कथावाचन का भी मजा है. विवरण तो बेजोड़ हैं. संवादों में लोकभाषा और नाटकीयता के कारण मारकता का समावेश हुआ है. किस्सा गढने के शैलीय उपकरणों का डा. चतुर्वेदी ने इतनी सहजता से प्रयोग किया है कि पाठक इन्वाल्व हुए बिना नहीं रहता. मेरी दृष्टि में यह किसी भी कथाकृति की सफलता की कसौटी है.


एक सामान्य से विवरण को संस्कृत शब्दावली के प्रयोग द्वारा व्यंग्य की ध्वनि प्रदान करना तो कोई सच्चिदानंद चतुर्वेदी से सीखे – "जिह्वा के घंटे की वृत्ताकार भित्ति से टकराते ही तन-मन को पुलकित कर देने वाला तीव्र नाद उत्पन्न होता था. नाद उत्पन्न कर, घंटे की वह जिह्वा, तृषित श्वान की जिह्वा की भांति कांपती हुई, किसी अन्य दर्शनार्थी के हस्त-स्पर्श की प्रतीक्षा में, पुनः घंटे के मध्य झूलने लगती थी." (पृ.10). राजनैतिक दलों की एक जैसी भीतरी रंगत को उजागर करने के लिए वे एक साधारण सी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न करते हैं और पार्टी लोकतंत्र के चरित्र को पाठक सहज ही भांप जाता है – "गाँव के पुरुष कर्मा से टोपी भी मांग लाते. टोपी ला रात भर के लिए पानी में डुबो देते. टोपी का पीला रंग उतर जाता, सफेद निकल आती. रात भर में जनसंघी टोपी कांग्रेसी टोपी बन जाती. टोपी के अनुभव के आधार पर डमरुआ के लोगों को यह रहस्य पता चल गया था कि भीतर से दोनों पार्टियां एक हैं, ऊपर से रंग अलग-अलग हैं. कर्मा यह रहस्य कभी नहीं जान पाया कि गाँव के चाचा उसकी पीली टोपी धोकर अपनी सफेद टोपी बना लेते हैं." (पृ. 158). उपन्यास का त्रासद व्यंग्य अपने चरम को पहुंचता है तब जब ग्राम प्रधान के मुहर और पैड को बरगद की शाखाओं से बांधकर लटकाया जाता है और बरगदिया ठलुआ उसके नीचे लेटकर कहता रहता है – "भारतीय प्रजातंत्र की डमरुआ शाखा का इंचार्ज हूँ मैं. जिसे मुहर मरवानी हो मेरे पास चला आये. प्रजातंत्र उस वेश्या के समान है जिसे चाहते तो सब हैं, पर उसके बच्चों को कोई अपना नाम नहीं देना चाहता." (पृ. 272).


भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के असफल होने की इस व्यंग्यात्मक परिकथा में लेखक ने बड़े करीने से कई सारे आधुनिक विमर्श भी बुन दिए हैं. आद्योपांत उपन्यासकार हाशियाकृत समुदायों के प्रति चिंतित दिखाई देता है. स्त्रियाँ हो या दलित, उपेक्षित गाँव हो या पर्यावरण सब के प्रति लेखक की गहरी संवेदना इस उपन्यास में अभिव्यंजित हुई है. जितना गुस्सा उन्हें लोकतंत्र की हत्या करनेवाले राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र पर आता है, उतने ही नाराज वे उस सामाजिक तंत्र के प्रति भी दिखाई देते हैं जिसने न तो कभी औरतों को मनुष्य होने का अधिकार दिया और न ही निम्न वर्ण के लोगों को अपने जैसा जीवित प्राणी तक माना. किसुना की सारी कहानी इसी सामाजिक भेदभाव की करुण गाथा है. ऐसे अवसरों पर लेखक ने अपनी ओर से भी टिप्पणी की है और पात्रों के माध्यम से भी व्यापक सामाजिक परिवर्तन की जरूरत को दर्शाया है – "खुशी कहाँ है? कितने छूँछे हैं ये शब्द. चलते-चलते एक सुनसान गली में रुक गया, जमीन पर अपनी उंगली से तीन-चार आडी-तिरछी लकीरें खींचीं, मान लिया लिखा है `खुश रहो'. पेशाब में बहा दिया उन लकीरों को, कहा – ''लो चौबे जी! बह गए तुम और तुम्हारा 'खुश रहो'.'' गाँव में आगे जाने की जरूरत नहीं समझी उसने, घर लौटने लगा." (पृ. 192). इसी प्रकार 'पेटीकोट राज' के बहाने देशवासियों की पुरुषवर्चस्ववादी और स्त्रीविरोधी मानसिकता का व्यंग्यात्मक खुलासा भी विभिन्न कथायुक्तियों के सार्थक इस्तेमाल का प्रमाण है. 'आपद्काल' में तो तमाम सभ्यता और संस्कृति की कलई ही खोल दी गयी है. लोकतंत्र यहाँ तक आते आते शोक तंत्र में तब्दील हो चुका है - "इमरजेंसी के दौरान डमरुआ में हुई गिरफ्तारियों तथा बंगालिन ताई के अब तक डमरुआ न लौटने से पडियाइन चाची इतने डर गयी थीं कि उन्होंने रास्ते में लोगों को टोक-टोक कर बात करने की अपनी पुरानी आदत लगभग छोड़ दी थी." (पृ. 231).


`अधबुनी रस्सी : एक परिकथा' की एक बड़ी ताकत है इसका लोक पक्ष. भूमंडलीकरण और बाजारवाद के विकट घटाटोप के बीच स्थानीयता और लोक से जुड़ाव ठंडी बयार जैसा सुख देता है. लेखक के जीवनानुभवों के लोक-सम्पृक्ति से संबलित होने के कारण यह कथाकृति कहीं भी अपनी जमीन नहीं छोड़ती. लोक की विपन्नता और दुर्दशा के जितने प्रामाणिक चित्र इस कृति में है, उसकी सरलता, सहजता और मानसिक सुंदरता भी उतने ही प्रामाणिक रूप में उभरी है. लोकविश्वास और अंधविश्वास दोनों ही को उपन्यासकार ने खास अंदाज में उकेरा है. यह लोक आज भी धरती को अपनी मानता है. "हे, धरती मैया! तुम कभी बूढ़ी मत होना. हम तुम्हारे बच्चे हैं, तुम्हारे जियाए जीते हैं. तुम दे देती हो तो दे कौर खा लेता हूँ, वरना वह भी नसीब न होता. तुम्हारे अलावा हमारा कोई और सहारा नहीं है." (पृ. 78).


अभिप्राय यह है कि डॉ.सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने 'अधबुनी रस्सी' खूब बुनी है और पूरी बुनी है. इसकी बुनावट में भारतीय लोकतंत्र के अनुभव के रेशे पीड़ा, आक्रोश, व्यंग्य, विमर्श और लेखकीय विवेक के रेशों के साथ इस तरह गुंथे हुए है कि पाठक का आंदोलित हो उठना अपरिहार्य है. पिछडेपन, दरिद्रता और चौतरफा शोषण से ग्रस्त डमरुआ आमूलचूल परिवर्तन के लिए छटपटा रहा है. डमरुआ की यह छटपटाहट केवल एक पिछड़े से गाँव की छटपटाहट नहीं है बल्कि रूढियों में जकड़े इस देश के आम जन की छटपटाहट है!



अधबुनी रस्सी : एक परिकथा (उपन्यास)/
 सच्चिदानंद चतुर्वेदी/ 
2009/ 
राजकमल प्रकाशन, 
1- बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली- 110002/
 पृष्ठ – 272/ मूल्य – रु.300.

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

ओडियाभाषी सौरा नायक की हिंदी कविताएँ


बात संभवतः 1995 या '96 की है. केंद्रीय हिंदी निदेशालय  के हिंदीतरभाषी नवलेखक शिविर  के सिलसिले में गोवा जाना हुआ. हम मार्गदर्शकों को पूरे आठ दिन जिन लेखकों की सतत जिज्ञासा ने प्रभावित किया उनमें एक तो थे गुजरात के कहानीकार जो पेशे से डॉक्टर हैं [सियामी ट्विन्स पर उनकी कहानी मुझे आज भी याद है], और दूसरे थे ओडिशा के सौरा नायक जिन्होंने  पात्र और डायरी लेखन में अधिक रुचि दर्शाई थी. बाद में इन दोनों की ही पुस्तकें प्रकाशित हुईं और मुझे जानकर अच्छा लगा कि वे मुझे भूले नहीं.


अभी कुछ माह पूर्व एक किशोर ने मेरे कार्यालय में आकर नमस्कार करने के बाद इतना ही कहा था कि 'मैं ओडिशा......' ; कि मैं उछल पड़ा - आप सौरा नायक के बेटे हैं?' वह बालक हैदराबाद की किसी कंपनी में कार्यरत है और अपने पिता की और से मुझे प्रणाम करने आया था. उसने फोन पर सौरा नायक से बात भी कराई. बातों-बातों में पता चला कि इन दिनों वे अपना कविता-संग्रह तैयार कर रहे हैं. कुछ ही दिन बाद उनकी कविताएँ भूमिका के लिए मेरे पास आ गईं. भूमिका लिख कर दे दी है; पर एक खास बात उसमें लिखने से छूट गई  है; कि सामान्य सुविधाओं तक की दृष्टि से भी अत्यंत विपन्न पृष्ठभूमि से आए सौरा नायक की विनम्रता मुझे आज के समय में दुर्लभ लगती है.  

भूमिका

हमारा समय अत्यंत क्रूर और असाध्य समय है. आज के रचनाकार की रचनाधर्मिता की पहली कसौटी यही होनी चाहिए कि उसने अपने समय की इस क्रूरता और असाध्यता को किस प्रकार संबोधित किया है. ओडियाभाषी सौरा नायक इस रचानाधर्म को पहचानते हैं, इसीलिए उन्होंने चतुर्दिक व्याप्‍त मूल्य विघटन, अपसंस्कृति और अमानुषिकता के प्रति असंतोष, आक्रोश और क्रोध को सीधे-सीधे बयान कर दिया है - सपाटबयानी के आक्षेप की परवाह किए बिना. 

कवि सौरा नायक इस स्थिति से अत्यंत विचलित हैं कि हम सैद्धांतिक स्तर पर तो सत्य का जय घोष करते हैं लेकिन व्यावहारिक स्तर पर सत्‍य का गला घोंटने में नहीं हिचकते. अभिव्यक्‍ति की स्वतंत्रता से रहित लोकतंत्र उन्हें असह्‍य प्रतीत होता है - सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन ऐसे में दो लेखकों ने नाम भर नहीं रह जाते, अभिव्यक्‍ति का ख़तरा उठानेवाले तमाम योद्धाओं के प्रतीक बन जाते हैं.

संपन्नता और विपन्नता के बीच जितना बड़ा अंतर हम आज देख रहें हैं, मनुष्यता के इतिहास में यह पहले शायद इतना न रहा हो. यह खाई दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है. कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि इतने भीषण अंतराल के चलते शायद ऐसा वर्ग संघर्ष कभी संभव न हो जो समत्व के स्वप्‍न को साकार कर सके. ऐसे में भूख का बढ़ते जाना अत्यंत क्रूर सच्चाई है. सौरा नायक तो यह तक कहने में संकोच नहीं करते कि बुद्ध तक भूख के चंगुल से नहीं बच पाए और उन्हें बुद्धत्व का प्रकाश आहार से ही मिला. प्रकारांतर से वे यह कहते हैं कि भारत जैसे दरिद्रता से जूझ रहे देश की प्राथमिकता रोटी होनी चाहिए, संबोधि नहीं क्योंकि अब यहाँ सत्य की नहीं दौलत की प्रतिष्‍ठा है. 

आज के कवि को यह प्रश्‍न बहुत व्यथित करता है कि वह क्या लिखे, क्यों लिखे, किसके लिए लिखे? सौरा नायक भी काव्य रचना से अधिक प्रासंगिक आज के समय में प्रलय के आह्‍वान को मानते हैं. वास्तव में भारत के अधिकांश संवेदनशील और ईमानदार नागरिक आज ऐसा ही महसूस करते हैं. इसका कारण है मनुष्यों को अनुशासित करने की सर्वश्रेष्‍ठ व्यवस्था अर्थात लोकतंत्र की भयावह असफलता. कवि का विश्‍वास कल्याणकारी लोकतंत्र में है, परंतु उस समय इस विश्‍वास की चूलें हिलने लगती हैं जब गणतंत्र के सारे स्तंभ धन देवता, वोट देवता और डंडा देवता की देहरी पर दम तोड़ते दिखाई देते हैं. इतना ही नहीं लोकतंत्र में जनसंघर्ष का हथियार समझे जानवाले सत्याग्रह तक को स्वार्थ की राजनीति करनेवालों ने जनविरोधी और लोकविरोधी बना डाला है. ऐसे में कवि का क्रोध जायज है - "नामर्दो, बंद करो/ यह आग जनी लूट पाट/ रेल रोको, रास्ता रोको हड़ताल से/ भला क्या हासिल होगा/ सिवाय इसके कि.../ मजदूरों की रोटी मारी जाएगी/ कोई बेबस बेइलाज/ मारा जाएगा..../ कुछ बेघरवार हो जाएँगे/ उनकी झोपड़ियों को/ आग लील जाएगी,/ कुछ भोले भाले/ इन्सानों की... लहू/ मिट्टी में सन जाएगी/ बेकसूरों से जेल भर जाएगी." यहीं से वे प्रतिक्रियाएँ जन्म लेती हैं जिन्हें विद्रोह कहकर सदा सत्ता कुचलती रहती है - "जला सको तो/ नामर्दो..../ उस नेता को जलाओ,/ तोड़ सको तो तोड़ो.../ उनके शीश महल-हवा महल को"

सौरा नायक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक चिंताओं के कवि हैं. उनके सरोकार अत्यंत व्यापक है जिनमें एक विफल होते हुए लोकतंत्र की पीड़ा अभिव्यंजित है. उनके ये सरोकार उन्‍हें कहीं भी चैन लेने नहीं देते, न भोलेनाथ की नगरी भुवनेश्‍वर में न जगन्नाथ की नगरी पुरी में. वे उस देहात में लौट जाना चाहते हैं जहाँ संबंधों का स्वर्ग आज भी महमहाता है. उनके कवि हृदय को प्रकृति की अपरूप लीला मुग्ध करती है, पानी के तरल कोमल वर्म पर रजत किरणों की फिसलन उन्हें मोह लेती है. प्रेमोन्मत्त नायक की निगाह सी किरण और विवश लज्जाशील बाल तरुणी सी झील उनकी सहज सौंदर्य चेतना को उद्‍बुद्ध करती है. 

कुल मिलाकर प्रस्तुत कविता संग्रह सौरा नायक के सहज संवेदनशील हृदय का दर्पण है; और इस हृदय में सारी कायनात समाई है. साहित्य जगत में उनकी इस कृति को यथेष्‍ट सम्मान मिलेगा, इसी कामना के साथ-

-ऋषभ देव शर्मा