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सोमवार, 31 मई 2010

हिंदी पत्रकारिता दिवस - ३० मई - पर संगोष्ठी

इधर कुछ समय से हैदराबाद के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी जी अपने हर आयोजन में यह कहने लगे हैं, ''बस, यह मेरा अंतिम संयोजन है''. लेकिन हम लोग उनकी आयोजनजीविता या संयोजनधर्मिता को पहचानने के नाते जानते हैं कि हर तिमाही कम से कम एक संगोष्ठी या सम्मलेन आयोजित किये बिना वे रह ही नहीं सकते.

सो हर बरस की तरह ३० मई नज़दीक आते ही उन्होंने 'उदंत मार्तंड' की याद में ''हिंदी पत्रकारिता दिवस संगोष्ठी'' की घोषणा कर डाली. 'तेलंगाना बंद' के बावजूद संगोष्ठी हुई और खूब जमी.

समारोहअध्यक्ष डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने आज की पत्रकारिता की लक्ष्यहीनता पर खेद जताया तो डॉ. अहिल्या मिश्र ने महिला पत्रकार की अपनी खतरोंभरी ज़िंदगी की ओर ध्यान खींचा. डॉ. विजयवीर विद्यालंकार ने आंध्र की आर्यसमाजी पत्रकारिता का यशोगायन किया तो नीरज ने धर्मनिरपेक्ष पत्रकारिता पर सांप्रदायिक हमलों की आपबीती सुनाकर रोमांच पैदा किया.और भी काफी लोग बोले. अपुन के जिम्मे संगोष्ठी की अध्यक्षता थी, सो टिप्पणियों से ही काम निकल गया.

विद्यार्थी जी थोक में सम्मान-पुरस्कार प्रदान करने वाली अनेक संस्थाओं के सूत्रधार हैं . इस अवसर पर भी उन्होंने हैदराबाद के कई नए-पुराने पत्रकारों को सम्मानित-पुरस्कृत किया. यह शुभकार्य उन्होंने उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल महामहिम डॉ. बी. सत्यनारायण रेड्डी के करकमलों से संपन्न कराया.

महामहिम ने अपने संक्षिप्त और सारगर्भित संदेश में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीयता के लिए काम करने हेतु पत्रकारों का आह्वान किया.

रविवार, 23 मई 2010

जाना एक सच्चे हिंदी पत्रकार का


हैदराबाद से प्रकाशित हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ''कल्पना'' के सम्पादक मंडल में रहे यशस्वी पत्रकार मुनींद्रजी [जन्म १९२५ ई] का गत दिनों - १६ मई २०१० ई. को - निधन हो गया. ''कल्पना'' के बंद होने के बाद से उन्होंने ''दक्षिण समाचार'' [पूर्वनाम ''हैदराबाद समाचार''] के माध्यम से देश भर में हिंदी के एक आंदोलनी पत्रकार के रूप में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त की. यह स्मृतिलेख उनके एकनिष्ठ हिंदीप्रेम के नाम समर्पित है.



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सोमवार, 10 मई 2010

कवि अगर रसोइया भी हो!

इधर कुछ दिन से व्यस्तता के साथ कुछ तनाव सा था. वैसे भी अप्रैल-मई में संस्थान के कार्याधिक्य के कारण तनिक ज्यादा दबाव तो सिर पर रहता ही है. लेकिन गत दिनों एक संगोष्ठी के अवसर पर जबसे दोस्तों ने आँख में अंगुली दे-देकर दिखाया कि डॉ. गोपाल शर्मा के लीबिया जाने, डॉ.कविता वाचक्नवी के लंदन जाने और चंद्र मौलेश्वर प्रसाद के अस्वस्थ होने के बाद से ऋषभ की ऊर्जा एक चौथाई ही रह गई है, तबसे चारयारी की यादें भीतर भीतर आरी चला रही थीं. ऊपर से कुछ पारिवारिक दायित्वों को संपन्न करने में अपनी सीमाएँ तात्कालिक रूप से व्यथित कर रही थीं.

कि ऐसे ग्रीष्म में एक शाम की मुलाकात में गुरुदयाल अग्रवाल जी ने काव्यपाठ और आलू के पराँठों का अपना न्यौता दोहरा दिया. रविवार - ९.५.२०१० की शाम , लू के तमाचे झेलते डॉ.बी. बालाजी और मैं उनके यहाँ जा धमके. उन दोनों की जुगलबंदी जमी - यानी दोनों ने ५-५,७-७ कविताएँ तो पेल ही दी होंगी. मैं वक्तज़रूरत के लिए तेवरीसंग्रह लेकर गया था . पर ज़रूरत ही नहीं पड़ी. दोनों कविगण इतने भले निकले कि मेरे एक बार इनकार करने पर ही मान गए. चौकड़ी के सदस्यों की तरह न जिद की, न गुस्सा दिखाया, न आदेश दिया; अपनी अपनी में मगन रहे.

दूसरा सत्र पेटपूजन का था. श्रीमती गुरुदयाल सवा महीने से बेटी के पास गई हुई हैं इसलिए ही अपनी पाककला के जौहर दिखलाने को श्रीयुत गुरुदयाल जी मचल रहे थे. मगर मान गए जनाब , गुरुदयाल जी लाजवाब हैं! उन्होंने हमें लाजवाब कर दिया. अब इसे आप क्या कहिएगा कि उन्होंने मेरे इस प्रस्ताव पर मेरी क्लास ले ली कि सारे पराँठे एक साथ बनाकर रख लिए जाएँ ; और तीनों साथ बैठकर खाएँ. नहीं; उन्होंने बात नहीं मानी और एक-एक पराँठा सेंककर थाली में गरमागरम परोसा. मैंने नोटिस किया कि अतिरिक्त घी को सोखने के लिए वे रसोई से टेबल तक पराँठे को कागज़ में लपेटते हुए लाते थे. ७५ वर्षीय अपने गुरुदयाल जी आज भी इतने ऊर्जावान हैं और मैं ५२-५३ में ही टें बोल रहा हूँ. कवि अगर रसोइया भी हो तो असली रस-परिपाक को समझेगा. जाने क्या क्या सोचता रहा .

९ मई थी; यानी मदर्स डे. मुझे लगा, ये गुरुदयाल जी कितनी अच्छी माँ हैं. उन्होंने एक एक सब्जी के बारे में अलग अलग पूछा. मैंने भी सबका खूब जायका लिया और पूछा कि इस मौसम में बथुवे का रायता कैसे संभव किया गया. पता चला कि सर्दी के दिनों में दिल्ली से वे ढेरों बथुवा मँगा कर सुखाते हैं और साल भर खाते हैं. भई वाह; धन्य हैं गुरुदयाल जी आप; और धन्य है आपका बथुवा प्रेम! यह मदर्स डे याद रहेगा.

चर्चा - लाज न आवत आपको

गत दिनों स्त्रीविमर्श, ऋषभ की कविताएँ और हिंदी-भारत समूह पर एक छोटी-सी कविता दी थी - लाज न आवत आपको, विस्मय कि उसपर काफी चर्चा हो गई. कवि का अपना पाठ तो कविता है, यों अपनी ओर से कुछ नहीं कहना है. लेकिन पाठक कि रचना धर्मिता और किसी भी रचना के अनेक पाठों और उप-पाठों की संभावना का सम्मान करते हुए यह आवश्यक लगा कि चर्चा को यहाँ जस-का-तस सहेज दिया जाए.

प्रिय ऋषभ देव जी,
नारी-मन की त्रासदी को बड़ी कुशलता और मर्मज्ञता के साथ
आप ने इस कविता में उकेरा है | शब्दों को कोई जामा पहनाये बिना
हकीकत को उसके असली रूप में इतनी शिद्दत से बयाँ कर देने का
आपका साहस वन्दनीय है |
सस्नेह
कमल (सत्यनारायण शर्मा कमल)

क्या कविता लिखी है आप ने सर जी. रोंगटे खडे हो गये पढकर . लाज न आवत आपको ....
मेरे पास शब्द नही हैं इसकी प्रशंसा करने के लिए . इस अकिंचन की हार्दिक बधाई स्वीकार करें .
वेंकटेश (प्रो. एम. वेंकटेश्वर)

कविता बेचॆन करती हॆ । तुलसी की याद कराते हुए भी प्रासंगिक हॆ । निराला धिक शब्द का प्रयोग करते हॆं ।बधाई ।
दिविक रमेश

आ० दिविक जी,
मेरे विचार से कविता में संकेत "बिल्वामंगल" की ओर है
न कि तुलसी कि ओर |
कमल

धन्यवाद कमल जी । मॆंने केवल इतना कहना चाहा था कि तुलसी की याद कराती हॆ यह कविता ।
दिविक रमेश

आदरणीय दिविक जी .
मै आपसे सहमत हूं. यह कविता सीधे तुलसी और रत्नावली के प्रसंग को ताज़ा करती है. उत्तर-आधुनिक परिवेश में ( तथाकथित ) यह एक प्रखर स्त्री विमर्श की कविता है.
एम वेंकटेश्वर

बिल्वमंगल शायद अगली किसी कविता में आयेंगे.
इस कविता के समय तो बस मन में थे.....अगली योजना की तरह. -ऋ
सुगठित और पूर्ण प्रस्तुति
-निधि ऋषि

आदरणीय,
इस कविता का कथ्य तो बहुत अच्छा लगा, रचना अत्यन्त सशक्त भी है। किन्तु प्रथम तीन चरणों को पढ़कर मन विक्षुब्ध सा हो गया।
(इसे छोटे मुँह बड़ी बात न समझें तो मैं कहना चाहूँगी कि) ऐसी प्रतीति हुई कि कदाचित् किसी कुत्ते की बात हो रही है । उसकी भाषा से ऐसी वितृष्णा सी हुई कि ये विश्वास करना कठिन हो गया कि ये आपकी उत्कृष्ट लेखनी से उद्भूत है। आशा है आप मेरी धृष्टता को क्षमा करेंगे। खेद है कि मैं अपने मन की बात को कहने से- स्वयं को रोक नहीं सकी। कृपया इसे आलोचना समझ कर अन्यथा न लें ।
पुनः क्षमा-याचना सहित,
शकुन्तला बहादुर

शकुन्तलाजी,
आपकी प्रतिक्रिया सर्वथा उपयुक्त है .
मैं भी कुछ ऐसे ही शब्द इस्तेमाल करना चाहता था, मैं लिखता;
" आपकी कविता(?) वीभत्स है, विचारों का घालमेल है, न तो कविता है, न सौन्दर्य न सरसता...,"
फिर सोचा कि प्रतिक्रिया न देना अधिक अच्छा होगा . इसलिए नहीं लिखा .
किन्तु अब आपकी प्रतिक्रिया से प्रेरित और उत्साहित होकर अब लिख रहा हूँ .
सादर,
विनय वैद्य

विनय वैद्या जी,
आपके विचार जानकर मेरा मनोबल बढ़ा । ये सन्तोष भी हुआ मेरे जैसे विचार किसी और पाठक के भी हैं। प्रायः प्रशंसा-पत्र ही दिखाई दिये थे। अस्तु....
"मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना।"
आभार सहित,
शकुन्तला बहादुर

सोच अपनी अपनी / समझ अपनी अपनी
पुरुष की अन्तश्चेतना में नारी देह की गन्ध ऐसे ही बस जाती है जैसे
ऋषभदेव जी ने अपनी कविता में सुंघाई है. काम का उन्माद जब सर चढकर बोलता है तो लाश और सांप कुछ पहचाने नहीं जाते . और जब औरत आईना दिखाती है तो पुरुष भाग खडा होता है जैसे तुलसीदास ?
-एम वेंकटेश्वर

आदरणीय कमल जी, वेंकटेश जी और ऋषभ जी,
अपनी अल्पमति से कहना चाहूँगी कि कविता किसी व्यक्तिविशेष से सीधे सीधे नहीं जुड़ी होती हैं। यदि उसमें कोई नाम आएँ तब भी वे नाम वस्तुत: प्रतीक होते हैं या मिथक भी होते हैं .....
.. और यहाँ तो नाम आए ही नहीं। ऐसे में इसे किसी इतिहास-चरित्र मात्र के साथ जोड़ना मानो ऐसा है कि कविता की लक्षणा की हत्या की जा रही हो, उसे बाँधा जा रहा हो, सीमित किया जा रहा हो।
मेरे लेखे तो कविता ऐसी हर उस नारी का प्रतिदर्श है, जो वैसी विकट स्थिति में पड़ी है, खड़ी है, गड़ी है। कविता की अर्थ व्याप्ति को कम करने जैसा है इसे रत्नावली, बिल्वमंगल आदि नाम से जोड़ कर देखना।
गलत कह गई होऊँ तो छोटी समझ कर क्षमा करें। आप सब विद्वान लोग हैं, सो अन्यथा नहीं लें।
सादर
- कविता वाचक्नवी

आदरणीय कविता जी,
कविता में ध्वन्यार्थ तो होता ही है. और फ़िर एक रूपक भी बनता है, जिससे जो प्रसंग य संदर्भ ध्वनित होते हैं उनके बारे में चर्चा करना या अपनी राय देना गलत नहीं , आप भी अन्यथा न लें.
एम वेंकटेश्वर


सर्वआदरणीय दिविक रमेश जी, एम. वेंकटेश्वर जी, कविता वाचक्नवी जी, सत्यनारायण शर्मा कमल जी,प्रतिभा सक्सेना जी,शकुंतला बहादुर जी एवं विनय वैद्य जी ,
सादर नमन.
आप सबकी तथा डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण',समीर लाल जी,संजय भास्कर जी,सतीश सक्सेना जी, अनूप शुक्ल जी,सुमन जी और एम. वर्मा जी की समीक्षात्मक टिप्पणियों/पाठ विमर्श के लिए आभारी हूँ .
स्नेह बना रहे
-ऋ

प्रिय डा. रिषभ देव,सस्नेह!
बहुत प्यारी रचना रत्नावली पर तुमने भेजी है,भावपूर्ण है,जीवंत है!
अपनी एक कविता तुम्हे भेज रहा हूँ, अच्छी लगेगी,आशा है! -

रत्नावली का सच

मैंने चाहा था तुमको प्रियतम!
मनसे,तनसे प्रतिपल,
हरक्षण की थी कामना
तुम्हे पाने की,
तुम्ही में खो जाने की,
लेकिन-
तुम जिस रात आए,
मेरे प्रेम-पाश में बंधने,
मुझे उपकृत करने-
उस रात,
मैं मायके में थी न?
बेटी की मर्यादा
मेरे पैरों को रोक रही थी
जंजीर बन कर!
उस रात मेरे भीतर बैठी-
मर्यादित नारी जाग उठी थी
और उस नारी ने कह दिया था--
"लाज न आवत आपको"
और बस,
तुम लौट गए थे हत 'अहम्' लेकर!
मैं-
मर्यादा में जकड़ी,तड़फती रही!
सच कहूं मेरे प्रिय!
उस रात जीत गई थी नारी
और हार गई थी तुम्हारी पत्नी-
रत्नावली बेचारी!
संसार ने पाया महाकवि तुलसी-
रत्नावली रह गई युगों से झुलसी-
तन और मन की आग से!
यही है रत्नावली का सच,
जिसे तुम भी नहीं जान सके मेरे प्रिय!
--------------------------------
डा.योगेन्द्र नाथ शर्मा'अरुण'

आदरणीय डा.ऋषभ देव एवं डॉ. अरुण की कविताएं मेरी लेखनी को ,कुछ कहने के लिए, प्रेरित कर गई ,प्रस्तुत है -

रत्ना की चाह --

केवल तुम्हारी थी .
थोड़ा-सा आत्म-तोष चाहता रहा था मन
पीहर में पति- सुख पा इठलाती बाला बन
मन में उछाह भर ताज़ा हो जाने का ,
बार-बार आने का ,
अवसर,
सुहाग-सुख पाने का .
*
थोड़ा सा संयम ही
चाहा था रत्ना ने ,
भिंच न जाय मनःकाय
थोड़ा अवकाश रहे,
खुला-धुला ,घुटन रहित ,
नूतन बन जाए
पास आने की चाह .
*
कैसे थाह पाता
विवश नारी का खीझा स्वर
तुलसी ,तुम्हारा नर!
स्वामी हो रहूँ सदा
अधिकारों से समर्थ
पति की यही तो शर्त !
*
सह न सके .
त्याग गए कुंठा भऱ .
सारा अनर्थ-दोष
एकाकी नारी पर !

- प्रतिभा सक्सेना.

Param Priy Dr. Rishabh,
Sasneh.
Kal tumhari kavita "Laaj na avat apko" itni achchhi lagi ki main apni ek kavita bhejne ka lobh samvaran nahi kar saka,jo "Ratnavali Ka Sach" sheershak se likhi thi. Bad me sochata raha ki yah kaisa vichitra sanyog hai ki Rishabh ne bhi Ratnavali ki peeda ko vani dee aur maine bhi usi ko kendra me rakh kar "Patni" aur "Nari" ke beech ke dwadwa ko lekar apni bhavana vyakt ki thee.
Tum par garv karta hoon main. Computer jyada ata nahi,isiliye jaldi aur vistar se tumhe likh nahi pata. Umr ke 70ven varsh me pravesh kar chuka hoon aur Roorkee jaise chhote se nagar me rah kar Sarasvati ki sadhana me rat raha hoon. Jo Ma Sharda ne diya,use apna param saubhagya manta hoon.
Saparivar sukhi raho,yahi meri mangal kamna hai.
Tumhara, Dr. "Arun"

As a poem it is, INDEED, very very good. However, on the subject let us have some discussions, sometime - and no offence meant please.
Regards - Gurudayal Agarwala

आदरणीय शर्मा जी ,
आपके द्वारा लिखी गयी नारी वादी कवितायेँ देखने के बाद मेरी इच्छा हुयी कि एक अनुवाद आपको भेजूं. अच्छी लगे तो अपने ब्लॉग में दीजियेगा.
धन्यवाद
अभिवादनों के साथ
आर. शांता सुंदरी

कौन है तू
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मै एक वरूधिनी हूँ !
भयभीत हरिनेक्षना हूँ
प्रेम करने के दंड के बदले में
धोखा दी गयी वेश्या हूँ
हिमपर्वतों को साक्षी मानकर कहती हूँ
प्यार के बदले में
वीदाना ही मिली आँखों से नींद उड़ जाने की.
प्यार करने वाली स्त्रियों को ठगने वाले
माया प्रवरों के वारिस ही हैं मनु!
+ + +

मै एक शकुन्तला हूँ!
एक पुरुष की अव्यक्त स्मृति हूँ
मुझे छोड़ सबकुछ याद रखने वाला वह
उसे छोड़ कुछ भी याद न करने वाली मै
दोनों के असीम सुख सागर का
मनो प्रकृति ही मौन साक्षी हो!

पति का प्यार नहीं सिर्फ निशानी पाने वाली मै!
+ + +

पांच पतियों की पत्नी द्रौपदी हूँ मै!
वरन कर अर्जुन का बात गयी पांच टुकड़ों में
पुरुष के मायाद्यूत में एक सिक्का मात्र हूँ !
भरी सभा में घोर अपमान
पत्नी के पड़ से वंचित करने वाला युधिष्ठिर!

बाते दाम्पत्य में बचा तो केवल
जीवन-नाटक का विषाद !
+ + +

मै ययाति की कन्या माधवी हूँ!
दुरहंकार से भरी पुरुषों की संपत्ति हूँ
संतान को जन्म देनेवाली
सर से पाँव तक सौन्दर्य की मूर्ती हूँ!
अनेक पुरुषों के साथ दाम्पत्य
मेरे लिए अपमान नहीं
वह तो मेरा क्षत्र धर्म है!
नित यौवन से भरी कन्या हूँ मै!
हतभाग्य!
स्त्री का मन न जानने वाले ये ...
ये क्या महाराज हैं? महर्षि हैं?
पुरुष हैं?
+ + +

दो आँखों पर सपनों के नीले साए
समय ने जो कहानियाँ बताईं
उन सबमे स्त्रियाँ व्यथित ही दिखीं!
यह पूरा स्त्रीपर्व ही दुखी स्मृतियों की परंपरा है !
+ + +

अब मै मानवी हूँ!
अव्यक्ता या परित्यक्ता नहीं हूँ
अयोनिजा या अहिल्या नहीं होऊँगी !
वंचिता शकुन्तला की वारिस कदाचित नहीं हूँ !
अब मै नहीं रहूँगी स्त्रीव का मापदंड बनकर
मै अपराजिता हूँ !
अदृश्य श्रृंखलाओं को तोड़ने वाली काली हूँ !
सस्य क्षेत्र ही नहीं युद्धक्षेत्र भी हूँ !

लज्जा से विदीर्ण धरती भी मै ही हूँ
उस विदीर्ण धरती को विशाल बाहुओं से ढकने वाला आकाश भी मै ही हूँ !
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मूल तेलुगु कविता : रेंटाला कल्पना
अनुवाद : आर. शांता सुंदरी

Priy Dr. Rishabh, Sasneh.
Tumhari ek kavita ne jane kaisa jadu kiya ki maine tumhe varshon purani apni ek kavita bhej dee,jis par Pratibha Saxena kee ek kavita tumne mujhe bheji. Sach yah hai ki isi prakar ki preranaon se kavita nirantar badhi aor saji-sanvari hai.
Main lagatar ghareloo aur sahityik karyon me vyast rahata hoon,isliye nirantar computer par nahi baith pata. Vastavikta yah hai ki main computer bas kam-chalau hi janta hoon.
Tumhari mail ati hai to sfoorti see mahsoos karta hoon.
Vidushi Vidyottama ko kendra me rakha kar aath sargon ka ek Nari Gaurav Gatha kavya racha hai jo prakashit bhi huva hai aur Moun Teerth Foundation,Ujjain se Vidushi Vidyottama Samman se vibhooshit bhi huva hai.
Pichhalee bar tum Khatauli aye,lekin mujhse mulakat nahi ho saki,ab kab ana hai?
Tumhara,Dr. Arun

रविवार, 9 मई 2010

गुरुदयाल जी की कविता और आलू के परांठे

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं

तुलसी मध्यकाल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रतिनिधि कवि हैं.। उनकी कृति 'रामचरितमानस' धर्म और भक्ति के बहाने तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के चित्रण एवं मूल्यों की स्थिति, उनके विघटन तथा नए मूल्यों की तलाश की यात्रागाथा है। उन्होंने अपने काव्य में तनिक सा अवकाश मिलते ही तत्कालीन राजनैतिक एवं सामाजिक अनिश्चितता, संकटबोध तथा आपाधापी का वर्णन आध्यात्मिकता की अन्योक्ति के माध्यम से किया है।


जनता की भाषा के कवि होने के कारण तुलसी जनता की समस्याओं के भी कवि हैं। वे सामान्य जनता के बीच से उभरने वाले ऐसे कलमकार हैं जिन्होंने जीवन की तमाम कुरूपताओं को अपने तन-मन पर झेला है। यही कारण है कि उनके काव्य में उनका युग अपनी तमाम जन-समस्याओं के साथ उपस्थित है।



तुलसी अकबर के समय में विद्यमान थे। अकबर सहित उससे पहले और बाद के सभी शासकों ने भारतीय जनता के साथ प्रयोग के पशु जैसा व्यवहार किया।
''इन शासकों की महत्वाकांक्षा, स्वेच्छाचारिता, धार्मिक संकीर्णता तथा प्रतिशोध की भावना की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने धार्मिक प्रतिशोध से प्रेरित होकर जाने कितने ज्ञान के केंद्र-पुस्तकालयों, संग्रहालयों तथा साधना के केंद्र-मंदिरों और पवित्र स्थानों को नष्ट कर देने में लेशमात्र संकोच का अनुभव न किया। इनकी स्वेच्छाचारिता की कोई सीमा नहीं थी। नियम या विधान अथवा कानून इनकी इच्छानुसार रूप ग्रहण किया करते थे। इन्होंने जनजीवन के साथ जाने कितने प्रयोग किए।'' (डॉ.. त्रिलोकी नारायण दीक्षित, तुलसी साहित्य: विवेचन और मूल्यांकन - सं. डॉ..देवेंद्रनाथ शर्मा और डॉ.. वचन देव कुमार, पृ. 78)।
इस काल में राजपरिवार के अधिकतर सदस्य सुख, भोग, विलास और राजपद के पीछे दीवाने थे। राजदरबारों में अराजकता, स्वार्थपरता और विश्वासघात के षड्यंत्रों का बोलबाला था। अपनी सत्ता की रक्षा की खातिर शासक अपने कृपापात्र सामंतों की पंक्तियाँ तैयार करने में व्यस्त थे। शासक और सामंत मिलकर उत्पादक वर्ग-श्रमिकों और किसानों-का मनमाना शोषण कर रहे थे।
''राज्य का एक वर्ग बहुत संपन्न, साधन संयुक्त और दूसरा विपन्न और साधनविहीन था। जनसामान्य की स्थिति उत्तरोत्तर विकृत होती जा रही थी। जीवन का रूप आर्थिक विपन्नता के कारण विद्रूप हुआ जा रहा था।'' (डॉ.. त्रिलोकी नाथ दीक्षित, तुलसी साहित्य: विवेचन और मूल्यांकन, पृ. 78)।

इस विपन्नता को तुलसीदास ने स्वयं भोगा था। उन्होंने तत्कालीन शासकों और साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा जनता के दोहरे उत्पीड़न और शोषण को अपनी आँखों से देखा था। महत्वाकांक्षी एवं युद्धविलासी शासकों की व्यक्तिगत सनकों के कारण निरंतर कहीं न कहीं युद्ध चलते रहते थे। युद्ध पशुधर्म है। उससे मनुष्यता त्रस्त होती है। उसकी विभीषिका लंबे समय तक जन-जीवन को अस्त-व्यस्त छोड़ देती है। युद्धों के परिणाम महामारी एवं दुर्भिक्ष के रूप में गरीब जनता को झेलने पड़ते हैं। तुलसीदास युद्धों के इस विषम परिणाम को झेलने वाले युग में जी रहे थे। यही कारण है कि उन्होंने ऊपर से पौराणिक रूढ़ि का निर्वाह प्रतीत होने वाले 'रामचरितमानस' के 'कलि-काल-वर्णन' में अपने युग की विभीषिका के भोगे हुए यथार्थ का आँखों देखा विश्वसनीय हाल बयान किया है। कलिकाल में बार-बार अकाल-दुकाल पड़ते हैं क्योंकि कृषि नष्ट हो रही है। परिणामस्वरूप जनता दरिद्र, भूखी और दुःखी है -
''कलि बारहिं बार दुकाल परैं, बिनु अन्न दुःखी सब लोग मरैं।'' (रामचरितमानस, उत्तरकांड, दोहा 101)।



भूख को तुलसी ने इस सीमा तक निकट से देखा और झेला था कि उनका बचपन पेट भरने के लिए मिले चने के चार दानों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के फलों के समान समझने के लिए विवश था। अनाथता और निर्धनता ने तुलसीदास के व्यक्तित्व के गठन में बड़ी भूमिका निबाही थी।
''उनके परवर्ती जीवन, चिंतन एवं साधन-चयन पर इन दोनों का बड़ा गहरा प्रभाव है। भगवत पथ के पथिक होने के कारण उन्होंने अपने लिए धन की याचना कभी नहीं की, किंतु यह स्वीकारा कि भौतिक स्तर पर 'नहिं दरिद्र सम दुःख जग माहीं' और लोक कल्याणार्थ जीविकाविहीन लोगों का दुःख दूर करने के लिए प्रभु से आग्रह भरे स्वरों में दारिद्र्य रूपी दशानन से दुनिया को मुक्त करने की प्रार्थना की - 'दारिद दसानन दबाई दुनी दीनबंधु, दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी।' अपने लिए'जथालाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो' का आदर्श सामने रखने वाले तुलसी 'रोटी द्वै हौं पावौं'से ही संतुष्ट थे, किंतु औरों के लिए 'नहिं दरिद्र कोउ दुःखी न दीना' की मंगलकामना से प्रेरित होकर समस्त 'सुख-संपदा' से संयुक्त समाज की कल्पना वे कर गए हैं।'' (डॉ.. विष्णुकांत शास्त्री, तुलसी साहित्य: विवेचन और मूल्यांकन, पृ. 97/98)।

गरीबी और भूख की समस्या होते हुए भी मध्यकालीन चेतना के ईश्वरवादी तथा राजभक्तिवादी होने के कारण उस काल में वर्ग-संघर्ष उभरकर सामने नहीं आ सका तथा जनता अन्यान्य समस्याओं में उलझी रही। इस सामाजिक एवं ऐतिहासिक सच्चाई के कारण यह तो अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि भक्ति में जनसमस्याओं का समाधान ढूँढने वाली कविता वर्ग-संघर्ष का स्पष्ट चित्रण करते हुए राजतंत्र और सामंतशाही के विरुद्ध किसानों अथवा मजदूरों की क्रांति का बिगुल बजाएगी। परंतु तुलसीदास ने अपनी स्वाभाविक शालीनता को बरकरार रखते हुए अपने युग के अनुरूप रामराज्य के स्वप्न के माध्यम से एक ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की है जो तत्कालीन कलिकाल की विसंगतियों से मुक्त है।
''अपने समय की दुरवस्था के कारण ही उन्होंने रामराज्य की कल्पना की। दुरवस्था के कारण ही उन्होंने कहा कि 'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।' उत्तरकांड में एक ओर रामराज्य की कल्पना, दूसरी ओर कलियुग की यथार्थता द्वारा तुलसीदास ने अपने आदर्श के साथ वास्तविक परिस्थिति का चित्रण कर दिया है। किसी भी दूसरे कवि के चित्रों में ऐसी तीव्र विषमता नहीं है; किसी के चित्रण में यह 'कंट्रास्ट' नहीं मिलता। परंतु रामराज्य के सिवा अन्यत्र भी दुष्ट शासकों पर उन्होंने अपने वाक्वाण बरसाए हैं। उन्होंने भविष्यवाणी की है कि रावण और कौरवों के समान इन शासकों का भी अंत होगा।'' (डॉ.. रामविलास शर्मा, भाषा, युगबोध और कविता, पृ. 36)।


तुलसी के काव्य की रचनाप्रक्रिया का वैशिष्ट्य उनकी व्यक्तिगत एवं तत्कालीन जीवन और समाज की विसंगतियों को पचाकर लोकहितकारी मूल्यसृष्टि की तकनीक में निहित है।
''वस्तुतः लोकादर्शी तुलसी का 'मानस' समकालीन जनजीवन की पीड़ा, प्रताड़ना एवं संघर्ष से अभिभूत है। स्वार्थ की विभीषिका से सामाजिक जीवन त्रस्त था। इसी कारण पारस्परिक ईर्ष्या - द्वेष अपने चरमोत्कर्ष पर था। समाज में व्याप्त व्यष्टि और समष्टि के इस संघर्ष के समापन के लिए तुलसी की अंतर्भेदनी दृष्टि ने 'स्व' (व्यष्टि) को 'विराट अहं' (समष्टि) में और विराट अहं को स्व में विलीन करने की आवश्यकता अनुभूत की। तभी स्वांतःसुख सर्वांतःसुख बनकर गौरवान्वित हो सका।'' (डॉ.. अनिल कुमार मिश्र, रामकथा में जीवन-मूल्य, पृ. 120)।



तुलसी के राम का दीनजन पर विशेष स्नेह है और तुलसी का उनके लिए अत्यंत प्रिय संबोधन 'गरीबनेवाज' है। तुलसी जनता की दरिद्रता से बेहद पीड़ित हैं। इसीलिए उनके कलिकालवर्णन में दरिद्रता, अकाल और भुखमरी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। परंपरागत रूप से पापयुग का प्रतीक पौराणिक कलियुग मात्र ही तुलसी द्वारा चित्रित कलियुग नहीं है बल्कि उन्होंने अपनी आँखों देखे उस समाज का वर्णन किया है जो विविध पाप, ताप, दोष और दरिद्रता से घिरा हुआ था।
''कलियुग का उल्लेख मात्र कर देने से तुलसी के समाज का मार्मिक चित्र नहीं प्रस्तुत होता। बुराइयों की तालिका प्रस्तुत कर देने से भी बात नहीं बन सकती थी। तुलसी कलियुग के नाम पर अपने समाज का जो वर्णन करते हैं, वह विशिष्ट दृश्यों और घटनाओं से युक्त है इसलिए वह पाठक के लिए दृश्य और चित्र बन जाता है। कलियुग का वर्णन तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' और 'कवितावली' में विशेष रूप से किया है। तुलसी के अनुसार कलियुग का सबसे बड़ा लक्षण है - कपट और मिथ्या आचरण।'' (डॉ.. विश्वनाथ त्रिपाठी, लोकवादी तुलसीदास, पृ. 85)।


तुलसी का समय ऐसा विकट समय था कि धन की खातिर सभी तरह के सामाजिक एवं नैतिक अपराध घटित होते थे। दूसरे का धन हर लेने वाले को गुणवान माना जाता था। गुरु शिष्य का धन हरण कर लेते थे। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र का विकास अथवा आत्मोन्नति न रहकर उदर पोषण मात्र रह गया था। गरीबी के राक्षस ने ही यह स्थिति उत्पन्न की थी कि एक ओर लोग ब्रह्मज्ञान की पाखंडपूर्ण चर्चा में व्यस्त थे, तो दूसरी ओर एक-एक कौड़ी के लिए हत्या करने पर उतारू रहते थे -
''सोई सयान जो परधन हारी,
जो कर दम्भ सो बड़ आचारी
***
हरइ सिष्यधन सोक न हरई,
सो गुरु घोर नरक महुँ परई/
मातु-पिता बालकन्हिं बोलावहिं,
उदर भरइ सोइ धर्म सिखावहिं/

ब्रह्मज्ञान बिनु नारि-नर कहहिं न दूसरि बात,
कौड़ी लागि मोह बस, करहिं बिप्र गुरु घात।''
(रामचरितमानस, उत्तरकांड, दोहा 99)।



अपने व्यक्तिगत जीवन में तुलसी को दरिद्रता, दीनता, रोग तथा जाति-पाँति के भेदभाव के कारण बहुत कष्ट उठाना पड़ा था। अपने समसामयिक समाज की इन प्रमुख समस्याओं को उन्होंने कलियुग के प्रधान दुर्गुणों के रूप में प्रस्तुत किया है। इनमें भी दरिद्रता ने तो जैसे उनके भक्त-व्यक्तित्व को भी अपने घेरें में ले रखा है।
''राम का जो गुणगान तुलसी ने किया है, रामकथा का जो वर्णन किया है, उसमें दरिद्रता और भूख उनकी रचनात्मकता का अभिन्न अंग बनकर आए हैं। मार्मिक से मार्मिक प्रसंगों में तुलसी को निर्धनता विस्मृत नहीं होती। रामकथा के परंपराप्राप्त रूप को अत्यंत मार्मिक बनाते समय तुलसी अनेकानेक स्थानों पर 'रंक', 'दरिद्र', 'गरीब', 'भूख' आदि की सहायता से अपने जिस अत्यंत प्रभावशाली काव्य संसार का सृजन करते हैं, वह उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समझने की दृष्टि से उपेक्षणीय नहीं है। रामकथा पर आधारित काव्यों की कमी नहीं है, किंतु तुलसी की अपनी विशेषता और उनकी महान लोकप्रियता का कारण तुलसी की वह भावनात्मक दृष्टि है जिससे उन्होंने रामकथा को उपस्थित किया और जो स्वयं तुलसी के व्यक्तित्व और तुलसी के समाज की विशेषताओं पर आधारित है।'' (डॉ.. विश्वनाथ त्रिपाठी, लोकादर्शी तुलसीदास, पृ. 94)।

वास्तविकता में तुलसी जिस समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह भूमि पर निर्भर रहनेवाला समाज है।
''उत्पादन का मुख्य साधन है भूमि, मुख्य उत्पादक हैं किसान, कर द्वारा इनका श्रमफल हथियाने वाला मुख्य वर्ग है राजाओं और सामंतों का।'' (डॉ. . राम विलास शर्मा, हिंदी जाति का इतिहास, पृ. 44)।
प्रजाहित की चिंता न करते हुए कराधान एवं दंडविधान द्वारा जनता का शोषण करनेवाली राज्य व्यवस्था ही किसानों की गरीबी और दुरवस्था का मूल कारण है। यही कारण है कि गरीबी की समस्या का समाधान सुझाते हुए रामराज्य की कल्पना के माध्यम से तुलसी ने दंडविधान का निषेध किया है और दुखी व दीन से पूर्व दरिद्र के अभाव का निर्देश किया है। पेट की आग से जलता हुआ दरिद्र जनसमुदाय जहाँ बेटे और बेटी तक को बेचने के लिए विवश हो, केवल वहीं कवि रामराज्य में प्रवेश करते ही सुंदर अन्न की प्राप्ति से भूखे व्यक्ति को मिलने वाले आनंद की उत्प्रेक्षा कर सकता है -
''सेवक बचन सत्य सब जाने।
आश्रम निकट जाइ निअराने।।
भरत दीख बन सैल समाजू।
मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।''
(रामचरितमानस, अयोध्याकांड, दोहा 235)।

अनेक स्थानों पर तुलसी ने राम के दर्शन और आलिंगन के सुख की तुलना अन्न और भोजन से की है। उनकी दृष्टि में भूखी जनता के लिए अन्न तथा भरपूर फसल का होना सुराज अथवा रामराज्य का प्राथमिक लक्षण है। चित्रकूट प्रसंग में सुराज वर्णन तथा उत्तरकांड में रामराज्य वर्णन से स्पष्ट होता है कि तुलसी की अभीष्ट राज्यव्यवस्था में भुखमरी तथा गरीबी के लिए स्थान नहीं है। आत्मानुशासन और लोकमंगल की प्रेरणा से संचालित तुलसी का रामराज्य आज भी एक सुख-स्वप्न है -

''अल्पमृत्यु नहिं कवनिउँ पीरा।
सब सुंदर सब विरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।''
(रामचरितमानस, उत्तरकांड, दोहा 21)।

- संपादक

अक्टूबर २००८ अंक

ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

शूद्र और स्त्री को एक साँस में ढोल आदि के साथ रखने और ताडन का पात्र बताने वाली चौपाई की अनेक प्रकार से व्याख्याएं हो चुकी हैं। ''जड़'' जलधि के इस कथन का स्रोत गर्ग-संहिता आदि में पहले से उपलब्ध है. -- ''ताडनं मार्दवं यान्ति, शूद्राः पटहः स्त्रियः''

इसे उद्धृत करते हुए ,संभवतः, बाबा तुलसी के मन में उन संहिताओं की जड़ता पर व्यंग्य का भाव भी रहा हो जिन्होंने स्वयं बाबा को भी खूब सताया था. साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों में बाबा के अपने अंतर्विरोधों से भी आँख नहीं फेरी जा सकती. सन्दर्भ-च्युत करके इस चौपाई के आधार पर जिसने भी जब भी तुलसी बाबा को स्त्री-विरोधी माना है, या शूद्र-शत्रु घोषित किया है ,उनके प्रति अन्याय ही किया है और अपनी संकुचित दृष्टि का प्रमाण दिया है. इसीलिये अनेक सहृदय जन इस चौपाई की अलग-अलग व्याख्या करते दिखाई देते हैं, जो स्वागतेय ही है |

-सम्पादक

अक्तूबर २००८

मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू

मित्रो!

हमने बडे धोखे खाए हैं। पग-पग पर छले गए हैं। जाने कितनी बार किस किसने हमें ठग लिया और हम अपनी भलमनसाहत की दुहाई देते रहे। भलमनसाहत भी क्या कोई बुरी चीज है ? हर बार हम यही पूछते रहे कि हमने तो किसी का बुरा नहीं किया था; किया क्या, सोचा तक न था; फिर भला हमीं क्यों प्रवंचना के शिकार हुए हर बार?

पर हम यह क्यों नहीं सोचना चाहते कि भलमनसाहत को अगर विवेक का मार्गदर्शन न मिले तो वह भीषण दोष बन जाती है। क्या हमने कभी इस बात पर विचार किया कि ग्राह्य और अग्राह्य के बीच के फर्क को न समझकर सहज विश्वासी होना आत्महत्या की शुरूआत है। सृष्टि द्वंद्वात्मक है परंतु मनुष्य को द्वंद्व से मुक्त होने पर ही शांति मिलती है। भले और बुरे के द्वंद्व में दोनों को अलग-अलग पहचानना ही होगा। ग्रहण और त्याग का हंस जैसा विवेक इस पहचान के बिना संभव नहीं। यह विवेक आने पर ही भलमनसाहत की सार्थकता है क्योंकि तभी हम दोष और दोषी से दूर रह सकते हैं तथा गुण और गुणी का वरण कर सकते हैं।

अपने प्रभु पर अनन्य निर्भर भक्त के लिए ही यह संभव है कि वह दुरित को काटने और भद्र को बाँटने की प्रार्थना करके सब कुछ को उसके हवाले कर दे। ऐसा भोलापन प्रभु को रिझाता है और प्रभु की यह रीझ भक्त को विवेक देती है। ध्यान देने की बात है, प्रभु विवेक देता है, लेकिन उसके प्रयोग में भक्त स्वतंत्र है। यों, चुनना तो होगा हमें ही - गुण और दोष के बीच तमीज़ करके ; वरना दिव्य विवेक भी छूँछा रह जाएगा। हमारा दोष यही है कि विवेक होते हुए भी हमने बार-बार गलत चुनाव किया, दोष का वरण किया, अपने लिए अपने हाथों नरक रचा। जानबूझ कर भलमनसाहत को आत्मघाती बना डाला।

ऐसे द्वंद्व के समय तुलसी बाबा की वाणी सुन ली होती तो शायद विवेक जग जाता। बाबा कह रहे हैं कि खल अगर किसी सज्जन के साथ गठबंधन कर ले, तब भी अपनी स्वाभाविक मलिनता को नहीं छोड़ता। अभंग है खल की मलिनता। इतना ही नहीं, ये खल बड़े मायावी हैं। साधु का वेष बनाकर आते हैं, सुंदर रूप धर कर आते हैं। पर वेष और रूप की साधुता और सुंदरता से रावण और मारीच की स्वभावगत कुरूपता छिप भले जाए, मिटती नहीं है। भलमनसाहत का ढोंग करके राहु और कालनेमि सदा से भलों का छलते आए हैं, लेकिन उनकी दुष्टता अंततः जग जाहिर हुई ही है।

यह सब जानकर भी अगर कोई दुष्टों के साथ भी भलमनसाहत का ही आचरण करता जाए तो उसे भलामानुस नहीं मूर्ख और मूढ़ ही कहा जाना चाहिए - वह इस गुणदोषमय द्वंद्वात्मक जगत के योग्य नहीं ! अपनी इसी अयोग्यता के कारण हम बार-बार धोखा खाते हैं, छले जाते हैं, पिटते हैं और हारते रहते हैं !

- संपादक

सितम्बर २००८ अंक

तुलसी सो सुत होइ!

तुलसीबाबा की जयंती पर हर वर्ष उनके संघर्षपूर्ण जीवन के चित्र पुतलियों में तैरने लगते हैं।
एक बालक जो जन्मते ही अनाथ हो गया!
कहते हैं, कोई कुटिल नाम का कीट होता है जो संतान को जन्म देते ही मर जाता है। तुलसी अपने आपको उस कीट जैसा समझते रहे होंगे क्योंकि उनकी माता तो जन्म देते ही मृत्यु के मुख में चली गई थी, पिता भी ऐसे पुत्र को जन्मते ही त्याग कर कुछ काल बाद स्वर्ग सिधार गए। ऐसा पुत्र स्वयं को अभागा और अनाथ कुटिल कीट न समझे तो क्या समझे!
भिक्षान्न पर निर्वाह करना पड़ा।

वे अनुभव कितने विकट रहे होंगे जिन्होंने बाबा से कहलवाया कि जिस बालक को जन्मते ही माता-पिता तक ने त्याग दिया, उसके भाग्य में भला कुछ भी भलाई कहाँ से आएगी। तुच्छता, हीनता, तिरस्कार और निरीहता से घिरे उस बालक को कुत्तों की तरह टुकड़ों पर ललचाते हुए भी उनसे वंचित रहना पड़ा होगा( तभी तो दरिद्रता और दशानन उन्हें एक जैसे दिखे होगे। उच्च कुल का यह बालक अज्ञातकुलशील और नाम-रहित होकर भूख से लड़-लड़कर बड़ा हुआ होगा। पर संयोग से बचपन में ही राम-चरित के प्रति आस्था का संस्कार मिल गया और 'भाँग' होते-होते वे `तुलसी´ हो गए। अनाथ सनाथ हो गया। राम-मार्ग राजमार्ग हो गया।

संघर्ष व्यर्थ नहीं गया। विद्या मिली। यश मिला। घर बस गया। गोस्वामी पद भी मिला। काम और राम का द्वंद्व भी चला। बोध भी हुआ, पश्चात्ताप भी और निश्चय भी। तुलसी अपने राम को समर्पित हो गए -

``बालेपन सूधेमन राम सनमुख भयो/
राम नाम लेत मांगि खात टूक टाक हौं।
/परयो लोकरीति में पुनीत प्रीति रामराय/
मोहबस बैठो तोरि तरक तराक हौं।।/
खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो/
अंजनीकुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं।/
तुलसी गोसाईं भयो भोंडे दिन भूलि गयो,/
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं।।
´´
तुलसी जयंती पर अनंत शुभकामनाओं सहित।

-सम्पादक

अगस्त २००८ अंक

जासु बिलोकि अलौकिक सोभा ..............

आज पुष्पवाटिका में जब से जानकी जी को देखा है, मेरे राम जैसे कुछ और ही हो गए हैं। जाने कब का सोया परम प्रेम जाग उठा। मेरे राम का जानकी जी से एक ही संबंध है - परम प्रेम का संबंध। परम प्रेम भक्ति का ही नाम है न! अपनी आह्लादिनी शक्ति का साक्षात्कार होते ही राम के भीतर-बाहर आनंद का नाद बजने लगा। सुख, स्नेह, शोभा और गुणों की खान वैदेही, माँ-भवानी के भवन की ओर जाने लगीं तो मेरे राम ने चुपके से परम प्रेम के कोमल रंगों से अपने चारु चित्त के कैनवास पर उनकी छवि आँक ली। जाने कब से मेरे राम का हृदयाकाश सूना पड़ा था! सीता की छवि ही उस पर अंकित पहली और आखिरी छवि है:

परम प्रेम मय मृदु मसि कीन्हीं।
चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्हीं।।

सीता की छवि के अलावा और कोई छवि है ही कहाँ ? जहाँ छवि है, वहाँ सीता ही हैं। जहाँ सीता नहीं, वहाँ छवि हो ही नहीं सकती। राम का हृदय आज तक छविहीन था। सीता ही तो छविमान बनाती हैं मेरे राम को। आज पहली बार राम का हृदय सच में धड़का था। सीता को देखा तो सुख मिला। सबको सुख देने वाले मेरे राम ने आज अपने सुख को जाना और अवाक् रह गए:

देखि सीय सोभा सुख पावा/
हृदय सराहत बचनु न आवा।।

ऐसी है मेरी जननी जनकनंदिनी जानकी की छवि जो सुंदरता को भी सुंदर बनाती है। उन्हीं की छवि तो इस जगत के शीशमहल में दीपक की लौ बनकर जगमगा रही है:

सुंदरता कहुँ सुंदर करई।
छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।।

सारे जगत को राम अपने हृदय में लिए फिरते हैं। राम का हृदय आज छविगृह बन गया। सीता की छवि उसमें जगमगा उठी। ब्रह्मांड जगर-मगर हो गया।

राम और सीता मिलते हैं तो अंधेरे कट जाते हैं, प्रकाश फूट पड़ता है, सौंदर्य बरसता है और आह्लाद का समुद्र हिलारें लेता है!

- संपादक
जुलाई 2008 अंक

शनिवार, 8 मई 2010

जब तें उमा सैल गृह जाईं..

मित्रो!
विचित्र है यह भारतवर्ष। एक ओर हम स्त्री को लक्ष्मी का रूप मानते हैं और दूसरी ओर स्त्री भ्रूण की हत्या करते समय हमारा कलेजा नहीं काँपता । स्त्री जातक इस कदर अवांछित है हमारे समाज में कि संपन्न से संपन्न घर में भी आज भी कन्या का जन्म होने पर कुछ देर के लिए ही सही पर शोक का वातावरण छा जाता है। पुत्र जन्म हो तो गाँव गिराँव में थाली बजाकर शुभ समाचार दिया जाता है। इसके विपरीत कन्या जन्म हो तो घर की बूढीयाँ पेट और छाती पीटने लगती हैं जैसे कोई मर गया हो। कन्या के रूप में लक्ष्मी के आने पर भी शोक मनाने वाला हमारा यह समाज निश्चय ही धिक्कार के योग्य है। ऊपर से तुर्रा यह कि अपनी इन कुप्रथाओं को ढकने के लिए शास्त्रों और काव्यों के उदाहरण देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि पुत्र वंशधर होता है अत: उसका जन्म उत्साह का हेतु है जबकि पुत्री पराई अमानत की तरह घर आती है अत: उसके आगमन पर उल्लसित होने का औचित्य ही क्या है।
हमें तो लगता है कि इस देश के भयंकर पिछडे़पन और दरिद्रता का सबसे बड़ा कारण लक्ष्मी स्वरूपा बेटियों का अपमान ही है। स्त्री का जन्म धारण करने के कारण मानव प्राणी के साथ भेदभाव का बर्ताव करने वाले समाज और उसके तंत्र को असल में तो अब तक कभी का नष्ट हो जाना चाहिएा था। पर शायद इसलिए बचा रहा है यह समाज कि कभी कभी बेटी का सम्मान भी यह कर लेता है। बेटियों का आशीष इस पापी समाज को भी चिरजीवन दिए हुए है। बेटियाँ जीवन का प्रतीक हैं। बेटियाँ प्रफुल्लता और आनंद का स्रोत हैं।बेटियाँ हैं तो बहारें हैं। बेटी पर्वत के वक्ष पर खेलती हुई नदी है। हिमाच्छादित पर्वतराज हिमालय के घर जब पुत्री का जन्म होता है तो युग युग की जमी बर्फ पिघलती है और सब प्रकार की सिद्धियों और संपत्ति की वर्षा होने लगती है। पार्वती साक्षात सुख समृदि्ध हैं।

तुलसी बाबा ने अत्यंत तन्मय होकर हिमवान के घर कन्या जन्म की बधाई गाई है -

सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
प्रगटी सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति ।।

कब समझेंगे हम, बेटी चाहे हिमवान के घर जन्म ले या अन्य किसी के, पुत्री का पिता बनकर पुरुष धन्य होता है! इस धन्यता का अनुभव हिमालय ने कुछ इस प्रकार किया कि सारी नदियों का जल पवित्र हो उठा। सब खग-मृग-मधुप सुख से भर उठे। सब जीवों ने परस्पर बैर त्याग दिया। सबका हिमालय के प्रति नैसर्गिक अनुराग बढ़ गया। उनके घर नित्य नूतन मंगल होने लगे और उनका यश दिगंत व्यापी हो गया।

हर बेटी गिरिजा ही होती है। बेटी के आने से पिता पहली बार सच्ची पवित्रता को अपनी रगों में बहती हुई महसूस करता है। बेटियाँ अपने सहज स्नेह से सबको निर्वैरता सिखाती हैं। बेटियाँ अपनी सुंदरता और कमनीयता से सभ्यता और संस्कृति का हेतु बनती हैं। वे मंगल, यश और जय प्रदान करने वाली हैं। तभी तो पुत्री जन्म को तुलसी रामभक्ति के फल के सदृश मानते हैं -

सोह सैल गिरिजा गृह आए¡।
जिमि जनु रामभगति के पाए¡।।

- संपादक
जून २००८ अंक

अनुजवधू, भगिनी, सुतनारी। सुनु सठ, कन्या, सम ये चारी।।




मित्रो!

तुलसीबाबा कथा के क्रम में तनिक सा अवसर मिलते ही अपने वांछित समाज के आचार के संकेत बड़ी कुशलता से देते हैं। लोग प्राय: बालि-वध के औचित्य-अनौचित्य पर लंबी-लंबी बहस करते रहते हैं। बहस को एक ओर खिसकाकर अगर देखें तो पता चलता है कि इस अवसर का लाभ उठाकर तुलसी ने अपने काव्यनायक के मुँह से स्त्री के प्रति सामाजिक आचरण की मर्यादा की व्याख्या की है।

यों तो स्त्री-मात्र सम्माननीय है, उसके प्रति कुदृष्टि रखनेवाला व्यक्ति असामाजिक आचरण का अपराधी है अत: दंडनीय है। स्त्री-मात्र के प्रति मातृभाव से ही हम वासनाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिए हमारे यहाँ मातृपूजन किया जाता है, कन्याओं को पूजनीय माना जाता है। भारत के कई प्रांतों में बालिका को माँ /अम्मा/इमा कहकर पुकारना इसी संस्कार का परिचायक है। अत: स्त्री अवध्य है, उसके प्रति किसी भी प्रकार का हिंसक आचरण पुरुष की पौरुषहीनता का प्रतीक है।

यह तो हुई स्त्री-मात्र के प्रति दृष्टि की बात। लेकिन यहाँ विशेष प्रसंग उपस्थित है। छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या - ये चारों बराबर हैं। इनके प्रति जिसकी दृष्टि में वासना आई - इनके प्रति जिसके मन में कामभाव जागा - वह अभागा भला पुरुष है क्या! वह महापातकी है! वह समाज और सामाजिकता को कलंकित करता है। इसीलिए तुलसी के राम व्यवस्था देते हैं -

ताहि बधें कछु पाप न होई!

इस प्रसंग में एक और संकेत निहित है जो तुलसी बाबा के स्त्रीविमर्श का अनिवार्य हिस्सा है। वह यह कि राम बालि को अतिशय अभिमानी और मूढ़ मानते हैं क्योंकि वह पत्नी के परामर्श की उपेक्षा करता है -

`नारि सिखावन करसि न काना´।

रावण भी इसी प्रकार का आचरण करता है और मंदोदरी ही नहीं, स्त्री-मात्र का उपहास करता है - मखौल उड़ाता है - उनके आठ-आठ अवगुण गिनाता है। लेकिन तुलसी की दृष्टि में वह मूर्ख, खल और अभिमानी है। स्त्री के परामर्श पर ध्यान न देना रावण के भी विनाश का सूचक है - बालि की तरह!

- संपादक

मई 2008 अंक

गुरुवार, 6 मई 2010

''ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में हिंदी की भूमिका'' पर व्याख्यान संपन्न


''ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में हिंदी की भूमिका'' पर व्याख्यान संपन्न


हैदराबाद,६ मई,२०१०.

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के राजभाषा प्रभाग के तत्वावधान में आयकर निदेशालय के अंतर्गत देश भर में कार्यरत हिंदी अनुवादकों के लिए 'आयकर शिखर' में आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय सेमिनार के दूसरे दिन विशेष वक्ता के रूप में पधारे प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने ''ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में हिंदी की भूमिका'' पर व्याख्यान दिया.
अतिथि व्याख्याता ऋषभ देव शर्मा ने विस्तार से यह स्पष्ट किया कि ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में भारत केवल दुनिया भर के माल की खपत के लिए मंडी ही न रहकर उत्पादक और विक्रेता के रूप में भी उभर रहा है . उन्होंने वैश्विक कारोबार,सूचना प्रौद्योगिकी और बाज़ार की दृष्टि से हिंदी की आवश्यकता और क्षमता के बारे में बताते हुए आगे यह भी कहा कि कंप्यूटर और मोबाइल का जितना प्रसार होगा तथा आर्थिक विकास जितनी जल्दी गाँवों को लक्षित करेगा , हिन्दी सहित सभी स्थानीय भाषाओं के लिए उतना ही अनुकूल माहौल बनेगा क्योंकि गाँवों तक व्यवसाय इन्हीं भाषाओं के माध्यम से प्रसारित हो सकता है.

आरम्भ में आयकर निदेशालय के राजभाषा अधिकारी आर के शुक्ल ने प्रो.शर्मा का परिचय देते हुए स्वागत किया.सुश्री साहू के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ चर्चा संपन्न हुई.