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रविवार, 18 अक्तूबर 2009

प्रकाश की तरंगें छोड़तीं पदचिह्न



''प्रकाश की तरंगें
छोड़तीं पदचिह्न

समय के खेत तक
पहुँचा सकते हैं वे हमें

लेकिन
चलना तो हमें ही होगा
किसान की तरह
सधे कदमों से
अपने खेत की मिट्टी की
पुकार सुनते ही

क्या तैयार हैं हम ?''

>>>>>>> देवराज

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

दक्खिनी हिंदी की परंपरा : ‘ऐब न राखें हिंदी बोल’

तूँ कहाँ का है, इस जागाँ तूँ क्यों आया? इस शहर को बाट तूँ क्यों पाया? तुझे कौन दिखलाया?’’ xxx ‘‘सो उस दिलरुबा नार कूँ, दीदियाँ के सिंघार कूँ, चतुर चैसार कूँ, एक सहेली थी,भौत छबीली थी, रात रंगीली थी। नाँव उसका ज़ुल्फ़ था, लट साँवली निपट, रंग कूँ काली, घूँगर वाली।’’

दक्खिनी हिंदी के लेखक वजही (1609) द्वारा रचित गद्य के ये अंश यह सोचने पर विवश करते हैं कि यदि दक्खिनी में 17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में गद्य का यह रूप था तो उस समय के उत्तर के हिंदी रचनाकार ऐसा गद्य क्यों नहीं लिख पाए! स्मरणीय है कि यह समय महाकवि तुलसीदास का समय है। इस प्रश्न से टकराए बिना यदि हम हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के गद्य का उदय 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मानते हैं, तो बड़ी ऐतिहासिक भूल करते हैं। कोई कड़ी है जो बीच से निकल गई है या जानबूझ कर निकाल दी गई है! इस निकली हुई कड़ी का नाम है दक्खिनी’|

खड़ी बोली के साहित्य को भारतेंदु काल से आरंभ मानते हुए प्रायः यह याद कर लिया जाता है कि कभी अमीर खुसरो ने भी इस भाषा में काव्य रचना की थी परंतु उसकी कोई परंपरा न मिलने के कारण उन्हें किसी प्रवर्तन का श्रेय नहीं दिया जाता। गद्य में तो और भी खस्ता हालत है। ब्रज और राजस्थानी के गद्य की चर्चा तो मिलती है लेकिन खड़ी बोली के गद्य की कहीं गंध तक इतिहासकारों को नहीं मिल पाई है। ऐसा इसलिए है कि इतिहासकारों ने लिपि भेद के कारण दक्खिनी के साहित्य की ओर लंबे समय तक ध्यान ही नहीं दिया जबकि दक्खिनी में चैदहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक अत्यंत समृद्ध पद्य और गद्य की परंपरा प्राप्त होती है। इसका कारण यह हो सकता है कि यह काल जहाँ उत्तर भारत में ऐसी उथल-पुथल का था जिसमें साहित्य लगभग पूरी तरह धर्माश्रित और लोकाश्रित था, वहीं दक्खिन के शासक अपने समय की सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भागीदार थे और राज्याश्रय में दक्खिनी के लेखन का भरपूर पोषण हो सका।

खड़ी बोली के गद्य को भारतेंदु काल से आरंभ मानने से पहले इस तथ्य पर ध्यान देना ज़रूरी है कि दक्खिनी साहित्य के पहले साहित्यकार ख्वाज़ा बंदानेवाज गेसूदराज से आरंभ होकर दक्खिनी हिंदी की गद्य परंपरा मीराँजी, शमसुल उश्शाक, बुराहानुद्दीन जानम, औार मुल्ला वजही से होते हुए एक विस्तृत विरासत कायम करती है। यह विरासत सही मायने में खड़ी बोली की विरासत है क्योंकि दक्खिनी हिंदी और खड़ी बोली मूलतः अभिन्न हैं। यदि इस विरासत को विधिवत विश्लेषित किया जाए तो साफ हो जाएगा कि अमीर खुसरो खड़ी बोली में लिखने वाले अकेले रचनाकार नहीं थे, उनके बाद एक पूरी परंपरा थी - गद्य और पद्य दोनों की पूरी परंपरा।

यह पूछा जा सकता है कि जब अवधी और ब्रज भाषा में आध्यात्मिक और शृंगारिक साहित्य रचा जा रहा था उस समय खड़ी बोली विकास की किस दशा में थी। इसके उत्तर में याद करना होगा उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को जिनमें अलाउद्दीन और मुहम्मद तुगलक की दक्षिण विजय के साथ उत्तर से अनेकानेक मुस्लिम सामंतों, सैनिकों और शिल्पकारों को दक्षिण आना पड़ा। इन्हीं के कारण दक्षिण में गुलबर्गा, गोलकोंडा और बीजापुर के इलाके में खड़ी बोली की कविता आरंभ हुई - यह लगभग वही समय था जब मिथिलांचल में विद्यापति की पदावली गूँज रही थी। इसका अर्थ हुआ कि खड़ी बोली काव्य परंपरा 1850 ई. के बाद अचानक नहीं फूट पड़ी,बल्कि उसकी विकासधारा विद्यापति के काल से ही समांतर प्रवाहित हो रही थी। इतना ही नहीं दक्खिन में आ बसे इन रचनाकारों ने अपनी काव्य भाषा को एकाधिक स्थलों पर विधिवतहिंदवीऔर हिंदीकहा है। जैसे -

‘‘बाचा कीना हिंदवी में।’’ (अशरफ़, 1503 ई.)

‘‘यह सब बोलूँ हिंदी बोल।

पन तूँ अन भौ सेती खोल।।

ऐब न राखें हिंदी बोल।

माने तूँ चख देखें खोल।।’’ (बुरहानुद्दीन जानम, 1522 ई.)

उर्दू साहित्येतिहासकार एहतेशाम हुसैन ने बुरहानुद्दीन जानम के पिता मीरान जी के हवाले से बताया है कि उन्होंने भी अपनी भाषा को स्वयं हिंदी कहा है और यह भी लिखा है कि मेरी ये रचनाएँ उन लोगों के लिए हैं जो अरबी-फारसी नहीं जानते। अरबी-फारसी की परंपरा से जोड़ कर हिंदी की परंपरा से काट दिए गए इन विस्मृत रचनाकारों के दर्द को समझने के लिए यह रेखांकित करना ज़रूरी है कि महात्मा तुलसीदास के समकालीन कवि अब्दुल गनी ने घोषणापूर्वक कहा था कि मेरी भाषा तो हिंदवी और देहलवी है, मैं अरब और फारस की कथा नहीं जानता -

‘‘ज़बाँ हिंदवी मुझसो होर देहलवी।

न जानूँ अरब और अजम मस्नवी।।’’ (अब्दुल गनी)

यहाँ प्रसंगवश हिंदवीशब्द की व्याप्ति को समझने के लिए यह उल्लेख किया जा सकता है कि ग़ालिब ने जब फारसी से हटकर उर्दू में काव्य सृजन आरंभ किया तो उन्होंने अपनी भाषा को उर्दू नहीं, हिंदवी कहा था।

अस्तु, दक्खिनी के गद्य-पद्य की परंपरा के विहंगावलोकन से यह बात साफ है कि‘‘हिंदी भाषा का विकास और उसमें साहित्य रचना का कार्य केवल उत्तर भारत में ही नहीं हुआ है। दक्षिण भारत की मुसलमानी रियासतों, उनके शासकों एवं उनके दरबार के तथा अन्य साहित्यकारों का भी इसमें महत्वपूर्ण हाथ है। मुसलमान फकीरों, सैनिकों और राज्य संस्थापकों के द्वारा साहित्यिक हिंदी दक्षिण भारत में पहुँची थी और पंद्रहवीं शताब्दी तक उसमें उच्च कोटि का साहित्य निर्मित होने लगा था।’’ (डॉ. धीरेंद्र वर्मा)। दुर्भाग्य यह रहा कि इस साहित्य का बड़ा भाग अभी तक भी देवनागरी लिपि में प्रकाशित नहीं है, अन्यथा खड़ी बोली की खोई हुई कड़ी की पहचान कभी की हो गई होती। इस दिशा में सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य महापंडित राहुल सांकृत्यायन का है।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि ‘‘जब उत्तर भारत में फारसी का प्रभुत्व बना रहा तो दक्षिण में दक्खिनीका। हिंदी ने जो कदम दक्खिनी में जमाए उन्हें फारसी हिला न सकी। सुप्रसिद्ध इतिहासकार फरिश्ता ने लिखा है कि बहमनी राज्य के दफ्तरों में हिंदी जबान प्रचलित थी और सल्तनत ने उसे सरकारी जबान का पद दे रखा था। बहमनी राज्य के छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद हिंदी का यह पद उत्तराधिकार में रियासतों ने कायम रखा।’’ (डॉ. बाबूराम सक्सेना)।

यहाँ यह जानना रोचक हो सकता है कि हाब्सन-जाब्सन कोश (1886) में दक्खिनी को हिंदुस्तान की एक विचित्र बोली मानते हुए इसे दक्खिनी देश की स्वाभाविक भाषाकहा गया है,जो देश की तत्कालीन स्वाभाविक भाषा हिंदवी अथवा हिंदी की एक शैली थी। यहाँ दक्खिनी और उर्दू के संबंध का प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, ‘दक्खिनसे अभिप्राय बहमनी साम्राज्य के विभिन्न भागों से रहा है - बरार, बीदर, गोलकोंडा, अहमदनगर और बीजापुर। उत्तर भारत से आए मुसलमानों के साथ यहाँ दिल्ली से खड़ी बोली का आगमन हुआ और क्रमशः मुल्ला वजही तथा कुलीकुतुब शाह आदि के माध्यम से उसका साहित्यिक रूप भी विकसित हुआ जिसे 17वीं शताब्दी तक आते-आते दक्षिण में बसे हुए उत्तर भारतीय मुसलमानों की साहित्यिक भाषाकी प्रतिष्ठा मिल गई। ‘‘इसी काल के आसपास जब औरंगजेब के आक्रमणों के समय मुगल सेनाओं के माध्यम से दिल्ली में बोली जानेवाली हिंदुस्तानी (अथवा हिंदुस्थानी) दक्खन के इस क्षेत्र के संपर्क में आयी, तब पहले से दक्खन में बसे उत्तर भारतीय मुसलमानों में प्रचलित हिंदुस्तानी से भिन्नता को स्पष्ट करने के लिए इस परवर्ती बोली का नाम ज़बाने-उर्दू-ए-मुअल्ला (शाही डेरे की भाषा) रखा गया। बाद में इसी नाम का संक्षिप्त रूप उर्दूप्रचलन में आ गया।’’ (सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या )|

आज दक्खिनी हिंदी के नाम में निहित दक्खिन से आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ भागों का अर्थ लिया जाता है जिनमें कई शताब्दियों तक संस्कृतियों और भाषाओं का ऐसा संगम होता रहा जो भारत राष्ट्र की सामासिकता का आदर्श है। यह अध्ययन का विषय है कि दक्खिनी के मध्यकालीन साहित्यिक रूप और आधुनिक व्यावहारिक रूप के निर्माण में हिंदी की बोलियों के साथ-साथ तेलुगु, मराठी और कन्नड़ की भाषिक परंपराओं का प्रभाव किस प्रकार सक्रिय रहा है।

भाषावैज्ञानिक लक्षणों के आधार पर निर्विवाद रूप से यह माना जाता है कि दक्खिनी हिंदीवास्तव में हिंदी का ही रूप है। हिंदी की ध्वनियों के साथ फारसी की कुछ ध्वनियाँ भी इसमें शामिल हैं। खड़ी बोली की तरह स्त्रीलिंग संज्ञाओं में याँ का जुड़ना भी इसे खड़ी बोली कुल में शामिल करता है। इसमें अनेक बोलियों के शब्दों की विद्यमानता का कारण यह है कि 13 वीं से 16 वीं शताब्दी तक उत्तर से दक्षिण आनेवाले सैनिकों, साधुओं और व्यवसायियों में अधिकतर पंजाब, बांगरू प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते थे। इनके साथ दक्षिण में आई भाषा इसीलिए अनेक बोलियों का समूह प्रतीत होती है जो पुनः सामासिकता का प्रमाण है तथा दक्खिनी हिंदी के असांप्रदायिक और राष्ट्रीय चरित्र के मूल में है। इस भाषा के रचनाकार ही वस्तुतः खड़ी बोली के प्रारंभिक प्रयोक्ता साहित्यकार थे। यदि उन्हें उर्दू के भी आदिकवि कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। ‘‘इस प्रकार खड़ी हिंदी के सर्वप्रथम कवि यही दक्खिनी कवि थे। एक ओर उन्होंने बोलचाल की कौरवी (खड़ी बोली) को साहित्यिक भाषा का रूप दिया, तो दूसरी तरफ उनकी कृतियों ने उर्दू कविता का प्रारंभ किया।’’ (राहुल सांकृत्यायन)|

अतः 14वीं शताब्दी के ख्वाज़ा बंदानेवाज़ खड़ी बोली (हिंदी और उर्दू, दोनों) के आदिकवि हैं जिन्हें अमीर खुसरो (13वीं शती) का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जा सकता है।18वीं शताब्दी के वली को प्रायः उर्दू का पहला कवि कहा जाता है परंतु यह ध्यान में रखना होगा कि वे दक्कन में रह चुके थे और दक्खिनी की साहित्यिक परंपरा से परिचित थे अर्थात् उनके माध्यम से दक्खिनी की साहित्यिक परंपरा उर्दू के रूप में उत्तर पहुँची। यदि शुद्धतावादी आग्रहों ने विवाद न खड़े किए होते तो यह पूरी विकासधारा इस तथ्य को सहज प्रमाणित करने वाली मानी जाती कि उर्दू हिंदी की ही एक शैली है, न कि पृथक भाषा।

दक्खिनी हिंदी के साहित्य की जब भी चर्चा होगी, उसके सामासिक और धर्म निरपेक्ष स्वरूप की उपेक्षा नहीं की जा सकेगी। भाषा और संस्कृति दोनों ही स्तरों पर यह साहित्य भारतीयता से अनुप्राणित है। चाहे ऋतु वर्णन का प्रसंग हो अथवा नायिका भेद का संदर्भ, यह साहित्य संस्कृत से अपभ्रंश तक की परंपरा से जुड़ा प्रतीत होता है। कुली कुतुब शाह ने तो एक नायिका का नामकरण ही हिंदीकिया है -

‘‘रंगीली साईं, ते तूँ रंग भरी है।

सुगड़ सुंदर सहेली गुन भरी है।।

लटकना बिजली निमने उस सुहावै।

वो हिंदी छोटी बहुछंद शहपरी है।।’’ (कुली कुतुब शाह)।

इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि इन सब तथ्यों को ध्यान रखते हुए हिंदी और उर्दू साहित्य का समग्र और अखिल भारतीय इतिहास लिखा जा सके तो वह इस देश की सामासिक संस्कृति का दर्पण होगा। स्मरणीय है कि दक्खिनी हिंदी काव्यधारा’ (1958) के माध्यम से महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस प्रकार के इतिहास लेखन का मार्ग पहले ही प्रशस्त कर दिया है। उन्होंने इस कृति में दक्खिनी हिंदी काव्यधारा को आदिकाल (1400-1500 ई.), मध्यकाल (1500-1657 ई.) और उत्तरकाल (1657-1840 ई.) में विभाजित किया है तथा दक्खिनी हिंदी के 36रचनाकारों की रचनाओं को संकलित किया है। इन रचनाकारों में शामिल हैं -

आदिकाल - बंदानेवाज़, शाह मीराँजी, अशरफ़, फ़ीरोज़, बुरहानुद्दीन जानम, एकनाथ, शाह अली और वजही।

मध्यकाल - मुहम्मद कुल्ली, अब्दुल, अमीन, गौवासी, तुकाराम, मीराँ हुसैनी, अफज़ल,मुक़ी जी, कुतुबी, अब्दुल्लाह कुतुब, सनअती, ख़ुशनूद, रुस्तमी और निशाती।

उत्तरकाल - नस्रती, मिराँजी ख़ुदानुमा, तबई, गुलाम अली, इशरती, जईफ़ी, मुहम्मद अमीन, वज्दी, वली दकनी, वली वेल्लोरी, हाशिम अली, क़यासी, बाकर आगाह और तुराब दखनी।

महापंडित सांकृत्यायन के बाद हिंदी और उर्दू में यद्यपि बहुत से शोध कार्य दक्खिनी हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर हुए हैं, परंतु वे अपर्याप्त हैं। अभी भी इस क्षेत्र में अध्ययन और शोध की विपुल संभावना है।

- एक तो यह कि दक्खिनी का बहुत सारा साहित्य (गद्य और पद्य) लिप्यंतरण और पाठ संपादन की प्रतीक्षा में पड़ा हुआ है - जाने कब उसका उद्धार हो!

- दूसरे यह कि हिंदी, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन साहित्य के साथ दक्खिनी का तुलनात्मक अध्ययन भारतीय साहित्य की संकल्पना को साकार करने के लिए बेहद ज़रूरी है।

- तीसरे यह कि दक्खिनी हिंदी के साहित्य में संस्कृत परंपरा से चली आती काव्य रूढ़ियों और अरबी-फारसी की काव्य रूढ़ियों का जो समन्वय हुआ है उसका व्यापक अनुशीलन अभी शेष है जो निश्चय ही सांस्कृतिक एकता की पुष्टि का सुदृढ़ आधार बन सकता है।

- इसी प्रकार अध्ययन की चौथी दिशा यह हो सकती है कि दक्खिनी हिंदी की भाषिक संरचना के निर्माण में हिंदी की बोलियों के साथ-साथ दक्षिण की भाषाओं के योगदान को विश्लेषित किया जाए।


भारतीय साहित्य में दलित विमर्श : मणिपुरी समाज का संदर्भ

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में ’दलित’ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें जन्म, जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण शताब्दियों तक सामाजिक न्याय और मानवाधिकार से वंचित रहना पड़ा है। मुख्य रूप से वर्ण व्यवस्था में शूद्र समझी जाने वाली जातियाँ, छुआछूत की प्रथा के शिकार अछूत, हरिजन और गिरिजन दलित वर्ग के अंतर्गत आते हैं। सामाजिक विडंबना यह है कि मध्यकाल में स्त्री को भी इसी प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार होना पड़ा; इसलिए इस वर्ग में संपूर्ण समाज की आधी आबादी समझी जानेवाली स्त्री जाति भी शामिल है। शूद्र और स्त्री को ढोल और पशु की भाँति ताड़ना का पात्र घोषित करने वाली परंपरा ने अमानुषिक अत्याचार करके इन वर्गों को इस प्रकार पददलित किया कि इनकी अस्मिता तक विलीन हो गई। आज जब हम दलित विमर्श की बात करते हैं तो एक ओर तो हम इसका संबंध भूमंडलीकरण के साथ उभरे उत्तर आधुनिक विमर्श से जोड़ते हैं तथा दूसरी ओर उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय नवजागरण के उस अधूरे रह गए पक्ष के साथ जोड़ते हैं जिसका नेतृत्व एक ओर तो राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, बालगंगाधर तिलक और महात्मा गाँधी जैसी महान आत्माओं ने तथा दूसरी ओर ज्योति बा फुले, पेरियार, नारायण गुरु और डॉ. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जैसी परिवर्तनकामी विभूतियों ने किया। नवजागरण की पहली परंपरा के नेतागण जहाँ ’सुधार’ की नीति में विश्वास रखते थे वहीं दूसरी परंपरा के नेताओं का विश्वास ’परिवर्तन’ में था। उत्तर आधुनिक विमर्श ने हाशिए के वर्गों को केंद्र के वर्ग बनाने की पहल करके दूसरी परंपरा के इसी विश्वास को नया संदर्भ प्रदान किया और विभिन्न भारतीय भाषाओं में बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में दलित विमर्श तीव्रता के साथ उभरा। इस प्रकार भारतीय समाज और साहित्य के संदर्भ में दलित विमर्श का अभिप्राय है वर्णाश्रम व्यवस्था अथवा तथाकथित मनुवादी या ब्राह्मणवादी व्यवस्था में अस्पृश्यता, दमन और दलन के शिकार निम्न वर्ण या अंत्यजों की पीड़ा की केंद्रीय विमर्श के रूप में स्वीकृति। और इस दलित विमर्श का ध्येय है जाति उन्मूलन।

भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उभार भारतीय समाज व्यवस्था के परिवर्तन का द्योतक है। यह विडंबना ही है कि समस्त प्राणियों में एक ही परम तत्व के दर्शन करने वाला तथा वर्ण व्यवस्था को गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित करने वाला समाज एक समय इतना कट्टर हो गया कि निम्न वर्ण या जाति में जन्म लेने वालों को सब प्रकार के अवसरों से मनुष्य और मनुष्य में जन्म के आधार पर भेदभाव करते हुए, वंचित किया जाने लगा। इस सारी व्यवस्था के लिए आज प्रायः ’मनुस्मृति’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और उन ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिस्थितियों एवं घात-प्रतिघातों की उपेक्षा कर दी जाती है जिन्होंने एक सुचिंतित सामाजिक व्यवस्था को जड़, प्रगतिविरोधी, मानवविरोधी एवं समाजविरोधी रूढ़ में बदल दिया। भारत की लंबी गुलामी का एक बड़ा कारण भारतीय समाज की रूढ़ग्रस्त और सड़ी-गली जाति व्यवस्था और छुआछूत की कुरीति को माना जा सकता है। इसीलिए नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधाओं ने भारत को इस कलंकपूर्ण प्रथा से मुक्त कराने का यथाशक्ति प्रयास किया। यही कारण है कि भारत के संविधान में अनुच्छेद १५ (२ बी) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया कि जाति के आधार पर भारत के किसी भी नागरिक के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसके अलावा लंबे समय तक सामाजिक शोषण और दमन का शिकार रही हरिजन और गिरिजन जातियों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में अलग से सूचीबद्ध किया गया ताकि इनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके। इन प्रयासों के सुपरिणाम सामने आने लगे हैं जिनमें से एक है भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य की नई प्रवृत्ति का विकास।

भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया में आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में चली मानवाधिकारों की हवा ने दलित चेतना को प्रवाहित करने में बड़ा योगदान किया है। इस क्षेत्र के दलित साहित्यकार जहाँ एक ओर परंपरागत काव्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र को अपर्याप्त मानते हुए साहित्य की नई कसौटी की खोज कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे अफ्रीका और अमरीका की अश्वेत जातियों के साहित्य से भी प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। काव्यभाषा में भी इससे सुनिश्चित परिवर्तन आया है, क्योंकि दलित साहित्य मनोरंजन और आनंद के लिए नहीं, समाज को झकझोरने और जगाने के लिए लिखा जा रहा है। इसीलिए कभी-कभी उसका तेवर प्रगतिशील और जनपक्षीय साहित्य के अन्य आंदोलनों के समान प्रतीत होता है।

म्लेच्छ, अछूत, दस्यु, दास तथा और न जाने कितने गालीवाचक शब्दों से पुकारी गई जातियों ने दलित साहित्य (दलितों द्वारा रचित, दलित चेतना संपन्न साहित्य) के रूप में अपने ’अनुभव’ को उच्च वर्ण के साहित्यकारों के ’अनुमान’ की तुलना में मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करने में सफलता पाई है। अनुभव की मुख्यता होने के कारण यह साहित्य मूलतः आत्मकथात्मक है। हिंदी में १९८० के बाद कई दलित आत्मकथाएँ आईं और चर्चित हुईं (मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल चौहान), दलित साहित्य की वार्षिकी का प्रकाशन आरंभ हुआ (जयप्रकाश कर्दमः १९९९), दलित कविता सामने आई (ओमप्रकाश वाल्मीकि, श्यौराज सिंह बेचैन, रजतरानी, सुदेश तनवीर), दलित पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ (अपेक्षा, शंबूक, युद्धरत आमआदमी), दलित उपन्यासों की रचना हुई (छप्परः जयप्रकाश कर्दमः १९९४) तथा समीक्षा के क्षेत्र में दलित विमर्श को व्यापक स्वीकृति प्राप्त हुई। इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य के इतिहास का दलित विमर्श की दृष्टि से पुनर्पाठ भी आरंभ हुआ जिसके परिणामस्वरूप भक्ति साहित्य को नई दृष्टि से व्याख्यायित किया गया तथा बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों का अध्ययन भी दलित चेतना के संदर्भ में किया जाने लगा। इसी से १९१४ में ’सरस्वती’ में प्रकाशित हीरा डोम की कविता ’अछूत की शिकायत’ को हिंदी दलित साहित्य की प्रथम रचना के रूप में स्वीकृति प्रापत हुई।

यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि फुले और अंबेडकर के प्रभाववश दलित विमर्श का यह विस्फोट सर्वप्रथम मराठी के साहित्य में दिखाई दिया। उसके बाद हिंदी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और तमिल आदि विविध भारतीय भाषाओं में गत शताब्दी के अंतिम दो दशकों में यह प्रवृत्ति क्रमशः लगगभ साथ-साथ विकसित हुई। इस साहित्यप्रवृत्ति ने साहित्य के केंद्रीय आख्यान के रूप में वर्णविरोधी आख्यान को स्थापित करने का प्रयास किया है जिससे जहाँ एक ओर दलित अस्मिता को सफलतापूर्वक रेखांकित किया जा सका है, वहीं दूसरी ओर असंतोष और आक्रोश की परिणति जातिवादी क्रोध, प्रतिहिंसा और घृणा के रूप में भी सामने आई है - जो इस आंदोलन का चिंताजनक पक्ष है। दलित राजनीति ने भी दलित साहित्यकारों को प्रभावित किया है। विशेषकर दलित पैंथर, बहुजन समाज पार्टी और द्रविड़ विचारधारा वाली पार्टियों में इन्हें अनुकूलता नजर आती है, जो स्वाभाविक भी है। मंडल आयोग संबंधी बहसों का भी दलित साहित्य पर प्रभाव पड़ा है। निश्चय ही दलित साहित्य एक नवीन सामाजिक ऐतिहासिक आख्यान की रचना कर रहा है। परंतु दलित राजनीति द्वारा उसके असंतोष और आक्रोश के अपने निहित स्वार्थ हेतु उपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

दलित साहित्य का उद्देश्य एकदम साफ है और वह हैः दलित मुक्ति। इसके लिए परंपरागत हिंदू वर्ण व्यवस्था का बहिष्कार करते हुए बाबा साहेब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था इसीलिए दलित साहित्यकारों को बौद्ध धर्म की वर्णविहीन व्यवस्था में अपने लिए पर्याप्त संभावनाएँ दिखाई देती हैं। यही कारण है कि मलयालम और तमिल समाज में दलित आंदोलन बड़ी सीमा तक हिंदू विरोध, ब्राह्मण विरोध और संस्कृत विरोध का पर्याय प्रतीत होता है। ब्राह्मण-अब्राह्मण के कट्टर भेदभाव से ग्रस्त यह समाज दलित के नाम पर समाज को नए सिरे से विघटित करके एक सर्वथा दलित वर्चस्व वाले समाज के संघटन की कल्पना करता है। मलयालम दलित चिंतक कंचा इल्लय्या जब यह घोषणा करते हैं कि बीस-तीस वर्षों के भीतर अंग्रेजी भारत की राष्ट्रभाषा बन जाएगी, हिंदू धर्म एक सामाजिक-धार्मिक शक्ति के रूप में नष्ट हो जाएगा और वेद, उपनिषद तथा गीता से प्रेरणा प्राप्त करने वाले साहित्य के स्थान पर अंबेडकरवादी दलित साहित्य सर्वव्यापी हो जाएगा, तो वे वास्तव में दलित विमर्श को स्वार्थ और घृणा की राजनीति का शिकार बनाने का प्रयास करते प्रतीत होते हैं। ऐसे चिंतक दलित साहित्य को उत्तर-आधुनिक विमर्श के बजाय उत्तर-हिंदू विमर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसके बावजूद यह सत्य है कि अंबेडकरवादी यह साहित्य दलित की मुक्ति की खोज ज्ञान की मुक्ति के रूप में करता है। ब्राह्मणवादी व्यवस्था में बुद्ध ने ज्ञान को उच्च वर्णों के शिकंजे से मुक्त कराया था तथा स्वतंत्र भारत में दलित विमर्श उसी कार्य को करना चाहता है। इसके लिए उसे संवैधानिक शक्ति भी प्राप्त है। यह हर्ष का विषय है कि अंबेडकरवादी यह आंदोलन दलितों को कलम और किताब के माध्यम से संघर्ष के लिए प्रेरित करता है और यह विश्वास करता है कि दलित साहित्य में जड़ रूढ़ जातिवादी सामाजिक संरचना को बदलने की शक्ति निहित है।

विविध भारतीय भाषाओं के साहित्य में दलित विमर्श के इस उभार के संदर्भ में जब हम ने मणिपुरी साहित्य का रुख किया तो यह रोचक तथ्य सामने आया कि अब तक विवेचित अर्थों में दलित विमर्श मणिपुरी साहित्य में सर्वथा अनुपस्थित है। इसका कारण समझने में भी देर नहीं लगी। दरअसल मणिपुरी समाज व्यवस्था में हिंदू समाज व्यवस्था जैसी वर्ण और जाति की प्रथा कभी नहीं रही। वहाँ अस्पृश्यता अथवा जातिगत भेदभाव न पहले था, न आज है। इसका अर्थ है दलित विमर्श के रूढ़ अर्थ में मणिपुरी समाज में जब दलित ही नहीं है, तो वहाँ के साहित्य में दलित विमर्श कहाँ से आएगा।

अब जरा मणिपुरी समाज के इस वैशिष्ट्य की पृष्ठभूमि को खंगाल लेना समीचीन होगा। मणिपुरी मूल समाज में हिंदू धर्म के सदृश भगवान की परिकल्पना नहीं है। वहाँ सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में ’अतिया गुरु शिदबा’ की मान्यता है। अतिया का अर्थ है आकाश जो सर्वव्यापकता का प्रतीक है तथा शिदबा का अर्थ है अमर जो शाश्वता का प्रतीक है। इस प्रकार मणिपुरी समाज में यह मान्यता है कि सर्वव्यापी और शाश्वत शक्ति के रूप में आदि गुरु ने ही सृष्टि की रचना की। गुरु शिदबा के दो पुत्र हुए, ’पाखंबा’ और ’सनामही’। इन दोनों के सात पुत्रों से सात वंश या गोत्र निर्मित हुए, जिनके नाम पर सात राज्य थे। बाद में इन वंशों के अनेक उपवंश बन गए जिनका आगे चलकर एकीकरण होने पर मोइराङ् तथा ’कङ्ला’ नामक दो वंश बने। बाद में ये दोनों भी एकीकृत हो गए और इस तरह एक ही राजवंश बचाः कङ्ला। यह कङ्ला ही आधुनिक मणिपुर है। (कङ् का अर्थ है सूखना तथा लैबक का अर्थ है भूमि। इस प्रकार कङ्ला सूखी भूमि का वाचक है।) इस रूप में लगभग चार-पाँच शताब्दी पूर्व एकीकृत हुए मणिपुर में जाति-पांति के आधार पर किसी भी प्रकार की ऊँच-नीच नहीं थी और न ही वैसा शोषण और दमन था जिसकी चर्चा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की शिकार दलित जातियाँ करती है। अर्थात शेष भारत जैसी वर्णव्यवस्था की विकृतियाँ मणिपुरी समाज में कभी नहीं रहीं, आज भी नहीं हैं।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है १३वीं-१४वीं शती में जब मणिपुर में वैष्णव धर्म का प्रवेश हुआ तो पहले-पहल रामानंदी संप्रदाय यहाँ आया। संभवतः ’जाति-पांति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’ के दर्शन में व्यावहारिक रूप से विश्वास करने के कारण ही यह संप्रदाय मणिपुरी समाज को रास आया होगा तथा व्यापक तौर पर वैष्णव धर्म का यहाँ प्रचार हो सका होगा। इतना ही नहीं, बाद में जब बंगाल से गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय मणिपुर पहुँचा तो उसके प्रचारकों ने यहाँ जाति व्यवस्था चलाने का प्रयास भी किया परंतु मणिपुरी समाज के अपने संस्कार इतने प्रबल थे कि जातिगत भेदभाव और छुआछूत यहाँ जड़ नहीं जमा सकी।

यदि सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग होकर विचार करें तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि आर्थिक और राजनैतिक कारणों से वर्ग भेद मणिपुरी समाज में अवश्य उपस्थित है। ध्यान रहे कि जाति और वर्ण सांस्कृतिक प्रत्यय हैं जबकि वर्ग राजनैतिक-धनिकों द्वारा निर्मित श्रेणी है। आर्थिक वर्ग भेद के कारण उच्च वर्ग जिस प्रकार अन्यत्र निम्न वर्ग का शोषण करता रहा है, मणिपुर भी उसका अपवाद नहीं है। अर्थात शोषित-दमित वर्ग यहाँ भी है परंतु उसे दलित विमर्श के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता, अन्यथा ’दलित’ शब्द की परिभाषा को बदलकर उसे शोषित के व्यापक अर्थ में रखना होगा। राजनैतिक और आर्थिक लाभ उठाने की दृष्टि से दक्षिण मणिपुर ’ककचिङ्’ क्षेत्र के अनेक वर्गों ने स्वयं को अनुसूचित प्रमाणित करवा लिया है परंतु वे उस प्रकार के सामाजिक तिरस्कार के पात्र कभी नहीं रहे जिसका अनुभव हिंदू व्यवस्था के हरिजनों-गिरिजनों को है।

यह भी ध्यान देने की बात है कि जिन्होंने अपने-आपको अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्य पिछड़ी जातियों में सम्मिलित कर-करा लिया है, मणिपुर में उनकी भी शादियाँ गैर अनुसूचितों और गैर पिछड़ों में होती हैं अर्थात आरक्षण की राजनीति के बावजूद रोटी-बेटी का संबंध समाज के सभी वर्गों के बीच विद्यमान है। यदि नृवंशशास्त्रीय पक्ष की चर्चा करें तो यह भी उल्लेखनीय है कि मणिपुर में पुराने जमान से सात मीतै राजन्य वर्गों के अलावा नौ गिरिजन वंश भी रहे हैं। लेकन इनके बीच भी जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव कभी नहीं रहा तथा रोटी-बेटी का संबंध इन वंशों के बीच बिना भेदभाव के रहा है। एक और बात ध्यान देने वाली है कि जहाँ शेष भारत में प्रायः बौद्धों की गिनती दलित और पिछड़ों में की जाती है, वहीं मणिपुर में बौद्धधर्मावलंबी भी दलित नहीं हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि मणिपुर में दलन, दमन और शोषण का इतिहास समाजशास्त्रीयता की अपेक्षा राजनीति और प्रशासन से संचालित है। इस प्रकार के दलन, दमन और शोषण का सक्रिय प्रतिरोध और विरोध करने वाले २८ उग्रवादी और प्रतिउग्रवादी संगठन मणिपुर में सक्रिय हैं। लेकिन इन संगठनों का कोई टकराव समाज के किसी वर्ग (जाति या वर्ण) के साथ नहीं है। बल्कि इनका टकराव राजनैतिक, प्रशासनिक, सैनिक और सुरक्षा व्यवस्था से है जिसे ये मणिपुरी समाज के शोषक के रूप में देखते हैं। इसके अलावा मणिपुर में पुराने और अत्याधुनिक मूल्यों का टकराव भी पीढ़ियों के टकराव के रूप में देखा जा सकता है। इस टकराव की साहित्यिक परिणति भी मणिपुरी भाषा के युवा साहित्य अथवा क्रुद्ध साहित्य में अत्यधिक तीव्रता के साथ हुई है। परंतु उसे दलित विमर्श का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

दलित विमर्श के अंतर्गत ही प्रायः स्त्री विमर्श की चर्चा भी की जाती है। मणिपुर के संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि यहाँ स्त्रियाँ शेष भारत की अपेक्षा सदा ही बेहतर स्थिति में, जागरूक, संघर्षशील, शक्ति संपन्न तथा परिवार से लेकर समाज तक के निर्णयों को प्रभावित करने में सक्षम और आंदोलनधर्मी रही हैं। मणिपुरी भाषा के साहित्य में मणिपुरी स्त्री की यह छवि देखी जा सकती है।
यहाँ सहज ही प्रश्न उठता है कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की भाषाओं के साहित्य में दलित विमर्श की क्या स्थिति है। उल्लेखनीय है कि असम का समाज बड़ी सीमा तक जातिवादी है तथा जातिवादी बंधन यहाँ उत्तर भारत से भी उग्र है। इसीलिए असमिया साहित्य में दलित विमर्श उपलब्ध है। त्रिपुरा में भी जहाँ बंगाल का प्रभाव है वहाँ जातिभेद है; और जातिवादी दलन भी। परिणामस्वरूप दलित विमर्श का साहित्य भी वहाँ हैं। इसी प्रकार नेपाल के प्रभाववश सिक्किम में जाति व्यवस्था आज भी अत्यंत दृढ़ है तथा छुआछूत और अंधविश्वास व्याप्त है। वहाँ के साहित्य में भी दलित विमर्श का उभार स्वाभाविक है।

मणिपुर की भांति अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय और नगालैंड में जाति भेद न होने के कारण वहाँ के साहित्य में दलित विमर्श नहीं है। यहाँ इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि नगालैंड में जनजाति की व्यवस्था अभी भी सभ्यता की आदिम अवस्था में सुरक्षित है और उनकी अपनी जनजातीय संस्थाएँ है जिनमें वर्ण या जातिगत सामाजिक अन्याय और भेदभाव की कोई अवधारणा ही नहीं है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि सभ्यता की आदिम व्यवस्था में वर्ण या जाति की संकल्पना के लिए कोई स्थान नहीं था।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य में दलित विमर्श के व्यापक प्रचलन का मूल कारण जाति और वर्ण पर आधारित सामाजिक भेदभाव रहा है तथा जिन समाजों में इस प्रकार का भेदभाव नहीं पाया जाता वहाँ दलित विमर्श अनुपस्थित है। यहाँ मैं यह जोड़ना चाहूँगा कि यदि दलित विमर्श और दलित साहित्य का उद्देश्य जाति का उन्मूलन करना तथा बिना जातिगत आधार वाले समाज का निर्माण करना है तो साहित्यकारों, विशेषकर दलित साहित्यकारों, को मणिपुरी समाज का अध्ययन करना चाहिए। वर्णविहीन समाज के साथ-साथ मणिपुर का समाज स्त्री सशक्तीकरण के दृष्टि से भी विशेष स्थान का अधिकारी है। साहित्यकारों को इस बात की ओर भी ध्यान देना चाहिए कि दलित स्त्री को मणिपुरी स्त्री का ’रोल मॉड’ दिया जा सकता है। दमन और दलन के वर्णेतर स्वरूप और उसके प्रतिकार को भी यदि आधुनिक भारतीय साहित्य के एक सरोकार के रूप में रेखांकित किया जाए तो इसके लिए भी मणिपुरी साहित्य का निकट से अनुशीलन अपेक्षित है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि साहित्य का उद्देश्य कभी भी सामाजिक घृणा और प्रतिहिंसा का प्रचार करके समाज को विघटित करना नहीं हो सकता। बल्कि उसे सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। दलित साहित्य से भी मानवमात्र की यही अपेक्षा है। इसीलिए सामाजिक न्याय पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना की दृष्टि से दलित साहित्यकारों को मणिपुरी भाषा और साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन अवश्य करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि जातिविहीन समाज व्यवस्था का जीवंत मॉडल आज भी मणिपुरी समाज में व्यवहार में है जिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में दलित साहित्य द्वारा उभारा जा सकता है और प्रतिपादित किया जा सकता है कि जाति उन्मूलन असंभव नहीं है।

भारतीय चिंतन परंपरा और ‘सप्तपर्णा’

महादेवी वर्मा (1907 ई.) का संपूर्ण साहित्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित है। उनके गीतों में भारत के जातीय साहित्य की परंपराओं की ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं। संस्कृत और पालि भाषा के साहित्य के माध्यम से उन्होंने इस देश की चिंतन परंपरा को आत्मसात करके ही अपने कवि व्यक्तित्व का निर्माण किया है। मौलिक रचनाकार के अलावा उनका एक रूप सृजनात्मक अनुवादक का भी है जिसके दर्शन उनकी अनुवाद-कृत ‘सप्तकर्णा’ (1960) में होते हैं। अपनी सांस्कृतिक चेतना के सहारे उन्होंने वेद, रामायण, थेर गाथा तथा अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की कृतियों से तादात्म्य स्थापित करके 39 चयनित महत्वपूर्ण अंशों का हिन्दी काव्यानुवाद इस कृति में प्रस्तुत किया है। आरंभ में 61 पृष्ठीय ‘अपनी बात’ में उन्होंने भारतीय मनीषा और साहित्य की इस अमूल्य धरोहर के संबंध में गहन शोधपूर्ण विमर्ष किया है जो केवल स्त्री-लेखन को ही नहीं हिंदी के समग्र चिंतनपरक और ललित लेखन को समृद्ध करता है। संस्कृति और साहित्य के परस्पर संबंध की तार्किकता का प्रतिपादन करते हुए महादेवी कहती हैं कि एक विशेष भू-खण्ड में जन्म और विकास पाने वाले मानव को अपनी धरती से पार्थिव अस्तित्व ही नहीं प्राप्त होता, उसे अपने परिवेश से विशेष बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता का दाय भी अनायास उपलब्ध हो जाता है। इतना ही नहीं, वे तो यहाँ तक मानती हैं कि मनुष्य की रागात्मक वृत्तियों का संघात ही उसके सौंदर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से संपृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।

जहाँ तक परिवर्तन का प्रश्न है, मनुष्य के पार्थिव परिवेश में भी निरंतर परिवर्तन होता रहता है और उसके जीवन में भी। जैसा कि महादेवी कहती हैं, जहाँ किसी युग में ऊँचे पर्वत थे,वहाँ आज गहरा समुद्र है और जहाँ आज अथाह सागर लहरा रहा है, वहाँ किसी भावी युग में दुर्लंघ्य पर्वत सिर उठा कर खड़ा हो सकता है। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन ने भी सफल-असफल संघर्षों के बीच जाग कर, सोकर, चलकर, बैठकर, यात्रा के असंख्य आयाम पार किए हैं। पर न किसी भौगोलिक परिवर्तन से धरती की पार्थिव एकसूत्रता खंडित हुई है, न परिवेश और जीवन की चिर नवीन स्थितियों में मनुष्य अतीत-बसेरों की स्मृति भूला है।

यहाँ विचारणीय है कि हमारा विशाल देश, असंख्य परिवर्तन सँभालने वाली अखंड भौगोलिक पीठिका की दृष्टि से विशेष व्यक्तित्व रखता है। मनुष्य जाति के बौद्धिक और रागात्मक विकास ने उस पर जो अमिट चरणचिह्न छोड़े हैं, उन्होंने इसके सब ओर महिमा की विशेष परिधि खींच दी है। यह विशेष परिधि ही भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की द्योतक है। इसे दर्शन, धर्म और साहित्य के माध्यम से व्यक्त चिंतन परंपरा के रूप में भी देखा जा सकता है। इन तीनों में जहाँ दर्शन पूर्ण होने का दावा कर सकता है और धर्म अपने निर्भ्रांत होने की घोषणा कर सकता है, वहीं साहित्य मनुष्य की शक्ति-दुर्बलता, जय-पराजय, हास-अश्रु और जीवन-मृत्यु की कथा होने के कारण मनुष्य रूप में अवतरित होने पर स्वयं ईश्वर को भी पूर्ण मानना अस्वीकार कर सकता है। साहित्य की धारा सभ्यता के आदिकाल से प्रवाहित है तथा अनेक परिवर्तनों से गुजरकर अपनी क्षण-क्षण अभिनवता में जीवंत रहती है। जिस प्रकार नदी के एक होने का कारण उसका पुरातन जल नहीं, नवीन तरंगभंगिमा है, उसी प्रकार साहित्य भी निरंतर प्रवाहमान होने के कारण ही ताजगी से भरपूर है।

इस दृष्टि से भारतीय साहित्य की परीक्षा करने पर उसमें काल, स्थिति, जीवन,समाज, भाषा, धर्म आदि से संबंध रखनेवाले अनंत परिवर्तनों की भीड़ में भी एक ऐसी तारतम्यता मिलती है जिसके अभाव में किसी परिवर्तन की स्थिति संभव नहीं रहती। महादेवी वर्मा ने इस तारतम्यता की खोज करते हुए माना है कि साहित्य में संस्कृति की प्राचीनतम अभिव्यक्ति वेद-साहित्य के अतिरिक्त अन्य नहीं है तथा सहस्रों वर्षों के व्यवधान के उपरांत भी भारतीय चिंतन, अनुभूति, सौंदर्यबोध और आस्था में उसके चिह्न अमिट हैं। वैदिक साहित्य में जल, स्थल, अंतरिक्ष, आकाश आदि में व्याप्त शक्तियों की रूपात्मक अनुभूति और उनके रागात्मक अभिनंदन में वे काव्य और कलाओं के विकास के संकेतों को निहित मानती हैं। जैसे

रक्ताभ श्वेत अश्वों को जोते रथ में,
प्राची की तन्वी आई नभ के पथ में,
गृह गृह पावक पग पग किरणों से रंजित!
आ रही उषा ज्योतिःस्मित! (ऋग्वेद)

इसमें संदेह नहीं कि भारतीय जीवन में स्थूल बौद्धिक प्रक्रिया से लेकर गंभीर रागात्मकता तक जो विशेषताएँ हैं, उनका तत्वतः अनुसंधान हमें किसी न किसी पथ से इस बृहत् जीवन-कोष के ही समीप पहुँचता है।

महादेवी जी, वेद-साहित्य को धर्म-विशेष के परिचायक ग्रंथ-समूह के संकीर्ण अर्थ में नहीं ग्रहण करतीं। उनके अनुसार उसमें न किसी धर्म-विशेष के संस्थापक के प्रवचनों का संग्रह है और न किसी एक धर्म की आचार-पद्धति या मतवाद का प्रतिष्ठापन या प्रतिपादन। वह तो अनेक युगों के अनेक तत्वचिंतक ज्ञानियों और क्रांतद्रष्टा कवियों की स्वानुभूतियों का संघात है। समझने की बात यह है कि मनुष्य की प्रज्ञा की जैसी विविधता और उसके हृदय की जैसी रागात्मक समृद्धि वेद-साहित्य में प्राप्त है, वह मनुष्य को न एकांगी दृष्टि दे सकती है न अंधविश्वास। इस साहित्य संपदा के काल के संबंध में इतना तो तय है कि यह जिस रूप में हमें उपलब्ध है, उस तक पहुँचने में वेदकालीन मनीषा को विशाल समय सागर पार करना पड़ा होगा। महादेवी के इस तर्क में दम है कि भाषा, छंद, चित्रात्मक भाव, गहन विचार-सरणि आदि से यह किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता कि वह जीवन का तुतला उपक्रम है। वे इसे मानवता के तारुण्य का ऐसा उच्छल प्रपात मानती हैं जो अपने दुर्वार वेग को रोकने वाली शिलाओं पर निर्मम आघात करता और मार्ग देने वाली कोमल धरती को स्नेह से भेंटता हुआ आगे बढ़ता है। यह तारुण्य जीवन से विरक्त नहीं होता, संघर्ष से पराजय नहीं मानता, प्रतिकूल परिस्थितियों से पराङ्मुख नहीं होता और कर्म को किसी कल्पित स्वर्ग नरक का प्रवेशपत्र नहीं बनाता। उनके मतानुसार इस समस्त वैदिक चिंतन के मूल में ऋत या उस सनातन नियम का बोध निहित है जिससे सृष्टि का समग्र जड़-चेतन व्यापार नियमित और संचालित होता है।

चारों वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषदों तक फैले वैदिक साहित्य के स्रष्टा ऋषि,जो नियम सृष्टि को संचालित करते हैं, उनके द्रष्टा मात्र हैं। इस साहित्य के अनुशीलन से पता चलता है कि वेद काल का मानव भौतिक जीवन का भावुक कलाकार ही नहीं, आत्मा का अथक शिल्पी भी है। प्रकृति में उसका सौंदर्य-दर्शन केवल कोमल मधुर तत्वों तक ही सीमित नहीं है,वरन् वह उग्र और रुद्र रूपों में भी आकर्षण का अनुभव करता है। यही कारण है कि उषा सूक्त में उषा की दीप्त छवि अंकित करने में जिस कुशलता का उपयोग हुआ है, वही नासदीय सूक्त में जिज्ञासाओं को सार्थक वाणी दे सकी है। जिस भक्तिजनित तन्मयता से ऋत् के रक्षक वरुण की वंदना की गई है, उसी के साथ इंद्र के वज्र-निर्घोष का भी आह्वान किया गया है। वैदिक ऋषि अपने आपको ‘पृथिवीपुत्रकी संज्ञा देकर धरती के वरदानों को जैसा आदर देता है, ‘आत्मा का विनाश नहीं होतास्वीकार कर वह अखंड चेतना के प्रति भी वैसा ही विश्वास प्रकट करता है। इतना ही नहीं, किसी अन्य युग के काव्य में जिन्हें स्थान मिलना कठिन है, उन विषयों को भी छंदायित करने में ऋषि की प्रतिभा कुंठित नहीं हुई। उलूक, दादुर, ऊखल, श्वान आदि ऐसे ही विषय है।

वैदिक साहित्य में प्रकृति के दैवीकरण की व्याख्या करते हुए महादेवी कहती हैं कि सूर्य,उषा, वरुण आदि आकाश में सबसे ऊँची स्थिति रखने के कारण सृष्टि का नियमन और संचालन करते हैं। दूसरी ओर वायुमंडल में स्थिति रखनेवाले इंद्र, मरुत आदि उथल-पुथल उत्पन्न करके भी जल-वृष्टि से पृथ्वी को उर्वर बनाते हैं। इनके साथ ही, अग्नि और सोम की पृथ्वी पर इतनी उपयोगी स्थिति थी कि वे पृथ्वी के ही देव मान लिए गए। यथा, अग्नि और पृथ्वी की ये स्तुतियाँ अत्यंत अर्थपूर्ण हैं -

छूट धनुष से फैल गये,
जैसे दिशि दिशि में बाण,
त्यों फैले स्फलिंग तुम्हारे,
अहे अर्चि - संधान! (ऋग्वेद)

अक्षय जल अक्षय होने के हित लाये हम,
अमर अग्नि के साथ अजर गृह में आये हम!। (अथर्ववेद)

तेरा जो शुभ गंध मिला औषधि, जल-कण में,
अप्सरियाँ गंधर्व जिसे रखते निज तन में,
उस सौरभ से गात हमारा तू सुरभित कर,
पड़े किसी की द्वेष-दृष्टि ओ जननि न हम पर। (अथर्ववेद)

भारतीय चिंतन परंपरा के सूत्रों को जोड़ते हुए कहा जा सकता है कि वेद-साहित्य की चिंतन-पद्धति ने यदि भारतीय चिंतन को दिशा-ज्ञान दिया है तो उसकी रागात्मक अनुभूति ने भावी युगों की काव्य-कलाओं में स्पंदन जगाया है। प्रकृति से रागात्मक संबंध, उस पर चेतन व्यक्तित्व का आरोप, रहस्य को व्यक्त करनेवाली जटिल उक्तियाँ, भक्तिजनित आत्म-निवेदन आदि बिना कोई संस्कार छोड़े हुए अंतर्हित हो गए, यह समझना मानव-चेतना की संश्लिष्टता पर अविश्वास करना होगा। रात्रि को भी वैदिक ऋषि ने माता के रूप में संबोधित किया है -

माता रात्रि! सौंप जाना तू
हमें उषा के संरक्षण में,
उषा हमें फिर, तुझे सौंप दे
संध्या समय विदा के क्षण में! (अथर्ववेद)

वेद काल के पट-परिवर्तन पर महादेवी की दृष्टि जिस कवि-मनीषी और उसकी कृति पर सबसे पहले पड़ी है, उन्हें भारतीय प्रतिभा ने आदिकवि और आदिकाव्य की सार्थक संज्ञा दी है। सभ्यता की यात्रा में जब नरमेध, गोमेध, अश्वमेध आदि के महारव से भरे हुए, हमारे कर्णरंध्रों में क्षुद्र क्रौंच की दीन क्रंदन-ध्वनि प्रवेश पा लेती है, तब हम चौंक उठते हैं। यह लौकिक काव्य के प्रजनन का क्षण है। निस्संदेह वाल्मीकि की यथार्थवादी, मर्मभेदी दृष्टि वेदकालीन ऋषि की दृष्टि से भी भिन्न है और मध्ययुगीन भक्त की दृष्टि से भी, क्योंकि सामान्यतः एक में जीवन के विविध अभावों की पूर्ति के लिए देव या देव-समूह की प्रसन्नता की अपेक्षा रहती है तो दूसरी में भवसागर-संतरण के लिए इष्ट के अनुग्रह की याचना। इन दोनों से स्वतंत्र, वाल्मीकि की चेतना मनुष्य की विजय-घोषणा के लिए एक ऐसे श्रेष्ठ मानव की उद्भावना करती है, जिससे अपने लिए उसे किसी लौकिक या पारलौकिक दान की न अपेक्षा है, न आवश्यकता।

महादेवी ने इस बात पर भी पर्याप्त बल दिया है कि वाल्मीकि वैदिक ऋषियों के समान कुल-परंपरा से ऋषि नहीं थे, बल्कि अपने दृढ़ संकल्प और उसके अनुरूप कठोर साधना से ही उन्होंने ऋषित्व की प्राप्ति की। इसका अर्थ है कि राम का चरित्र जिस धातु से बना है उसी से राम कथा के कवि का भी निर्माण हुआ होगा। तभी तो उनके राम यह कह सके -

बंधु हों मेरे सुखी
हो क्षेम-मंगल-योग
शपथ आयुष की
यही बस राज्य का उपयोग। (भरत-मिलन/रामायण)

इतना ही नहीं, महादेवी ने यह भी लक्षित किया है कि विद्रोही आदिकवि की करुणार्द्र दृष्टि के आकर्षण से उषा, मरुत् आदि के दिव्य रूपों में आकाशचारिणी प्रकृति अपने धूलि के देश और तृणों के कुटीर में लौट आई। जिससे महाकाव्य के अंग के रूप में प्रकृति-वर्णन, ऋतु-वर्णन आदि की परंपरा का सूत्रपात हुआ। हेमंत ऋतु का वर्णन करते हुए कवि की उत्प्रेक्षा द्रष्टव्य है -

दक्षिण दिशिचारी रवि से -
है उत्तर दिशा विहीन,
तिलकहीन बाला सी उसकी
हुई कांति छविहीन। (हेमंत वर्णन/रामायण)

काव्य की दृष्टि से आदिकवि के उत्तराधिकारियों में अश्वघोष और कालिदास को प्रमुख माना जाता है, परंतु जैसा कि महादेवी वर्मा ने बताया है, आदिकाव्य और उक्त महाकवियों की रचनाओं के बीच में बौद्धधर्म विषयक पालि वाङ्मय का इतना विस्तार है जिसे पार किए बिना हम उन तक नहीं पहुँच सकते। महादेवी ने प्राचीन साहित्य का अनुशीलन सर्वथा धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि भाषा, धर्म-सिद्धांत आदि की दृष्टि से भिन्न होने पर भी पालि वाङ्मय, अपनी आत्मा में भारतीय होने के कारण, भारतीय साहित्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम है।

पालि वाङ्मय के अंतर्गत त्रिपिटक में बौद्ध धर्म संबंधी साहित्य की विषय-क्रमानुसार तीन मंजूषाएँ संगृहीत है - विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। इनमें साहित्य की दृष्टि से सुत्तपिटक को ही महादेवी ने सर्वसाधारण के लिए महत्वपूर्ण माना है, क्योंकि उसमें धम्मपद,जातक कथाएँ, थेर-थेरी गाथाएँ जैसी कृतियाँ शामिल हैं, जिनके अभाव में हमारे साहित्य का इतिहास अधूरा रह जाता है। महादेवी जी याद दिलाती हैं कि हमारा साहित्य गीत की दृष्टि से विशेष समृद्ध रहा है तथा वीतराग भिक्षु-भिक्षुणियों के ये गीत हमारी अटूट गीत-परंपरा की उज्ज्वल कड़ियाँ हैं। उन्होंने विस्तार से इस तथ्य को उभारा है कि इन थेर गाथाओं में मुखर हो उठने वाले हृदय कितने विविध हैं! कोई राजकुमार है कोई दासीपुत्र, कोई ब्राह्मण है कोई शूद्र,कोई साध्वी है कोई नगरवधू, कोई महिषी है और कोई क्रीत सेविका। कोई प्रिय पत्नी से वियुक्त है, कोई माता पिता से। कोई विलास-वैभव की एकरसता से थक कर आया है, कोई कठोर परिश्रम की विविध चोटों से आहत होकर। सारांश यह कि विविध वर्ण, परिवार और परिस्थितियों के भुक्तभोग इन छंदों में अपनी कथाएँ गूँथते हैं। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने के कारण इन भिक्षुओं के गीतों में स्वानुभूतिजन्य वैविध्य मिलता है। उदाहरण के लिए जो राज्य-सुख छोड़कर आया है वह अपरिग्रह को अधिक महत्व देता है, जो कठोर श्रम करके आया है वह श्रमिक जीवन की वेदना के विषय में अधिक कहता है। जो उच्च वर्ण से संबद्ध है वह ज्ञान और तप की विशेषता की चर्चा अधिक करता है, जो शूद्र कुल से आया है वह समानता को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। जो दास रह चुका है वह मुक्ति की अधिक प्रशस्ति करता है, जो स्वामी रह चुका है वह पर-पीड़न की अधिक निंदा करता है। इसीलिए महादेवी ने माना है कि इन गाथाओं में हमें तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का जैसा परिचय और उसमें पोषित मानव-जीवन का जैसा चित्र प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। वे यह भी बताती हैं कि जिन भिक्षु-भिक्षुणियों के गीत उपलब्ध हैं, उनकी संख्या क्रमशः २६५ और ७३ के लगभग है। कतिपय उदाहरण :

पर्वत की सरिता को तजकर,
आज नहीं अवसर प्रवास का,
रम्य यहीं है वास क्षेमकर,
क्षेम मयी यह नदी सुहाती! (धम्मिको थेरो)

नव किशलय दल से युक्त द्रुमाली
लगती है अंगार - अरुण,
इन तरुओं ने अब त्याग दिये,
वे जीर्ण पत्र के शीर्ण वसन।
कोपलें लाल सी अगणित ले
ये अर्चिष्मान हुए भासित! (दसनिपात)

पुष्ट उन्नत यह मेरा वक्ष
कभी था सुगठित और सुगोल,
जलरहित चर्म-थैलियों तुल्य
जरा से है अवनत बेडौल।
सत्यवादी के मृषा न बोल। (अंबपाली)

सांस्कृतिक चिंतन प्रवाह में इस साहित्य की महत्ता का मूल्यांकन करने के लिए यह तथ्य काफी है कि स्तुतिपरक और दिव्यज्ञानसंभूत वेद-गीतों से ये गीत सर्वथा भिन्न प्रतीत होते हैं,परंतु ज्ञान की महिमा, जीवन की यथार्थ पृष्ठभूमि के संगीत तथा प्रकृति के प्रति रागात्मकता के कारण ये तत्वतः वेदगीतों के निकट पहुँचते हैं, अतः ये भी एक ही मूल भावधारा के विकास के सोपान हैं। भारतीय प्रतिभा प्रकृति के प्रति सनातन रागमयी है, इसका निश्चित प्रमाण इन वीतराग भिक्षुओं की गाथाएँ हैं। वेदकालीन कवि ऋषि तो प्रकृति के प्रति साधिकार राग रखता है,क्योंकि वह उसे माया या भ्रांति नहीं मानता। जीवन के दुःखमय दर्शन की न उसने खोज की है और न उस दुःख से मुक्ति की कामना उसकी जानी पहचानी हैं। इसके विपरीत बौद्ध भिक्षु सौंदर्य को नश्वर और भ्रांति मानता है। उसके निकट जीवन दुःख का दूसरा नाम है। न वह मधुर संगीत पर मुग्ध होने का अधिकार रखता है, न सुंदर चित्र की रंगरेखाओं में स्वयं को भुला सकता है। परंतु इन गीतों को देखने से पता चलता है कि प्रकृति ने उसकी समस्त साधना पर विजय पा ली - संभवतः उसके अनजाने ही।

इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि कुशल संगीतज्ञ, कवि, दार्शनिक और महायान के प्रवर्तकों में महत्वपूर्ण स्थिति रखने वाले अश्वघोष संस्कृत महाकाव्यकारों में प्रथम भक्त कवि हैं, जिनके निकट उनका कथानायक लोकोत्तर ही नहीं, एकमात्र उपास्य भी है। तुलनात्मक अनुशीलन करते हुए महादेवी ने दिखाया है कि आदिकवि को राम के लोकोत्तर गुणों ने आकर्षित अवश्य किया था, किंतु वे राम के अनन्य भक्त नहीं हैं तथा कालिदास की विस्तृत काव्य-चित्रशाला में भी ऐसा कोई पात्र नहीं मिलता जिसे कवि का एकमात्र इष्ट कहा जा सके। परंतु अश्वघोष (ई. पू. पहली शती) के बुद्ध कथानायक भी हैं और उपास्य भी। उनकी साहित्यिक कृतियों के रूप में बुद्धचरित,सौंदरनंद (दो महाकाव्य) और सारिपुत्र प्रकरण के कुछ अंश उपलब्ध हैं।सप्तपर्णामें सम्मिलित अश्वघोष की कुछ काव्य पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना उचित होगा। यथा -

आज उज्ज्वल तिलक -
द्रुम को भेंट कर यह
पीतवर्ण रसाल -
शाखा यों सुशोभित,
शुभ्र वेशी पुरुष के
ज्यों संग नारी
पीत केसर - अंग -
रागों से प्रसाधित। (वसंत वर्णन/बुद्धचरित)

तेजकांति से युक्त वपुष को
देख देख कर वे महिला जन,
‘इसकी भार्या धन्य हुई है
कहती थीं, पर शुद्ध-भाव-मन। (बुद्धचरित)

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि अश्वघोष के पास कवि का संवेदनशील हृदय भी है और संसार को दुःखात्मक और त्याज्य माननेवाला दर्शन भी।

अश्वघोष के बाद सप्तपर्णामें कालिदास को ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखा गया है जिसे भारत की वाग्देवता संचारिणी दीपशिखा के समान उद्भासित करके फिर अतीत के अंधकार में नहीं छोड़ जा सकी। उनके काव्यों की चमत्कारिक असाधारणता पर मुग्ध लोक, मानो अपने विस्मय को व्यक्त करने के लिए ही उनपर चरम मूर्खता का आरोप करने में भी कुंठित नहीं हुआ। सत्य न होते हुए भी ऐसी किंवदंतियाँ उनकी लोकोत्तर प्रतिभा की स्वीकृति-मात्र हैं। ऐतिहासिक परिस्थतियों की विवेचना से पता चलता है कि कालिदास के समय (चौथी शताब्दी के आसपास) तक भारतीय जीवन और समाज में एक स्थिर सौंदर्य आ चुका था। महाभारत काल की चरम स्वच्छंदता और उसकी चरम ध्वंस में परिणति, बौद्ध युग का चरम बंधन और वज्रयान में उसकी चरम मुक्ति के शिखर और गर्त पार करके जीवन-प्रवाह समतल भूमि पर आ गया था और यह सत्य है कि समतल पर मंथर जल का एक प्रशांत उदार सौंदर्य होता है। इसीलिए हम देख सकते हैं कि कालिदास ने जीवन की गतिशीलता के मर्म और उसके विविध सौंदर्य की अनुभूति ही नहीं प्राप्त की, उस अनुभूति के सत्य को, राग-रस-रंगमयी वाणी भी दी। इनकी कृतियों में मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञान शाकुंतल (तीन नाटक) तथा ऋतुसंहार, मेघदूत,कुमारसंभव और रघुवंश (चार काव्य) उपलब्ध हैं। द्रष्टव्य है कि कालिदास में विद्रोह का स्वर नहीं है, वे केवल सौंदर्य और विलास के कवि हैं। इसका कारण बताते हुए महादेवी ने कहा है कि कालिदास का समय निर्माण का युग था। विद्रोह के स्वर की न कवि को आवश्यकता थी, न समाज को। वे आगे स्पष्ट करती हैं कि कालिदास सौंदर्य और प्रेम के अमर गायक हैं, किंतु उनकी कृतियों में व्यक्त सौंदर्य और प्रेम के द्वंद्व को किसी प्रचलित रूढ़भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वे मानती हैं कि चमत्कारिक बाह्य रंग-रेखाओं में व्यक्त सौंदर्य, जिसका परिचय मोहमुग्ध कर देता है, कवि का लक्ष्य नहीं, क्योंकि वह असाधारण सौंदर्य तब तक बार-बार असफल होता रहता है, जब तक उसकी असाधारण तथा अपरिचित रेखाएँ साधारण और परिचित नहीं हो जातीं और उनमें जीवन के तरल-करुण रंग नहीं छलकने लगते। इन तरल-करुण रंगों के सहारे कालिदास सीधे वाल्मीकि के सौंदर्यबोध की परंपरा से जुड़ जाते हैं।

इसी प्रकार वैदिक साहित्य से ही हम देख सकते हैं कि भारतीय काव्य में प्रकृति के उपासकों की परंपरा अविच्छिन्न और दीर्घ है। किंतु उस परंपरा में कालिदास की, अर्चना ही नहीं, देवता-विग्रह की भावना भी विशिष्ट है। उनके निकट मानव, पशु, पक्षी, नदी, निर्झर, पर्वत, शाद्वल आदि में ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी उपेक्षा की जा सके। ‘हिमालयतो खैर पार्वती के जनक हैं,इसलिए उनके प्रति कवि का विशेष लगाव है -

जब मस्तक खुजलाते हैं गज,
देवदारु से संघर्षणरत,
उनसे बहकर क्षीर सुरभिमय
कर देता शिखरों को सुरभित। (कुमारसंभव)

यहीं यह भी याद करना जरूरी है कि कालिदास की उपमाओं की विशेषता प्रख्यात है,किंतु इस विशेषता के मूल में कोई चमत्कार न होकर जीवन और प्रकृति के विविध रूपों में व्याप्त एकता की अनुभूति ही निहित है। महादेवी के अनुसार तो वस्तुतः चमत्कार का अभाव ही कालिदास की कृतियों का चमत्कार है। उनकी कृतियों में न तो जीवन असामान्य है न प्रकृति,परंतु कवि के जिस दृष्टिबिंदु पर इनका सम्मिलन होता है, वही चमत्कारिक रंगों में प्रतिफलित हो उठता है। रघुवंशऔर ‘अभिज्ञान शाकुंतलके कुछ भावपूर्ण स्थल इस संदर्भ में द्रष्टव्य हैं-

पाला था अपत्य सम जिसको
ऋषि-वधुओं ने दे नीवार,
खड़ा हुआ था वही हरिण-दल
रूँधे पर्णकुटी के द्वार।
थालों में जल पीने वाले
खग शंका से हों न अधीर,
हट जाती थीं मुनि-कन्याएँ
दे कर त्वरित् द्रुमों में नीर। (रघुवंश)

'सुमन के भी स्पर्श से जब
प्राण तन को छोड़ जाता,
मारने के हित न साधन
कौन सा पाता विधाता! (अज विलाप/रघुवंश)

स्वामिनी गृह की रहीं तुम
मंत्रणा में सचिव तत्पर,
कक्ष के एकांत में मेरी
तुम्हीं प्रिय संगिनी वर।
तुम कलाओं में ललित
मेरी रहीं शिष्या प्रवीणा,
निष्करुण यम ने तुम्हीं को
छीन क्या मेरा न छीना! (रघुवंश)

यह वही सरयू, सदा मेरे लिए जो मान्य,
धाय उत्तर कोशलों की एक जो सामान्य।
पुष्ट होते वे इसी की खेल सिकता-गोद,
वृद्धि पाते हैं मधुर पय-पान से सामोद। (रघुवंश)

आज विदा होगी शकुंतला
सोच हृदय आता है भर-भर,
दृष्टि हुई धुँधली चिंता से
रुद्ध अश्रु से कंठ रुद्धस्वर।
जब ममता से इतना विचलित
व्यथित हुआ वनवासी का मन,
तब दुहिता विछोह नूतन से
पाते कितनी व्यथा गृहीजन! (अभिज्ञान शाकुंतल)

‘साधारणको इस प्रकार ‘असाधारणबनाने की कला ही कालिदास की श्रेष्ठता का आधार है।

कालिदास के परवर्ती संस्कृत कवियों में महादेवी के अनुसार भवभूति (आठवीं शती) का व्यक्तित्व सबसे विशिष्ट है। इस विद्रोही कवि का अधिकांश जीवन संघर्ष में व्यतीत हुआ। इनके तीन नाटक उपलब्ध हैं - महावीरचरित, मालतीमाधव और उत्तररामचरित। महादेवी के अनुसार करुणा भवभूति के चिंतन का केंद्रबिंदु भी है और जीवन का सम भी, अतः किसी भी दुःखार्त के प्रति उनकी समवेदना सहज है। उन्होंने विशेष रूप से लक्षित किया है कि भवभूति के युग के समाज की नारी और शूद्र आदि के प्रति जो हीन भावना और अंध रूढ़ियों के प्रति जो निष्ठा रही होगी,उससे कवि प्रभावित नहीं जान पड़ता। उत्तररामचरितमें राम के स्वगत कथन इसका ज्वलंत प्रमाण हैं -

दलित उर को कर रहा है घोर दुख का वेग,
पर नहीं दो खंड हो जाता हृदय यह टूट।
शोक-मूर्च्छित हो रही है विकल मेरी देह,
चेतना से, किंतु यह पाती नहीं है छूट।
दग्ध करता गात मेरा तीव्र अंतर्दाह,
किंतु उसको कर न पाता वह जलाकर क्षार।
नियति मेरे मर्म पर करती कठिन आघात
काटती है, किंतु वह मेरा न जीवन-तार। (उत्तररामचरित)

सप्तपर्णाके अंतर्गत आर्षवाणी, वाल्मीकि, थेरगाथा, अश्वघोष, कालिदास और भवभूति के बाद सातवें सोपान पर महादेवी वर्मा ने जयदेव को प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने बताया है कि जयदेव (१२वीं शती का पूर्वार्द्ध) का जब आविर्भाव हुआ तब संस्कृत के श्रृंगारी काव्य के नायक-नायिका के रूप में राधाकृष्ण की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। महादेवी ने यह भी स्पष्ट किया है कि श्रृंगार-भाव जीवन की मूलप्रवृत्तियों में स्थिति रखता है, अतः अन्य मूलप्रवृत्तियों के समान उसका भी संस्कार और उदात्तीकरण स्वाभाविक है तथा जयदेव ने ‘गीत गोविंदके माध्यम से यही सांस्कृतिक दायित्व संपन्न किया है।

महादेवी परंपरा के प्रवाह की पड़ताल करते हुए बताती हैं कि भारतीय गीत साहित्य अंतरंग और बहिरंग दोनों में विविध है। इसके अंतर्गत उषा की दिव्य सुषमा से लेकर दादुर की ध्वनि तक को अपनी सीमा में सुरक्षित रखनेवाले वेदगीत हैं। भिक्षु-भिक्षुणियों के साधनामय जीवन की कथा सुनानेवाले गीतिवृत्त हैं। दैनंदिन जीवन के अतिपरिचित और क्षणिक सुख-दुःख,मिलन-विरह, पर्व-उत्सव आदि को लय के तार में गूँथ कर अक्षय माधुर्य देनेवाले लोकगीत हर साँस में मुखरित हैं। सिद्धों के गूढ़ और गुरु ज्ञान को संगीत के पंख देनेवाले मंत्रगीत भी साहित्य का महार्घ न्यास हैं। सारांश यह कि बुद्धि की जटिल प्रक्रिया से हृदय की सरल संप्रेषणीयता तक,जो कुछ भारतीय प्रतिभा संचित कर सकी, उसे उसने जीवन का छंद बना कर कंठों में सुरक्षित रखने का अथक प्रयास भी किया है। गीतगोविंद, इस अविच्छिन्न गीत परंपरा की मूल्यवान कड़ी है। यथा -

छाया सरस वसंत विपिन में,
करते श्याम विहार!
युवति जनों के संग रास रच
करते श्याम विहार!
ललित लवंग लताएँ छूकर
बहता मलय समीर;
अलि-संकुल पिक के कूजन से
मुखरित कुंज-कुटीर;
विरहि-जनों के हित दुरंत
इस ऋतुपति का संचार!
करते श्याम विहार! (गीत गोविंद)

जयदेव की कविता को श्रृंगारिक कहें या भक्ति परक - इस विवाद को अनावश्यक मानते हुए महादेवी ने प्रतिपादित किया है कि राधाकृष्ण को केंद्र बनाकर चलनेवाली श्रृंगार-उपासना और उन्हें आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक मान कर विकास करनेवाली भक्ति-भावना की संधि में जयदेव का आविर्भाव होने के कारण उन्हें दोनों का दायभाग अनायास प्राप्त हो गया।

इस प्रकार, महादेवी जी ने सप्तपर्णामें संस्कृत और पालि साहित्य के चयनित अंशों का काव्यानुवाद प्रस्तुत करते समय अपनी दृष्टि भारतीय चिंतनधारा और सौंदर्यबोध की परंपरा के इतिहास पर केंद्रित रखी है। उनकी यह कृति उन्हें एक सफल सृजनात्मक काव्यानुवादक,साहित्येतिहासकार तथा संस्कृति-चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित करने में पूर्ण समर्थ है, इसमें संदेह नहीं। अंततः कवयित्री के शब्दों में कहें तो -

भारतीय वाङ्मय की रूपमयता विविध और चेतना सर्वात्मिका है। उसमें से कुछ पंक्तियाँ लेकर उसका परिचय देना, कुछ बूँद जल लेकर समुद्र का परिचय देने के समान हो जाता है। पर यह सत्य है कि हम अपनी छोटी गंगाजली में जितना जल भर लेते हैं, उतना ही तो गंगा में नहीं होता और जितनी वर्षा से हमारा बोया बीज अंकुरित हो जाता है, उतनी ही तो मेघ के जलदान की सीमा नहीं होती।

महादेवी के असीम अवदान की तुलना में यह आलेख भी अत्यंत सीमित प्रयास भर ही तो है!