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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

व्यापारिक घराने हिंदी अपनाने पर बाध्य होंगे

साहित्यिक रपट

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं लोकार्पण समारोह संपन्न


स्थिति और परिघटना भाषा के प्रयोजन पक्ष की नियामक हैं - प्रो. दिलीप सिंह
व्यापारिक घराने हिंदी अपनाने पर बाध्य होंगे - विनोद तिवारी
साहित्य की भाषा भी विविध रूपों में प्रयोजनवती होती है - प्रो. ऋषभदेव शर्मा


हैदराबाद, 21 अप्रैल, 2009 (प्रेस विज्ञप्ति)।


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के धारवाड केंद्र में 'प्रयोजनमूलक हिंदी के नए आयाम' विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। इस अवसर पर संस्थान के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह की वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कृति 'हिंदी भाषा चिंतन' तथा उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय द्वारा प्रकाशित प्रो.. दिलीप सिंह और प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित ग्रंथ 'अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य' को लोकार्पित भी किया गया।


आरंभ में समारोह का उद्घाटन करते हुए 'माधुरी' के पूर्व संपादक विनोद तिवारी ने विश्वास दिलाया कि भावी विश्व की एक प्रबल भाषा के रूप में हिंदी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है क्योंकि तकनीकी और वैश्विक वाणिज्य के क्षेत्रों में हिंदी का निरंतर विस्तार हो रहा है। उन्होंने साहित्यिक भाषा से अधिक ध्यान प्रयोजनमूलक भाषा पर देने की माँग करते हुए कहा कि आने वाले समय में सभी व्यापारिक घरानों को हिंदी माध्यम अनिवार्य रूप से अपनाना होगा। 'अनुवाद' पत्रिका के संपादक डॉ. पूरनचंद टंडन ने विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए अनुवाद की भूमिका पर ज़ोर दिया और कहा कि शुद्धतावाद तथा छुआछूत से बचकर ही किसी भाषा का आधुनिकीकरण और विस्तार हो पाता है।


बीज वक्तव्य में प्रो. दिलीप सिंह ने विस्तारपूर्वक अलग-अलग व्यवहार क्षेत्रों में भाषा प्रयोग की चुनौतियों की चर्चा की और कहा कि अब समय आ गया है कि प्रयोजनमूलक हिंदी के विभिन्न रूपों का विवेचन और विश्लेषण स्थितियों और परिघटनाओं के परिवर्तन के संदर्भ में किया जाए।


उद्घाटन सत्र में ही संस्थान के समकुलपति आर.एफ. नीरलकट्टी ने दूरस्थ शिक्षा निदेशालय द्वारा प्रकाशित और प्रो. दिलीप सिंह एवं प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक 'अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य' को लोकार्पित किया। पुस्तक का परिचय देते हुए डॉ.. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि इसमें अनुवाद चिंतन के सभी अद्यतन और व्यावहारिक पक्षों का समावेश है।


'प्रयोजनमूलक हिंदी: ऐतिहासिक एवं सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ' विषयक प्रथम विचार सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पूर्व उपनिदेशक डॉ. दिनेश चंद्र दीक्षित ने की। डॉ.. सविता घुडकेवार, प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी, डॉ.. संजय मादार, डॉ.. साजी आर कुरुप तथा डॉ. रामप्रवेश राय ने अपने शोध पत्रों में प्रयोजनमूलकता की अवधारणा का विवेचन किया तथा पिछले चार दशकों में विभिन्न प्रयोजन क्षेत्रों के विस्तार का भी जायजा लिया।


दूसरे विचार सत्र में 'प्रयोजनमूलक हिंदी और प्रिंट मीडिया' के संबंधों का विश्लेषण किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता अंग्रेज़ी और भारतीय भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के आचार्य डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी ने की। डॉ. सुनीता मंजनबैल ने साहित्यिक पत्रिकाओं तथा डॉ.. जी. नीरजा ने दैनिक समाचार पत्रों में फल-फूल रही प्रयोजनपरक हिंदी का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत किया, तो विनोद तिवारी ने फिल्म पत्रकारिता, डॉ.. पी. श्रीनिवास राव ने खेल पत्रकारिता और डॉ. बिष्णु राय ने अन्य संदर्भों की पत्रकारिता के हिंदी भाषा पर पड़नेवाले प्रभावों की चर्चा की।


'सृजनात्मक साहित्य में प्रयोजनमूलक हिंदी के संदर्भ' पर केंद्रित तीसरे विचार सत्र की अध्यक्षता गोवा विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. बालकृष्ण शर्मा 'रोहिताश्व' ने की। इस सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने आलोचना, डॉ.. पी. राधिका ने कथा-साहित्य, डॉ.. बलविंदर कौर ने कविता, प्रो. अमर ज्योति ने संस्मरण तथा डॉ.. सूर्यकांत त्रिपाठी ने आत्मकथात्मक उपन्यासों की भाषा के प्रयोजनमूलक वैविध्यों की विस्तार से पड़ताल की। इससे प्रयोजनमूलक दृष्टि से सृजनात्मक साहित्य का विश्लेषण करने के विविध प्रारूप उभरकर सामने आए और यह स्पष्ट हुआ कि साहित्य भी भाषा का एक विशिष्ट प्रयोजन ही है जिसमें अलग-अलग विधाओं के प्रयोजनों के अनुरूप विशिष्ट भाषा का चयन किया जाता है तथा संदर्भ के अनुसार साहित्येतर विषयों की प्रयोजनपरक भाषा के समावेश द्वारा प्रामाणिकता की सिद्धि की जाती है।


चौथे विचार सत्र में 'प्रयोजनमूलक हिंदी के आनुषंगिक संदर्भ' की पड़ताल की गई जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव ने की। इस सत्र में डॉ. जयलक्ष्मी पाटिल, डॉ.. एन.लक्ष्मी, डॉ.. रेशमा नदाफ और प्रो. एस.वी.एस.एस..नारायण राजू ने कंप्यूटेशनल भाषाविज्ञान, राजभाषा, वैज्ञानिक लेखन और मीडिया लेखन के संदर्भ में उभरते हुए नए-नए भाषारूपों की विशेषताओँ पर प्रकाश डाला। विभिन्न सत्रों का संचालन प्रो. अमरज्योति, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. नारायण राजू, डॉ. सुनीता मंजन बैल और डॉ.. जयलक्ष्मी पाटिल ने किया।


दूसरे दिन सायंकाल आयोजित समापन समारोह की अध्यक्षता डॉ.. दिनेश चंद्र दीक्षित ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. जे.पी. डिमरी, प्रो. रोहिताश्व और राकेश कुमार मंचासीन हुए। डॉ.. रामप्रवेश राय और विनोद तिवारी ने संगोष्ठी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इससे
व्यावहारिक भाषा संबंधी अनेक भ्रांतियों का निराकरण हुआ है तथा विभिन्न व्यवहार क्षेत्रों में हिंदी के प्रगामी प्रयोग की दिशाएँ स्पष्ट हुई हैं। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद केंद्र के आचार्य प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर समकुलपति आर.एफ.नीरलकट्टी ने प्रो. दिलीप सिंह की सद्यःप्रकाशित कृति 'हिंदी भाषा चिंतन' का लोकार्पण किया तथा प्रो. जे.पी. डिमरी और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने लोकार्पित कृति के संबंध में समीक्षात्मक विचार प्रकट किए।


हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के निधन पर श्रद्धांजलि के साथ दो दिन का यह आयोजन समाप्त हुआ।0

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं लोकार्पण समारोह : धारवाड़

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के धारवाड़[कर्नाटक]केंद्र में आयोजित ''प्रयोजनमूलक हिंदी के नए आयाम'' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का दीप प्रज्वलन कर उद्घाटन करते हुए फिल्म पत्रिका 'माधुरी' के पूर्व सम्पादक विनोद तिवारी |

उद्घाटन सत्र में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के समकुलपति आर.एफ.नीरलकट्टी ने दिलीप सिंह और ऋषभदेव शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक ''अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य'' का लोकार्पण किया [दायें - नीचे]|

समापन सत्र में दिलीप सिंह की पुस्तक ''हिंदी भाषा चिंतन'' का भी लोकार्पण संपन्न हुआ [दायें - ऊपर]|

इस अवसर पर , साथ में उपस्थित 'अनुवाद' पत्रिका के सम्पादक पूरन चंद टंडन ,राम प्रवेश राय , इफ्लू के जगदीश प्रसाद डिमरी,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व उपनिदेशक दिनेश चन्द्र दीक्षित ,राकेश कुमार, गोवा विश्वविद्यालय के बालकृष्ण शर्मा रोहिताश्व,सचिव जे. एस. एन. पट्टनशेट्टी  तथा विभागाध्यक्ष अमर ज्योति |

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

सालारजंग संग्रहालय में जैन प्रदर्शनी

Posted by Picasa सालारजंग संग्रहालय में २६०८वीं महावीर जयंती के अवसर पर दस दिन की जैन धर्म संबंधी पुरातत्व प्रदर्शनी का उद्घाटन कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की पूर्व राज्यपाल डॉ. रमादेवी ने किया. बाद में वहीं ''वर्तमान विश्व में महावीर की अहिंसा का औचित्य''विषय पर संगोष्ठी संपन्न हुई [चित्र : 'स्वतंत्र वार्ता' से].

रविवार, 5 अप्रैल 2009

प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता*




भाषा रूपों का अध्ययन करने की आधुनिक प्रणालियों में एक यह मान कर चलती है कि प्रयोजनवती होकर ही कोई भाषा व्यापक प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है. ये प्रयोजन मोटे तौर पर दो प्रकार के हो सकते हैं.एक हैं सामान्य प्रयोजन ,जैसे दैनंदिन व्यवहार में वार्तालाप द्वारा विचारों का आदान -प्रदान . इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा को 'सामान्य प्रयोजनों की भाषा' कहा गया है. दूसरे प्रकार का सम्बन्ध विशिष्ट व्यवहार क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा रूपों से है, जैसे अलग अलग विज्ञान शाखाओं में अलग अलग भाषा रूप का प्रयोग होता है अथवा कार्यालय या प्रशासन के कामकाज को अंजाम देने के लिए खास तरह के भाषाप्रयोग में दक्ष होना ज़रूरी होता है. अलग अलग प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इन विशिष्ट भाषा रूपों को 'विशिष्ट प्रयोजनों की भाषा ' या प्रयोजनमूलक भाषा कहा जा सकता है.किसी प्रयोजनक्षेत्र की भाषा के वैशिष्ट्य के आधार पर उसकी प्रयुक्ति [रजिस्टर] का निर्धारण होता है. प्रयुक्ति विशेष के अभ्यास द्वारा उस क्षेत्रविशेष या ज्ञानशाखाविशेष के भाषिक व्यवहार में दक्ष हुआ जा सकता है. यहाँ यह भी साफ़ करना उचित होगा कि सामान्य प्रयोजन की भाषा को निष्प्रयोजन या प्रयोजनातीत नहीं कहा जा सकता ,बल्कि वह भी प्रयोजनाधारित एक प्रकार ही है. इसी तरह ललित या साहित्यिक भाषा को भी अलगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि साहित्य भी एक विशिष्ट प्रयोजन है तथा उसकी अपनी अनेक प्रयुक्तियाँ और उपप्रयुक्तियाँ हैं.

यहाँ तनिक रुक कर भारत के स्वातंत्र्योत्तर भाषिक परिवेश पर विचार करें तो पाते हैं कि यद्यपि भारत में राजभाषा के रूप में जनभाषाओं के प्रयोग का लम्बा इतिहास रहा है ,तथापि ब्रिटिश काल में उन्हें अपदस्थ करके अंग्रेजी को कार्यालय, प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया गया . ऐसा करना सर्वथा अवैज्ञानिक था परन्तु भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था. अतः स्वतंत्रताप्राप्ति के साथ ही यह आशा जगी कि अब भारत की राजभाषा हिंदी होगी.संविधान ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित कर भी दिया. लेकिन जहाँ जहाँ जिन जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था वहां वहां उन उन प्रयोजनों के लिए देश भर में हिंदी के प्रयोग को संभव बनाने की चुनौती आज भी हमारे सामने विद्यमान है. कार्यालयों में, व्यवसायों में, शिक्षालयों में और न्यायालयों में जब तक हिंदी प्रतिष्ठित नहीं हो जाती तब तक यही समझना चाहिए कि यह देश भाषिक तौर पर आजाद नहीं हुआ है. इस भाषिक आजादी को हासिल करने के लिए विविध प्रयोजनों की हिंदी के व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.

संभावनाओं से परिपूर्ण व्यवहार क्षेत्र के रूप में राजभाषाक्षेत्र अर्थात कार्यालय और प्रशासन का अपना महत्व है ,लेकिन लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता ने हिंदी की विविध प्रयुक्तियों को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. आज यदि खेल के मैदान से लेकर राजनीति के मैदान तक और व्यापर-वाणिज्य से लेकर कम्प्युटर के भूमंडलीय स्वरूप तक को सहेजने में हिंदी के विविध प्रयोजनमूलक रूप सक्षम दिखाई दे रहे हैं तो इसका श्रेय बड़ी सीमा तक हिन्दी पत्रकारिता को जाता है क्योंकि उसने राजकाज, शिक्षा,न्यायव्यवस्था और अन्य अनेक क्षेत्रों में राजभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा के बावजूद जनभाषा के रूप में उसकी व्यापक जनसंचार की शक्ति को पहचाना तथा नित-नूतन प्रसार पाते ज्ञानाधारित समाज की स्थापना में हिंदी को समृद्ध करते हुए स्वयं समृद्धि प्राप्त की.

वस्तुतः हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों के सन्दर्भ में पत्रकारिता की हिंदी के वैशिष्ट्य को समझना समसामयिक संचारयुग मेंअत्यंत प्रासंगिक विषय है. इसीलिए नीलम कपूर और सुनीता भाटिया ने अपनी पुस्तक ''प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता''[२००७] में इस विषय का सांगोपांग विवेचन किया है जो भाषा और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं वरन सामान्य अध्येता के लिए भी रोचक और उपयोगी है.
>ऋषभ देव शर्मा


*प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता ,
नीलम कपूर एवं सुनीता भाटिया ,
कान्ती पब्लिकेशन्स ,ए - ५०७/१२, साउथ गांवडी एक्सटेंशन , दिल्ली - ११००५३,
२००७, ४९५ रुपए ,सजिल्द. ३५० पृष्ठ .
--Posted By कविता वाचक्नवी to "हिन्दी भारत" at 4/04/2009 06:42:00 PM


गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

शिक्षण सामग्री गुणवत्ता नियंत्रण



'दूरस्थ माध्यम शिक्षण सामग्री गुणवत्ता नियंत्रण' विषयक कार्यशाला संपन्न


चेन्नै, 02अप्रैल, 2009।
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अंतर्गत दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के तत्वावधान में यहाँ द्वि-दिवसीय कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन दूरस्थ शिक्षा परिषद, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के सहयोग से सभा के सम्मेलन कक्ष में संपन्न हुआ जिसमें दो दिन तक चले विभिन्न वैचारिक सत्रों में ‘दूरस्थ माध्यम शिक्षण सामग्री और गुणवत्ता नियंत्रण’ के विविध पक्षों पर गहन चर्चा हुई।

डॉ. ऋषभदेव शर्मा के संयोजकत्व में संपन्न उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता इग्नू के प्रोफेसर डॉ.सत्यकाम ने की तथा एन.सी.ई.आर.टी. के डॉ. हीरालाल बाछोतिया मुख्य अतिथि के रूप में मंचासीन हुए। इग्नू के रसायन शास्त्र के आचार्य डॉ. बी.एस. सारस्वत ने उद्घाटन भाषण तथा उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने बीज वक्तव्य दिया।

विचार सत्रों में दूरस्थ माध्यम सामग्री के स्वरूप और दूरस्थ शिक्षा निदेशालय की सामग्री की गुणवत्ता पर समीक्षात्मक दृष्टि से परिपूर्ण आलेख प्रस्तुत किए गए। सत्रों की अध्यक्षता प्रो. टी.वी. कट्टीमनी, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. हीरालाल बाछोतिया तथा प्रो. सत्यकाम ने की। विषय विशेषज्ञ के रूप में मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के. आर. इकबाल अहमद तथा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय की निदेशक गीता वर्मा ने प्रतिभागियों को संबोधित किया। अमरेंद्र श्रीवास्तव, ए.जी. श्रीराम, एन. लक्ष्मी, सतीश कुमार श्रीवास्तव, बी. बी. खोत, कौशल्या वरदराजन, डॉ. मोहन नायुडु, प्रो. निर्मला एस. मौर्य, डॉ. बिष्णुकुमार राय, डॉ. लक्ष्मी अय्यर, डॉ. मधु धवन तथा डॉ. जी.नीरजा ने दूरस्थ शिक्षा माध्यम की पाठ सामग्री के निर्माण के अपने अनुभवों के आधार पर इस क्षेत्र की जटिलताओं और उनके समाधान की प्रक्रिया पर अपने विचार प्रकट किए। प्रधान सचिव सी.एन.वी. अण्णामलै ने अतिथियों का स्वागत सत्कार किया। गीता वर्मा के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ द्वि-दिवसीय कार्यशाला संपन्न हुई।

चित्र परिचय
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के चेन्नै केंद्र में संपन्न ‘दूरस्थ माध्यम शिक्षण सामग्री और गुणवत्ता नियंत्रण’ कार्यशाला में उपस्थित दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, चेन्नै की निदेशक गीता वर्मा, कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह, पी.जी. केंद्र हैदराबाद के अध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो.एम.वेंकटेश्वर , प्रो.टी.वी.कट्टीमनी एवं अन्य ।

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

हैदराबादी बिरयानी में मिथिला के मसाले*





कहानियाँ हमारे भीतर भी होती हैं और बाहर भी। सब तरफ जाने कितनी कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं! संवेदनशील रचनाकार इन कहानियों पर अपनी कल्पना का रंग चढ़ाकर इन्हें साहित्य का रूप दे देता है। सामाजिक संबंधों की विपुलता, अनुभवों की विशदता, अनुभूति की गहनता और अभिव्यक्ति की छटपटाहट से मिलकर बनती है कहानियाँ। जिसने जीवन को, समाज को, संसार को और सबसे महत्वपूर्ण है कि मनुष्य को जितने निकट से, जितने कोणों से और जितनी गहराई से देखा, जाना और परखा हो, वह उतनी ही तरह-तरह की कहानियाँ लिखने में सफल रहता है।


हैदराबाद की लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र (1948) भी एक ऐसी ही अनुभवों की धनी कलमकार हैं। उन्होंने अपने वैविध्यपूर्ण अनुभवों की थाती को कथारस में भिगोकर हिंदी साहित्य जगत् को ‘मेरी इक्यावन कहानियाँ’ (2009) समर्पित की हैं। एक कहानीकार के रूप में अहिल्या जी समकालीन कहानी की अनेक प्रवृत्तियों से असंतुष्ट और क्षुब्ध दिखाई देती हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि समकालीनता के नाम पर आजकल साहित्य में सामाजिक संघटन को विघटित करने, राष्ट्रीयता को ध्वस्त करने तथा देश के छोटे-से-छोटे गाँव से लेकर राजधानी तक को वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर लगभग गृहयुद्ध जैसी स्थिति में झोंकने का षडयंत्र चल रहा है। इससे साहित्य के मूल धर्म की क्षति उन्हें चिंतनीय प्रतीत होती है। कलमकारों का संस्कृति की रक्षा के स्थान पर उसके क्षरण में प्रवृत्त होना भी उन्होंने लक्षित किया है और यह चाहा है कि साहित्य लोकमंगल का पक्ष लेते हुए मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु समर्पित हो। इन मानवीय मूल्यों में सत्य, पे्रम, क्षमा, दया, करुणा, स्नेह, अनुराग, वात्सल्य, धीरता, वीरता, अहिंसा, औदार्य, मैत्री, सहयोग, संयम, कर्तव्यपालन, व्यवहार माधुर्य और सर्वभूत हितौषिता जैसे लोक हितकारी मनोभाव लक्षित किए जा सकते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ यथार्थ के धरातल पर स्थापित होने के बावजूद मनुष्य के विदू्रप स्वरूप के स्थान पर उसके आदर्श सौंदर्य को उकेरती हुई प्रतीत होती हैं।


अहिल्या मिश्र की कहानियों में गाँव और शहर का द्वंद्व परिवेश और मानसिकता दोनों ही स्तरों पर दिखाई देता है। उनका लेखकीय मन हैदराबाद जैसे महानगर में रहने के बाद भी मिथिलांचल के लिए तड़पता है। शहरी जीवन की आपाधापी, प्रदर्शनप्रियता और औपचारिकता पर उन्होंने अनेक स्थलों पर व्यंग्य किया है तथा सहज मानवीय संबंधों की सर्वोपरिता को बार-बार प्रतिपादित किया है। दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के व्यक्तिगत अहं के कारण पड़नेवाली दरार उनकी कई कहानियों में दिखाई देती है लेकिन अनेक स्वनामधन्य स्त्रीवादी लेखिकाओं से अहिल्या मिश्र इस अर्थ में भिन्न हंै कि वे इस अहं के विस्फोट में रिश्तों और घर को चकनाचूर नहीं करती बल्कि किसी-न-किसी संवेदन बिंदु से स्नेह की डोर को अटका देती हैं और स्त्री-पुरुष के मध्य संतुलन खोज लेती हैं।


अहिल्या मिश्र की कहानियाँ कल और आज में बहुत सहजता से आवाजाही करती प्रतीत होती हंै। स्मृतियों का उनके पास अकूत खजाना है। ये स्मृतियाँ उनके पात्रों के जीवन में रह-रहकर आती हैं और उनके मानस को कुरेदती हैं। यही कारण है कि अनेक पात्र अपने जीवन का पुनरवलोकन और मूल्यांकन करते प्रतीत होते हैं। ये स्मृतियाँ पात्रों के आत्मसाक्षात्कार का आधार भी बनी हैं और किसी प्रस्थानबिंदु पर निर्णय की पे्ररणा भी। जीवनानुभव के मंथन से ऐसे अवसरों पर उन्होंने महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी निकाले है। उदाहरण के लिए, पारिवारिक और सामाजिक मर्यादा के नाम पर निश्छल पे्रम की बलि देकर पे्रमहीन गृहस्थ जीवन अपनाने को उन्होंने फाँसी का फंदा पहनने जैसी मूर्खता माना है। इससे यह भी पता चलता है कि परिवार व्यवस्था की समर्थक होते हुए भी वे उसके दोषों से आँख नहीं फेरतीं और ऐसे विवाह को अवैध मानती है जिसमें लड़की को जानवरों सा बाँध-छाँदकर सात फेरों में कैद कर दिया जाता है। इसके व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों और परिणामों की चर्चा उनकी कई सारी कहानियों में मिलती है।


‘मेरी इक्यावन कहानियाँ’ पर यदि इस दृष्टि से विचार किया जाए कि किस कहानी के लिए लेखिका ने अपने आस-पास की किस स्त्री या किस घटना से पे्ररणा प्राप्त भी है, तो काफी रोचक जानकारियाँ सामने आ सकती हैं। ऐसा कहने का आधार यह है कि इन कहानियों को पढ़ते समय कई परिचित चेहरे और जीवन स्मृतियों में चक्कर मारने लगते हैं। स्मृतियों के साथ अहिल्या जी ने विस्मृति के दलदल को भी बखूबी समेटा है। हैदराबाद की एक व्यस्त सड़क पर गाउन पहने, गले में दुपट्टा डाले तेजी से चली जा रही प्रो. मति को कहानी का पात्र होते हुए भी सहज ही पहचाना जा सकता है। यह पहचान तब और भी गहरी हो जाती है जब जया सत्या को बताती है कि ‘‘अगर तुम इनकी आवाज सुन लोगी तो मंत्रमुग्ध हो जाओगी। मधुरवाणी इनके व्यक्तित्व का मुख्य अंग है। मीठी आवाज इनकी पहचान है। हँसमुख चेहरा लिए सभी से प्यार से मिलना इनकी आदत है।’’ प्रो. मति के मित्र और छात्र इतने से परिचय से उन्हें साफ पहचान लेंगे। उनका दोहन करनेवाले साहित्य जगत् के ठेकेदार प्रीत की गतिविधियाँ भी हैदराबाद के हिंदी जगत् की रोज की देखी भाली गतिविधियाँ हैं। प्रो. मति अब इस स्वार्थी संसार में नहीं हंै। पता नहीं, उन्हें पता भी है कि नहीं कि किसी ने उन्हें कहानी बना दिया!

डॉ. अहिल्या मिश्र की इन कहानियों की विषयवस्तु जिस तरह दैनंदिन जीवन से उठाई गई है, परिवेश और भाषा भी बड़ी सीमा तक वहीं से गृहीत है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, मिथिलांचल लेखिका का पीछा नहीं छोड़ता - पीहर ने कभी किसी स्त्री का पीछा छोड़ा है! यही कारण है कि वे अनेक स्थलों पर अपनी कहानियों में मैथिल परंपरा और मान्यताओं पर विस्तार से प्रकाश डालती हंै और मैथिली भाषा के संवाद रचती है। इससे इन कहानियों को वास्तव में वैशिष्ट्य प्राप्त हुआ है। अधिक कुछ कहने की अपेक्षा पाठकों को मैथिली भाषा के संवादों का आस्वादन कराना उचित होगा -


1. ‘‘हे चौदहवीं का चान। अहाँ के पाविक हम धन्य भेलहुँ। जतेक अहाँ के रूप क चर्चा सुनल हूँ। ताहि से कही बेशी अहाँ सुनर छी। सभा गाछी में नई जइतहुँ न एहन कमलक फूल कहाँ पवितहूँ।’’


2. ‘‘कि भेलैया से हमारा नई बूझि परइत अछि, लेकिन बद्री कोनो उत्पात मचैने छै। ओकर सब दिन के ई आदैत छै। कि करवा तो जाक आराम कर, बड़की दुल्हिन छथिन ने ऊ बात सम्हाइर लेथिन्ह।’’


3. ‘‘अरे कोई है ब्ई कि नई, कनि देखियऊ बच्ची कियक कानि रहल छैक। ऐन साब कोई कियक छोड़ि दैते जाई छैयक। कतेक जुगुत जतन सँ भगवान ई दिन देखैलैथ अछि। बचिया कनैइत कनैइत अपसियाँत भेल है, आ केकरो कान पर जूँ नहीं रेंग रहल आछि। हे गंभारीवाली ई सब छोरि क देखहक त बचिया के। कने ओकरा एने उठैने आबा।’’


निस्संदेह लोकसंस्कृति और जनभाषा के प्रयोग ने अहिल्या मिश्र की कहानियों को मौलिक व्यक्तित्व प्रदान किया है। हिंदी जगत में इनका स्वागत होगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

* मेरी इक्यावन कहानियाँ / डॉ. अहिल्या मिश्र / गीता प्रकाशन ,हैदराबाद / २००९ / ५०० रुपए / २९६ पृष्ठ.