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शनिवार, 28 मार्च 2009

डॉ. मारिया नेज्यैशी का दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में आगमन

हैदराबाद, २७ मार्च २००९ ।



"हंगरी की जनता को अपनी भाषा से अत्यधिक लगाव है। वह अपनी भाषा को सम्मान का प्रतीक मानती है इसीलिए उसने उसे बचा कर रखा है तथा सभी स्तरों पर सारे काम काज वहां हङ्गेरियन भाषा में ही किये जाते हैं। प्रारम्भिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की सभी विषयों की शिक्षा हङ्गेरियन में ही दी जाती है - चाहे वह अर्थ शास्त्र हो या भौतिक विज्ञान। वहां के छात्र भारत और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए अत्यंत समर्पण भाव से हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन करते हैं। हंगरी के लोगों को हिंदी सीखने में अधिक कठिनाई नहीं होती और वे जल्दी ही अधिकार पूर्वक हिंदी में वार्तालाप करना सीख जाते हैं॥ मैं भारत की अपनी यात्राओं में सर्वत्र हिंदी में ही बोलती हूँ। और मेरी राय है कि हिंदी के सम्बन्ध में असुरक्षा भाव नहीं रखना चाहिए।"


ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में आयोजित विशेष कार्यक्रम 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' में नगरद्वय के विविध भाषाभाषी लेखकों से बात करते हुए तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए डॉ.मारिया नेज्यैशी ने व्यक्त किये. डॉ. मारिया नेज्यैशी हंगरी के युटोस लोरांड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर हैंतथा इन दिनों भारत प्रवास पर हैं. उनके नगरागमन पर आयोजित इस कार्यक्रम में हैदराबाद के हिंदी सेवियों और रचनाकारों की ओर से पुस्तकें समर्पित कर उनका सम्मान किया गया. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सचिव के.विजयन ने सभा-चिह्न से अलंकृत शाल पहनाकर डॉ.मारिया नेज्यैशी का अभिनन्दन किया.


आयोजन की अध्यक्षता करते हुए 'स्वतंत्र वार्ता ' के सम्पादक डॉ.राधे श्याम शुक्ल ने यूरोप में हंगरी तथा भारत में हैदराबाद की तुलना करते हुए कहा कि ये दोनों ही अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अपने अपने क्षेत्र में दिल के समान माने जाते हैं. अतः यह आयोजन दो दिलों के मिलन जैसा आह्लादकारी और रोमांचक है. उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के परस्पर संबंधों की चर्चा करते हुए बल देकर यह कहा कि भारतीयों को हंगरी से भाषा प्रेम और सांस्कृतिक स्वाभिमान की प्रेरणा लेनी चाहिए.


आरम्भ में मुख्य अतिथि डॉ. मारिया नेज्यैशी ने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार, शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध के सम्बन्ध में कई प्रकार की जिज्ञासाएँ प्रकट कीं जिनका समाधान करते हुए उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने हिंदी भाषा आन्दोलन के इतिहास, लक्ष्य, स्वरूप और संभावनाओं पर प्रकाश डाला. डॉ. मारिया नेज्यैशी ने हिंदी प्रचार में महिलाओं की भूमिका तथा द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी की पाठ्य पुस्तकों के निर्माण की प्रक्रिया में विशेष रुचि प्रकट की.


'गुफ्तगू' के दौरान डॉ.कविता वाचक्नवी, डॉ. रोहिताश्व, डॉ. राजकुमारी सिंह, डॉ. धर्म पाल पीहल और डॉ. पी माणिक्याम्बा ने मुख्य अतिथि से हंगरी भाषा, वहां के जनजीवन, रीति रिवाज़, साहित्य की प्रवृतियों, साहित्यकारों के सम्मान तथा हिंदी सीखने की सुविधा और बाधा जैसे विविध विषयों पर सवाल किए.


बातचीत में डॉ.तेजस्वी कट्टीमनी, डॉ. बी बालाजी, डॉ.रोहिताश्व, डॉ.कविता वाचकनवी, डॉ.रेखा शर्मा, डॉ..बलविंदर कौर, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.कांता बौद्ध, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल,, पवित्रा अग्रवाल, डॉ. अहिल्या मिश्र, संपत देवी मुरारका, डॉ. करण सिंह ऊटवाल , सीमा मेंडोस, श्रीनिवास सोमानी, आशादेवी सोमानी, पुष्पलता शर्मा, सविता सोनी, उमा देवी सोनी, डॉ.सुरेश दत्त अवस्थी. डॉ.आनंद राज वर्मा, डॉ.भास्कर राज सक्सेना, डॉ.विजय कुमार जाधव, के.नागेश्वर राव, रामकृष्णा तथा भगवान दास जोपट आदि ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.खुर्शीदा बेगम ने गीत प्रस्तुत किया.


कार्यक्रम के संयोजक तथा उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाधाक्ष्य प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी के धन्यवाद प्रस्ताव के उपरांत ''साहित्यकारों से गुफ्तगू'' का यह विशेष आयोजन युगादि की शुभकामनाओं के आदान प्रदान के साथ संपन्न हुआ.
Posted By कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee to "हिन्दी भारत" at 3/27/2009 07:37:00 PM

गुरुवार, 26 मार्च 2009

हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक




पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा

हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक






यह संभव है कि विश्व की रचना किसी ईश्वर ने की हो , फिर भी यह तयशुदा है कि इसमें निहित वस्तुओं को नाम हम मनुष्यों ने दिए हैं और इसी से ये वस्तुएं हमारी चेतना का अंग बन पाई हैं. अलग अलग शब्दों में भारतीय भाषा चिंतन में यह दोहराया गया है कि हमारी शब्दावली को हमारे बाहरी और भीतरी विकास के साथ कदम से कदम मिला कर चलना पड़ता है. ऐसा न होने पर हमारी संकल्पनात्मक शक्ति धुंधली और अस्पष्ट होने लगती है.इस बात को आधुनिक भाषा चिंतकों ने भी माना है कि किसी समाज की प्रगति उसकी भाषा के आधुनिकीकरण से ही निर्धारित और निर्दिष्ट होती है. इसलिए भाषा विकास की यात्रा में हमें अपनी विरासत को संभालते हुए नै चुनौतियों के अनुरूप परिवर्तनों को आत्मसात करते चलना पड़ता है. हिन्दी इन दोनों पक्षों का संतुलन साधने में सक्षम होने के कारण ही स्थानीयता और वैश्विकता की शर्तों को एक साथ पूरा कर रही है..इसके लिए वह एक ओर जहाँ सस्कृत और लोकभाषा में निहित अपनी जड़ों से जुडी हुई है ,वहीं दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान विज्ञान और व्यापार वाणिज्य के निमित्त अन्य देशी विदेशी भाषाओँ से भी शब्द ग्रहण करने में परहेज़ नहीं करती.


प्रो. दिलीप सिंह [१९५१] ने अपने ग्रन्थ ''हिन्दी भाषा चिंतन'' में हिन्दी भाषा के इस सतत विकासमान स्वरूप का सम्यक भाषावैज्ञानिक विवेचन किया है.


ग्रन्थ के पहले खंड 'धरोहर' में हिंदी के शब्द संसार की व्यापकता और शक्ति को डॉ. रघुवीर के कोष पर पुनर्विचार के सहारे रेखांकित करने के बाद हिन्दी व्याकरण के तीनों कालों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया है. विषद व्याकरण की ज़रुरत बताते हुए लेखक ने सावधान किया है कि हमें एक तो केवल स्थितियों को नियंत्रित करनेवाले भाषा के कामचलाऊ स्टार से बचना होगा तथा दूसरे,सामर्थ्यहीन, बनावटी, निर्जीव और संकीर्ण भाषा और शुद्धतावादी दृष्टिकोण के प्रति भी सावधान रहना होगा. ठीक भी है , वरना भाषा तो अपनी गति से प्रगति करती पहेगी और व्याकरण जड़ होकर पिछड़ जाएगा. यहीं लिखत और मौखिक भाषारूपों की भी चर्चा की गई है. इस खंड की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में हिन्दीभाषा विज्ञान में महिलाओं के योगदान के मूल्यांकन की चर्चा की जा सकती है.एक सुलझे हुए समाजभाषावैज्ञानिक के रूप में लेखक ने इस मूल्यांकन द्वारा स्त्री-विमर्श को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा है।


दूसरे खंड में समाज भाषा विज्ञान के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए भाषा प्रयोग की दिशाओं का जायजा लिया गया है. तीसरा खंड मानकीकरण को समर्पित है जबकि चौथे खंड में हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दो मुद्दे उठाए गए हैं.यहाँ लेखक ने ''दक्खिनी'' को हिंदी के विकास की मजबूत कड़ी के रूप में प्रस्तावित किया है और हिंदी तथा उर्दू के विवाद को बेमानी माना है.पांचवें खंड में स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में भाषा नियोजन का पक्ष विवेचित है. लेखक ने प्रयोजनमूलक हिंदी के नए नए रूपों के विस्तार को भी नियोजन का व्यावहारिक आयाम मानते हुए विविध ज्ञान शाखाओं और रोजगारपरक क्षेत्रों में प्रयुक्त भाषारूपों को भाषा की संप्रेषण शक्ति और जिजीविषा का प्रतीक माना है.इसीलिये हिन्दी की प्रयोजन मूलक शैलियों की विस्तृत चर्चा करते हुए छठे खंड में जहाँ व्यावसायिक हिंदी के विविध रूप वर्णित हैं , वहीं पत्रकारिता और साहित्य समीक्षा की भाषा के साथ पहली बार पाक-विधि की भाषा का सोदाहरण विवेचन करते हुए आधुनिक हिंदी के अभिव्यक्ति-सामर्थ्य का दृढ़ता पूर्वक प्रतिपादन किया गया है.


सातवें और अंतिम खंड ''हिंदी का विस्तार'' में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के योगदान का तटस्थ मूल्यांकन करने के साथ हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर विचार किया गया है. इस प्रकार यहाँ हिंदी के स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक सभी सन्दर्भ विविध पक्षों के साथ उभर कर सामने आ सके हैं. इस प्रकार यह कृति इस तथ्य को भली भाँति असंदिग्ध रूप में प्रतिपादित करती है कि -


''हिंदी भाषा मात्र एक व्याकरणिक व्यवस्था नहीं है, वह हिंदी भाषा समुदाय में व्यवस्थाओं की व्यवस्था के रूप में प्रचलित और प्रयुक्त है ; इस तथ्य के प्रकाश में निर्मित हिंदी-व्याकरण ही भाषा के उन उपेक्षित धरातलों पर विचार कर सकेगा जो वास्तव में भाषा प्रयोक्ता के भाषाई कोष की धरोहर हैं. कोई भी जीवंत शब्द और जीवंत भाषा एक नदी की तरह विभिन्न क्षेत्रों से गुजरती और अनेक रंग-गंध वाली मिटटी को समेटती आगे बढ़ती है. हिंदी भी एक ऐसी ही जीती जागती भाषा है. इसके व्यावहारिक विकल्पों को व्याकरण में उभारना, यही एक तरीका है कि हम हिंदी को उसकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय भूमिका में आगे ले जा सकते हैं.''




हिंदी भाषा चिंतन / प्रो. दिलीप सिंह /
वाणी प्रकाशन,
२१-ऐ, दरियागंज , नई
दिल्ली - ११०००२ /
२००९ / ४०० रुपये /
२८८ पृष्ठ -सजिल्द।



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Posted By कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee to "हिन्दी भारत" at 3/25/2009 08:22:00 PM

मंगलवार, 24 मार्च 2009

राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ शताब्दी समारोह


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में
राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ शताब्दी समारोह संपन्न


हैदराबाद, 24 मार्च 2009.


इस वर्ष राष्ट्रकवि डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को हुआ था। उन्हें हिंदी साहित्य में उत्तर छायावाद के प्रमुख कवि माना जाता है। भावुक राष्ट्रीयता, दार्शनिक चिंतन और कामाध्यात्म से संपन्न उनकी ‘हुंकार’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ जैसी रचनाएँ हिंदी साहित्य की अमिट धरोहर हैं। उनके काव्य नाटक ‘उर्वशी’ को 1972 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ भारत की सामासिक संस्कृति के विकासक्रम की व्याख्या करनेवाला अद्वितीय ग्रंथ है।



देशभर में ‘दिनकर शताब्दी’ के अंतर्गत आयोजित समारोहों की इस कडी में यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में एकदिवसीय साहित्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया।


आरंभ में संस्थान के आचार्य एवं अध्यक्ष डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए आवेग, वाग्मिता, आक्रोश, व्यंग्य और सौंदर्यबोध जैसे आयामों की कसौटी पर 'दिनकर' के काव्य के मूल्यांकन की आवश्यकता बताई।


दीप प्रज्वलन द्वारा कार्यक्रम का उद्घाटन करने के उपरांत ‘स्वतंत्र वार्ता’ के संपादक, मुख्य अतिथि डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने ध्यान दिलाया कि ‘दिनकर’ अपनी काव्य कृतियों में भारतीय इतिहास और मिथकों से कथासूत्र ग्रहण करके उनके माध्यम से आधुनिक युग के प्रश्नों की व्याख्या करते हैं। उन्होंने ‘दिनकर’ को प्रेम और युद्ध का ऐसा कवि स्वीकार किया जिसकी आस्था मानवधर्म और वैश्विकता में है।



समारोह की अध्यक्षता करते हुए आर्ट्स कालेज, उस्मानिया विश्वविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. एम. वेंकटेश्वर ने कहा कि ‘दिनकर’ आवेगपूर्ण राष्ट्रीयता के साथ गहन सांस्कृतिक चिंतन को अभिव्यक्त करनेवाले ऐसे कवि हैं जिन्होंने आपद्धर्म के रूप में युद्ध के औचित्य का दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन किया है।



इस अवसर पर अर्पणा दीप्ति ने दिनकर के व्यक्तित्व और विचारधारा, डॉ. पी.श्रीनिवास राव ने उनकी कृति ‘कुरुक्षेत्र’, डॉ. बलविदंर कौर ने ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, डॉ. जी. नीरजा ने ‘उर्वशी’ और डॉ. मृत्युंजय सिंह ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पर केंद्रित आलेख प्रस्तुत किए तो डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल ने ‘दिनकर की डायरी’ के विविध प्रसंगों पर प्रकाश डाला।



समारोह के दौरान हेमंता बिष्ट, कैलाशवती, अंजली मेहता, सुचित्रा, जी. श्रीनिवास राव, एस. वंदना, संगीता, कुतुबुद्दीन और एस. इंदिरा ने राष्ट्रकवि की विभिन्न कृतियों से ली गई कतिपय प्रतिनिधि और प्रसिद्ध रचनाओं का भावपूर्ण शैली में वाचन किया।


चर्चा परिचर्चा को विजयलक्ष्मी, हेमलता, एन. वंदना, रऊफ मियाँ, भगवान, रीना झा, वैभव भार्गव, ए.जी. श्रीराम, के. नागेश्वर राव, ज्योत्स्ना कुमारी तथा भगवंत गौडर आदि ने अपनी जिज्ञासाओं से जीवंत बनाया|

रविवार, 22 मार्च 2009

रँग गई पग-पग धन्य धरा


वसंत-पंचमी: सरस्वती पूजन का दिन।

सरस्वतीः सृजन की अधिष्ठात्री देवी |

वसंत बर्फ के पिघलने, गलने और अँखुओं के फूटने की ऋतु है। ऋतु नहीं, ऋतुराज। वसंत कामदेव का मित्र है। कामदेव ही तो सृजन को संभव बनाने वाला देवता है। अशरीरी होकर वह प्रकृति के कण कण में व्यापता है। वसंत उसे सरस अभिव्यक्ति प्रदान करता है। सरसता अगर कहीं किसी ठूँठ में भी दबी-छिपी हो, वसंत उसमें इतनी ऊर्जा भर देता है कि वह हरीतिमा बनकर फूट पड़ती है। वसंत उत्सव है संपूर्ण प्रकृति की प्राणवंत ऊर्जा के विस्फोट का। प्रतीक है सृजनात्मक शक्ति के उदग्र महास्फोट का। इसीलिए वसंत पंचमी सृजन की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा का दिन है।


हिंदी जाति के लिए वसंत पंचमी का और भी अधिक महत्व है। सरस्वती के समर्थ पुत्र महाकवि 'निराला' का जन्मदिन भी हम वसंत पंचमी को ही मनाते हैं। गंगा प्रसाद पांडेय ने 'निराला' को महाप्राण कहा है। उनमें अनादि और अनंत सृजनात्मक शक्ति मानो अपनी परिपूर्णता में प्रकट हुई थी। यह निराला की महाप्राणता ही है कि उन्होंने अपने नाम को ही नहीं,जन्मतिथि और जन्मवर्ष तक को संशोधित कर दिया। अपनी बेटी की मृत्यु पर लिखी कविता 'सरोज स्मृति' में एक स्थान पर उन्होंने भाग्य के लेख को बदलने की अपनी ज़िद्द का उल्लेख किया है। सचमुच उन्होंने ऐसा कर दिखाया। यह महाकवि की महाप्राणता नहीं तो और क्या है?


महाप्राण निराला का जन्म यों तो माघ शुक्ल एकादशी, संवत् १९५५ तदनुसार इक्कीस फरवरी १८९९ ई. को हुआ था, लेकिन उन्होंने अपने निश्चय द्वारा वसंत पंचमी को अपना जन्म दिन घोषित किया। हुआ यों कि गंगा पुस्तकमाला के प्रकाशक दुलारे लाल भार्गव ने सन् १९३० ई. में वसंत पंचमी के दिन गंगा पुस्तकमाला का महोत्सव और अपना जन्मदिन मनाया। इस अवसर पर निराला ने उनका परिचय देते हुए निबंध पढ़ा। डॉ.रामविलास शर्मा बताते हैं कि "उन्होंने देखा कि दुलारेलाल भार्गव वसंत पंचमी को अपना जन्मदिवस मनाते हैं। उन्होंने निश्चय किया कि वह भी वसंत पंचमी को ही पैदा हुए थे। वसंत पंचमी सरस्वती पूजा का दिन, निराला सरस्वती के वरद् पुत्र, वसंत पंचमी को न पैदा होते तो कब पैदा होते? नामकरण संस्कार से लेकर जन्मदिवस तक निराला ने अपना जन्मपत्र नए सिरे से लिख डाला।"


निराला की आराध्य देवी है सरस्वती और प्रिय ऋतु है वसंत। वसंत को प्रेम करने का अर्थ है सौंदर्य को प्रेम करना। सरस्वती की आराधना का अर्थ है रस की आराधना। निराला की कविता इसी सौंदर्यानुभूति और रस की आराधना की कविता है। सृष्टि के कण-कण में छिपी आग वसंत में रंग-बिरंगे फूलों के रूप में चटख-चटख कर खिल उठती है। कान्यकुब्ज कॉलिज, लखनऊ के छात्रों ने एक बार उन्हें दोने में बेले की कलियाँ भेंट दी थीं; निराला ने अपनी कविता 'वनवेला' उन्हें भेंट कर दी। उन्हें सुगंधित पुष्प बहुत प्रिय थे। रंग और गंध की उनकी चेतना उन्हें अग्नि तत्व और पृथ्वी तत्व का कवि बनाती है। वे पृथ्वी की आग के कवि हैं तथा वसंत पंचमी पृथ्वी की इस आग के सरस्वती के माध्यम से आवाहन का त्योहार। वसंत अपने पूरे रंग वैभव के साथ उनके गीतों में उतरता है-प्रिय पत्नी मनोहरा की स्मृति भी जगमग करती जाग उठती है। रंग और गंध की मादकता तरु के उर को चीरकर कलियों की तरुणाई के रूप में दिग्-दिगंत में व्यापने लगती है -

"रँग गई पग-पग धन्य धरा -
हुई जग जगमग मनोहरा।
वर्ण गंध धर, मधु-मकरंद भर
तरु उर की अरुणिमा तरुणतर
खुली रूप कलियों में पर भर
स्तर-स्तर सुपरिसरा।"


कवि को लगता है कि कला की देवी ने कानन भर में अपनी कूची इस तरह फूलों के चेहरों पर फिरा दी है कि सब ओर रंग फूटे पड़ रहे हैं -

"फूटे रंग वासंती, गुलाबी,
लाल पलास, लिए सुख, स्वाबी,
नील, श्वेत शतदल सर के जल,
चमके हैं केशर पंचानन में।"


रंगों की बरात लिए वसंत आता है तो आनंद से सारा परिवेश सराबोर हो उठता है। वसंत और कामदेव का संबंध शिव के साथ भी है। शिव काम को भस्म भी करते हैं और पुनर्जीवन भी देते हैं। शिव पुरुष भी हैं और स्त्री भी। निराला भी अर्धनारीश्वर हैं। उनमें एक ओर पुरुषत्व के अनुरूप रूपासक्ति और आक्रामकता थी तो दूसरी ओर नारीत्व के अनुरूप आत्मरति तथा समर्पण की प्रबल भावना भी थी। वे सड़क पर कुर्ता उतारकर अपना बलिष्ठ शरीर प्रदर्शित करते हुए चल सकते थे तो सुंदर बड़ी-बड़ी आँखों और लहरियादार बालों से उभरती अपनी 'फेमिनिन ग्रेसेज' पर खुद ही मुग्ध भी हो सकते थे। यही कारण है कि वसंत की कुछ कविताओं में वे स्त्रीरूप में भी सामने आते हैं -

"सखि, वसंत आया।
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया।
किसलय-वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु पतिका
मधुप-वृंद बंदी
पिक-स्वर नभ सरसाया।"


वसंत का यह हर्षोंल्लास संक्रामक है। प्रकृति से प्राणों तक तनिक-सा छू ले, तो फैलता जाता है। कुंज-कुंज कोयल की कूक से पगला जाता है। सघन हरियाली काँप-काँप जाती है। प्राणों की गुफा में अनहद नाद बज उठता है। रक्त संचार में रसानुभूति का आवेग समा जाता है। यह सब घटित होता है केवल स्वर की मादकता के प्रताप से -

"कुंज-कुंज कोयल बोली है,
स्वर की मादकता घोली है।"


यही मादकता तो 'जुही की कली' की गहरी नींद का सबब है। वासंती निशा में यौवन की मदिरा पीकर सोती मतवाली प्रिया को मलयानिल रूपी निर्दय नायक निपट निठुराई करके आखिर जगा ही लेता है-
"सुंदर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिए गोरे कपोल गोल ;
चौंक पड़ी युवती
चकित चितवन निज चारों ओर फेर,
हेर प्यारे को सेज-पास,
नम्रमुख हँसी-खिली
खेल रंग प्यारे-संग।"


कबीर हों या नानक, सूर हों या मीरा - सबने किसी न किसी रूप में जुही की कली और मलयानिल की इस प्रेम-क्रीड़ा को अपने मन की आँखों से देखा है। भक्ति और अध्यात्म का मार्ग भी तो इसी प्रकृति पर्व से होकर जाता है। तब प्रियतम और वसंत-बहार में अद्वैत घटित होता है -

"आए पलक पर प्राण कि
वंदनवार बने तुम।
उमड़े हो कंठ के गान
गले के हार बने तुम।
देह की माया की जोती,
जीभ की सीपी की मोती,
छन-छन और उदोत,
वसंत-बहार बने तुम।"


यह वसंत-बहार हँसने, मिलने, मुग्ध होने, सुध-बुध खोने, सिंगार करने, सजने-सँवरने, रीझने-रिझाने और प्यार करने के लिए ही तो आती है। निराला इस ऋतु में नवीनता से आँखें लडाते हैं -

"हँसी के तार के होते हैं ये बहार के दिन।
हृदय के हार के होते हैं ये बहार के दिन।
निगह रुकी कि केशरों की वेशिनी ने कहा,
सुगंध-भार के होते हैं ये बहार के दिन।
कहीं की बैठी हुई तितली पर जो आँख गई,
कहा, सिंगार के होते हैं ये बहार के दिन।
हवा चली, गले खुशबू लगी कि वे बोले,
समीर-सार के होते हैं ये बहार के दिन।
नवीनता की आँखें चार जो हुईं उनसे,
कहा कि प्यार के होते हैं ये बहार के दिन।"


इस वसंत-बहार का ही यह असर है कि कवि को बाहर कर दिए जाने का तनिक मलाल नहीं। कोई सोचे तो सोचा करे कि कवि को देस-बदर कर दिया या साहित्य से ही बेदखल कर दिया। पर उसे यह कहाँ मालूम कि भीतर जो वसंत की आग भरी है, वह तो कहीं भी रंग-बिरंगे फूल खिलाएगी ही। इस आग से वेदना की बर्फ जब पिघलती है तो संवेदना की नदी बन जाती है। चमत्कार तो इस आग का यह है कि सख्त तने के ऊपर नर्म कली प्रस्फुटित हो उठती है। कठोरता पर कोमलता की विजय; या कहें हृदयहीनता पर सहृदयता की विजय -

"बाहर मैं कर दिया गया हूँ।
भीतर, पर भर दिया गया हूँ।
ऊपर वह बर्फ गली है,
नीचे यह नदी चली है,
सख्त तने के ऊपर नर्म कली है;
इसी तरह हर दिया गया हूँ।
बाहर मैं कर दिया गया हूँ।"


जब सख्त तने पर नर्म कली खिलती है तो उसकी गंध देश-काल के पार जाती है -

"टूटें सकल बंध
कलि के, दिशा-ज्ञान-गत हो बहे गंध।"

और तब किसी नर्गिस को खुद को बेनूर मानकर रोना नहीं पड़ता। वसंत की हवा बहती है तो नर्गिस की मंद सुगंध पृथ्वी भर पर छा जाती है। ऐसे में कवि को पृथ्वी पर स्वर्गिक अनुभूति होती है, क्योंकि -

"युवती धरा का यह था भरा वसंतकाल,
हरे-भरे स्तनों पर खड़ी कलियों की माल।
सौरभ से दिक्कुमारियों का तन सींच कर,
बहता है पवन प्रसन्न तन खींच कर।"


वसंत अकुंठ भाव से तन-मन को प्यार से खींचने और सींचने की ऋतु है न! रस-सिंचन का प्रभाव यह है कि -

"फिर बेले में कलियाँ आईं।
डालों की अलियाँ मुस्काईं।
सींचे बिना रहे जो जीते,
स्फीत हुए सहसा रस पीते
नस-नस दौड़ गई हैं खुशियाँ
नैहर की कलियाँ लहराई।"


इसीलिए कवि वसंत की परी का आवाहन करता है -

"आओ; आओ फिर, मेरे वसंत की परी छवि - विभावरी,
सिहरो, स्वर से भर-भर अंबर की सुंदरी छवि-विभावरी!"


वसंत की यह परी पहले तो मनोहरा देवी के रूप में निराला के जीवन में आई थी और फिर सरोज के रूप में आई। सौंदर्य का उदात्ततम स्वरूप 'सरोज-स्मृति' में वसंत के ही माध्यम से साकार हुआ है -
"देखा मैंने, वह मूर्ति धीति
मेरे वसंत की प्रथम गीति-
श्रृंगार, रहा जो निराकार,
रस कविता में उच्छ्वसित धार
गाया स्वर्गीय प्रिया-संग-
भरता प्राणों में राग - रंग,
रति रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदलकर बना मही।"


इतना ही नहीं, राम और सीता का प्रथम मिलन भी इसी ऋतु में संभव हुआ -
"काँपते हुए किसलय, झरते पराग-समुदाय,
गाते खग-नव जीवन परिचय, तरु मलयवलय।"


वसंत का यह औदात्य निराला की कविता 'तुलसीदास' में रत्नावली को शारदा (सरस्वती) बना देता है। निराला वसंत के अग्रदूत महाकवि हैं। वसंत की देवी सरस्वती का स्तवन उनकी कविता में बार-बार किया गया है। वे सरस्वती और मधुऋतु को सदा एक साथ देखते हैं।

"अनगिनत आ गए शरण में जन, जननि,
सुरभि-सुमनावली खुली, मधुऋतु अवनि।"


निराला अपनी प्रसिद्ध 'वंदना' में वीणावादिनी देवी सरस्वती से भारत में स्वतंत्रता का संस्कार माँगते हैं। वे मनुष्य ही नहीं, कविता की भी मुक्ति चाहने वाले रचनाकार हैं। यह मुक्ति नवता के उन्मेष से जुड़ी है। वसंत और सरस्वती दोनों ही नवनवोन्मेष के प्रतीक हैं -

"नव गति, नव लय, ताल छंद नव
नवल कंठ, नव जलद मंद्र रव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर नव स्वर दे!"


सरस्वती को निराला भारत की अधिष्ठात्री देवी मानते हैं। वे मातृभूमि और मातृभाषा को सरस्वती के माध्यम से प्रणाम करते हैं -

"जननि, जनक-जननि जननि,
जन्मभूमि - भाषे।
जागो, नव अंबर-भर
ज्योतिस्तर-वासे!"


यह देवी 'ज्योतिस्तरणा' है जिसके चरणों में रहकर कवि ने अंतर्ज्ञान प्राप्त किया है और यही देवी भारतमाता है जिसके चरण-युगल को गर्जितोर्मि सागर जल धोता है -

"भारति, जय, विजय करे।
कनक-शस्य-कमलधरे।"


कनक-शस्य-कमल को धारण करने वाली यह देवी शारदा जब वर प्रदान करती है तो वसंत की माला धारण करती है -

"वरद हुई शारदा जी हमारी
पहनी वसंत की माला सँवारी।"


वसंत की माला पहनने वाली यही देवी नर को नरक त्रास से मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। सरस्वती धरा पर वसंत का संचार कर दे तो 'जर्जर मानवमन, को स्वर्गिक आनंद मिल जाए। बस, चितवन में चारु-चयन लाने भर की देर है-

"माँ, अपने आलोक निखारो,
नर को नरक त्रास से वारो।
पल्लव में रस, सुरभि सुमन में,
फल में दल, कलरव उपवन में,
लाओ चारु-चयन चितवन में
स्वर्ग धरा के कर तुम धारो।"


जब धरती को सरस्वती की चारु-चयन-चितवन मिलती है तो पार्थिवता में अपार्थिवता का अवतार होता है-

"अमरण भर वरण-गान
वन-वन उपवन-उपवन
जागी छवि खुले प्राण।"


वसंत ने जो अमर संगीत सारी सृष्टि में भर दिया है, उसके माध्यम से साकार होने वाली कला और सौंदर्य की देवी ने कवि के प्राणों को इस प्रकार बंधनमुक्त कर दिया है कि उसमें महाप्राणता जाग उठी है। निराला की महाप्राणता का स्रोत वसंत की अनंतता के प्रति उनके परम-विश्वास में ही निहित है -
"अभी न होगा मेरा अंत
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसंत -
अभी न होगा मेरा अंत।"